Thursday, March 12, 2020

छोटी सी बात है, बस इत्ती सी

मैं- होली कैसी रही?
मित्र- वैसी ही जैसी पिछले बरस हुई थी.
मैं- मतलब? फिर से?
मित्र- हाँ. लेकिन इस बार सास बहू की नहीं पति-पत्नी की लड़ाई हुई. यानी अम्मा और पिताजी की.
मैं- वो तो नार्मल बात है.
मित्र- हाँ, नार्मल ही है. अम्मा सूटकेस पैक करके मामा को फोन लगाईं कि ले जाओ हमको. मामा बोले कुछ दिन रुक जाओ अभी बिजी हैं.
मित्र- हँसते हुए. फिर यहीं मनी होली. रूठे-रूठे.
मैं- हम्म्म्म. कितना दुःख हुआ होगा अम्मा को.
मित्र- अरे नहीं. ये रोज का है उनका. जाएँगी कहाँ. खाली हूल देती हैं.
मैं- पापा ने भी कुछ नहीं कहा. मतलब रुकने को?
मित्र- पापा तो कहे, पहले इनको जाने दो तब खाना खायेंगे....

यह संवाद हुए कुछ दिन बीत गए हैं. जिस मित्र से संवाद हुआ वह सहज है. उसके पिता भी, पत्नी भी...मामा भी और भी सब लोग शायद. बस मैं ही सहज नहीं हूँ. लगता है अम्मा के कलेजे में अपमान का जो दंश चुभा होगा, वो सालता तो होगा. अम्मा पहले भी एक बार घर छोड़कर बेटे के साथ चली गयी थीं. तब छोटा बेटा था अविवाहित.अब वो बेटे के साथ ही रहती हैं. बेटे की बीवी यानी छोटी बहू से बनती नहीं. कई बार बातों में यह आ चुका है कि माँ बेचारी हो गयी हैं अब. उन्हें कौन रखेगा? इसलिए यहीं रहेंगी, बस इस बात को मानती नहीं हैं.सोचती हूँ क्या यह सिर्फ एक घर या रिश्ते की कहानी है? नहीं, यह स्त्रियों के अकेलेपन की असुरक्षा की कहानी है.

क्या इन्हीं दिनों के लिए रिश्ते बनाये जाते हैं? शादी की जाती है कि बुढ़ापे में एक-दूसरे के साथ रहेंगे. बच्चे पैदा किये जाते हैं कि बुढ़ापे में जब शरीर अशक्त होगा तो बच्चे देखभाल करेंगे. सिर्फ आश्रम में न छोड़ आना ही काफी नहीं, माँ-बाप को उनको सम्मान के साथ रखना भी जरूरी है. ओह रखना जरूरी है का क्या अर्थ हुआ भला, हमें उनके साथ रहना है यह बोध होना जरूरी है हमें भी तो. उनके भीतर की असुरक्षा को समझना, उसे अपने होने से भरना भी जरूरी है. उन्हें ऐसी स्थिति में पड़ने से बचाना भी जरूरी है जहाँ उनका अपमान होने की संभावना हो.

एक स्त्री का सच में अपना कोई घर नहीं होता. उम्र के किसी भी मोड पर उसे यह बात चुभ सकती है. घर की रजिस्ट्री उसके नाम हो तो भी. मुझे लगता है अम्मा को समझने की जिम्मेदारी छोटी बहू को ही लेनी चाहिए. इन पुरुषों को अभी बहुत वक़्त लगेगा अपने दायरों से निकलने में लेकिन हम स्त्रियों को देर नहीं करनी चाहिए.

मैं मित्र से बहुत दूर हूँ लेकिन बहुत जोर से रोना चाहती हूँ अम्मा के गले लगकर. पिता, पति, पुत्र, भाई कोई भी कहाँ दे पाया भरोसा कि जिस भी घर में वो रह रही हैं, जहाँ वो जाना चाहती हैं वो सब उनके ही घर हैं, उनका अधिकार है उन घरों पर. उन्हें कहीं क्यों जाना है छोड़कर...लेकिन क्या वो कभी कह पायीं कि तुम चले जाओ घर से, हाँ, ये सुना अलबत्ता कई बार उन्होंने.

