सूरज ढलते ढलते उदास शाम का सिरा थमा गया था। दिन के जाने और रात के आने के बीच का यह छोटा सा वक्फ़ा अपने भीतर न जाने कितनी उथल पुथल समेटे होता है। किसी के जाने और आने के बीच का वो हिस्सा जिसमें न जाने कितने संशय सांस ले रहे होते हैं। विगत की हथेलियाँ छूट नहीं रही होतीं और आगत की आहट का कोई पता नहीं होता।
देवदार के घने जंगलों के बीच रोशनी और अंधेरे के रंग खेल खेल रहे थे। यह आँख मिचौली का खेल नहीं था, यह खेल था सांस के आने और जाने के बीच जरा सा सुस्ता लेने का। लैंढ़ोर न जाने कितनी बार आई हूँ लेकिन आने और आने में फर्क होता है। इस बार का आने खुद से ख़ुद को रिहा करने के लिए जरूरी था। मैं उन रास्तों पर चलते हुए जीवन की उन पगडंडियों की स्मृतियों को भी पार कर रही थी जिन पर चलकर मेरा वजूद बना है।
जंगल की ख़ुशबू को थाम लेने को व्याकुल हथेलियाँ ख़ुद पर हंस रही थीं। ख़ुशबू को भला कोई थाम सकता है? क्या उसकी कोई तस्वीर ली जा सकती है? नहीं, ख़ुशबू को सिर्फ जिया जा सकता है। एक जगह बैठकर मैं देवदार और आसमान की गुफ्तगू को होते हुए देख रही थी। मेरे पीछे जीवन और मृत्यु का मंत्र बुदबुदा रही थीं कब्रें। उन कब्रों में सोये हुए लोग सुकून में तो होंगे शायद।
जब सब कुछ इतना फ़ानी है तो झगड़ा किस बात का है आखिर। झगड़े का संसार हमारा बनाया हुआ है। झगड़ा कितना बेवजह यह बताने को कुदरत हमेशा तैयार रहती है। टट्टू पर बैठा खिल खिल करता बच्चा, उसके साथ चलता पिता, फोटो का ठीक ठीक एंगल ढूंढती माँ की खुशी, जीवन पर भरोसा है। वह भरोसा जिसे दुनिया भर के समझदार लोग लगातार तोड़ने पर लगे हैं।
चलते-चलते पूरी धरती नाप लेना चाहती हूँ। इन दिनों पाँव थकते नहीं हैं। असल में जितना चलती हूँ मन को उतनी रिहाई मिलती है। चलना रास्तों से रिश्ता बनाना है, ख़ुद के करीब लाता है। चलते हुए चुप रहना किसी ध्यान में होने जैसा होता है। यह हाल ही में जाना है। अपने हाल में जाने हुए को मुट्ठियों में कैद कर लेना चाहती हूँ। फिर ख़ुद की बेवकूफी पर हंस देती हूँ। जो कुछ भी दुनिया में अच्छा है उस पर कब्जेदारी की हमारी फितरत।
यह मेरा जाना हुआ है, यह व्यक्ति मेरा है, यह जगह मेरी है, यह घर मेरा है...सारा झगड़ा मैं का है। ख़यालों के गहरे समंदर में डूबे हुए मैं अपने भीतर धँसती जा रही थी। भीतर धँसते जाने का अर्थ है अपने भीतर छुपा कर रखी उस क़ीमती शय जिसका नाम उदासी है को छू लेना।
मेरी आँखें बह निकली थीं और इस बात की खबर गालों के अलावा किसी को नहीं थी। लैंढ़ोर की हवा मरहम सी बन चुकी थी। भीतर का अंधेरा खाली हो रहा था और बाहर उगा रहा ताजा अंधेरा रोशनी बनकर भीतर प्रवेश कर रहा था।
युवा खिलखिलाहटों का सैलाब उधर से गुजरा तो लगा ढेर सारे फूल खिले हों। उनकी हंसी से एक फूल चुराकर मैंने अपने बालों में टाँक लिया था...
लैढ़ोर ने हाथ थाम लिया था।
(जारी...)
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