Tuesday, May 5, 2020

खिलने दो न असहमति के सौन्दर्य को


लॉकडाउन खुल रहा है धीरे-धीरे. तुम्हारे शहर में भी तो खुला होगा न? मैं गयी थी बाजार कुछ जरूरी सामान लेने. पूरे 42 दिन बाद बाज़ार. अजीब उहापोह थी मन में. बाजार जाते ही खत्म हो गयी. इतनी भीड़ थी वहां कि बिना कुछ लिए ही वापस आ गयी. अब इसी तरह जीने की आदत डालनी होगी. आर्थिक स्थिति डांवाडोल पहले ही कम नहीं थी अब और बंटाधार होगा इसका. शराब की दुकानों पर लगी लाइनें मजाक और विमर्श का विषय नहीं हैं विमर्श का विषय है सरकार की वह मजबूरी जो पहले तो पूरे देश को घरकैद कर देती है सुरक्षा के नाम पर और फिर जरूरी दुकानों और दफ्तरों को कुछ नियमों के साथ खोलने की बात करती है और उस जरूरी की लिस्ट में शराब को रख देती है. क्यों? विमर्श का विषय है कि जब समूची दुनिया कोरोना से लड़ रही थी क्यों सरकार भूली नहीं अपना जातिवादी, धर्मवादी एजेंडा और चुन-चुनकर लोगों को जेल भेजती रही, केस ठोंकती रही. कहीं कोई चर्चा भी न हुआ. काम भी हो गया. कोविड की आड़ में क्या-क्या न झोली किया सरकार ने. अजीब बात है न? वैसे इतनी अजीब भी नहीं. अजीब और बहुत कुछ चलता रहता है इन दिनों. जैसे हम इतने जजमेंटल क्यों हैं. किसी के बारे में, किसी बात पर राय बनाने को लेकर इतनी जल्दी में क्यों रहते हैं. या तो किसी के गले में लटक जाने तक सहमत होते हैं या पिस्तौल तान देने की हद तक विरोध में खड़े हो जाते हैं. दुखद है यह. हम असहमत हो सकते हैं लेकिन उन बारीकियों को समझते हुए कि क्यों हैं असहमत. बिना किसी को कटघरे में खड़ा करे. हमारी किसी से असहमति हमारे सोचने की लेयर्स का अंतर भी हो सकता है. मुझे तो लगता है मेरी कम समझी भी हो सकती है. जानती ही कितना हूँ. अपने जाने हुए का विस्तार मुझे हमेशा असहमतियों के बीच ही मिला है.

मैंने बताया था न तुम्हें मैं मोनिका कुमार को पढ़ रही हूँ इन दिनों. अपने भीतर कुछ उगता हुआ लगता है उन्हें पढ़ते हुए. मेरे कम जाने को विस्तार जैसा. या जाने हुए का ज्यादा जानने की ओर बढाने जैसा. पिछले दिनों फिल्म थप्पड़ पर उनके लिखे को लेकर काफी चर्चा है. मैंने बताया था न तुम्हें उस लेख के बारे में. हाँ वही थप्पड़, मुझे पसंद नहीं आई. उस लेख में थोड़ा अतिवाद तो लगा था मुझे भी. कि आप एक फिल्म से कितनी अपेक्षा रख सकते हैं. बौलीवुड ने तो न जाने कितने संवेदनशील विषयों पर फ़िल्में बनाकर उनकी ऐसी तैसी की है और खूब पैसा भी कमाया है. चाहे वो वर्क प्लेस पर सेक्स्सुअल हैरसमेंट को लेकर बनी हो, दहेज के झूठे मामले में फंसाने वाली फिल्म हो, स्त्री को काम पर जाते और पुरुष को घर पर काम करते दिखाने वाली फिल्म हो. फिल्मों से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती हालाँकि की जानी चाहिए. फिर भी जो थोडा बहुत सहयोग किया है फिल्मों ने उसके जरिये हम विमर्श को सहज ढंग से आम लोगों तक ले जाने में इस्तेमाल कर ही लेते हैं. थ्री इडियट, अस्तित्व जैसी फिल्मों को एकेडमिक सेशंस में इस्तेमाल होते देखा ही है. देखा तो मृत्युदंड को भी है.

