Wednesday, December 12, 2018

अभिनय-3


रात के गहराते अँधेरे में बीता वक़्त फिर से चहलकदमी करने लगा लगा. सुषमा के आने से उससे बातें करने से उज्ज्वला बार-बार अतीत में पहुँच जाना चाहती है. आज विकान्त दा का जिक्र उज्ज्वला को छू गया. कितना भरोसा था उन्हें उज्ज्वला पर. उन्हें उम्मीद थी कि उज्ज्वला जरूर नाम रोशन करेगी। 'मैं कुछ नहीं कर सकी विकान्त दा!' धीरे से बुदबुदायी उज्जवला, साथ ही हल्की सी सीत्कारी निकल गयी. प्रणय चौंका।
'उज्जवला ओ उज्ज्वला! तुम ठीक तो हो न ?'
'हाँ, ठीक हूँ,'
'क्या हुआ, क्या सोच रही हो?'
'कुछ नहीं'
बड़ी गुमसुम हो? मैंने तो सोचा था सहेली से मिलकर बड़ी खुश होगी.'
'वो तो मैं हूँ ही'
'और क्या बातें हुईं सुषमा से? प्रणय की आवाज में जिज्ञासाएं छलकने लगी थीं.
'मैंने तो आपसे कभी नहीं पूछा कि आपकी आपके दोस्तों से क्या बातें हुईं?'
'ओफ्फो, चंद घंटों में इतना असर!' प्रणय ने व्यंग्य किया.
'इतना असर  का क्या मतलब है?'
उज्ज्वला आवाज़ की तल्खी को छुपा न सकी.
'अरे तो नाराज क्यों हो रही हो? मत बताओ, मैं तो यूँ ही जानना चाह रहा था बड़े कष्ट सहे उसने.' प्रणय अपनी तमाम उत्सुकता बगैर उज्ज्वला का रिस्पांस पाए ही निकाले जा रहा था. उज्जवला चुप ही रही. सुषमा को तो उसने आदर्श पत्नी होने की कम्प्रोमाइज करने की नसीहतें दे डालीं, लेकिन उसके खुद के भीतर कुछ अन्तर्द्वन्द चलने लगे. सारी गलती सुषमा की ही तो नहीं हो सकती आखिर विपिन को  भी तो उसे समझना चाहिये. अगर वह अभिनय नहीं कर सकती थी तो कम से कम उसे 'प्ले' देखने जाने की छूट तो मिलनी चाहिये. अगर वह बिजनेस पार्टियों में जा सकती है तो विपिन उसके साथ क्यों नहीं प्ले और एक्जीबिशन देखने जा सकता. क्या परिवार की शान्ति औरतों की इच्छाओं की क़ुरबानी की नींव पर ही टिकी है. कितनी खोखली है यह शांति. अचानक उज्ज्वला को लगा यह सब वह क्या सोचने लगी. जिन्दगी भर परिवार, पति बच्चों के सुख में खुद को संतुष्ट मानती रही. तो क्या सचमुच वह संतुष्ट नहीं थी. यह सब उसके भीतर कब और कैसे जमा होता रहा, नहीं जान पायी उज्ज्वला. लेकिन आज सुषमा से मिलकर उसे लगा कि कुछ छूट गया है उससे. कहीं कोई कसक है. यही सब सोचते-सोचते उज्ज्वला की आँख लग गयी.
अगली सुबह रात के विचार मंथन की हल्की सी लकीर उज्ज्वला के चेहरे पर थी. प्रणय के ऑफिस जाते ही उज्ज्वला के सोचने की प्रक्रिया और तेज़ हो गयी. सुषमा ड्राइंगरूम के केबल पर कोई फिल्म डेक रही थी.
'कॉफ़ी पियोगी. उज्ज्वला?' सुषमा ने पूछा.
'हाँ, पी लूंगी.'
कॉफ़ी के साथ ढेर सारी फुरसत लेकर उज्ज्वला सुषमा के पास आ बैठी.
'कौन सी फिल्म आ रही है?' उज्ज्वला ने कॉफ़ी का प्याला बढाते हुए पूछा.
'पता नहीं, बस ऐसे ही खोले बैठी हूँ. कितना अच्छा लग रहा है इस फुरसत को जीना वरना सुबह से देर रात तक जुटे रहो. कभी-कभी खाना तक खाने की फुरसत नहीं मिलती.'
'खाना खुद बनाती हो?'
'नहीं, एक आया रखी है. अच्छा खाना बनाती है.'
'थकती नहीं कभी?'
'थकती हूँ, लेकिन ऊबती नहीं हूँ. सच कहूँ जब काम नहीं होता तब थकने लगती हूँ.'
उज्ज्वला के भीतर लगातार कुछ करवटें ले रहा था. वह बड़े मन से सुषमा को सुन रही थी.
'मैं भी चाहती थी कुछ काम करूँ. पर...' आवाज में बुझे हुए सपने के चटखने का कंपन था.
'तू तो इतना जरूरी काम कर रही है/' सुषमा उज्ज्वला की मनोदशा को समझ रही थी और उसे संभालना चाह रही थी.
'यह काम जो इतने सालों से इतनी कुशलता से तू कर रही है वह कम महत्वपूर्ण नहीं है.'
उज्ज्वला चुप रही. स्क्रीन पर चल रही फिल्म अब बैकग्राउंड में आ गयी थी.
'सुषमा,,,!' उज्ज्वला कुछ कहते-कहते रुक गयी.
'हाँ, बोलो क्या बात है?'
'कुछ नहीं, मैं सोच रही थी कि कोई काम खूब करने के बाद कई साल तक न करे तो क्या करना भूल जाते हैं.'
सुषमा ने गहरी सांस लेते हुए कहा, 'एक्टिंग दोबारा करना चाहती हो?'
'नहीं, एक्टिंग भला मैं...इस उम्र में, मैं तो ऐसे ही....' उज्ज्वला जैसे रंगे हाथों पकड़ी गयी हो.
'मैं तो खुद ही कहना चाहती थी तुझसे, लेकिन सोचा पता नहीं तू और प्रणय क्या सोचोगे. उज्ज्वला काम करने के लिए कभी देर नहीं होती. अगर तू करना चाहे तो मैं तेरी मदद कर सकती हूँ लेकिन पहले प्रणय से पूछ ले'
'उनसे क्या पूछना है? उज्ज्वला तपाक से बोली. और इसी के साथ जो अब तक खुद को छुपाने की कोशिश वो कर रही थी वह धराशाई हो गयी.

(जारी...)

Saturday, December 8, 2018

अभिनय-2

'मेरे मुश्किल वक़्त में जानती हो किसने मेरा साथ दिया?'
'किसने' उज्ज्वला ने पूछा।
'विकान्त दा ने.'
'वो कहाँ मिले?' उज्ज्वला आश्चर्य से रोमांचित हो उठी थी.
'कहीं मिले नहीं लेकिन उनसे जो सीखा। वही मेरा करियर बना. विकान्त दा की बातें याद करती थी तो बड़ी ऊर्जा मिलती थी. तुम यकीन नहीं मानोगी उज्ज, रोजमर्रा की बातचीत के दौरान कही गयी उनकी उन बातों से मैं हमेशा प्रेरित होती रही जिन पर हम उन दिनों बहुत ध्यान नहीं देते थे.'

उज्ज्वला बरसों पुराने वक़्त के उन टुकड़ों को फिर से जीने लगी थी. उसकी आँखों में वही पुरानी तस्वीरें उभरने लगी थी. उसकी आँखें में वही पुरानी तस्वीरें उभरने लगी थी. वही कालेज का जमाना, वही दोस्त, वही फटकार लगाते विक्रांत दा.
'विकांत दा हमेशा कहते थे न कि खुद को जिन्दा रखते हुए जीना ही असल जीना है. लेकिन उज्ज्वला तब हमने कभी सोचा था कि विकान्त दा कितनी महत्वपूर्ण बात कह रहे हैं. जब जिंदगी से सामना हुआ तब लगा कि सचमुच बहुत मुश्किल है अपनी तमाम ऊर्जा और महत्वाकांक्षाओं को बरकरार रखते हुए, खुद को जिन्दा रखते हुए जीना. खासकर औरतों के लिए तो और भी मुश्किल है. सिर्फ कुछ समझौतों को साँसों के बल पर धकेलने जाने की नियति अगर स्वीकार नहीं तो राह में अड़चनें ही अड़चनें हैं.'

'लेकिन सुषमा, एक-दूसरे को समझना, एक दूसरे की पसंद-नापसंद का सम्मान करना अगर समझौता है तो मैं इसे गलत नहीं मानती. जीवन की मिठास बनाये रखने के लिए व्यक्तित्व की इतनी लचक तो लाज़िमी है.'

'तुम ठीक कह रही हो उज्ज्वला लेकिन हर बार समीकरण मनचाहे नहीं होते. अपने जीवन की मिठास निचोड़-निचोड़ कर जब तक भेंट करते रहो, तुम आदर्श स्त्री हो. लेकिन अगर एक बार अपने जीवन में भी थोड़ी सी मिठास, थोड़ी सी खुली हवा, मुठ्ठी भर आकाश की तमन्ना ने कहीं जन्म ले लिया तो?