मित्र को मेरी बात ज्यादा समझ नहीं आती. 'कुछ ज्यादा ही सोचती हो' कहकर वो हंस देता है. मुझे अम्मा ज्यादा मित्रवत लगती हैं. दुनिया की तमाम स्त्रियाँ अम्मा सी लगती हैं.

(अमृता शेरगिल की पेंटिंग गूगल से साभार )

Tuesday, March 10, 2020

फेसबुक


लोगों की वॉल पर उतराती
दंगे की तस्वीरें, वीडियो, खबरें
छोड़ रही हैं कसैलापन
व्याकुलता, क्षोभ,पीड़ा
दूर कहीं उदास कोयल
 गा रही है उदासी का राग

हर ओर के लोग दुःख से भरे
कुछ गुस्से से भरे
कुछ सुकून से भी भरे हुए
कुछ हिसाब लगाते कि
इसके मरने पर दुखी हो
उसके मरने पर दुखी क्यों नहीं
इस बच्चे के आंसू से पसीज रहे हो
उस बच्चे के आंसू के वक़्त कहाँ थे

ये लोग थे तो 'एक ओर ही'
अलग-अलग कब हुए
इसका कोई ब्यौरा नहीं

तभी एक सिनेमा का जिक्र
गुजरता है नज़रों से
बदलता है स्वाद
जेहन की जीभ का

कहीं कोई स्त्री
नयी साड़ी वाली फोटुक में लहराती है
किसी की यात्रा की तस्वीरें
नज़रों से अनायास ही टकरा जाती है

कोई प्रेयसी उदासी में पिरो रही है
मेंहदी हसन की गज़ल
'मुझसे ख़फा है तो जमाने के लिए आ...'

किसी ने कविता पाठ ठोंक दिया है
फेसबुक की दीवार पर खूँटी गाड़कर
याद दिलाया एक सन्देश ने उन दोस्तों का जन्मदिन
जिन्हें कभी मिले भी नहीं
अपने करीबियों के जन्मदिन भूल जाने वाले भी
अब भर-भर भेजते हैं बधाई अनजाने लोगों को
पहले डायरियों में लिखा करते थे अपनों के ख़ास दिन

रवाना करने के बाद शुभकामनाओं की खेप
नजर आती है कोई पकवान की तस्वीर
लीजिये रेसिपी भी मांग ली है किसी ने तो
इसके पहले कि जुबान पर टिकता पकवान का स्वाद
बड़े साहित्यिक जलसे की तस्वीरें नुमाया होती हैं
कौन क्या बोल, किसने क्या सुना से ज्यादा
किससे मिले, कितनी तस्वीरें खिंची
के दृश्य आँखों में झरते चले जाते हैं

निपटा के घर के काम एक स्त्री
कोने में बैठी है उदास
देख रही है आकाश
हालाँकि किताब का कोई अधखुला पन्ना
फडफडा रहा है वहीँ उसके पास
बीच-बीच में बाज़ार दिखाने लगता है
आपकी पसंद की साड़ियाँ, शर्ट, जूते
आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस तो
पति और प्रेमी से बेहतर निकला
इसे तो हमारी पसंद के रंग और पैटर्न भी पता हैं
बाज़ार की ओर
चल पड़ती हैं उँगलियाँ अनचाहे ही
उलझी रहती हैं कुछ देर

त्योहार आ ही गया सर पर
रंग ही रंग छाने लगा है दीवारों पर
इसके पहले कि ठहरे कोई रंग
जीवन में, जेहन में
फेसबुकिया हलचल बदलती रहती है
मिजाज़ मन का

वो एक ही पल की बात है जब
रंग और बेरंग दोनों ही दुनिया में
थिरकती हैं उँगलियाँ
मुस्कुराने और रोने वाले ईमोजी
सेकेंड्स के भीतर उँगलियों से रिहा होते हुए
अवतरित होते हैं वॉल पर

कोई नोटिफिकेशन फिर थमा देता है उदासी
कि दंगों में मरने वालों की संख्या बढ़कर....हो गई है
राष्ट्रवाद फिर से मनुष्यता से टकराने को
बाहें कसने लगा है फेसबुक पर...

