Sunday, August 16, 2009

सदी का सबसे बड़ा आदमी


काशीनाथ सिंह
लड़ाइयां ढेर सारी लड़ी गईं वीरों की इस धरती पर और धरती पर ही क्यों, पानी पर भी और आसमान में भी, यहां तक कि घर-घर में. चाहे वह राजपूतों का जमाना रहा हो, चाहे मुगलों का, चाहे अंग्रेजों का, लेकिन गली में लड़ाई केवल एक लड़ी गई है और वह भी इस नगर में, यह उसी लड़ाई की दास्तान है।
देश को आजाद हुए, मुश्किल से चार-पांच साल हुई थे, उन्हीं दिनों इस गली में कोई खानदानी रईस रहते थे, जिनका नाम राणा से शुरू होता था और चंदेल पर जाकर खत्म होता था. इतने लंबे नाम से उन्हें कोई नहीं जानता था, लोग जानते थे उनके तखल्लुस शौक से. उन्हें इस बात का बखूबी इल्म था कि उर्दू के जितने भी बड़े-बड़े शायर वगैरह हुए हैं, ज्यादातर के तखल्लुस दो हर्फों के रहे हैं-मसलन मीर, सौदा, जौक, जोश, वगैरह. इसी की देखादेखी जब उन्होंने शायरी शुरू की थी तो अपना नाम शौक रखा था और यह नाम और कहीं चला हो या न चला हो, कोठे पर खूब चला. लेकिन जब उम्र के साथ-साथ यह शौक छूटा तो उन पर ऐसा शौक चढ़ा जिसने उनकी शोहरत देश के कोने-कोने तक फैलाई. जिसे देखो, वही उसी गली की तरफ चला जा रहा है, जिधर शौक साहब का गरीबखाना है।
शौक साहब चार मरातिम वाली अपनी कोठी में तीसरी अंटारी की उस खिड़की के पास बैठे रहते थे, जो गली की तरफ खुलती थी. उनके पास सारा कुछ था लेकिन सब उनके लेखे माटी के मोल था. हाथी था, लेकिन चढ़ते नहीं थे. घोड़े थे लेकिन दौड़ाते नहीं. बग्घी और कार भी थी, लेकिन हुआ करे. यह सारा कुछ इसलिए था कि रईस कि पास होना चाहिए. ये सब कोठी के पिछवाड़े वाले बगीचे में, जहां नौकरों-चाकरों के लिए दड़बे बने हुए थे, पड़े-पड़े चिंग्घाड़ा या हिनहिनाया करते थे. कहीं दूर देहात में उनके सैकड़ों एकड़ के फार्म भी थे, जिनमें अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन शौक साहब को इन सबसे नहीं, सिर्फ पान, कत्था, सुपारी और चूने से मतलब था.शौक साहब जिस खिड़की के पास बैठते थे, उसके बगल में चांदी की पन्नियों में लिपटी पान की गिलौरियों से एक तश्तरी सजी रहती, जिसमें महंगी से महंगी खुशबूदारी जर्दे की डिब्बियां पड़ी रहतीं. वे मूड के मुताबिक गिलौरी और तंबाकू मुंह में डालते, देर तक तबियत से घुलाते और ताक-तूककर खिड़की के बाहर गली में थूक मारते.जब भी उनकी पीक खिड़की के बाहर आती, किसी न किसी के सिर और कपड़ों पर पड़ती. इतिहास बताता है कि मुंह का ऐसा सटीक निशानेबाज इस नगर में कभी नहीं हुआ. कहने वाले तो कहते हैं कि कभी-कभी लोग उनके अचूक निशाने का इम्तिहान लेने के लिए नीचे से इकन्नी या अधन्नी उछालते थे, लेकिन जब वह टनटनाती हुई सड़क पर गिरती थी, तो पीक में भीगी न$जर आती थी.