मुझे भी फिल्म तो अच्छी नहीं लगी थी लेकिन यह अच्छा लगा था फिल्म में कि इसे देखकर यह विचार आना कि यह तो कितना कम है, जीवन में तो इससे कितना ज्यादा सहते हैं हम...और यह विचार ही इस फिल्म के बाद हर स्त्री के मन में आये, सोया हुआ अस्मिता बोध थोडा करवट ले तो भी कम नहीं. और पुरुष? उनका क्या? यह फिल्म पुरुषों के लिए भी तो थी न कि वो याद करें, महसूस करें कि जीवन भर साथ रह रही स्त्री को कितना कम समझ सके हैं वो, कितना कम हो सके हैं उसके मन के साथ.

मन, अपना मन, उसके साथ खड़े होना, दूसरे के मन को समझना ये सब अभी बहुत बड़ी बातें लगती हैं. तभी तो मुझे लगा था कि अमु तो खुशकिस्मत है उसे पड़ोसन भी समझ लेती है, उसकी भाई की गर्लफ्रेंड भी, पिता भी.

प्रोफेसर पिता बेटी को कैसे हाउसवाइफ होने देने से खुश हो सकता है? जबकि प्रोफेसर, अफसर, डाक्टर, इंजीनियर, सीईओ, आईएएस और लेखक पिताओं, पतियों की जड़ताएं कहाँ छुपी हैं भला.

मोनिका सोशल कंस्ट्रक्शन की बात करती हैं, ज्यादा गहरे उतरकर पड़ताल करती हैं. वो शायद सिर्फ फिल्म की बात नहीं करतीं, 'शायद' शब्द की आड़ ले रही हूँ शायद यह मेरे कम समझे को संभाल लेगा. वो फिल्म के बहाने पूरे समाज की पड़ताल करती हैं. वो छुटपुट चीज़ें से बहल जाने के खिलाफ दिखती हैं उनमें समुच्य में बदलाव की जो इच्छा है वो मुझे बहुत अच्छी लगती है. इतनी बड़ी इच्छाओं की मुझे तो शायद हिम्मत ही नहीं हुई कभी. जरा जरा सी चीज़ों में खुश हो ली मैं तो. लेकिन बड़े बदलाव के लिए बड़ी इच्छा होना लाजिमी है हालाँकि वो छोटे छोटे रेशों से होकर ही बड़ी होगी, परिपक्व होंगी इसमें भी कोई शक नहीं. बावजूद इसके एक फिल्म से इतनी अपेक्षाएं कुछ ज्यादा ही लगती हैं.

स्त्री विमर्श का डिब्बा बड़ा है. कई स्तर पर बात करनी होगी, कई तरह से. हर किसी को साथ लेकर चलना होगा. तो मोनिका बात गलत नहीं करतीं बस वो फिल्म के बरक्स उस बात को रखती हैं तो अतिवाद लगने लगता है.

चलो, असहमत ही हो लेते हैं. लेकिन हम असहमत होते ही युद्ध में क्यों उतर जाते हैं. वो हमकदम हैं, हमविचार हैं. वो भी हमारी तरह स्त्री मुक्ति का सपना देखती हैं. गहराई से समझती हैं मुद्दों को. उनसे कितना कुछ सीखने को मिलता है. हमारे कितने अनकहे को शब्द देती हैं. तो सलीके से असहमत ही हो लेते हैं. बात कर लेते हैं, सुन लेते हैं.

लेकिन देख रही हूँ मोनिका की तरफ निशाना साधते नजर आ रहे हैं लोग. हम सब स्त्री मुक्ति का सपना देखने वाली स्त्रियाँ अगर दोस्त नहीं हैं तो कौन सी स्त्री मुक्ति, किससे. क्या हम असहमतियों का सम्मान करना नहीं सीख सकते. असहमति की भाषा इतनी तल्ख क्यों.

मैं तो सबसे सीखने की कोशिश करती हूँ. सबको पढ़ती हूँ. ज्यादा कुछ जानती भी नहीं हूँ लेकिन इतना तो समझ ही सकती हूँ कि हम सब एक ही सपने को आँखों में लिए हैं, एक ऐसा समाज जहाँ स्त्री पुरुष दोनों अपनी मर्जी को पहचानें और उसे जीने की ओर कदम बढ़ाएं. बिना एक-दूसरे के प्रति आफेंसिव हुए. क्या यह इतनी बड़ी बात है.