मारीना- एक किताब की सहयात्रा में


- सिध्धेश्वर सिंह

इस किताब के बुने जाने के वास्ते रेशों के काते जाने की आहटें कुछेक वर्षों से मेरे कानों तक पहुंच रही थीं।इस बात का भान था कि 'कुछ' बन रहा है ; कुछ सीझ रहा है।पर इस बरस नया साल आते - आते किताब अंततः आ ही गई जो कि प्रकाशकीय हवाले से 'रूस की महान कवयित्री मारीना त्स्वेतायेवा का युग और जीवन' दर्शाने वाली एक 'जीवनी' है।आमतौर पर कोई भी (साहित्यिक)) जीवनी किसी 'था' अथवा 'थी' हो चुके व्यक्तित्व के कृतित्व पर रोशनी डालने वाली एक ऐसी किताब होती है जिसके जरिये एक पाठक अपने अब तक के जाने हुए में कुछ और जोड़कर देखता है लेकिन जिसके बारे में किताब लिखी जाय वह 'थी' होकर भी निरंतर/ सतत 'है' बनी रहे तो जाहिर है कि ऐसी किताब कुछ अलहदा ,कुछ जुदा ,कुछ न्यारी ,कुछ हट के तो होनी ही चाहिए।

किताब का नाम है 'मारीना 'और इसे लिखा है प्रतिभा कटियार ने।इसी साल जनवरी 2020 में आई यह किताब पिछले दो - ढाई महीने से मेरे साथ यात्रा करती रही है।नौकरी के सिलसिले में घर से डेरा और डेरे से घर की यात्राओं में इसे बहुत धीमी गति से ठहरकर पढ़ता रहा हूँ और अब इस स्थिति में हूँ कि एक पाठक की हैसियत से कुछ कह सकता हूँ। सबसे पहली बात तो यह कि यह जीवनी भर नहीं है बल्कि एक कविता प्रेमी का अपने प्रिय कवि को दिया गया एक ऐसा 'ट्रिब्यूट' है जिसमें महानता ,श्रद्धा और भावुकता की जगह दोस्ताना संवाद है।बड़े कवियों पर लिखी जाने वाली किताबों में उनकी बड़ी बातों पर ज्यादा फोकस रहता है और यह वह सबकुछ होता है जिसे दुनिया जाहिरा तौर पर जानती है। 'मारीना' इस अर्थ में भिन्न है कि यह वह सब तो बताती ही है जो कि एक कवि के जीवन और उसके रचे गए को सामने रखने से ज्यादा यह बता जाती है कि किसी कवि को कैसे पढ़ा जाय और उस पढ़े को गुनकर कैसे जिया जाय।पढ़ना तो मन लगाकर किया जा सकता है।समय ,समझ और उम्र के गुनने की थोड़ी सलाहियत भी आ (ही) जाती है लेकिन किसी कवि के जिये से उपजे रचे में रमकर जी जाना इतना सहल भी नहीं।मुझे लगता है कि यह वही बिंदु है जिसे जिगर मुरादाबादी और मिर्ज़ा ग़ालिब 'एक आग का दरिया है और डूबकर जाना है' तथा 'वो ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता' कह गए हैं।इस किताब को पढ़ते हुए मुझ बार - बार लगता है की मारीना की जिंदगी और शायरी का 'तीर -ए- नीमकश' जीवनीकार प्रतिभा कटियार के दिलोदिमाग में कहीं गहरे तक खुभा हुआ है। नहीं तो कोई किसी अदेखे -अजाने कवि को इतनी आत्मीयता से कैसे जान सकता है भला !