'तो क्या? उज्ज्वला का सुषमा से असहमति का स्वर सुषमा भी महसूस कर रही थी,
'कुछ नहीं' सुषमा टालते हुए रसोई की ओर बढ़ी.
'देख सुषमा, बुरा मत मानना लेकिन पति को कोई दूसरा समझना तो ठीक नहीं है न. जब तक पति-पत्नी एक-दूसरे में खुद को नहीं देखते, वह रिश्ता तो कमजोर होगा ही.'

सुषमा हौले से मुस्कुरा दी. सुषमा को उज्ज्वला की बातों से कोई हैरानी नहीं हो रही थी. घर गृहस्थी में रमी अपने ही घर को 'दुनिया' मानने वाली ऐसी कितनी ही औरतों से मिल चुकी है सुषमा। 'समर्पण का सुख' जीते जीते 'सुख' का दायरा सिमट चुका होता इनका।

'तुम इतनी चुप क्यों हो गयी सुषमा। मेरी बात का बुरा तो नहीं माना। उज्ज्वला ने आटा गूंथना शुरू कर दिया था.
सुषमा मुस्कुराई। 'पगली है क्या, तेरी बात का क्या बुरा मानना?'
'फिर तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही? सुषमा की ख़ामोशी उज्ज्वला को बेचैन किये थी. 'देख सुषमा, तेरा अनुभव मेरे अनुभव से अलग है तो जाहिर है कुछ मतभेद तो होगा ही.

''अरे भई क्या आज खाना-वाना नहीं मिलेगा.'' प्रणय का स्वर ड्राइंगरूम से चलकर किचन तक आ पहुंचा था. उज्ज्वला के हाथों की गति बढ़ गयी. सुषमा उसकी मदद करने लगी.
बड़ी ख़ामोशी से खाना पेट तक पहुँचता रहा. कभी-कभी वक़्त चीज़ों को कैसे उलझा देता है. अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे तीन लोग. तीनों ही एक-दूसरे में प्रवेश करने की कोशिश में. लेकिन इस कोशिश में प्रणय सिरे से नाकामयाब रहा.
सुषमा के पास उज्ज्वला के सारे सवालों के जवाब हैं लेकिन सुषमा ने ख़ामोशी अख्तियार करना उचित समझा. तर्क, सवाल और उलझनों के भंवर में उज्ज्वला सुषमा के सवालों का सामना नहीं कर पायेगी. उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं होगा कि अपने भीतर अभिनय की आंदोलित होती तरंगों को क्यों रोका उसने? रात दिन कुछ नया करने की फ़िराक में रहने वाली उज्ज्वला कहाँ खो गयी आखिर? और कैसे भूल गयी वो कॉलेज की बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड. उन दिनों उज्ज्वला का सिक्का चलता था कॉलेज में. जिसे देखो उज्ज्वला के पीछे भागता फिरता था. टीचर्स तक फैन थे उसके और अब यह सब गुजरे वक़्त का एक पन्ना, शोकेस में सजी एक शील्ड और एल्बम में लगी एक फोटो से अधिक कुछ नहीं. सुषमा निश्चय कर चुकी है कि वह उज्ज्वला से ऐसी कोई बात नहीं कहेगी. वह उज्ज्वल को किसी पसोपेश में नहीं डालना चाहती.

(जारी )

Friday, November 23, 2018

कहानी- अभिनय


'लो भई! तुम्हारी मिठाई और पेस्ट्रीज' पसीने में सने प्रणय ने थैला उज्ज्वला को थमा दिया. करीने से सजा कमरा बेहद सुकून दे रहा था प्रणय को. उज्ज्वला पूरे उत्साह से घर का कोना-कोना झाड़ने-पोछने में मशगूल थी. अठारह साल बाद अपनी प्यारी सहेली सुषमा का इंतजार करना उज्ज्वला को रुचिकर लग रहा था.

सुषमा आजकल बड़ी टीवी स्टार है. 'दमयंती' ने उसे रातो-रात स्टार बना दिया है लेकिन उज्ज्वला जिस सुषमा का इंतजार कर रही है, वह स्टार नहीं है. उसकी स्मृतियों में तो वही कॉलेज के ज़माने की सुषमा है. एक-दूसरे के बगैर एक दिन भी चैन से न रहने वाली सहेलियाँ आज अठारह साल बाद मिलेंगी यह ख्याल ही उज्ज्वला को रोमांचित किये जा रहा था.

'अरे भई, अगर तुम्हारी स्वागत की तैयारियां पूरी हो गयी हों तो हम लोग चलें स्टेशन से उसे रिसीव करने।' प्रणय का स्वर गूंजा तो उज्ज्वला की तन्द्रा भंग हुई.

'हाँ, हाँ, बस दो मिनट रुको, मैं जरा साड़ी बदल लूं. अच्छा बताओ प्रणय, सुषमा कैसी हो गयी होगी.?' दरवाजा भेड़ते हुए उज्ज्वला ने अतिरेक से पूछा।

'बिलकुल चुस्त-दुरुस्त और खूब मोटी।' गेट पर कोई स्त्री स्वर गूंजा।
'अरे सुषमा तू!' उज्ज्वला को जैसे अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं आ रहा था.
'हाँ भई, शत-प्रतिशत मैं यानी सुषमा. हमेशा की तरह समय से थोड़ा पहले।' मारे भावुकता के उज्ज्वला की आँखें छलक पड़ीं. सफर की थकान को उज्जवला की बाहों में सौंपकर सुषमा भी उमड़ पड़ी थी. अब तक प्रणय रिक्शे से सामान उतार चुका था.
'सुषमा तू ऐसी कठोर निकलेगी, मैं न जानती थी. इतने सालों में कोई खबर नहीं।'
गुदगुदे सोफों में धंसते हुए यह उलाहना मीठा लगा सुषमा को.
'सब बताऊँगी, धीरज रख लेकिन अभी तो मुझे नहाना है, बहुत थक गयी हूँ.'
सुषमा नहाने गयी और उज्ज्वला ने चाय का पानी चढ़ा दिया। कितना कुछ कहना-सुनना है दोनों को. लम्बा अंतराल और हर पल का हिसाब।
'लो उज्जवला, मैं तो आ गई. नहा धोकर। चाय तैयार हो तो फटाफट पिलाओ।' उम्र खिंचकर पचास की ड्योढ़ी पर आ पहुंची है. अपने फिगर पर इतराने वाला जिस्म फूलकर बेडौल हो गया है. लेकिन आवाज में वही अल्हड़ रवानगी है.
'सुषमा, तू तो खूब मुटा गयी है.'
'हाँ यार, कुछ रोल की डिमांड और कुछ ज़माने से लड़ने की ताकत बटोरने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही फूल गयी हूँ.' सुषमा ने बात कह तो दी लेकिन चाय की प्यालियों के बीच कहीं अवसाद का नन्हा टुकड़ा भी आ छुपा जिसे प्रणय की चुहल ने धीरे से किनारे किया.
प्रणय को डाक्टर के यहाँ जाना था. पिछले हफ्ते जिस दाढ़ की फिलिंग कराई थी वह फिर टीस मार रही थी. प्रणय के जाने के बाद खूब सारा एकांत समेट कर दोनों बैठी थीं मन में अथाह समन्दर समेटे। यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल था कि वक़्त की किस गिरह को पहले खोला जाय.
उज्ज्वला रात के खाने के लिए शिमला मिर्च और कटहल ले आयी थी काटने के लिए.
'तेज़ रफ्तार से जिन्दगी का पीछा करते-करते मैं अब थकने लगी हूँ उज्ज्वला। जीवन के लम्बे सफर की थकान तुझसे बांटने का जी चाहा इसलिए चली आई इतने सालों बाद, निसंकोच।'  सुषमा ने बातचीत का सिरा पकड़ा.
'लेकिन तुमने इतने सालों में एक बार भी मुझसे मिलने की कोशिश नहीं की क्या सचमुच तुम्हें मेरी याद ही नहीं आई.' उज्ज्वला के उलाहने में गहरा दुःख था.
'ऐसा नहीं है उज्ज्वला. दरअसल, इन सालों में मैं जिन-जिन रास्तों से गुजरी, उसकी गर्द भी तुम तक पहुंचने देना नहीं चाहती थी. मेरे सारे सगे-सम्बन्धी मुझसे दूर हो चुके थे. ऐसे में तेरे होने का एहसास ही मुझे सहारा देता था. मैं इसे टूटने नहीं देना चाहती थी. इसलिए खुद को दूर रखा तुझसे। लेकिन रख नहीं पायी कभी भी.' सुषमा का स्वर भीगने लगा था. 'और इसलिए अब आ गयी तुम्हारे पास कुछ दिन चैन से रहने। प्रणय को ऐतराज तो न होगा न ?' सुषमा ने उज्ज्वला की आँखों में झांकना चाहा, लेकिन वे तो दूर कहीं अतीत खंगाल रही थीं
'तुमने कुछ जवाब नहीं दिया उज्ज्वला?'
'अं SSS क्या?' उज्ज्वला वापस लौटी।
'अगर मैं कुछ दिन यहाँ रह जाऊं तो प्रणय को ऐतराज तो न होगा?'
'ऐतराज? प्रणय को? सवाल ही नहीं उठता। बल्कि उसे तो ख़ुशी होगी. सुषमा प्रणय मेरी भावनाओं को खूब समझता है' उज्ज्वला के इस वाक्य में काफी आत्मविश्वास था.
'उज्ज्वला, तू सचमुच किस्मतवाली है जो प्रणय तुम्हारी भावनाओं को समझता है. वरना आमतौर पर पति अपनी  असहमतियों को तर्कों की चाशनी में लपेटकर पत्नियों को कुछ यूँ चटाते हैं कि आमतौर पर वे कन्विंस हो ही जाती हैं और अगर नहीं होतीं छोटे-छोटे झगड़े एक बड़े तूफ़ान में बदलकर घर-परिवार, गृहस्थी सब तबाह कर देते हैं.' सुषमा की आँखें छलक पड़ी थीं.
'तू विपिन की बात कर रही है?' उज्जवला ने सुषमा की आँखों में झाँका।
'हाँ, विपिन से मेरे तलाक की वजह सिर्फ इतनी थी कि उसके तर्क मेरी असहमतियों का सामना नहीं कर पाते थे. उसका पति परमेश्वर होने का गुरूर मुझे मंजूर नहीं था. मैं उसकी आज्ञा मानने वाली हाँ, में हाँ और न में न करने वाली कठपुतली नुमा पत्नी न थी और यह उसे मंजूर नहीं था. भला हमारी गृहस्थी संघर्षों का इतना बोझ किस तरह सहती।'
'तो तू झगड़ा बढ़ाती ही क्यों थी?' उज्ज्वला ने उसे आदर्श पत्नी होने के नुस्खे बताने चाहे, लेकिन सुषमा आज पुराने जख्मों की पिटारी खोले बैठी थी.
'मैं झगड़ा नहीं बढ़ाती थी उज्ज्वला। मैंने बहुत समझौते किये. दो साल मैं विपिन की पत्नी रही, लेकिन एक पल के लिए उस व्यक्ति ने मेरी कद्र नहीं की. मैं चाहती थी परिवार बचा रहे लेकिन मैं खुद को भी बचाकर रखना चाहती थी. मैं थियेटर करना चाहती थी लेकिन विपिन को यह पसंद नहीं था. शहर में होने वाले प्ले देखने जाने की बजाय मुझे बिजनेस पार्टियों में जाना पड़ता था. मुझे लगने लगा था कि मैं एक उद्योगपति की शो-पीसनुमा पत्नी बनकर रह गयी हूँ. हमारा रिश्ता लगातार तनता जा रहा था. आखिर एक न एक दिन तो इसे टूटना ही था. इसके बाद समाज के अपमान और धिक्कार मिलने का दौर शुरू हुआ. इस सबके बीच खुद को संभालकर रखना सचमुच बहुत मुश्किल था.'
'तेरे घरवालों ने तेरा साथ नहीं दिया?' उज्ज्वला वक़्त  के गर्द खाये पुराने पन्नों को पढ़ते हुए काफी हैरान हो रही थी.
'घरवाले! उज्ज्वला ऐसे ही वक़्त में रिश्तों की सच्चाई सामने आती है. घरवालों की नज़र में भी तलाक  की दोषी मैं ही थी. मेरे तलाक से उनकी गर्दन शर्म से झुक रही थी. यू नो उज्ज्वला वी आर लिविंग इन डैमेज़्ड सिस्टम एंड सोसायटी. सदियों पुराने ढर्रों पर सोचते दिमाग हैं.'
सुषमा का अतीत कमरे में बिखरा पड़ा था. सब्जी काटते हुए वक़्त के जिस हिस्से को उज्ज्ज्वला जी रही थी वहां से वापस आना नहीं चाहती थी. सुषमा के चुप होते ही ख़ामोशी दोनों के दरम्यान मंडराने लगी.