तो जिस आदमी के कपड़े-कुरता और धोती लाल होते, उस पर होने वाली प्रतिक्रिया शौक साहब बड़े गौर से देखते क्या वह बाएं-दाएं ताककर चुपचाप निकल जाना चाहता है? क्या वह खिड़की की ओर सिर उठाता है, भुनभुनाता या उन्हें कोसता है? और अंत में कपड़े झाड़कर चल देता है? ऐसे शरीफ और कायर किस्म के आदमियों से उन्हें घिन आती और बची-खुची पीक की सिट्टी पीकदान में थूक देते. उन्हें ऐसे बहादुरों की तलाश रहती, जो कपड़े खराब होते ही मां-बहन की धुआंधार गालियां बकना शुरू करें, उछलें-कूदें, आसमान सिर पर उठा लें, रो-रोकर मोहल्ले और राह चलतों को अपना इर्द-गिर्द जुटा लें, फिर बिलखें-बिलबिलाएं और दया की भीख मांगते हुए, इंसाफ का वास्ता देते हुए बताएं कि अब वे क्या पहनेंगे, उनका क्या होगा?ऐन इसी वक्त, जब वे माथा पीट-पीटकर ऊपरवाले की गालियां दे रहे होते, उसी कोठी से दो नौकर निकलते और आदर के साथ उस ऊपर ले जाते, उसे चंदन के साबुन से मल-मलकर नहलाया जाता, नया कुरता और नई धोरी पहनाई जाती, इत्र से शरीर को सुवासित किया जाता, अच्छा से अच्छा खाना खिलाया जाता और अंत में उसे हाथी या घोड़े पर जो उसके लिए सपना होते-बिठाकर गली के नुक्कड़ तक विदा कर दिया जाता.ऐसे मेहमानों को पाकर नाम गांव-नगर के बाहर दूर-दूर तक पहुंचने लगा. लोग हर जगह चर्चा करते कि गरीब निवाज की एक कोठरी धोतियों से भरी हुई है और दूसरी अद्धी और तांजेब के कुरतों से. बरामदे में बराबर दो-तीन दर्जी सिलाई का काम करते रहते हैं।
इन खबरों का अंजाम यह हुआ कि लोग तरह-तरह की गालियां सीखते, रोने-कलपने की आदत डालते और फिर गली का चक्कर लगाना शुरू कर देते. पता नहीं, कब सरकार का मन बन जाए और थूक बैठें.लिहाजा अपने पर थुकवाने वालों की जो भीड़ बढऩी शुरू हुई, उसका कोई अंत नहीं था.लेकिन साहब, तारीफ कीजिए शौक साहब की, पीक की तरह उनकी नजर भी अचूक थी. आप दो चार दिन तो क्या महीनों तक उस गली में टहला कीजिए वे आप पर नहीं नहीं थूकेंगे, सो नहीं थूकेंगे. वे उस आदमी को उसकी चाल से पहचान लेते हैं-एसी काबिलियत किस शख्स में है? कौन गालियां देते-देते रो सकता है? यही नहीं, कोई लाख अनजान बनकर खिड़की को अनदेखा करते हुए नीचे से गुजरने की कोशिश करे, वे समझ जाते कि अभी कितने रोज या हफ्ते या महीने पहले यह कम्बख्त सुअर, अपने पर थुंकवा चुका है? कभी-कभी तो, जब बर्दाश्त के बाहर हो जाता, झल्लाकर बोल भी पड़ते, अबे हरामखोर, अभी महीना भी नहीं बीता कि फिर आ पहुंचा? या तैं कैसे आ गया रे? मैंने क्या कहा था? तेरे को ठीक से गालियां भी नहीं आतीं? आ गईं क्या? या अरे, यह कौन है चिथडू का बाप, ससुर नहीं तो! मैंने कोई ठेका लिया है तेरे घर-भर का. भाग यहां से.कुछ दिन तक तो कई ऐसे लोग भी जो कभी घरानेदार थे, लेकिन वक्त की मार से खस्ताहाल हो रहे थे, पगड़ी के नीचे अपना चेहरा छिपाए और सिर झुकाए उसी गली से गुजरते और पीक की उम्मीद में खिड़की के नीचे पहुंचते ही अपनी चाल धीमी कर देते. शौक साहब की पकड़ में आ जाते और वे बेमुरौव्वत होकर टोक देते, क्यों मुझे नरक में ठेल रहे हो महाराज. मैं तो ऐसे भी कुरता धोती दे देता. लेकिन क्या करूं अपने कौल से हारा हूं. या बस करो बाबू साहब. गालियां तो दे लोगे मगर रो कैसे पाओगे? आदत तो डाली नहीं. और खामखाह ऊपर से मुझे बदनाम करोगे कि शौक अपनी ही जात पर थूंकता है.इस तरह शौक साहब ने जनता को अहसास करा दिया कि उनकी पीक के सच्चे हकदार कौन हैं?
क्रमश...