'मारीना' नामक इस किताब में कुछ रूस की एक महान कवयित्री के जीवन की 'क्रोनोलॉजी' है।उसके जगत के 'किस्से' हैं।उसकी कविताओं की किताबत है जो अनुवादों के जरिए संसार भर की अनेकानेक भाषाओं में घुलकर सदानीरा है। यह सब तो है ही इसमें लगभग हर चेप्टर के बीच पेजब्रेक की तरह 'बुकमार्क' शीर्षक से दर्ज वे इबारतें हैं जो इस एक मँझोले कद वाली किताब को हमारी हिंदी की एक जरुरी किताब बनाती हैं।.. और क्या कहूँ ! एक पाठक* के रूप में यह मेरी एक छोटी - सी टीप है जिसकी साझेदारी का मकसद बस यह है कि अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो मेरी राय है कि अवश्य पढ़िए और अगर पढ़ी है तो मैं सचमुच जानने को उत्सुक हूँ कि यह आपको कैसी लगी?
---
* 'पाठक' शब्द पर स्टार लगाकर यह फुटनोट इसलिए लिख रहा हूँ कि ( हिन्दी के) एक प्रोफेसर के रूप में 'मारीना' की समीक्षा लिखना मेरे लिए बहुत आसान था लेकिन मैं अपने पाठक का क्या करूँ ! हिन्दी की पढ़ने - लिखने वाली बिरादरी में जिस तरह किसी किताब के आते ही 'ब्रेकिंग न्यूज' की तरह 'ब्रेकिंग रिव्यूज' आ रही हैं वैसे में इतनी देर से आज / अब अगर कुछ लिख सका तो अपने लिए बस यही कहूँगा कि (पढ़त - लिखत में) 'हमन को होशियारी क्या !' और जीवनीकार प्रतिभा कटियार के वास्ते भी कबीर के ही शब्द उच्चारूँगा कि 'हमन हैं इश्क मस्ताना '। तो,बस एक जानकारी भर कि एक कवि और उसकी कविताओं के इश्क में डूबी यह किताब 'मारीना' संवाद प्रकाशन से छपी है और इसका दाम तीन सौ रुपये (मात्र) है। तो ,मन करे तो 'मारीना' को खोजिए,खरीदिए और पढ़िए।
------
पुनश्च : यह विश्व पुस्तक मेला ,नई दिली की तस्वीर है जिसमें 'संवाद' के स्टाल पर बैठीं एक कवि -अनुवादक की बेटी और दो युवा कवयित्रियों की प्यारी भतीजी नेहिल हैं जो मेरे इसरार पर 'मारीना' की मेरी वाली प्रति पर अपने ऑटोग्राफ दे रही हैं।

Thursday, March 5, 2020

कई बेआवाज थप्पड़ों की याद दिलाती फिल्म ‘थप्पड़’


'थप्पड़' बस इतनी सी बात? बस इतनी सी बात पर घर छोड़ दिया? इतनी सी बात पर तलाक ले लिया? पागल है क्या? कितना तो चाहता था उसका पति उसे, थोड़ा बहुत तो हो जाता है ऊंच-नीच. इतना एडजेस्टमेंट तो रिश्तों में चलता है. ऐसे सोचने लगें तो एक भी औरत घर में रहे ही न सब घर छोड़कर चली जाएँ. सारी शादियाँ टूट जाएँ. ये तो कुछ ज्यादा ही दिखा दिया फिल्म में.. औरत वो जो घर जोडकर रखे, खुद सहे लेकिन परिवार पर आंच न आने दे. जिन औरतों ने सहा नहीं उनके घर टूटे ही हैं. ये और बात है कि टूटे घर वाली औरतों ने भी कम नहीं सहा. फिर इस फिल्म में तो लड़का सौरी फील भी कर रहा था. लेने भी आया. कितना कहा कि गुस्से में था...लड़की मानी ही नहीं...ऐसे तो चल लिया यह समाज. ऐसे तो निभ गयीं शादियां?

थप्पड़ देखते हुए आसपास से सुनाई देने वाले वक्तव्यों के चेहरे कुछ ऐसे ही थे. ‘इत्ती सी बात...’ यही बार-बार सुनाई दे रहा था. सच कहूँ तो कुछ देर तक समझ में मुझे भी नहीं आया कि इत्ती सी बात को फिल्म का विषय क्यों बनाया. इसमें बहुत कुछ और शामिल हो सकता था. माइनस थप्पड़ जो एक एक्सट्रीम गुस्से की वजह से पत्नी पर निकल गया अमृता की जिन्दगी में सब कुछ तो ठीक था. कुछ ज्यादा ही ठीक था. कितनी लड़कियों के पिता उन्हें इतना प्यार करते हैं भला, कितने पिता अनकंडीशनली बेटियों के साथ खड़े होते हैं. अव्वल तो वो खड़े होना ही नहीं चाहते क्योंकि वो आखिरी दम तक घर बसा रहे की कोशिश करने में लगे रहते हैं बिना यह सोचे कि इस कोशिश में कितनी घुटन होगी. जो पिता साथ खड़े होना भी चाहते हैं उनके आगे ‘समाज क्या कहेगा’ की दीवार आ जाती है.