जारी...

(सन 2000  में हंस के स्त्री विशेषांक में प्रकाशित कहानी )

लिखना नदी में पाँव डालकर बैठने जैसा हो


कब लिखना शुरू किया था याद नहीं लेकिन इतना याद है कि जब लिखना शुरू किया था तब लिखने के बारे में सोचा नहीं था. बस कोई हूक उठी थी जो सध नहीं रही थी. छोटी सी उम्र में दोस्त भी कम ही थे सो लिखने से ही दोस्ती भी गई. अब भी यह दोस्त ही है, इससे ज्यादा कुछ हो ऐसा कभी चाहा नहीं। वैसे दोस्त से बढ़कर क्या होता है भला. बस कि दोस्त हो और हर हाल में हो. जीवन के, मन के कैसे भी हों हालात दोस्त रहे साथ. लड़े, भिड़े, रूठ जाए फिर मना भी लाये। लिखना ऐसे ही रहा हमेशा. बिना किसी आकांक्षा के, लिखे से बिना किसी अलग तरह की कोई ख़्वाहिश जोड़े. बस नदी के किनारे पांव डालकर बैठने के सुख जैसा. जब कहानियां लिखीं तो पता नहीं था कि कहानी लिख रही हूँ, या जो लिख रही हूँ वो कहानी हो जाएगी। ऐसे ही कविताओं के साथ हुआ. पता नहीं चला कि कब क्या कैसे लिखा कब वो लिखा क्या बना और कब बनते- बनते रह गया. मेरे लिए उस वक़्त वैसा ही लिखा जाना जरूरी था जैसा वो लिखा गया. इसके इतर लिखने का प्रयास नहीं किया. चाहती हूँ यह लिखना ऐसे ही रहे जीवन में, सांस के जैसा। न इससे कम न इससे ज्यादा। न इससे ज्यादा की कोई अभिलाषा ही.

मुझे अपने लिखने में यह याराना बचाये रखना है. कि मुझे हर हाल में मेरा यह दोस्त मुझे संभाले रहे. बस इतना  ही.

Thursday, November 22, 2018

कभी धनक सी उतरती थी उन निगाहों में


- फहमीदा रियाज 

कभी धनक सी उतरती थी उन निगाहों में
वो शोख़ रंग भी धीमे पड़े हवाओं में

मैं तेज़-गाम चली जा रही थी उस की सम्त
कशिश अजीब थी उस दश्त की सदाओं में

वो इक सदा जो फ़रेब-ए-सदा से भी कम है
न डूब जाए कहीं तुंद-रौ हवाओं में

सुकूत-ए-शाम है और मैं हूँ गोश-बर-आवाज़
कि एक वा'दे का अफ़्सूँ सा है फ़ज़ाओं में

मिरी तरह यूँही गुम-कर्दा-राह छोड़ेगी
तुम अपनी बाँह न देना हवा की बाँहों में

नुक़ूश पाँव के लिखते हैं मंज़िल-ए-ना-याफ़्त
मिरा सफ़र तो है तहरीर मेरी राहों में.

(स्मृति शेष)

Tuesday, November 20, 2018

मौसम


वो जो बो कर गए थे न तुम
उदासी के बीज
उनमें निकल आये थे कल्ले

ज्यादा सार संभाल नहीं मांगी उन्होंने
वो बढ़ते रहे धीरे-धीरे
चुपचाप
नवम्बर लगते ही उसमें खिला था पहला फूल
इन दिनों पूरा पेड़
गुलाबी फूलों से भरा है
ये मौसम गुलाबी यूँ ही नहीं हुआ जा रहा.

Monday, November 12, 2018

चलते जाने का सबब कोई नहीं


एक शोर से गुजरी हूँ, दूसरे शोर में दाखिल हुई हूँ. तीसरा शोर इंतज़ार में है. फिर शायद चौथा, पांचवां या सौवां शोर. चल रही हूँ चलने का सबब नहीं जानती शायद इतना ही जानती हूँ कि न चलना फितरत ही नहीं. चलना कई बार शोर से भागना भी होता है यह जानते हुए भी कि यह शोर अंतहीन है. भीतर जब शोर हो तो बाहर तो इसे होना ही हुआ. मुझे शोर से मुक्ति चाहिए, खूब बोलते हुए घनी चुप में छुप जाने का जी चाहता है. शांति चाहती हूँ लेकिन जैसे ही शांति के करीब पहुँचती हूँ घबरा जाती हूँ. क्या चाहती हूँ पता नहीं, बस चलना जानती हूँ सो चल रही हूँ. लगता है सदियों से चल रही हूँ. अब मेरी चाल थकने लगी है, मैं भी थकने लगी हूँ, सोना चाहती हूँ. बेफिक्र नींद.

मेरे कानों ने कभी यह नहीं सुना कि 'मैं हूँ न'. खुद को रोज हारते देख उदास हुआ करती थी. फिर हताश होने लगी. इस उदासी और हताशा में शायद जीने की इच्छा रही होगी. तो चल पड़ी एक रोज जीने की तलाश में. तबसे चलती जा रही हूँ. नहीं जानती  थी कि जीने की ख्वाहिश करना कितना मुश्किल होता है. हालाँकि बिना जिए जीते जाने से ज्यादा मुश्किल भी नहीं.