Friday, August 14, 2009

काशी कक्का की कहानियां

बचपन की यादों में बाकी स्मृतियों की तरह एक स्मृति जो जमकर बैठी है वो है अलाव. मुझे रात का खाना खाने की जल्दी सिर्फ इसलिए होती थी कि खाने के बाद अलाव का माहौल बनता था. अलाव के इर्द-गिर्द लोगों का जमावड़ा. शुरुआत कुछ गप्पबाजी से होती लेकिन हम बच्चों के इसरार के आगे जल्दी ही बड़े लोग झुक जाते और उनकी गाड़ी कहानियों के ट्रैक पर लौट आती. रोज एक से एक कहानियां. ऐसा रोचक संसार, ऐसी-ऐसी फैंटेसी कि ठंड की वे लंबी रातें न जाने कब बीततीं, पता भी न चलता. डांटे कौन, डांटने वाले खुद कहानियों के संसार में गोते लगा रहे होते थे. कई बार नींद हमें उड़ा ले जाती और हमारी कहानियां अधूरी रह जातीं. सुबह उठते ही हम घूम-घूमकर उन लोगों का सर खाते जो रात में अलाव पर थे. उसके बाद क्या हुआ...राक्षस ने क्या किया...क्या राजा मर गया...राजकुमारी ने अपनी जान कैसे बचाई...वगैरह.

आज बचपन का वही मंजर जैसे फिर से लौट आया था. मौका था काशीनाथ सिंह और अखिलेश की कहानियों के पाठ का. यूं कभी-कभार कहानी पाठ सुने हैं मैंने लेकिन आज माहौल बड़ा अपना-अपना सा लगा. हालांकि अलाव कहीं नहीं था. न उसके आसपास चाचा, ताऊ, बाबा, दादा थे. फिर भी न जाने क्यों कहानियां, उनके कहे जाने का ढंग और सैकड़ों की संख्या में वाल्मीकि रंगशाला के एयरकंडीशंड हॉल में बैठे लोग वैसे ही लग रहे थे. उनकी तन्मयता भी वैसी ही थी. बीच-बीच में हुंकार जरूर नहीं लग रही थी. लेकिन कहानियों के मूड के साथ आते लोगों के रिएक्शंस हुंकार से ही लग रहे थे. मुझे याद है कि जब नाना कहानी सुनाते थे और कोई हुंकार न लगाये तो वो बहुत नारा$ज हो जाते थे. आज वो हुंकारे भी याद आ रहे थे.

इस अपने से माहौल में जिसे साझी दुनिया ने रचा था कहानियों का रंग जमना ला$िजमी थी. कुछ कहानियों की मजबूती और कुछ उनके कहे जाने का ढंग पूरे माहौल को खुशनुमा बना रहे था. अखिलेश की कहानी अंधेरा में सांप्रदायिक दंगों के बीच प्रेम को बचाने की कोशिश का चित्रण था. धर्म कई बार सर उठाता और कई बार किनारे पड़ा न$जर आता है. सांप्रदायिक ताकतों से प्रेम को बचाने की कोशिश करते युवक की बेबसी कई सारे सवाल छोड़ती है. कहानी में कथ्य के साथ बिम्ब और रूपकों का सुंदर चित्रण है. काशीनाथ जी ने इस मौके पर दो कहानियां पढ़ीं. पहली कहानी बांस और दूसरी इस सदी का सबसे बड़ा आदमी. इन दोनों कहानियों को भी वहां बैठे लोगों ने मंत्रमुग्ध कर लिया. इस सदी का सबसे बड़ा आदमी ने जहां पूरे माहौल को बेहद हल्का-फुल्का बनाते हुए किस्सागोई का पूरा लुत्फ दिया वहीं समाज के विद्रूप चेहरे को बेनकाब भी किया.

इस कहानी पाठ का असर है या कहानियों को सहेज लेने का लालच कि काशी जी से उनकी किताब मांगने को लोभ संवरण कर पाना मुश्किल ही था. अपनी चिर परिचित सहजता और स्नेह के साथ उन्होंने किताब सौंपी तो तसल्ली हुई. उनकी कहानी इस सदी का सबसे बड़ा आदमी अगली पोस्ट में यहीं दिखेगी.
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना!