कितनी लड़कियों को पड़ोस की कोई स्त्री बिना जज किये जोर से गले लगा लेती है. कितनी स्त्रियों को उसकी भाभी या भाई की मंगेतर मजबूती से थाम लेती हैं...अमृता खुशकिस्मत है.

भारतीय समाज की स्त्रियाँ अभी इतनी खुशकिस्मत नहीं हैं. सोचती हूँ कि कौन सी स्त्री होगी जो फिल्म देखकर यह नहीं सोचेगी बस इत्ती सी बात पर तलाक ले लिया, हमने तो इससे हजार गुना ज्यादा सहा, रोज सहते हैं...यही फिल्म का केंद्र बिंदु है. यह एहसास कराना.

जिस नीले रंग की दीवारों वाले घर के ख्वाब अमृता देखती है वो नीला रंग उसकी पसंद तो था ही नहीं, लेकिन उसने पति विक्रम की पसंद को इस कदर आत्मसात किया कि उसे लगा ही नहीं कि उसकी पसंद का रंग तो पीला था शायद. वो इस कदर भूल चुकी है कि पापा से कन्फर्म करती है इस बात को. 'मेरा फेवरेट रंग तो पीला था न पापा?' यह एक और बात है कि कितने पिताओं को अपनी बेटी के फेवरेट रंग और उनकी फेवरेट खाने की चीज़ों के बारे में पता है? हालाँकि सारी ही बेटियों को पता है पिता की पसंद की हर चीज़ के बारे में.

यह फिल्म सिर्फ थप्पड़ के बारे में नहीं है, यह रोज-रोज होने वाली उन छोटी उपेक्षाओं के बारे में है जो आत्म सम्मान को तोडती हैं लेकिन जिन्हें इग्नोर करके स्त्रियाँ घर की डोर थामे रहती हैं बिखरने नहीं देतीं.

'फिर से नयी गाड़ी ? ये आखिर करती क्या है?' अपनी सिंगल पड़ोसन की नयी गाड़ी पर ऐसे कमेन्ट देने वाले पति विक्रम को भले ही अमृता ने 'हार्ड वर्क करती है' कहकर हंसते हुए इग्नोर कर दिया हो लेकिन यह समूचे समाज का आईना है. जब अमृता कहती है ‘मैं भी सीख लूं गाड़ी चलाना?’ तो विक्रम कहता है 'तुम पहले आलू के पराठे बनाना सीख लो'. जब लड़कियां घर के काम में खुद को झोंक देती हैं हैं तो थप्पड़ नुमा कमेन्ट मिलता है ‘तुम चूल्हे में ही घुसी रहना, और चूल्हे से बाहर निकली स्त्रियों पर वो फ़िदा होने लगते हैं. जब वो बाहर निकलती हैं, तरक्की करती हैं तो उनका चरित्र चित्रण होने लगता है. उन्हें गाड़ी चलाना सीखने, आलू का पराठा बनाना सीखने, बच्चे पैदा करने, प्रमोशन हासिल करने, सुंदर दिखने, सामान्य दिखने हर बात के लिए थप्पड़ नुमा कमेंट इतने सहज रूप में मिलते रहते हैं कि स्त्रियाँ भी आदी सी हो जाती हैं इनकी.

क्यों स्त्रियों पर बने चुटकुले स्त्रियाँ ही मजे लेकर पढ़ती हैं, सुनती हैं सुनाती हैं. ये वो थप्पड़ है जिसे एक-दूसरे के गाल पर मारने के लिए हमें तैयार किया गया. एक चेतन स्त्री को हमेशा खतरे के तौर पर ही देखा गया है. चेतन स्त्री, घर, परिवार, समाज सबके लिए खतरा है. वो सब परिवार खुशहाल हैं जहाँ स्त्रियों ने कभी सवाल नहीं किये और पुरुषों ने यह बात कभी महसूस भी नहीं की.