हर रोज नई जंग होती है. एक लम्हे में हजार गांठें लगी होती हैं सुलझाते-सुलझाते और उलझा लेती हूँ. कभी सुलझ जाए कोई लम्हा तो बच्चों सी चहक उठती हूँ उस पल भर की चहक में ही जीवन है. मैं उसे ही खोज रही थी शायद। खोज रही हूँ. हर रोज अपनी हाथों की लकीरों को देखती हूँ वो रोज बदली हुई नज़र आती हैं, कई रेखाएं तो घिस चुकी हैं एकदम. कुछ मुरझा चुकी हैं. मुझे कुछ नहीं चाहिए असल में. कुछ भी नहीं. मैं निराश नहीं हूँ, हताश भी नहीं हूँ बस थक गयी हूँ. बहुत थकन है पोर-पोर में. न कोई इच्छा शक्ति देती है न सपना ही कोई बस कि पैरों में बंधी चरखी पर नाचती फिरती हूँ. किसी भी लम्हे में इत्मिनान नहीं, सुख नहीं हालाँकि सुख जिसे कहती है दुनिया बिखरा है हर तरफ.

बचपन से अब तक जो बात याद आती है कि सबको मेरी जरूरत है, बहुत जरूरत, इतनी कि बचपन में बचपन की जगह ही नहीं बची. मुझे कभी नहीं बताया किसी ने कि कौन सी शरारत किया करती थी मैं, किस बात पर अड़ जाती थी जिद पर. बिना जिया हुआ उदास बचपन साथ रहता है. साथ वो सब रहता है जो था नहीं, जो साथ है वो साथ लगा नहीं कभी.

दोस्त कहती है, कुछ भी शाश्वत नहीं, हाँ, समझती हूँ. शाश्वत कुछ भी नहीं सिवाय इस उदासी के. इस उदासी की गोद में सर रखकर सो जाना ही उपाय है. 'मैं हूँ न' की यात्रा तय कर पाना आसान कहाँ होता है।

(नोट- कहीं भी साझा करने या प्रकाशित करने के लिए नहीं )

Sunday, October 28, 2018

'क' से कविता एक सुंदर मीठी सुबह से दिन का आगाज़


अक्टूबर में उतरता है मौसम हथेलियों पर, कन्धों पर, धरती पर. अक्टूबर में इंतजार शुरू होता है वादियों के शगुनों वाली बर्फ से भर जाने का, नाउम्मीदियों के उम्मीदों से बदल जाने का. अक्टूबर से शुरू होता है उत्सव का सिलसिला जो जोड़ता है मन के उत्सव से, जिन्दगी को सुंदर बनाने के ख्वाब को और मजबूती से थाम लेने से. ‘क’ से कविता की 30 वीं बैठक में भी देहरादून के कविता प्रेमियों ने उम्मीदों के ऐसे ही रंग चुने. इस बार ‘पोयट्री विद वॉक’ का विचार बना और इसके लिए सुबह का वक्त चुना गया. इस विचार का जिस तरह स्वागत हुआ उसने उत्साह बढ़ा दिया. सुबह की ताज़ा हवा में हरसिंगार के फूलों के बीच से गुजरते हुए, गिलहरियों की चुलबुली शरारतों को नजरों में भरते हुए कुछ देर को ही सही सभी कविता प्रेमियों ने खुद को तमाम तनाव से मुक्त और ऊर्जा से लबरेज महसूस किया. सबसे पहले ‘क’ से कविता के विचार को साझा किया गया कि किस तरह 23 अप्रैल 2016 को देहरादून में शुरू हुई पहली बैठकी का सिलसिला आज समूचे उत्तराखंड में फ़ैल चुका है. समूचे उत्तराखंड में 17 अलग अलग जगहों पर बैठकें होती हैं और हर शहर की अपनी स्वायत्ता है. सिर्फ दो ही मूल बातें हैं ‘क’ से कविता के कॉन्सेप्ट की पहली यहाँ अपनी कविता नहीं पढ़नी और दूसरी इसकी सादगी. मूल विचार इन बैठकों में शामिल होते हुए और इन्हें आयोजित करते हुए भी किसी भी तरह के तनाव से खुद को दूर कर पाना और जिन्दगी के थोड़ा और करीब जा बैठने की कोशिश होती है.


इसी कोशिश के चलते सबसे पहले सभी साथियों ने गांधी पार्क का पूरा चक्कर लगाया, पार्क में मौजूद फूलों, पेड़ों, पंछियों को महसूस किया. जिन्दगी में पहले से मौजूद कितनी ही कविताओं से हम रू-ब-रू होते होते रह जाते हैं उन्हीं लम्हों के करीब जाने की यह कोशिश थी. इसके बाद ‘क’ से कविता जो अब लगभग तीन वर्ष पूरे करने की यात्रा में है इसे किस तरह और बेहतर बनाया जाय इस बारे में सभी साथियों ने अपने विचार रखे. नन्ही तूलिका और तनिष्का ने बताया कि उन्हें ‘क’ से कविता की बैठकों का पूरे महीने इंतजार रहता है और उन्हें यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

कविता पाठ का सिलसिला शुरू हुआ संतोष अर्श की गजल से जो इब्ने इंशा, केदारनाथ अग्रवाल, जावेद अख्तर, विजय गौड़, अदनान कफील, ममता से होते हुए बहुत सारे अन्य कवियों तक पहुंचा. अनत में एक मोहक भजन और मोहन गोडबोले के बेहद सुरीले बांसुरी वादन के साथ बैठक का समापन हुआ.

सभी साथियों ने कहा ‘यह सुबह यादगार हुई.’

Thursday, October 25, 2018

कोई हमें सताये क्यों


दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यों 
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों 

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं 
बैठे हैं रहगुज़र पे हम गैर हमें उठाये 

क्यों क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं 
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यों 

'ग़ालिब"-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं 
रोइये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय-हाय क्यों.