मैं एक पोस्ट पर मोनिका से आंशिक असहमत हूँ लेकिन उनके साथ हूँ. क्योंकि मैं जानती हूँ उनकी आँखों में भी वही सपना है जो मेरी आँखों में है. उनके साथ होने का यह अर्थ कैसे मान लिया कि जो उनसे असहमत हैं मैं उनके साथ नहीं हूँ. असल में हम सब साथ ही हैं. होना चाहिए. सब दोस्त ही हैं असहमति आरोप की तरह नहीं, अपनी बात रखने की तरह हो तो अच्छा होता है न ?

देश खुल रहा है, दफ्तर खुल रहे हैं, दुकानें खुल रही हैं हमारे जेहन कब खुलेंगे? खुलना सिर्फ ज्यादा चीजों को जानना नहीं होता, खुलना ज्यादा जानने के बाद असहमति की यात्रा तय करते हुए भी सह्रदय और विनम्र होना ही जाना है.

दो अलग रंग और आकार वाले फूल अलग खुशबू वाले फूल अलग-अलग तरह से एक ही काम करते हैं दुनिया को सुन्दर बनाने का, महकाने का. ऐसा विचारों के साथ क्यों नहीं हो सकता भला?

Sunday, May 3, 2020

ये मेरा घर ये मेरा घर...


आज सुबह में थोड़ा हल्कापन महसूस हो रहा है. थोड़ी ख़ुशी. आज मुझे 'अपने घर' में आये हुए एक बरस हो गया. पिछले बरस इन दिनों महसूस करना लगभग थमा हुआ था. पैर चक्करघिन्नी हो गये थे और दिमाग में जैसे एक साथ हजार हिसाब किताब चल रहे होते थे. मैं उन दिनों बहुत खुश नहीं थी. बस रोबोट की तरह काम करती जा रही थी. 'मेरा सपनों का घर' जैसा कोई सपना नहीं था मेरा. इसलिए घर मेरी ख्वाहिशों की फेहरिस्त में काफी नीचे ही था. जिन्दगी के उतार चढ़ाव और माँ-पापा की इच्छा कि 'तुम्हारे सर की छत सुरक्षित हो जाए' ने घर बनाने की ओर बढ़ा दिया.

घर में आने के बाद दोस्त पूछते कैसा महसूस कर रही हो तो मैं कहती कुछ महसूस नहीं हो रहा फिलहाल. महसूस होना हमेशा वक्त लेता है. पिछ्ले बरस की भागमभाग इस बरस का ठहराव बनी, महसूस करना बढ़ा. घर के मायने क्या थे मेरे लिए, पंछियों से बातें करने का ठीहा, बादलों को आते-जाते देखने की फुर्सत, एक कोना जहाँ संगीत सुना जा सके, एक कोना जहाँ पढ़ा जा सके, जहाँ देर तक जागा जा सके, सुबह की चाय पीते हुए अलसाया जा सके देर तक...बारिशों को हथेलियों पर लिया जा सके. जहाँ देह ही नहीं आत्मा भी बिंदास घूमती फिरे, कोई क्या कहेगा की फ़िक्र से परे. जहाँ दोस्तों की आमद हो, खिलखिलाहटें हो... ये कुछ ज्यादा फैंटेसी नहीं हो गयी?

जिस दुनिया में स्त्रियों को अपने लिए एक कोना न मिलता हो, अपनी मर्जी की सब्जी बनाना उनकी लिस्ट से गायब हो चुका हो और पति व बच्चों की पसंद ही उनकी पसंद में ढल चुकी हो, जहाँ कपडे वो मोहल्ले वालों के हिसाब से पहनती हों और सोना जागना, मुस्कुराना घरवालों के हिसाब से होता हो स्त्रियों के जीवन में और जहाँ लॉकडाउन में घर का अर्थ बढती हुई हिंसा के आंकड़ों में दर्ज हो वहां मेरी ख्वाहिशों के घर का सपना तो फैंटेसी ही हुआ.

