Thursday, April 23, 2020

तुम सपने में क्यों आये....


ध्यान हटाने से ध्यान नहीं हटता. उदासी झाड़ने से उदासी झड़ती नहीं. कुछ देर को भ्रम भले हो कि हम मुक्त हुए हैं. आजकल हर दिन खुद से मुंह चुराती फिरती हूँ. हर कुछ वो करने की कोशिश करती हूँ जिसमें मन लगे, लेकिन कोई दिन ढेर सारा रुदन दिए बिना नहीं जाता. जानती हूँ रोना बुरा नहीं लेकिन कहीं कुछ गहन क्षरित हो रहा है लगातार. हर रोज असहायता महसूस होती है, शर्मिंदगी महसूस होती है. हम खाए अघाए लोग हैं. उदास होते हैं फिर खुश भी हो लेते हैं.

कुछ वक्त की उदासी पर कोई सुखकर दृश्य कब्जा जमा लेता है. हम भूखे लोगों के बारे में खबरें देखकर काँप न उठें कहीं इसलिए या तो खबरें छुपा दी जाती हैं या हम चैनल बदल लेते हैं. हम रामायण, महाभारत देखने की लक्सरी जीते लोग हैं. कविताओं कहानियों में गोते लगाते लोग हैं. हम इतिहास के अपराधी हैं. हम अश्लील दृश्यों के गवाह हैं. कई बार उस तस्वीर का हिस्सा भी हैं.

देह में हरारत होना इस गहरी उदासी का हिस्सा भी हो सकती है. सांस भारी सी मालूम होती है. कुछ अच्छा नहीं लगता. इस वक़्त तुम्हें याद करना, सुबह की चाय पीते हुए खिलते हुए फूलों को देखना, पंछियों से बातें करना भी जाने क्यों दिन के किसी न किसी हिस्से में शर्मिंदगी में डुबो जाता है.

जानती हूँ तुम यही कहोगे कि 'तुम्हें सोचने की बीमारी है.' हाँ है तो सही. सोचने की भी महसूसने की भी. क्या करूँ. क्या तुम्हें भी यह बीमारी नहीं है?

क्या तुमने कोई खबर पढ़ी पिछले दिनों में किसी ग्रुप फोरवर्ड में, किसी ट्विट्टर, फेसबुक पर...कि इस विषाद काल में और गाढ़ी हो रही है मोहब्बत, जिन्हें कम जानते थे पहले उनसे बढ़ने लगा है प्यार. वो जो अनजान थे चेहरे वो तो बहुत प्यारे इन्सान थे...वो जिन्हें हम कम ही अपना समझते थे उन्हें अब गले लगाने का जी करता...कि यह काल मनुष्यता की मिसालें रख रहा है. पढ़ी हों तो, भेजना मुझे. और सुनो न पढ़ी या सुनी हों न ऐसी कोई खबर तो रो लेना थोड़ा सा...

मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता, तुम्हें याद करना भी नहीं. हालाँकि कल तुम अरसे बाद सपने में आये थे और तुम्हारे अचानक सपने में आने के कारण मुझे देर हो गयी आज जागने में....

Wednesday, April 22, 2020

रोटी होती तो कोई बात थी- किशोर चौधरी

लिखना असल में अपनी पीड़ा से छुटकारा पाने के उपाय ढूंढना है. पढ़ना असल में ढूंढना है कुछ ऐसा लिखा हुआ जो हमारे भीतर उतरता जाए और हमारी बेचैनी को गले लगाकर रो ले. लिखने से दुनिया नहीं बदलती, लिखने से हम खुद कुछ बदल सकें काश.किशोर चौधरी को बरसों से पढ़ते आ रही हूँ. वो बहुत प्रिय लेखक हैं. कल से उनकी कुछ कवितायें लगातार साथ हैं. मैं इन कविताओं को बहुत बार पढ़ चुकी हूँ...सबको पढ़नी चाहिए.पाठ्यक्रम में पढ़ाई जानी चाहिए.- प्रतिभा 


