Tuesday, February 23, 2021

दो चाय



पीले फूलों का मौसम फिर से लौट आया था. चारों तरफ वासंती बहार थी. फ्योली के फूलों ने रास्तों को यूँ सजाया हुआ था जैसे जब प्रेम की पालकी गुजरेगी तो वो उसके संग हो लेंगे. पुलम, नाशपाती, बुरांश, पलाश और आडू के फूलों ने समूचे पहाड़ों को किसी खूबसूरत काल्पनिक से दृश्य में परिवर्तित कर दिया था. लड़की ने अपना झोला कंधे से उतारकर किनारे स्टूल पर रखा और चाय वाले दादा को चाय बनाने को कहा. दो चाय.

चाय वाले दादा इधर-उधर देखने लगे. उन्हें लगा दूसरा कोई आने वाला होगा. हालाँकि पहाड़ों पर बहुत दूर से आने वाले दिख जाते हैं कम से कम चाय बनने की देरी भर की दूरी भर तो दिख ही जाते हैं लोग. फिर भी उन्होंने दो कप चाय चढ़ा दी. लड़की देर तक सामने वाली पहाड़ी पर खिलखिला रहे आडू के गुलाबी फूलों को देखती रही. कई बरस बीत गए इस बात को जब वो इसी पेड़ के नीचे खिलखिला कर हंस रही थी और लड़के ने पेड़ की डाल को थोड़ा सा नीचे खींच के छोड़ दिया था. डाल ने लड़के की शरारत को समझ लिया था. वो मुस्कुरा दी थी. और उसने ऊपर जाते हुए ढेर सारे गुलाबी फूल लड़की पर बरसा दिए थे. बरसते फूलों से नहा उठी थी लड़की और उसकी खिलखिलाहटों से वादियाँ नहा उठी थीं. लड़का चमत्कृत सा उस दृश्य को देख रहा था.

वो मोबाईल वाले कैमरों का दौर नहीं था. सारी तस्वीरें आँखों से खिंचकर ज़ेहन की हार्डडिस्क में सेव हो जाती थीं. अपनी तमाम खुशबू समेत. ज़ेहन की इस हार्ड डिस्क में कोई डिलीट बटन भी नहीं था. और यह अच्छा ही था. लड़की ने खुद को उस दृश्य में पैबस्त कई बार देखा था. लड़के की आँखों में. लड़के ने उस सुंदर दृश्य को देखते हुए पनीली हो आई अपनी आँखों को दृश्य से हटा लिया था. वह दृश्य उन दोनों के जीवन का सबसे सलोना दृश्य था. सबसे सलोना लम्हा.

हर बरस लड़की इस मौसम में इस दृश्य को इन खिलते हुए गुलाबी फूलों के आसपास तलाशती है. फूल खुद मानो उस वैभव को तलाशते हों हर बरस. लड़की के सामने रखी चाय में गुलाबी फूलों की परछाईं गिर रही थी. स्कूल जाते बच्चों ने लपककर उन फूलों की एक छोटी टहनी तोड़ ली थी. कुछ दूर जाकर उन्होंने वह फेंक दी थी कि उनका मन भर गया था शायद उस टहनी के वैभव से. लड़की का मन क्यों नहीं भरा इतने बरसों में. लडकी ने लपककर उस फूलों से भरी टहनी को उठाया और अपने साथ ले आई. चाय के कप के पास अब वह टहनी रखे हुए मुस्कुरा रही थी. टहनी उठाकर लौटते वक़्त लड़की ने सड़क पर झरकर गिरे फ्योली के फूल उठाकर जुड़े में सजा लिए थे. गुलाबी और पीले फूलों की जुगलबंदी में चाय की खुशबू बिखर रही थी. लड़की ने स्मृतियों की शाख से अपना मनपसन्द लम्हा उतारकर सामने सजा लिया था.

वह बारी-बारी से दोनों कप से चाय पी रही थी. चायवाले दादा ने पूछा,'बिटिया कोई और आने वाला है?' लड़की मुस्कुराई. 'नहीं दादा, जो आने वाला था वो वहीं गया है जहाँ उसे जाना चाहिए था.' दादा को कुछ समझ नहीं आया उन्होंने 'अच्छा' कहकर फिर से दूसरे ग्राहकों की चाय चढ़ा दी.

अख़बार में ख़बर थी, आपदा में बचाव के लिए गए लोगों का कोई पता नहीं...अख़बार कई बरस पुराना था या शायद नया ही. खबर बदली नहीं थी. लड़की की उदास आँखों ने चाय को देखा, और गटक लिया. पहाड़ पर पहाड़ सी आपदा आई. फिर न जाने कितने घर उदास हुए...लड़की ने चाय के दोनों कप रखते हुए दादा को पैसे दिए और फूलों से कहा, 'इस बरस ज्यादा खिलना है तुम्हें, कि उदास है मन का मौसम.' वो चलने को हुई तभी एक फूल उसके काँधे पर आहिस्ता से आकर बैठ गया. लड़की ने महसूस किया इस जहाँ या उस जहाँ...जहाँ भी है वहां लड़का जरूर मुस्कुराया है.

3 comments:

शिवम् कुमार पाण्डेय said...

वाह,बहुत ही सुन्दर। बाकी सब चाय-चाय है...!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत मार्मिक।

Onkar said...

बहुत सुन्दर