मुझे लगता है चीज़ें उतनी मुश्किल होती नहीं जितनी लगती हैं. बस इतनी सी ही तो बात होती है कि खुद की ख्वाहिश को पहचानो और उसके लिए थोड़ा एसर्ट भी करो. लेकिन यह छोटी सी लगने वाली दो ही बाते बहुत बड़ी हैं असल में. स्त्रियों को खुद को महसूस करने, खुद के लिए वो सपने देखने जो प्रयोजित न हों, और अगर वो देख लें तो उसके लिए एसर्ट करने की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी जाती. सफ़ेद घोड़े पर आने वाला राजकुमार जाने किसने उनके सपनों में बो दिया कि हर लड़की वही सपने देखने लगी, पिया का घर प्यारा लगे के गीत गाते हुए झूमने लगी, सबकी इच्छाओं के लिए रसोई में पकवान बनाने में सुख महसूस करने लगी और फिल्मो और धारावाहिकों में परोसी जा रही स्त्री किरदारों में खुद को देखने लेगी.

मैं भी तो ऐसी ही थी न. मैंने भी तो सर पर पल्ला लेकर तुलसी चौरा की पूजा करने वाली करवाचौथ के व्रत रखने वाली और दूसरों की ख़ुशी के लिए दिन भर रसोई में खटने वाली भूमिका दिल से निभाई. उसी में जीवन का समस्त सुख महसूस करने की कोशिश की. बारिश तब भी थी, फूल तब भी तो खिलते होंगे, पंछी तब भी तो गुनगुनाते होंगे मुझे सुनाई क्यों नहीं देते थे.

ऐसा नहीं कि अब मैं दूसरों की ख़ुशी को महत्व नहीं देती लेकिन उसके कारण खुद को एक्सप्लॉइट करना अब बंद कर दिया है. बस इतना ही.

हमें खुद को एक्सप्लोर करना सिखाया नहीं जाता, लेकिन हमें सीखना चाहिए. उसकी कीमत चुकानी पड़े तो चुकानी चाहिए. अपनी जिन्दगी और अपनी ख्वाहिशों की ओर हाथ बढ़ाना सीखना ही होगा. ये घर उसी का हासिल है. मेरे लिए घर का अर्थ विशाल भव्य किसी आलीशान हवेली नहीं है बल्कि वो कोना है जो मेरा है...मेरा अपना कोना.

इस मेरे अपने में मैं ही हूँ, कोई घालमेल नहीं. और मुझमें मुझे उगाने की शुरुआत प्रेम ही तो है. खुद से प्यार करना सिखाया तुमने जबसे तबसे मैं बदलने लेगी. प्रेम लिजलिजा नहीं बनता, मजबूत बनाता है. सहमी, घबरायी, सबकी बात मानने वाली अच्छी लड़की से मुक्ति मिली मुझे. कितना सुख है इस आज़ादी का.

वो आज ही का दिन था जब घर में पुताई और लकड़ी आदि का काम खत्म हुआ था. मैं अपने घर की दीवारों को रंग देने वालों, इनमें खिड़कियाँ खोलने वालों के प्रेम में थी. काम खत्म हुआ तो मैंने उनसे कहा आप लोगों के साथ ही पार्टी करनी है मुझे. और तो किसी को बुलाना नहीं है आप लोग आइयेगा....मेरी आवाज में मेरे मन के भाव एकदम से छ्लक रहे थे. उन लोगों को यकीन नहीं हो रहा था मेरी बात पर. क्यों नहीं हो रहा था यकीन. यह घर उनका भी तो है न जिन्होंने इसे बनाया. हर ख़ुशी में कमरे के हर रंग में हर कोने में उनकी बसाहट है. मैं उन्हें याद करती हूँ.

रंगों से घर को सजाने वाले, गम्भीर मुझे समझने लगे थे, वो कहते आपको जंगल से प्यार है न आपकी बालकनी में जंगल वाला टेक्सचर करूंगा एक दिन, आपके कमरे में आसमानी रंग और चिड़िया होनी चाहिए...हरा कितना हरा, नीला कितना नीला...उसे पता था. क्या तुम्हें पता है मुझे कितना नीला चाहिए?

सरफराज, मुनीर, फैजल, आलिम और गम्भीर आज भी मेरी याद में हैं. अभी गंभीर से बात कर बताया उसे 'आज ही तुमने मेरा घर सजा संवारकर सौंपा था...याद है?' उसे याद तो न होगा कि यह उसका काम है, वो बहुत घर सजाता है, सौंप देता है. लेकिन मेरे फोन से वो भावुक हो गया....भावुक तो मैं भी हूँ वैसे.

उन सब दोस्तों को शिद्दत से याद कर रही हूँ जिन्होंने हमेशा हाथ थामे रखा...मुझे जिन्दा रखा और खुद के लिए सपने देखने की ओर धकेला... घर जीने की इच्छा का ही तो नाम है न?