- ग़ालिब 

Wednesday, October 24, 2018

कहानी- पंख वाली खिड़कियाँ


दिनों को जैसे पंख लगे रहते हैं हरदम. इनसे कितनी भी होड़ करो ये पीछे छूटने को तैयार ही नहीं होते. दिनों से होड़ करना अब रीना का खेल हो चुका है. अपनी तनहाइयों से पीछा छुड़ाने के लिए उसने खुद ही अपने आसपास ढेर सारे काम का जंगल उगा लिया. न एक पल फुरसत का मयस्सर, न दिल दुखाने वाली कोई बात सोचने का वक्त. जो आये भी कोई अवसाद का झोंका, तो खुद को और झोंक दिया काम में रीना ने. काम की इसी आपाधापी में उसने कई रोज बाद इंटरनेट की दुनिया का दरवाजा खटखटाया. लॉग इन करते ही ढेर सारी हरी बत्तियां जलती न$जर आईं. उसे लगा वे सब जाने-पहचाने चेहरे हैं. वर्चुअल चेहरे. हरी बत्तियों के पीछे से झांकते...
हैप्पी बर्थ डे टू यू....हैप्पी बर्थ डे टू यू...
रीना ने जैसे ही रागिनी की मेल को क्लिक किया, एक छोटा सा क्यूट सा टेडी बियर गर्दन हिला हिलाकर गाने लगा.
अनायास ही रीना खिल गई. आज उसका जन्मदिन है, उसे तो याद ही नहीं था. लेकिन रागिनी को कैसे याद रहा...
अचानक रीना को लगा उसके ढेर सारे पंख उग आये हैं. वो खूब-खूब उडऩा चाहती है. असीमित उड़ान. अपने भीतर की खुशी को वो महसूस कर रही थी.
तो क्या प्रोग्राम है आज का?
विपिन का मैसेज चैट पर चमका.
रीना- कैसा प्रोग्राम? रीना ने अनजान बनते हुए पूछा.
विपिन- पार्टी का?
रीना- कैसी पार्टी
विपिन- तुम्हें नहीं पता?
रीना- नहीं, क्या हुआ?
विपिन- अरे, अयोध्या पर फैसला आ गया. कहीं कोई दंगा नहीं हुआ. इसकी पार्टी तो बनती है ना?
रीना- हूं....अयोध्या मंदिर तो मेरे पिताजी का है. रीना गुस्से में आ गई. हमारे भीतर का बच्चा कभी भी जाग उठता है. रीना को खुद के व्यवहार पर हैरत हुई.
विपिन- अरे यार, अपने देश के लिए इतनी उपेक्षा ठीक नहीं है. ऊपर से तुम हिंदू भी हो. खुश होना चाहिए तुम्हें. फैसला तुम्हारे हक में आया है.
रीना- सही कह रहे हो. ऊपर से मैं हिंदू भी हूं. तुम कम्युनिस्ट होने के नाम पर केवल हिंदुओं पर निशाना साधना बस. चलो जाओ, काम करने दो मुझे.
विपिन- अरे न सही अयोध्या फैसले की मिठाई, कम से कम जन्मदिन का एक लड्डू तो बनता है ना. ये कामरेड तो खाली लड्डू की फिराक में रहता है, बस.
रीना- ठीक कह रहे हो. इसीलिए जिधर का पलड़ा भारी न$जर आता है, उसी तरफ हो जाते हो. रीना ने खिंचाई की.
विपिन- यार एक लड्डू के लिए इतनी गालियां तो मत दो.
रीना- तो तुमने भी तो विश नहीं किया. अयोध्या फैसले पर मिठाई मांग रहे हो.
विपिन- मांगी तो जन्मदिन पर थी, तुम समझीं नहीं तो मैंने अयोध्या फैसले का हवाला ले लिया.
रीना- बातें मत बनाओ.
विपिन- तो
रीना- शाम को घर आओ.
विपिन- हवन करा रही हो क्या? तुम लोग तो हवन-शवन ही कराते हो जन्मदिन पर.
रीना- हां, करवा रही हूं हवन. उसमें अंतिम आहुति के तौर पर तुम्हें डालना है. जिंदगी खुद ही हवन हुई जा रही है. पता है, किसी को याद भी नहीं है घर में. रीना का स्वर उदास हो चला.
विपिन- कोई बात नहीं यार. इट्स ओके. अब हम बच्चे तो नहीं रहे.
रीना- हां, ठीक कह रहे हो. लेकिन क्या करें दिल तो बच्चा है जी...वैसे तुम घर आ आओ किसी दिन. सासूमां पूछ रही थीं तुम्हें?
विपिन- बाप रे? यार फिर वही शादी का रिकॉर्ड बजेगा. आजकल कहीं जाते घबराता हूं. मेरी शादी लगता है नेशनल इशू बन गई है.
रीना- तो कर क्यों नहीं लेते?
विपिन- डर लगता है. लगता है निभा नहीं पाऊंगा.
रीना- कोशिश करने वालों की हार नहीं होती....
विपिन- तुम कर तो रही हो कोशिश. और भी बहुत सारे लोग कर रहे हैं. हश्रे मामूल से वाकिफ न होते तो कर लेते हम भी खुदकुशी हंसते-हंसते...
रीना- वाह वाह...
विपिन- राघव कैसा है? उससे बहुत दिनों से बात नहीं हुई.
रीना- तुम्हें पता होना चाहिए. तुम्हारा दोस्त है.
विपिन- तुम्हारा भी तो पति है.
रीना- पति और दोस्त में अंतर होता है.
विपिन- लेकिन होना तो नहीं चाहिए.
रीना- होना तो बहुत कुछ नहीं चाहिए. तभी तो कह रही हूं शादी कर लो. तब देखती हूं कैसे देते हो लेक्चर...
विपिन- ना बाबा ना...चलो निकलता हूं मैं अब. कीप स्माइलिंग. जन्मदिन मुबारक एक बार फिर से?
रीना- थैंक्स.
विपिन- वैसे कितनी उम्र हुई?
रीना- मारूंगी.
विपिन- बाय
रीना-बाय.
विपिन से बात करते हुए ही रीना ने अपना चैट स्टेटस बदला. बिना ही बात मुस्कुराये रे मेरा मन...
जन्मदिन मुबारक हो मैम
अनुभूति का मैसेज कबसे पड़ा उसका इंत$जार कर रहा था.
रीना- थैंक्स. हाऊ डू यू नो?
अनु- फेसबुक मैम.
रीना- ओके. मुझे तो याद ही नहीं था.
रीना ने फटाफट फेसबुक खोला तो शुभकामनाओं की बाढ़ आई थी. वह मुस्कुरा दी. तभी मेल पर एक के बाद एक खिड़कियां खुलने लगीं.
सना- हैप्पी बर्थडे
विशू- कॉन्ग्रेट्स
निशा- व्हेयर इज द पार्टी टुनाइट
निखिल- आप जियें हजारों साल मैम
जोया- ढेर सारी बधाई
अनुभव- बधाई
अरुषि- बधाई बधाई बधाई
वैभव- मैनी हैप्पी रिटन्र्स ऑफ द डे मैम
रीना ने एक-एक करके सबका शुक्रिया अदा किया. उसे अच्छा लग रहा था. उसके चारों ओर शुभकामनाओं का इतना बड़ा संसार पहले कभी नहीं उगा था. इंटरनेट की दुनिया ने उसे कैसे-कैसे अनुभव दिए हैं. कितने सारे दोस्त. जिनमें से कुछ दोस्त तो अब लाइफलाइन बन चुके हैं. जैसे आभा दी, सना, रागिनी, प्रिया. रीना के पांव में सारा दिन तमन्नाओं की पायल बजती रही.
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ऑफिस में आज काम का ढेर लगा हुआ था. रीना बड़ी तन्मयता से किसी फाइल को पढऩे में डूबी थी, तभी प्रिया का मैसेज चमका.
हैलो....हैलो....हैलो...कोई है?
रीना- यस, आई एम देयर
प्रिया- थोड़ा सा समय ले सकती हूं?
रीना- हां बोलो. रीना बिजी थी फिर भी प्रिया को इग्नोर नहीं कर सकी.
प्रिया- रीना दी, पंकज अब पैचअप चाहता है.
बताओ कितनी मुश्किल से सब सैटेल हुआ है. ऐन वक्त पर ये नया नाटक...
रीना- पैचअप?
प्रिया- हां रीना दी. मुश्किल ये है कि उसके इस नये नाटक से मेरे पैरेंट्स
भी पिघल गये हैं. उन्हें भी लगता है कि मुझे पंकज को एक मौका और देना चाहिए.
रीना- क्या बात कर रही हो?
प्रिया- सच कह रही हूं रीना दी.
रीना- ये तो हद है.
प्रिया- वही तो. इमोशनल अत्याचार. कोई गोलू की दुहाई दे रहा है, कोई पंकज के आंसुओं की.
मैंने कहा कि मैं अपने बच्चे को अकेले पाल लूंगी तो पापा ने लेक्चर सुना दिया. आई एम फेडअप नॉव.
रीना- व्हाई पंकज हैज स्टार्टेड ऑल दिस ऑल ऑफ सडेन.
प्रिया- पता नहीं...प्रिया हताश हो रही थी.
रीना- देखो तुम अपने फैसले पर कोई इमोशनल प्रेशर मत आने देना.
प्रिया- वो तो नहीं आने दूंगी दी. लेकिन थक गई हूं अब लड़ते-लड़ते. सात साल शादी के फिर पांच साल का डिवोर्स केस. वहां भी बार-बार फैमिली काउंसिलिंग के बहाने मुझ पर ही दबाव बनाने की कोशिशें. सब कर कराकर जब फाइनल जजमेंट आने को था तो पंकज का नया नाटक. साले, तुम मेरी शक्ल देखना नहीं चाहते और रहना मेरे ही साथ चाहते हो. ये कैसा फ्रॉड है?
प्रिया का गुस्सा उसके मैसेजेस में झलक रहा था.
रीना- शांत हो जाओ. पंकज से ही बात करने पर बात बनेगी.
प्रिया- दीदी, यही तो वो चाहता है. गोलू से लिपटकर रोता है. मम्मी तो एकदम पसीज जाती हैं उसकी एक्टिंग देखकर. मेरे ही पैरेंट्स की न$जर में मुझे दोषी बना दिया उसने.
रीना- बात दोषी होने या बना देने की नहीं है प्रिया. दोषी कोई नहीं होता. बस कुछ समीकरण गलत हो जाते हैं.