सब पकवान लाइव थे
भूख पर अंधेरा छाया था।

* * *
पकवानों ने
खिड़की से झांक कर
सड़क पर चलती भूख को कोसा।

भूख ने ईश्वर से कहा
मरने से पहले घर पहुंचा देना।

* * *
तस्वीरें डालकर
अघाये हुए पकवान
इस सोच में गुम थे
कि नया क्या किया जाए।

भूख के पास दिखाने के लिए
ठीक ठीक एक शक्ल न थी।
* * *
पकवान झांक कर देख रहे थे
कि वे बीस की उम्र में कैसे थे।
भूख को झांकने की ज़रूरत न थी
वह तब भी ऐसी ही दिखती थी, 
जैसी अब है।
* * *
पकवानों ने 
एक दूजे को चैलेंज दिया।
भूख के मुँह से
एक शब्द भी न निकला।
* * *
जीवन को एक्सप्लोर करने को 
पकवान चित्र उकेरने,
नाचने, गाने और वीडियो बनाने लगे।
भूख अपने दोनों हाथों से
अंतड़ियों को चुप कराती रही।।
* * *
पकवानों ने कहा
कि घर से बाहर निकलते ही
किस के साथ दावत उड़ाएंगे।
भूख ने कहा
एक रोटी मिल जाये तो कितना अच्छा हो।
* * *
बड़ा पकवान
छोटे पकवान से मिलने आता है।
भूख कहीं नहीं जाती।
* * *
पकवान
कवि थे
लेखक थे
सम्पादक थे
चिंतक थे
कलाकार थे
मीडियाकर्मी थे
सलाहकार थे
युगदृष्टा थे।

भूख
बस भूख थी।
* * *
पकवानों ने कहा
ये कविताएं नहीं हैं।

भूख ने कहा
कविता हो तो भी इनका क्या करें।
रोटी होती तो कोई बात थी।
* * *

Tuesday, April 21, 2020

जीवन जिया मैंने

जीवन जिया मैंने
कहूँगी नहीं यह मरते हुए
अफ़सोस नहीं, न ही किसी पर आरोप लगाने की जरूरत
उन्माद के तूफानों और प्यार के कारनामों से अधिक
और भी हैं जरूरी चीज़ें इस दुनिया में

तुम जो पंखों से
दस्तक देते थे मेरी छाती पर
अपराधी हो मेरी युवा प्रेरणा के
तुम मान लो जिन्दा रहने का मेरा आदेश
मैं भी मानती रहूंगी तुम्हारी हर बात.

30 जून 1918




धैर्य चुकने लगा है

चुकने लगा है राशन 
तेल, मंजन
गैस सिलेंडर भी चुकने ही वाला है
न नहीं ले सके थे हम दो सिलेंडर
ऐसे ही चल रहा था काम
चुकने लगी हैं दवाइयाँ
जो बिना प्रिस्क्रिप्शन के मिलती नहीं
और प्रिस्क्रिप्शन देने वाले डाक्टर
व्यस्त हैं कहीं और

चुकने लगी है हिम्मत
धैर्य चुकने लगा है
रोजमर्रा के जिन कामों में झोंककर
खुद को संभाल रहे थे जरा
वो काम थकाने लगे हैं
न न आईना देखने को जी नहीं करता
उसमें उदासी दिखती है

सूखने लगी है वो बेल
जिसमें झमक के आने थे
मोहब्बत के फूल
उसकी जड में
जाने कौन डाल गया नफरत का मठ्ठा

नदियाँ ज्यादा मीठी हो चली हैं
और हम ज्यादा कड़वे...
(फोटो- साभार गूगल)

Monday, April 20, 2020

फ्रेंड रिकवेस्ट


पहले कुछ सौ के करीब थीं,
फिर हजारों हो गयीं
कुछ कुम्हलाने लगीं
बैठे बैठे
शायद उन्हें था इंतजार
कि एक रोज
स्वीकारा जायेगा उन्हें
कुछ में धैर्य था
कुछ में आवेग
कुछ ने तंज किये
कुछ ने गर्वीला समझा
कुछ चुपचाप बनी रहीं
इंतजार में

कुछ भूल चुकी थीं
कि वो हैं
भेजने वाले भी भूल चुके थे
भेजकर उन्हें
वो नहीं जानते थे
कि मैं दुनिया की तमाम मित्रताओं पर
आँख मूंदकर करना चाहती हूँ भरोसा
चाहती हूँ हर बढे हुए हाथ को
थाम लेना
हर पुकार की राह पर
दौड़ जाना चाहती हूँ

लेकिन बड़ा गन्दला किया है दुनिया ने
मित्रता के भाव को
खुद को बचाने की खातिर
कम ही थाम पाती हूँ बढे हुए हाथ
मित्रता सूची की सफाई
न करने पड़े इसलिए
सजग रहना चाहती हूँ
यूँ सजग होना भी क्या होता है
कि जानने के अर्थ कितने विशाल हैं
जिन्हें जाना उन्हें कितना कम जाना
और जो अनजान थे
उनसे मिलकर जाना खुद को भी कई बार
फ्रेंडरिक्वेस्ट की भीड़ में मिले
कितने नायाब दोस्त भी
और कितनों की दुनिया में
मेरी रिक्क्वेस्ट ने भी किया लम्बा इंतजार

जो मुझ तक पहुंची फ्रेंड रिक्वेस्ट
वो सब मुझे प्रिय हैं
लेकिन दोस्त बनने का सलीका
महज एक क्लिक या लाइक कमेन्ट भर नहीं
इनबाक्स में सेंधमारी तो हरगिज़ नही...