Saturday, May 2, 2020

पंछियों की आमद सुकून है


कल सारा दिन जररररर्र से निकल गया. किया क्या कुछ याद नहीं. लेकिन बेजारी सी रही हर वक्त. इतनी बेजारी कि कुछ लिखने का भी जी न किया. यूँ बेजारी तो रहती ही है इन दिनों हरदम. सारी दुनिया मजदूर दिवस मना रही थी सिवाय मजदूरों के. कहीं से कोई खबर न आई कि आज मजदूरों ने पेटभर खाया और इस तरह दिन सेलिब्रेट किया. कहीं से कोई खबर न आई कि आज मजदूरों का भी सम्मान होना जरूरी है ऐसा कहा सुना गया हो कहीं. शायद मैंने ही न पढ़ा हो. शायद हुआ हो और मेरी नजर न पहुंची हो. यह 'शायद' शब्द है न यह मुझे जिन्दा रखता है. इसमें उम्मीद का पूरा संसार छिपा है. विशाल संसार. मैं इसी शायद में गोते लगाती रहती हूँ.

मैं हमेशा सोचती हूँ कि जब एक मजदूर पिता अपने बच्चे के सामने पिटता है या गाली खाता है तब उसे कैसा लगता है. मैं सोचती हूँ कि जब एक माँ अपने बच्चों के सामने रोज पिटती है तो उसे कैसा लगता है, बच्चे जब कहीं भी पीट दिए जाते हैं माँ, बाप, जाति, समुदाय और गरीबी की गाली खाकर तो उन्हें कैसा लगता होगा. शायद सम्मान शब्द ने उन तक पहुँचने की यात्रा नहीं की अब तक. आप उन्हें कुछ भी कह लो बस उन्हें बस उनकी रोजी न छीनो. रोजी यानी रोटी, सर छुपाने को एक छत. शिक्षा, स्वास्थ्य तो उनके लिए बहुत बाद की बाते हैं. सम्मान तो शायद सबसे आखिरी बात.

हमारे पास शब्द हैं. हम पेट की भूख को मिटाने के बाद जेहन की भूख मिटाने बैठ जाते हैं. जो कवितायेँ हम उनके लिए लिखते हैं वो उन्हें देखते तक नहीं, जो लेख हम उनके लिए लिखते हैं वो उन्हें नहीं पढ़ते, जो भाषण हम उनके लिए देते हैं उनमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं. यह सब हम भरे पेट लोगों की जुगाली है. उन्हें सिर्फ सरकारी घोषणाओं से फर्क पड़ता है जिसमें हो उनके खाने और रोजगार की बात. उनके लिए सबसे अच्छी कविता है उन योजनाओं का कागजों से उतरकर उनके जीवन तक पहुँचना.

आप उनसे बहुत प्यार और सम्मान से बात करते हैं लेकिन उनका पेट अगर खाली है तो वो आपका दिया सम्मान छोड़कर आगे बढ़ जायेंगे. एक खबर पढ़ी थी कुछ दिन पहले एक विकलांग व्यक्ति ने मुफ्त में दान का राशन लेने से मना कर दिया. वो काम करके कमाना चाहता था,,,उसे सम्मान की समझ हो गयी थी शायद. एक जगह स्कूल में रह रहे मजदूरों ने स्कूल की पुताई कर दी कि मुफ्त में बैठे-बैठे खाना उन्हें रास नहीं आ रहा था. फिर भी हम मध्यवर्ग के लोग इन्हें मक्कार, कामचोर और धूर्त कहने में किसी भी घटना में इन पर शक करने में और इनके सर पर ठीकरा फोड़ने से बाज नहीं आता.

तुम सच ही कहते हो कितने बेवजह की बातें चलती हैं मेरे जेहन में. भेजा शोर करता है टाइप. इस शोर की शांति नींद में ही है और इन दिनों नींद भी कम ही है. अजीब थका-थका सा रहता है मन भी शरीर भी. पैरों में दर्द रहता है काफी दिनों से.

पंछियों की आमद इन दिनों थोड़ा सुकून है... 

