चलते-चलते अचानक पाँव अचानक मुड़ गया। मीठे दर्द की लहर सी उठी। टीस देह में उतर गयी। जिस वक़्त यह हुआ सूरज दिन के रजिस्टर पर अपनी दिहाड़ी पूरे होने के सिग्नेचर कर रहा था। देवदार के पेड़ अपनी गर्दन उठाए कुछ इस गलतफहमी को जी रहे थे मानो वो सामने खड़े हिमालय से ज़्यादा ऊंचे हों। हालांकि उनकी लहराती झूमती शाख़ों को ऐसा कोई गुमान नहीं था, वे बस अपने होने में ही खुश थीं। ढेर सारे टूरिस्ट पहाड़ी की ओट में जाते सूरज को अपने-अपने मोबाइल में कैद करने की जुगत लगा रहे थे। इस जुगत लगाने में उनका उस लम्हे को जीना लगभग छूटा जा रहा था।
मेरे पाँव के मुड़ने की ख़बर मेरे क़रीब खड़े मेरे दोस्त को नहीं हुई लेकिन उफ़क में अटके सूरज को हो गई। उसके घर जाने की स्पीड में ब्रेक लग गया। उसने पलकें झपकाकर पूछा, 'क्या हुआ?'
मैं हंस दी। 'कुछ नहीं' कहकर वहीं उसी पहाड़ी के किनारे बैठ गई।
सूरज नाराज़ होकर बदली में छुप गया।
मैं जानती हूँ इसके ये खेल, मैंने दर्द को घूंटते हुए कहा, 'तुझे कुछ देर और रोकना था, बस इसलिए। देख, तू रुक गया न?' बदली से झाँकते हुए उसने अपनी नाराज़गी को कुछ यूं लपेटा, जैसे पड़ोस वाली आंटी ने शाल लपेटा।
मैंने उस हँसकर दिखाया, देख मैं ठीक हूँ। उसने मेरी पीठ पर धौल देते हुए कहा, 'मुझसे न छुपा, मैं सब जानता हूँ।
अब संभलकर घर जा, आराम कर।'
'पहले तू तो जा। देख कितने सारे लोग तेरे जाने को देखने को व्याकुल हैं'। वो हंसकर चल दिया। जाते-जाते अपनी रोशनी मेरे दर्द पर रख दी थी उसने।
दर्द में थोड़ी राहत तो आई थी।
मैं जानती हूँ इसके ये खेल, मैंने दर्द को घूंटते हुए कहा, 'तुझे कुछ देर और रोकना था, बस इसलिए। देख, तू रुक गया न?' बदली से झाँकते हुए उसने अपनी नाराज़गी को कुछ यूं लपेटा, जैसे पड़ोस वाली आंटी ने शाल लपेटा।
मैंने उस हँसकर दिखाया, देख मैं ठीक हूँ। उसने मेरी पीठ पर धौल देते हुए कहा, 'मुझसे न छुपा, मैं सब जानता हूँ।
अब संभलकर घर जा, आराम कर।'
'पहले तू तो जा। देख कितने सारे लोग तेरे जाने को देखने को व्याकुल हैं'। वो हंसकर चल दिया। जाते-जाते अपनी रोशनी मेरे दर्द पर रख दी थी उसने।
दर्द में थोड़ी राहत तो आई थी।

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