प्रिया- दीदी, आप ऐसे कह रही हैं कि दोषी कोई नहीं होता. यहां सिर्फ समीकरण दोषी नहीं हैं. पंकज इज अ सिक मैन. आप जानती हैं उसने मेरे साथ क्या-क्या किया है. अगर तकदीर साथ न देती तो अभी तक या तो मैं पागलखाने में होती या मेरी तस्वीर पर हार लटका होता. मारने-पीटने, आधी रात को घर से निकाल देने से लेकर और क्या-क्या नहीं किया. मम्मी पापा सब जानते हैं फिर भी...
रीना- छोड़ो वो सब. आगे की सोचो.
प्रिया- नहीं, छोड़ूंगी नहीं. इंसान को अपना अतीत कभी नहीं भूलना चाहिए.
रीना- लेकिन अगर अतीत से लिपटी रहोगी तो भविष्य कैसे रचोगी?
प्रिया- अतीत से सबक लेकर.
रीना- ये भी ठीक है. एक नया सवेरा तुम्हारी राह तक रहा है, तभी अंधेरा लगातार गहरा रहा है.
प्रिया-काश ऐसा ही हो.
रीना- ऐसा ही होगा. ऑल द बेस्ट.
प्रिया- थैंक्स? आपसे बात करके हल्का महसूस हो रहा है.
रीना- हूं. टेक केयर. बाय.
प्रिया- बाय.
रीना अनजाने ही प्रिया की जिंदगी से अपनी जिंदगी के कुछ हिस्से मिलाने लगी. उसे लगा कि प्रिया के मुकाबले वो काफी कमजोर है. परिवार बचाने के लिए क्या कुछ नहीं सहना पड़ता है हम महिलाओं को. रीना की आंखों में उदासी के बादल का एक टुकड़ा तैरने लगा.
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चिडिय़ा उड़ी, उड़ के चली...अगले दिन की शुरुआत सना के इस स्टेटस मैसेज से हुई. उसे पढ़कर रीना मुस्कुराए बिना न रह सकी. ये लड़की भी ना जिंदगी से भरपूर है. इसके करीब से निकल भर जाओ, तो जिंदगी मुस्कुरा उठती है. जाने क्यों कोई इसकी जिंदादिली की कद्र नहीं कर पाता. रीना सोच रही थी.
स्वीट स्वीट गुडमॉर्निंग भेज रही हूं कैच करना. सना का मैसेज चैट विंडो से झांकने लगा. रीना को लगा उसके कमरे की खिड़की में सर डालकर सना खुद झांक रही है.
रीना- कैच कर लिया जी.
सना- गुड.
रीना- ये क्या है चिडिय़ा उड़ी...उड़ के चली...
सना- ये चिडिय़ा यानी मैं, अब चली.
रीना- कहां?
सना- मुम्बई नगरिया.
रीना- किसी फिल्म से ऑफर है क्या?
सना- फिल्म बनाने ही तो जा रही हूं.
रीना- ओके. चलो बढिय़ा है.
सना- आप नहीं चलोगी?
रीना- ले चलो.
सना- ठीक है फिर तैयार रहना. मैं भगा ले जाऊंगी.
रीना-पक्का?
सना- बड़ा मजा आयेगा.
रीना- मनोज से पूछ लिया?
सना- मनोज से क्या पूछना है? मेरी जिंदगी में इतनी इ$जाजत किसी को नहीं कि मेरे आड़े आये. मैं हूं बहती हवा...जो मेरे संग चले वो चले, वरना छूट जाये...
रीना- इतनी निर्मोही हो?
सना- हां, ऐसा ही समझ लो. मोह करने की बड़ी कीमतें अदा कर चुकी हूं.
रीना- अच्छा ठीक है. अब मैं निकलती हूं. आज काम भी ज्यादा है और घर भी जल्दी पहुंचना है. कुछ लोग डिनर पर आ रहे हैं.
सना- कभी हमें भी बुला लिया होता डिनर पर जानेमन.
रीना- क्यों तुम तो हवा हो. हवाएं क्या इनविटेशन कार्ड लेकर आती हैं. आ जाओ जब चाहो.
सना- ये बढिय़ा रहा. चलो जाओ, डिनर बनाओ. बाय.
रीना- बाय बाय.
चलो अपने सपनों का पीछा करने की ताकत तो है सना में. कबसे कह रही थी कि फिल्म बनाऊंगी...एकदम अलग. ऐसी फिल्म जो सपनों से, उम्मीदों से भरपूर हो. जिसमें औरतें ही औरतें हों. उसकी कुछ डाक्यूमेंट्रीज देखी हैं रीना ने. न$जर साफ है उसकी. अब मुम्बई जा रही है तो कुछ न कुछ तो करेगी $जरूर. रीना सना के बारे में सोचते हुए मुस्कुराने लगी. तभी उसे महसूस हुआ कि उसकी कोरें नम हैं. उसने अपने भीतर से सपनों के टूटने की आवाज महसूस की. न जाने कितने सपने...कितनी बार....सिर्फ सपने देखना काफी नहीं होता, उन्हें पूरा करने की ताकत भी हासिल करनी जरूरी होती है. सना के बारे में सोचकर रीना मुस्कुरा दी. बिना मां-बाप की इस लड़की ने कैसा कड़वा बचपन बिताया फिर भी अपनी हौसलों की उड़ान में कमी नहीं आने दी. काश तुम्हारे सारे सपने पूरे हों सना...रीना ने दिल से उसे दुआ दी.
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बिट्टू को स्कूल भेजने के साथ ही दिन की मुस्तैद शुरुआत के बाद रीना अखबार खोलकर बैठी तो चेहरा जर्द हो गया उसका. हैदराबाद में बम विस्फोट....तुरंत उसने टीवी ऑन किया. सारे चैनल्स खून से लथपथ न$जर आये. रीना को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, बस दिखाई दे रहा था. सबसे पहला ख्याल उसे आभा दी का आया.
उसने तुरंत फोन उठाया. लेकिन नंबर तो उनका है ही नहीं मेरे पास. एक बार मांगा भी था लेकिन बात मजाक-मजाक में ही टल गई. इतने दिनों से एक-दूसरे को जानते हैं और बात एक बार भी नहीं हुई. नंबर कहां से होगा. पियूष से पूछती हूं. उनकी भी फ्रेंडलिस्ट में हैं आभा दी. वो तो मिला भी है उनसे. उसने पियूष को फोन मिलाया.
पियूष ने बताया कि आभा दी सकुशल हैं, तो रीना की जान में जान आई. उसने तुरंत फेसबुक ऑन किया तो आभा दी की वॉल पर हाल-चाल लेने वालों की भीड़ थी.
ऑफिस पहुंची तो मन अजीब-अजीब सा हो रहा था. काम करने का तो बिल्कुल मन नहीं हुआ. उसने चाय लाने किशोर को भेजा और सिस्टम ऑन किया. ढेर सारी हरी बत्तियां जल रही थीं. उसे लगा अदृश्य रहने में ही भलाई है, वरना इन हरी बत्तियों को खिड़की बनते देर नहीं लगेगी. रीना का मन नहीं था किसी से बात करने का. सुबह की खबरों से मन उदास था उसका.
आर यू देयर?
पियूष का मैसेज था.
रीना- हां, पियूष बोलो.
पियूष- रीना, आभा इज फाइन बट...डॉ. राजेश...
पियूष ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
रीना- क्या हुआ उन्हें?
पियूष- यू नो अबाउट हिम? पियूष ने हिचकते हुए पूछा?
रीना- यस आई नो. बताओ क्या हुआ उन्हें? इज ही ओके?
पियूष- ही इ$ज इंजर्ड. सीरियस हैं...
रीना- हाऊ डू यू नो? तुम्हें कैसे पता? तुम्हारे पास नंबर है उनका? मुझे दो. मैं अभी बात करती हूं...
रीना हड़बड़ा गई.
पियूष- नंबर दे दूंगा. लेकिन अभी बात करने का कोई फायदा नहीं. मेरी आभा से बात हुई है. मैं शाम की ट्रेन से निकल रहा हूं. उसे हमारी जरूरत है रीना...
चैट के उस मैसेज में ही पियूष की आंखों में छलके आंसू रीना से छुप न सके. रीना को तेज रुलाई आई. खुद को समेटकर उसने बाथरूम की दीवारों में कैद किया.
मुंह धोकर बाहर निकली, तो उसका जी चाहा कि उड़कर पहुंच जाए आभा दी के पास. उनका सारा दु:ख सोख ले अपने भीतर. मेरी अच्छी आभा दी. पियूष जा रहा है रात को. क्यों न मैं भी चली जाऊं. पियूष का वो वाक्य उसे हमारी जरूरत है...उसके जेहन में तैर रहा था. घर पर क्या बोलूंगी. वर्चुअल वर्ड की ये दोस्ती घर-परिवार वालों को कितनी समझ में आयेगी. राघव से तो कोई उम्मीद है नहीं, आजकल सासू मां भी आई हुई हैं. बिट्टू के एग्जाम्स होने वाले हैं, ऐसे में उसे छोड़कर अकेले अचानक कहां जा रही हूं. किसके लिए? कैसे समझा पायेगी वो कि जिसका फोन नंबर तक उसके पास नहीं है, जिससे कभी नहीं मिली, वो उसके लिए कितनी अहमियत रखती हैं.
उसे लगा इस मुश्किल का हल भी आभा दी के पास ही है. पिछले एक साल में आभा दी की ऐसी आदत पड़ गयी है उसे कि हर छोटे बड़े फैसले में वो शामिल रहती हैं किसी न किसी रूप में. और अब जब वे खुद मुश्किल में हैं तो....
इसी उलझन में पूरा दिन बीता. फेसबुक पर लगी उनकी छोटी सी तस्वीर उसके जेहन में लगातार घूम रही थी. हमेशा वो करो जो दिल चाहे...तो दिल पर कोई बोझ नहीं रहता...किसी मौके पर उन्होंने कहा था.
रीना ने पियूष को फोन मिलाया, तुम्हारी ट्रेन झांसी से होकर जायेगी क्या?
पियूष- हां क्यों.
मैं भी चलूंगी.
अरे, मैं जा रहा हूं ना? इतनी जल्दी रिजर्वेशन वगैरह भी नहीं मिलेगा. तुम परेशान मत हो. मैं वहां जाकर फोन करूंगा तुम्हें. पियूष ने समझाना चाहा.
पियूष मैं चलूंगी. बस. आज भी अगर मैंने अपना मन मार लिया, तो कभी चैन से सो नहीं पाऊंगी.
पियूष चुप रहा.
घर आकर वो चुपचाप एक बैग में सामान ठूंसती रही. उसके आसपास सवालों का एक जंगल उगता रहा...