Wednesday, April 29, 2020

दुःख सबको मांजता है


स्कॉटलैंड की सडकों पर घूमते हुए मिली थी वह स्त्री. वो शदीद दुःख से भरी थी. उसने हाल ही में अपना बच्चा खोया था. वो खाली बच्चा गाड़ी के पास उदास बैठी थी. हम सड़कों पर यूँ ही घूम रहे थे. हम दोनों एक दूसरे के लिए अनजान थे. उसने भीगी पलकों से मुझे देखा और मुस्कुरा दी. मैंने उसके चेहरे पर दुःख, शांति और अपनेपन की मिली जुली छाया देखी. उस स्त्री की उस भीगी हुई मुस्कुराहट ने मुझे आज तक थाम रखा है. दुःख बहुत गाढ़ी चीज़ होता है. यह हम सबको मांजता है, ज्यादा मनुष्य होने की तरफ प्रेरित करता है. हाथ थामता है, अपनेपन से भर देता है. आज पूरी दुनिया एक से दुःख, एक से भय और पीड़ा से गुजर रही है. लेकिन क्या हम ज्यादा अपनेपन से भर उठे हैं. क्या हमारे रिश्ते पहले से ज्यादा मीठे हुए हैं? क्या हमने उन्हें जी भरके याद किया जो हमसे नाराज हुए बैठे हैं, क्या हमने अपने तमाम पूर्वाग्रहों को छोड़, तमाम गिले शिकवे भुलाकर लोगों को अपनेपन से भर दिया है?

हम ऐसे हालात में हैं जिसकी किसी ने कल्पना में भी कल्पना नहीं की थी. हममें से किसी को कुछ पता नहीं है कि क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए. ये किसी को की जद में दुनिया भर की सरकारों, डाक्टरों समेत हर व्यक्ति आता है. मैं भी आती हूँ, इसे पढ़ते हुए आप भी आते हैं.

त्रासदी का समय है. हम सबकी मेंटल हेल्थ एकदम डिस्टर्ब है. लेकिन हम इसे समझ नहीं पा रहे हैं. कभी खुद को खुश रखने के लिए गार्डनिंग करने लगते हैं, गाने सुनने लगते हैं. वर्क फ्रॉम होम में खुद को पहले से ज्यादा झोंककर महसूस करते हैं कि भला हुआ काम ने हमें बचा लिया. कभी रसोई में एक्सपेरिमेंट करने लगते हैं, कभी योगा, एक्सरसाईज, पढ़ना-लिखना. दोस्तों से बात करते हैं. उन दोस्तों के हाल चाल पूछते हैं जो स्लीपिंग मोड में पड़े थे. किसी का टूट रहा था हौसला तो उसे हिम्मत बंधा रहे होते हैं. फिर...अचानक...सब बिखरने लगता है. और शाम तक आते आते फूट फूट कर रो पडते हैं. सब लोग तो हैं आसपास फिर भी एक अजीब सा अकेलापन काटने को आता है.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं यह बिलकुल अलग अनुभव है. हर किसी के भीतर बहुत से बदलाव हो रहे हैं. बहुत मंथन चल रहे हैं. लोग बाहर के काम, व्यवहार, सेहत आदि पर तो काम कर रहे हैं लेकिन भीतर की दुनिया में चल रही इस हलचल को दुनिया में कभी स्पेस नहीं मिला, आज भी नहीं मिल पा रहा. हमारी समझ ही नहीं है कि इस बात की कि अगर व्यक्ति के भीतर की दुनिया ठीक नहीं होती तो टेक्निकली तो सब ठीक हो भी जाता है लेकिन असल में कुछ भी ठीक नहीं होता. यह टेक्निकली ठीक होना है किसलिए, इंसानों के लिए ही न, इंसानों के स्वस्थ रहने और खुश व शांत रहने के लिए, एक दूसरे को महसूस करने के लिए. लेकिन ऐसा हो क्यों नहीं रहा? जब हम किसी से पूछते हैं ‘तुम ठीक हो न? सब ठीक है न?’ तो उत्तर में प्रतीक्षा होती है कि सामने वाला हाँ ही कहे, कहीं दुखड़े लेकर न बैठ जाए. और उस हाँ में सैनिटाइज़र होना, तबियत ठीक होना, घर में रहना, घर में पर्याप्त राशन होना भर होता है.