अमृता के पिता जो काफी समझदार और संवेदनशील हैं उन्हें यह सुनकर झटका लगता है जब उनकी पत्नी बुढ़ापे में यह कहती है कि ‘सहा तो उसने भी है’. उन्हें लगता है कि वो तो बहुत ख्याल रखते हैं इसलिए उनकी पत्नी ऐसा कैसे कह सकती है. तब वो कहती है ‘मैं गाना चाहती थी लेकिन अगर मैं गाती तो बच्चे कौन पालता. किसी ने नहीं कहा तो भी मुझे पता था मुझे क्या करना है.’ लेकिन अंतिम वाक्य कि 'तुमने तो भी तो कभी नहीं कहा कि मैं अब गाती क्यों नहीं?' प्राण वाक्य है.

अगर खुद की मर्जी से घर की स्त्रियाँ पुरुषों पर, बच्चों पर, परिवार पर अपनी इच्छाओं को कुर्बान कर रही हैं और आपको यह पता भी नहीं तो आपकी यह उपेक्षा भी थप्पड़ है

बस इत्ती-इत्ती सी ही होती हैं बातें जोड़ने की भी और तोड़ने की भी. अस्तित्व फिल्म का वह दृश्य याद आता है जब तब्बू से उसका घर छोड़ने को कहा जाता है. कहने वाले पति और पुत्र दोनों हैं. वह घर जिसे उसने रत्ती रत्ती जोड़ा था अचानक उसका नहीं रहा. उसी एक गलती की वजह से जिसे पति भी शौकिया कई बार करता रहा है और जिसे खुद के लिए गलती माना ही नहीं.

यह फिल्म बहुत कम है, समाज में इससे कहीं ज्यादा थप्पड़ हैं जो रोज तड़ातड पड़ रहे हैं जिनमें से बेआवाज थप्पड़ों की तादाद बहुत ज्यादा है. यह फिल्म रिश्ता और सम्मान में से अगर चुनना हो तो सम्मान बचाने की ओर ले जाती है.

यह फिल्म स्त्रियों के बारे में है लेकिन इसे पुरुषों को जरूर देखना चाहिए. अपने घर की तमाम स्त्रियों के साथ देखना चाहिए. रो लेना चाहिए थोड़ा सा, महसूस कर लेना चाहिए अपनी गलतियों को. उन स्त्रियों के प्रति सम्मान से भर जाना चाहिए जो रोज आपकी उपेक्षाओ के थप्पड़ खाती हैं बिना शिकायत किये.

हर पिता को यह फिल्म देखनी चाहिए और सोचना चाहिए बेटियों के साथ सुंदर रिश्ता बुनने के बारे में.

Wednesday, March 4, 2020

दुस्वप्न


पीछे कुछ अनजाने लोग थे
उनके हाथों में थे हथियार

वो मुझे नहीं जानते थे
मैं भी उन्हें नहीं जानती थी
वो मुझे मारना चाहते थे
क्यों मारना चाहते थे
ये न वो जानते थे
न मैं जानती थी

यह बात तो कोई और ही जानता था

हथियारों से लैस उस भीड़ से बचकर भागते हुए
अचानक टकरा गई अपने प्रेमी से
सांस में आई राहत की सांस
छलक पड़ीं आँखें
पीड़ा और सुख दोनों से एक साथ
कि उसने कहा था
वो मुझे दुनिया के हर दुःख से बचाएगा
आंच नहीं आने देगा मुझ पर

छुप गयी उसके पीछे जाकर
भीड़ थमी
भीड़ के कुछ चेहरे मुस्कुराये
अचानक मेरा प्रेमी सामने से हटते हुए बोला
'ले जाओ इसे'

उस रोज पहली बार
प्रेमी का धर्म मालूम हुआ
इसके पहले तक प्रेम ही था
हम दोनों का धर्म

कत्ल होने से पहले मैंने महसूस किया
कि अब मुझे भीड़ के हाथों
कत्ल होने का दुःख नहीं
दुःख था प्रेम के धार्मिक हो जाने का

मुझे भीड़ ने नहीं प्रेम ने मारा
और हमारे बीच जो प्रेम था
उस प्रेम को किसने मारा...