Thursday, August 11, 2022

आह! कितनी उम्मीदें हैं तुम्हारे नाम से-किशोर चौधरी


- प्रतिभा कटियार
किशोर चौधरी का कविता संग्रह ‘बातें बेवजह’ पढ़कर ख़त्म किया है. जबसे इस किताब के संग हूँ मन पनीला सा हो रहा है. एक गौरैया भीगते हुए बालकनी में आ बैठी है. अपनी पांखें खुजला रही है या शायद भीगे पंखों को सुखाने की जुगत लगा रही है. कौन जाने क्यों वो भीगी होगी बारिश में, कहाँ जाने को निकली होगी और मेरी बालकनी की खिड़की पर सुस्ताने बैठ गयी है. बारिश लगातार हो रही है. भीतर भी, बाहर भी. चाय पीने की इच्छा में गौरेया को शामिल करने की इच्छा भी संग हो ली है. दिल ये चाहता है कि गौरेया यूँ ही बैठी रहे और मैं चाय बना लाऊं, एक कप उसके हिस्से की भी. फिर हम तीनों मैं किशोर और गौरेया साथ चाय पियें. बिना कुछ बोले. फिर यह डर भी है कि चाय बनाने गयी और गौरेया उड़ गयी तो...? यह सोचकर दिल उदास हो गया है. चाय पीने की इच्छा स्थगित कर गौरेया को देख रही हूँ. बारिश अब मुझे सिर्फ उसके पंखों पर ही दिख रही है. गौरेया प्रेम है...प्रेम गौरेया है. बारिश दुनियादारी कि जिससे कुछ पल राहत पाने को कोई ठीहा तलाशता दिल और फिर उसी दुनियादारी की पुकार पर उठकर चल देता है. किशोर इस बात को कुछ और ही ढंग से कहते शायद ऐसे कि-

ज़िंदगी अपरिभाषित दुःख नहीं
दर्द भरी जिज्ञासा थी.
कोई खो जाता है, तो मिलता क्यों है?

दिल को फितरत कुछ ऐसी मिली कि ऐसी ही बेवहज की बातों में वो जीवन भर अटका रहा. आँखों को फितरत कुछ ऐसी मिली कि बेवजह ही छलकती रहती हैं. बेवजह देर तक आसमान को ताकते हुए सोचा है पेड़ों के बारे में. फूलों की पंखुरियों पर हथेलियाँ फिराते हुए कभी टांकते हुए कोई फूल जुड़े में हमेशा सर झुका रहा जड़ों के आगे. कि चाय जब भी पी दो कप रहे ‘सामने’ जबकि दूसरा कोई न था. सच ही तो कहते हैं किशोर कि-

सब बातें नहीं होनी चाहिए हमारे बस में
मगर मूर्खतापूर्वक करना प्रेम
और समझदारी से मारे जाना, सीखना चाहिए सबको.

प्रेम की कौन कहे...कि प्रेम से ज्यादा बेवजह क्या है संसार में और हम इस विश्वास से निकल न पाए कभी कि प्रेम के बिना क्या ही जीवन, क्या ही दुनिया. प्रेम शब्द जितना रूमानी उतना ही इंकलाबी भी कि प्रेम से बड़ा प्रतिरोध कोई नहीं.

लेकिन प्रेम कभी ख़ाली हाथ नहीं आता. फूलों की, सपनों की, मिठास की सौगातें लेकर आता है और हमारी पूरी दुनिया बदलने लगती है. प्रेम लेकर आता है तन्हाई, दर्द, आंसू भी कि हमारी पूरी दुनिया बदल चुकी होती है. क्या प्रेम चला जाता है कहीं, फिर दूसरा प्रेम आता है, फिर तीसरा...पता नहीं. मुझे लगता है प्रेम कहीं नहीं जाता, वहीँ रहता है जीवन में डटकर. बस कि लोगों के आने-जाने को देखता रहता है, सहता रहता है. तासीर हर बार वही...टूटन हर बार वही. तो मान लीजिये कि अगर आप दुःख में हैं, पीड़ा में हैं, इंतज़ार में हैं, अगर दिल की धड़कनें काबू में नहीं तो रिल्के के शब्दों में अगर कहूँ तो मान लेना चाहिए कि ‘जीवन ने, प्रेम ने हमें बिसारा नहीं है, वो हमारा हाथ थामे चल रहा है.’