एक रोज मुझसे किसी ने पूछा, ‘सब ठीक है न?’ और ‘हाँ’ कहने के बाद मैं फफक कर रो पड़ी. जानती हूँ सुनने वाले को सिर्फ हाँ में दिलचस्पी थी. भीतर ही भीतर हम सब टूट रहे हैं, जैसे कुछ खो रहा है. हम सबको सबसे पहले एक दूसरे के प्रति संवेदनाएँ बढानी थीं, महसूस करना बढ़ाना था लेकिन हमने तकनीकी तौर पर हालचाल भर लेकर काम चला लिया.

काम तो हो जाते हैं सारे, घर के भी बाहर के भी लेकिन हम जो लगातार अकेले पड़ते जा रहे हैं उसका क्या? हम जो एक दूसरे को महसूस नहीं कर पा रहे हैं उसका क्या? बस कि एक आवाज की दूरी पर तो थे हम लेकिन यह जो हमारे बीच सदियों का सा फासला गहराता जा रहा है इसका क्या? बुखार होता तो बता देती लेकिन इस उदासी को कैसे बताऊँ, किसे बताऊँ? कैसे बताऊँ कि नींद खुल जाती है रात में, कि काम करते करते रोती जाती हूँ. काम वक्त पर पूरा हो जाता है, मैं टूटकर बिखर जाती हूँ.

जिस समाज में लोग भूख से बिलख रहे हों, जिस दौर में पूरी दुनिया मौत के एक वायरस से लड़ने की खातिर घरों में कैद हों उस दौर में कोई भी व्यक्ति सामान्य मनस्थिति में तो नहीं होगा...क्या हम अपने होने से एक दूसरे को हील (भर) कर पा रहे हैं. क्या बिना किसी को जज किये कह पा रहे हैं एक दूसरे से कि जरा तुम अपना हाथ देना...कि हम साथ हैं परेशान न हो.

इतिहास है इस बात का कि ऐसी महामारियों के दौर में लोगों की टूटन बढ़ी है, अकेलापन बढ़ा है. जब टूटन बढती है तो बढती है असुरक्षा, अविश्वास. शायद इस दौर में सबसे पहले और सबसे ज्यादा हमें अपनेपन को बढ़ाने पर, एक-दूसरे को महसूस करने पर काम करना चाहिए. सोचन चाहिए कि क्या हम इतने निर्मल, इतने मीठे हो सके हैं कि हमारा होना ही हमारे आसपास के लोगों को अच्छा महसूस कराये, राहत दे. हम सबको ज्यादा मनुष्य होने की जरूरत है... अभी यह लम्बी लड़ाई है. लॉकडाउन खत्म भी हो जायेगा लेकिन जंग जारी रहेगी.

तकनीक ने तो हमें जोड़ रखा है लेकिन एक-दूसरे से मन से जुड़ने की तकनीक तो हमें खुद ही ईजाद करनी होगी.
(आज द क्विंट में- https://hindi.thequint.com/readers-blog/coronavirus-lockdown-effect-on-mental-health-anxiety-loneliness)

सुनना सीख रही हूँ


इन दिनों कुछ भी नया पढने में मन रुच नहीं रहा. पुराने की ही फिर-फिर पलट रही हूँ. रिल्के, निर्मल वर्मा, लोर्का और वॉन गॉग ज्यादा साथ रहते हैं. गॉग अपने भाई को लिखे खत में कहते हैं, क्या हम पढ़ना जानते हैं? सचमुच हमेशा यही तो सोचती रही कि क्या हम पढ़ना जानते हैं? क्या हमने सुनना सीखा है? क्या हमने देखना सीखा है? सब कुछ तो सीखना बाकी ही है. हम जिन चीज़ों को पढकर खुश हुए, उनमें रम गये, आहलादित हुए, दिल दे बैठे उन्हें खोलकर देखा तो पाया कि इसमें तो हजार दिक्कतें थी. दिक्कतें दिखीं क्यों नहीं? जिन बातों से प्रभावित हुए जिन लोगों से उनमें भी हजार दिक्कते थीं. जिन बातों को सुन-सुनकर बड़े हुए, जो रगों में लहू के साथ दौड़ने लगीं उनको कभी परखा ही नहीं. ये सब देखना, सुनना, पढना जो जो बचपन से जारी है जिसने हमें गढा है उसमें हजार दिक्कतें रहीं. बस दिखी नहीं. क्योंकि हमें तो सिर्फ आँख भर देखना, शब्द भर सुनना, और पढना सिखाया गया था. वो भी वैसे,जैसे बताया गया है.