(2016 में नया ज्ञानोदय में प्रकाशित)

Tuesday, October 23, 2018

साढ़े चार मिनट


कमरे में तीन ही लोग थे। वो मैं और एक हमारी दोस्त...।
तीनों ही मौन थे।
मैं वहां सबसे ज्यादा थी या शायद सबसे कम।
वो वहां सबसे कम था या शायद सबसे ज्यादा।
दोस्त पूरी तरह से वहीं थी।
मैं खिड़की से बाहर देख रही थी।

सब खामोश थे। यह खामोशी इतनी सहज थी कि किसी राग सी लग रही थी। मैं खिड़की के बाहर लगे अनार के पेड़ों पर खिलते फूलों को देख रही थी। जिस डाल पर मेरी नजर अटकी थी वो स्थिर थी हालांकि उस पर अटकी पत्तियां बहुत धीरे से हिल रही थीं।

उन पत्तियों का इस तरह हिलना मुझे मेरे भीतर का कंपन लग रहा था। मुझे लगा मैं वो पत्ती हूं और वो...वो स्थिर डाल है। डाल स्थाई है। पत्तियों को झरना है। फिर उगना है। फिर झरना है...फिर उगना है।

'मुझे मां से बात करनी है...' वो बोला।

उसके ये शब्द खामोशी को सलीके से तोड़ने वाले थे।
मैं मुड़ी नही। वहीं अनार की डाल पर अटकी रही।
दोस्त ने कहा, 'अच्छा, कर लीजिए।'
'क्या वो यहीं हैं...?' उसने पूछा।
'हां, वो अंदर ही हैं।' बुलाती हूं।

कुछ देर बाद कमरे में चार लोग थे। मां मैं वो और दोस्त।
मैं अब भी खिड़की के बाहर देख रही थी।
'आप अंकल से बात कर लीजिए...' उसने मां से कहा।
मां चुप रहीं।

'लेकिन...' दोस्त कुछ कहते-कहते रुक गई।
'किसी लेकिन की चिंता आप लोग न करें...मैं सब संभाल लूंगा। सब।'
उसने मां की हथेलियों को अपने हाथों में ले लिया।
दोस्त ने कहा, 'फिर भी।'
'परेशान मत हो। यकीन करो। ' उसने बेहद शांत स्वर में कहा।

कमरे में मौजूद लोगों की तरफ अब तक मेरी आधी पीठ थी। अब मैंने उनकी तरफ पूरी पीठ कर ली ताकि सिर्फ अनार के फूल मेरे बहते हुए आंसू देख सकें।

मां कमरे से चलीं गईं...दोस्त भी।

वो मेरे पीछे आकर खड़ा हुआ। अब वो भी कमरे के बाहर देख रहा था। शायद अनार के फूल...या हिलती हुई पत्तियां। कमरे में कुछ बच्चे खेलते हुए चले आए। उसने बच्चों के सर पर हाथ फिराया...बच्चे कमरे का गोल-गोल चक्कर लगाकर ज्यूंयूयूँ से चले गए।

अब कमरे में वो था और मैं...बाहर वो अनार की डाल...
उसकी तरफ मेरी पीठ थी....उसने कहा, 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा है...'

गहरी सर्द सिसकी भीतर रोकने की कोशिश अब रुकी नहीं।
अनार की डाल मुस्कुरा उठी।
'सिर्फ साढ़े चार मिनट नहीं, साढ़े चौदह साल...' मैंने कहा...

उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया।
हम दोनों अनार की डाल को देखने लगे...
बच्चे फिर से खेलते हुए कमरे में आ गए थे...उसने फिर से उनकी पीठ पर धौल जमाई...

वो आखिरी बार था जब मां की जिंदा हथेलियों को इस तरह किसी ने अपनी हथेलियों में रखा था।
उसी रात मां मर गई।
रोज की तरह चांद गली के मोड़ वाले पकरिया के पेड़ में उलझा रहा।
मां रात को सारे काम निपटाकर सोईं और फिर जगी नहीं।
बरसों से वो उचटी नींदों से परेशान थीं। सुबह उनके चेहरे पर सुकून था। वो सुकून जो उनके जिंदा चेहरे पर कभी नहीं दिखा।

वो आता, थोड़ी देर खामोशी से बैठता, चाय पीता चला जाता।
न वो मेरी खामोशी को तोड़ता न मैं उसकी।
हमारे दरम्यिान अब सवाल नहीं रहे थे। उम्मीद भी नहीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या जरूर कुछ उदास दिखती थी।
मां ने पक्षियों को दाना देकर घर का सदस्य बना लिया था। वो घर जो उन्हें अपना नहीं सका, उस घर को उन्होंने कितनों का अपना बना दिया।

'तो तुमने क्या सोचा?' एक रोज उसने खामोशी को थोड़ा परे सरकाकर पूछा।
मैं चुप रही।
वो चला गया।
मैं भी उसके साथ चली गई थी हालांकि कमरे में मैं बची हुई थी।

दोस्त मेरी हथेलियों को थामती। मुझसे कहीं बाहर जाने को कहती, बात करने को कहती। उसे लग रहा था कि मैं मां के मर जाने से उदास हूं।
असल में मां की इतनी सुंदर मौत से मैं खुश थी। इसके लिए मैं उसकी अहसानमंद थी।
जीवन भर मां को कोई सुख न दे सकी कम से कम सुकून की मौत ही सही।

अनार की डाल पर इस बरस खूब अनार लटके। इतने कि डालें चटखने लगीं।
लाल कलगी वाली चिडि़या फिर से गुनगुनाने लगी।
मां की तस्वीर पर माला मैंने चढ़ने नहीं दिया।

उस रोज भी कमरे में चार लोग थे।
वो, मैं दोस्त और मां तस्वीर में.
वो जो सबसे कम था लेकिन था
मैं जो थी लेकिन नहीं थी
दोस्त पिछली बार की तरह वहीं थी न कम न ज्यादा
मां कमरे में सबसे ज्यादा थीं, तस्वीर में।

'साथ चलोगी?' उसने पूछा.
'साथ ही चल रही हूं साढे़ चौदह सालों से,' मैंने कहना चाहा लेकिन चुप रही।
'कहां?' दोस्त ने पूछा।
'अमेरिका....' उसने कहा
'लेकिन...' दोस्त ने कुछ कहना चाहा पर रुक गई।
'यहां सबको इस तरह छोड़कर...कैसे...' दोस्त ने अटकते हुए कहा।
शायद उसे उम्मीद थी कि वो पिछली बार की तरह उसे रोक देगा यह कहकर कि, 'लेकिन की चिंता मत करो, मैं संभाल लूंगा। सब। बस यकीन करो।'

उसने कुछ नहीं कहा। मैं मां की तस्वीर को देख रही थी।
'हां, मैं भी वही सोच रहा था।' उसने आखिरी कश के बाद बुझी हुई सिगरेट की सी बुझी आवाज में कहा।
'आपका जाना जरूरी है?' दोस्त राख कुरेद रही थी।

वो खामोश रहा।
चांदनी अनार के पेड़ पर झर रही थी।
'हां,' उसने कहा। दोस्त उठकर कमरे से चली गई। शायद गुस्से में। या उदासी में।
अब कमरे में तीन लोग थे मैं वो और मां।

'तुमने मेरी मां को सुख दिया,' कहते हुए मेरी आवाज भीगने को हो आई।
'तुम्हें भी देना चाहता था...' उसने कहा।
मेरे कानों ने सिर्फ 'था' सुना...

वो बिना ये कहे कमरे से चला गया कि 'तुमने पूरे साढ़े चार मिनट से मेरी तरफ नहीं देखा।'
न मैं यह कह पाई कि 'उम्र भर उसे न देख सकने का रियाज कर रही हूं...'



Friday, October 19, 2018

नदी, उदासी, इश्क



उस रोज जब
तुम्हारी निगाह में
बुझ रहा था प्रेम

आसमान में
बुझ रहा था चाँद

नदी बूझ रही थी
इस बुझ जाने की कहानी.

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नदी किनारे तुम्हारे संग होने का ख़वाब
कितना सुंदर था जब तक वो ख्वाब था

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नदी ने
आँखों के पानी को सहेज लिया

तुमने सहेज ली
दुनियादारी

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उस रोज जब तुम्हारी हथेलियों को
लेकर अपनी हथेलियों में
कहनी थी
किसी ख्वाब के पूरा होने की कहानी

तुम्हारी आँखों में दिखा
'द एंड' का बोर्ड

वहां कोई पानी क्यों नहीं था?

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नदियाँ जानती हैं
बहुत सी कडवाहट सहेजकर भी
देना नमी,
शीतलता

लेकिन ऐसा करते करते
वो बूढ़ी होने लगती हैं,
थकने लगती हैं एक रोज
और तब तुम शिकायत करते हो
जीवन में घिर आयी नमी की कमी की

नदियों को प्रदूषण से बचाना सीखो
धरती पर भी
अपने भीतर भी.

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रात गा रही थी मिलन का राग
नदी के किनारे
उगा था चौथ का चाँद

राग खंडित करने का हुनर
तुम्हें आता था.

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नदियों के पास नहीं इतना पानी
कि बेवफाई से जन्मे सूखे को
प्यार की नमी बख्श सकें

नदियाँ उदास प्रेमियों के आगे
सर झुकाए रहती हैं

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नदी प्रार्थना में थी
चाँद भी था सजदे में
हवाएं पढ़ रही थीं दुआएं
कि वक्त की शाख से
गिरा है जो प्रेम का लम्हा
वो लम्हा टूट न जाए कहीं

उस लम्हे को
तोड़ा तुम्हीं ने बेतरह

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इंतजार से मोहब्बत निखरती है
सुना था

लम्बे, बहुत लम्बे इंतजार के बाद भी
टूटी बिखरी ही मिली मोहब्बत

नदी बेबस सी देखती रही
मिलन की घड़ियों का
टूटन में बदलना

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नदियाँ सूख रही हैं
धरती की भी
इंसानों के भीतर की भी
नदियों को बचाया जाना
जरूरी है
मोहब्बत का बचाया जाना
ज़रूरी है

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जब जब तुमने अनसुना किया
नदियों के रुदन को

धरती पर सूखती गयी
प्रेम की फसल.