प्रेम से बड़ा नुकसान कुछ नहीं होता
कि एक दिन कोई
आपको आपसे ही चुराकर चला जाता है.

किशोर का यह कविता संग्रह ‘बातें बेवजह’ पढ़ते हुए जो महसूस होता है उसे सिर्फ ‘पढ़ना’ कहकर आगे नहीं निकला जा सकता. किशोर अपनी तरह के अलग ही लेखक हैं. वो अपना अलग ही जॉनर क्रिएट करते हैं. उन्हें पढ़ते हुए अक्सर हैरत में डूबती हूँ कि कोई कैसे नब्ज की चाल, आँख में अटका आंसू और दिल की धड़कनों को वैसा का वैसा लिख सकता है? यह उनके लिखने का हुनर नहीं यह उनके जीने का हुनर है. चूंकि किशोर मित्र भी हैं इसलिए थोड़ा करीब से जानती हूँ कि उनकी फितरत ही पानी की है. रेगिस्तान में रहने वाला यह लड़का अपनी पानी सी फितरत से रेगिस्तान को सींच रहा है. दिलों को मोहब्बत से सींच रहा है.

छोटी नीली चिड़िया को
चाहिए होती है जितनी जगह
एक पतली-सी टहनी पर
सबको
बस उतना-सा प्यार चाहिए होता है.

ये कवितायें बाहर की नहीं भीतर की हैं. इनका हाथ थामेंगे तो कोई सिसकी, कोई रुका हुआ रुलाई का भभका, कोई बिसरायी हुई स्मृति आपको थाम लेगी. जाने नहीं देगी. और सच कहूँ आप जाना चाहेंगे भी नहीं. मैं कबसे इन सतरों की दहलीज़ पर बैठी हूँ. उठने का दिल ही नहीं चाह रहा और मन ही मन किशोर से नाराज होती हूँ कि कम्बखत ऐसे कौन लिखता है, ऐसा कौन लिखता है भला कि-

आखिर लौट आई मुस्कान मेरे चेहरे पर
जब ये सोचा
कि तुम्हारे साथ न होने का दुःख
सिर्फ़ इक ज़िंदगी भर का ही है.

किताब लगभग पूरी अंडरलाइन है और मन खूब भरा हुआ जैसे भरे हुए हैं बादल. कि इस किताब ने आसपास रहने की जगह तलाश ली है. संग्रह हिन्द युग्म से आया है. कीमत सिर्फ 199 रूपये है और अमेजन पर उपलब्ध है. अंडरलाइन किये कुछ हिस्से साझा कर रही हूँ-

प्रेम दुबले लड़के का कहा हुआ
छोटा सा वाक्य है
काश, थोड़ी और होती शराब.
---
उसने दिव्य दृष्टि से खोला
जिंदगी का आखिरी पन्ना
और पढ़कर चौंक उठी
कि वह ताउम्र अकेली थी.
---
कि अद्भुत रचयिता ने
लड़कियों की तामीर में
शामिल रखा, एकाकीपन.
लड़के मगर बुनते रहे
अपना एकांत, शराब के दो प्याले.
---
कभी-कभी मैं सोचता हूँ
कि तुम लौटा दो मेरा पासा
और चला जाऊं उठकर
कि इस प्रेम वाली बिसात पर
दर्द वाले खाने कुछ ज्यादा हैं.
---
मेरी नास्तिकता पर
तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो
मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ
तो मैं इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता.
---
भ्रम
प्रेम का सबसे बड़ा सहारा है.
--
दिल ने ये कैसा
प्रेम का दरवाजा बनाया है
जो खुलता है उदासी के आंगन में.
--
आह
कितनी उम्मीदें हैं
एक तुम्हारे नाम से.

4 comments:

vandan gupta said...

बहुत खूबसूरती से किताब से परिचित कराया है

Ravindra Singh Yadav said...

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 12 अगस्त 2022 को 'जब भी विपदा आन पड़ी, तुम रक्षक बन आए' (चर्चा अंक 4519) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:30 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

Abhilasha said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

ज्योति-कलश said...

सुन्दर पुस्तक पर खूबसूरत लेखन !