Saturday, August 8, 2009

फासले- मारीना त्स्वेतायेवा


फासले..., कोसों, मीलों लम्बे...
हमें अलग किया गया,
भेजा गया बहुत दूर
ताकि चुपचाप जीते चले जाएं हम
पृथ्वी के दो अलग-अलग हिस्सों में।
फासले..., कोसों, मीलों लम्बे...
उखाड़ा गया हमें,
पटका गया इधर-उधर
बांधे गये हाथ,
ठोंकी उन पर कीलें
पर मालूम नहीं था उन्हें
अंत:करण और धड़कती नसों का...
किस तरह होता है मिलन...

(अनुवाद: डा: वरयाम सिंह)

Thursday, August 6, 2009

रात भर

रात भर एक ख्याल सुलगता रहा
रात भर एक रिश्ता आंखों में पलता रहा
रात भर मन मोम सा पिघलता रहा
और रात पूरी उम्र में ढलती रही...

Sunday, August 2, 2009

जन्मदिन हमारा शुक्रिया आपका !

किसी रोज बातों-बातों में यूं ही कहा था कि काश कोई ऐसी दुनिया होती जहां सुंदर कविताएं, संगीत, प्यारी बातें, सारे मौसम, पूर्णमाशियां सारी, समंदर, पंक्षी, ढेर सारी आजादी और वो सब कुछ हो जो मुझे पसंद हो. जहां कोई नियम नहीं, कोई रोक-टोक नहीं. क्या होता भला उस दुनिया का नाम बूझो तो?
प्रतिभा की दुनिया और क्या. वह छोटा सा संवाद ब्लॉग बन गया. कुछ दोस्तों ने एक सुंदर सा ब्लॉग प्रतिभा दुनिया के नाम से बनाकर तोहफे में दिया. इस तरह प्रतिभा की दुनिया बन गई. फिर सवाल कि इस दुनिया में हो क्या? क्योंकि इस पर कोई योजनाबद्ध ढंग से काम तो हुआ नहीं था. और क्यों भला मैं अपनी दुनिया सार्वजनिक करूं. क्यों बताऊं लोगों कि मुझे फलां कविता बहुत प्रिय है. मैं बता भी दूं तो भला कोई क्यों सुने मुझे. इन्हीं सब उहापोह के बीच यह सफर शुरू हुआ. लेकिन दोस्तों ने ब्लॉग बनाने तक ही साथ नहीं निभाया लिखवा लेने का भी जिम्मा उठाया. जिस दिन पोस्ट न डालूं फोन आ जाते, मेल आने लगतीं कुछ तो लिखिये. साथियों ने हौसला दिया तो वरिष्ठजनों ने रास्ता दिखाया, बताया कि यह तुम्हारी दुनिया है इसके प्रति उदासीनता ठीक नहीं है. धीरे-धीरे ब्लॉग की दुनिया के नये दोस्त भी उत्साहवद्र्धन में शामिल होने लगे. हैरत होती मुझे कि किसी के लिखे का कोई इंत$जार भी कर सकता है. मुझे अपने लिखे को लेकर कोई मुगालता, कभी नहीं रहा. मुझे खुद पर यकीन रहा हो, न रहा हो लेकिन दोस्तों ने, गुरुजनों ने यह यकीन कभी नहीं छोड़ा. उनका यकीन ही मेरा लेखन है. आज मुड़कर देखती हूं तो पाती हूं कि पूरे एक साल से यह दुनिया बाकायदा आबाद है. कोई आंधी नहीं, कोई तूफान नहीं, कोई रुकावट नहीं. ढेर सारे साथी फॉलोअर्स के रूप में जुड़े हैं और टिप्पणीकर्ताओं के रूप में भी. आज प्रतिभा की दुनिया के जन्मदिन के मौके पर उन सबके प्रति आभार जिन्होंने हर मौके पर मेरा उत्साह बढ़ाया, लिखने के सिलसिले को रुकने नहीं दिया और मुझमें विश्वास बनाये रखा. उनका यह विश्वास ही मेरी ताकत है.