हम खुद से सवाल करने वाले लोग नहीं हैं, अपने कार्य, व्यवहार को पलटकर देखने और उसे तराशने के लिए कोशिश करने वाले लोग नहीं हैं. हम खुद को खुदा समझने वाले लोग हैं. व्यक्ति के तौर पर, समूह के तौर पर. पिछले दिनों कुछ साथियों से पढने लिखने ख़ासकर साहित्य पढने को लेकर बात कर रही थी. और सोच रही थी कि अभी तो पढने की बात भर है कि साहित्य पढना हमें निखारता है, संवेदनशील बनाता है. वो बात तो हुई ही नहीं कि साहित्य में भी काफी घपलेबाजी है. उसे अलग से देख पाने के लिए बहुत पैनी नजर और नाजुक नजरिया चाहिए. कि अभी तो सवाल वहीं तक पहुंचे कि क्या कुछ भी जो छप गया वो साहित्य है, सेल्फ हेल्प किताबें भी साहित्य हैं क्या? कितनी लम्बी है वो यात्रा जब सवाल आएंगे कि देवदास हीरो क्यों था? शरतचन्द्र, रविन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों की नायिकाएं ऐसी ही क्यों हैं? कविताओं में स्त्रियाँ दुःख और करुणा की इमेज में ही क्यों कैद हैं. समर्पण का सुख ही क्यों है स्त्री का सुख और क्यों नायिकाओं के सौन्दर्य पर इतना ध्यान दिया गया है. क्यों प्रेमिकाओं और पत्नियों के बीच एक जंग छिड़ी रहती है कहानियों में और पाठकों को जोड़े रखती है. क्यों नख शिख वर्णन इतना स्पेस घेरता है, जुझारूपन क्यों नहीं जगह घेरता.

हमें क्या पढ़ाया जा रहा है, क्या दिखाया जा रहा है, कैसा साहित्य, कैसा सिनेमा और उसे अलग से पहचान पाना हम कब सीख पायेंगे आखिर? बहुत दूर लगता है यह सब. सोचती रहती हूँ लेकिन शायद मैंने अब तक अपनी बात को ठीक से कहना सीखा नहीं.

इन दिनों मोनिका कुमार को पढ़ रही हूँ. मोनिका मेरे मन की वो सारी बातें लिख रही हैं जिन्हें मैंने अब तक कहना सीखा नहीं. जितना मैं सोचती हूँ, सोच पाती हूँ उससे भी आगे की बात लिख रही हैं मोनिका. लिखे हुए को, पढ़े हुए को, देखे हुए को वो उधेड रही हैं. हमें यह उधेड़ना सीखना है. हाँ जरूर है किसी बात को ख़ारिज करने के लिए उस बात को तफसील से जानना बहुत जरूरी है.ऐसा मालूम होता है जिन्दगी की कक्षा में पहले दर्जे की विद्यार्थी हूँ. हूँ ही. 

मुझे चिड़ियों की आवाज सुनना अच्छा लगता है. मैं उनकी आवाज में आवाज मिलाना सीखना चाहती हूँ. मुझे झरने की आवाजें पसंद हैं मैं झरने की आवाज को झरने के संग पीना चाहती हूँ. इन आवाजों से हमें भिड़ना नहीं पड़ता, सवाल नहीं करने पड़ते. ये प्रकृति की पवित्र आवाजें हैं. काश हम प्रकृति जैसे हो पाते.

पता है, आज पूरे 32 दिन बाद घर के बाहर कदम रखे. सड़क पर. खामोश सड़क पहले कब देखी थी याद नहीं. हैवलॉक की याद आई. ऐसी ही ख़ामोशी थी वहां. हरियाली और खुशबू में लिपटी हुई सड़कें. पीले, गुलाबी, बैंगनी और लाल फूलों से सजी हुई सड़कें. एक पेड़ के नीचे से गुजरते हुए मेरी पलकें भीग गयीं. जानते हो क्यों...धरती पूरी लाल फूलों से पटी पड़ी थी. मैं कुछ फूल चुनने लगी. कुछ फूल मेरे ऊपर भी गिरे. मैंने आज फूलों के गिरने की आवाज सुनी.

तुमने कभी सुनी है आवाज? फूलों के गिरने की आवाज? मैं सुनना सीख रही हूँ इन दिनों...