Thursday, October 18, 2018

प्यारी सी आशा

ये तस्वीरें मेरी नहीं हैं, आशा की हैं. आशा जिस तक लेकर गए साथी रोहित रूसिया. छिंदवाड़ा के रोहित जी ,से परिचय हुआ 'क' से कविता के जरिये और बाद में उनके हुनर एक-एक कर श्रृखंलाबध्ध ढंग से सामने आते गए, उनके कविता पोस्टर, कविता पाठ, नाटक और उनका कलात्मक काम. यकीनन और भी बहुत कुछ. 

उन्हीं के जरिये आरती रूसिया के काम को भी देखा और जाना. आरती आशा समूह का नेतृत्व करती हैं. आशा छिंदवाडा और उसके आस पास की आदिवासी स्त्रियों का समूह है जो करघे पर कपड़ा बुनने से लेकर हाथ की कारीगरी के जितने काम संभव हैं करता है. ये स्त्रियाँ आस पास के इलाकों में रहती हैं और आशा समूह में काम करती हैं. 

मैं आशा कॉटन फेब की वेबसाईट पर हैण्डमेड साड़ियों को देखती रहती थी, एक रोज रोहित जी से अपनी पसंद की साड़ी की फरमाइश कर दी. रंग एकदम वैसा जैसा मुझे चाहिए,  कपड़ा एकदम वैसा ही, उसमें डिजायन भी एकदम वैसी ही...इस तरह कभी कोई साड़ी या कोई भी चीज़ ली नहीं थी. मैं फरमाइश कर रही थी, मेरे सामने मेरी फरमाइश का बेस्ट ऑप्शन आ जाता. और इस तरह मेरी फरमाइशों को रोहित जी आरती जी और आशा समूह की साथियों के साथ मिलकर जो साड़ी बनवाकर मुझे भेजी वो है ये.

शुद्ध कॉटन, जिसका सूत हथकरघे पर बना है मिल में नहीं, वर्ली आर्ट जिसे आशा के साथियों ने अपने हाथों से साड़ी पर सजाया है ठीक उसी तरह जिस तरह मैं देहरादून में बैठकर सोच रही थी. साड़ी बनी, छिंदवाड़ा से चली और देहरादून में पैकेट खोलते ही लगा अरे, इतनी सुंदर...इतनी तो मैंने सोची नहीं थी. यह साड़ी दिखने में जितनी सुंदर है, इसका फैब्रिक महसूस करने में उतना ही नरम और आरामदायक.

रोहित जी, आरती जी और आशा के सभी साथियों को मेरा शुक्रिया कहियेगा. यह मेरी सबसे प्रिय साड़ियों में शामिल है... ASHA (Aid & Survival of Handicraft Artisan)

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Sunday, October 7, 2018

इसी मौसम में


हरसिंगार खिलने के महीने को अक्टूबर क्यों कहा गया होगा लड़की को पता नहीं लेकिन उसने हथेलियों में हरसिंगार सहेजते हुए हमेशा कुछ ताकीदें याद कीं जो इस मौसम में उसे दी गयी थीं. इसी मौसम में उसने आखिरी बार थामा था एक अजनबी हाथ, इसी मौसम में उसने निगाह भर देखा था उसे. शहर की सड़कों पर उन दोनों ने इसी मौसम में एक साथ कुछ ख़्वाब देखे थे. उन ख्वाबों में ही तय किया था एक वादा कि कोई वादा नहीं करेंगे एक दूसरे से. इसी मौसम में उँगलियों ने उँगलियों से दोस्ती की थी. निगाहों ने टकराकर दिशाएं बदलना सीखा था. यही तो था मौसम जब चाय पीने की शदीद इच्छा में खोजते फिरे थे चाय की कोई गुमटी और मिल जाने पर चाय इस कदर खोये रहे थे एक दूसरे में कि चाय ठंडी हो गयी थी रखे-रखे ही. इसी मौसम में उम्मीदों की ठेली लगाने की सोची थी दोनों ने और दरिया के पानी से वादा किया था कि पानी बचाए रखेंगे दरिया में भी और आँखों में भी.

इसी मौसम लड़की ने शरमाना सीखा था, शरमाना छोड़ा भी. इसी मौसम में लड़के ने उससे कहा था, अगर मुझे पाना है तो खुद को संभालना सीखो, उठना सीखो, अकेले चलना सीखो, मुश्किलों से लड़ना सीखो, धूप को सहना सीखो, काँटों से उलझना और खुद निकलना सीखो. उसने कहा अगर मुझे पाना है तो प्यार करो खुद को, संगीत के सुरों में धूनी जमाओ, रास्तों में भटकना सीखो. उसने कहा, अगर पाना है मुझे तो प्यास संभालना सीखो, बिन मौसम की बरसातों में भीगना सीखो, बिना धूप के सूखना सीखो. उसने कहा कि अगर जीना है प्यार में तो हर पल मरना सीखो, याद की तावीज़ गले में टांगकर मेरे बगैर ही मेरे होने को महसूस करना सीखो...

जब वो सब सीख गयी तो उसने पाया कि वो किसी और के संग जीना सीख चुका था...हरसिंगार झरे पड़े थे धरती पर...इसी मौसम में...

Thursday, October 4, 2018

बचा रहे बनारस...


दाल में बचा रहे रत्ती भर नमक
इश्क़ में बची रहें शिकायतें
आँखों में बची रहे नमी
बचपन में बची रहें शरारतें
धरती पर बची रहें फसलें
नदियों में बचा रहे पानी
सुबहों में बची रहे कोयल की कूक
शामों में बची रहे सुकून की चाय
दुनिया में बची रहे मोहब्बत
और बचा रहे बनारस...

फेवरेट सिनेमा- फिलहाल


ये लम्हा फ़िलहाल जी लेने दो...

'फिलहाल' फिल्म मुझे कई कारणों से प्रिय है. बहुत सारे कारण. यह फिल्म दोस्ती पर बनी है. दोस्ती के आकाश को खिलते, निखरते देखने का सुख है इस फिल्म को देखना. यह फिल्म बनी है मातृत्व की तीव्र इच्छा और उसके तमाम एहसासों को सलीके से उभारती है, और जिस वक़्त यह फिल्म देखी थी मैं भी माँ बनने की तीव्र इच्छा में थी. यह मेघना गुलज़ार की पहली फिल्म थी. गुलज़ार साहब की बेटी के काम को देखने का रोमांच तो था ही.  इस फिल्म में मेरी प्रिय अभिनेत्रियाँ सुष्मिता सेन और तब्बू थीं. फिल्म के गीत बेहद खूबसूरत थे जो आज भी फेवरेट लिस्ट में शामिल रहते हैं.

इस फिल्म को मेघना ने बहुत ही प्यार से बनाया, हर फ्रेम, हर शॉट एकदम तसल्ली से. स्क्रिप्ट एकदम बंधी हुई. न कोई जल्दबाजी न कोई ठहराव. सरोगेसी पर पहले भी फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन इस विषय को डील करते समय जिस तरह की इंटेसिटी जिस तरह की भावनात्मक जर्नी की जरूरत थी वो फिल्म में दिखती है. मातृत्व का एहसास दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास, माँ बनने की इच्छा, इमोशनल उतार-चढ़ाव, मातृत्व की उस इच्छा को एक दोस्त के द्वारा समझा जाना और दुनिया के सबसे खूबसूरत एहसास को दोस्त को तोहफे में देना.

सुष्मिता भले ही कम फिल्मों में दिखी हों लेकिन मुझे उन्हें परदे पर देखना सुखद लगता है, तब्बू को भी. इन दोनों को दोबारा कभी किसी फिल्म में नहीं देखा. यह असल में सुष्मिता और तब्बू की फिल्म है जिसमें संजय सूरी और पलाश ने रंग भरे हैं. ये लम्हा फ़िलहाल जी लेने दो, ले चलें डोलियों में तुम्हें गर इरादा करो, सोलह सिंगार करके सहित तमाम गाने अच्छे लगते हैं. इस फिल्म का जिक्र भी हो तो मन को कुछ खुश खुश सा महसूस होता है...

Wednesday, October 3, 2018

उम्मीद यहीं कहीं है



उस रोज मैं देहरादून के एक इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ कुछ बातचीत कर रही थी. दूरस्थ इलाके के इस इंटर कॉलेज में बच्चे कई कई किलोमीटर की पहाड़ियों से उतर कर आते हैं और प्रिंसिपल सर इस बात के मर्म को समझते हैं इसलिए भरपूर कोशिश करते हैं कि बच्चों की पढ़ने की इच्छा के चलते इतने दूर चलकर आने को ज्यादा से ज्यादा सम्मान कैसे दिया जाय, कैसे बच्चों के समय व पढ़ने की इच्छा को भरपूर खुराक दी जाय. इसी बाबत यहाँ शिक्षक साथियों के साथ हर महीने अकादमिक चर्चा की शुरुआत हुई है.

उस रोज भी हम उसी बाबत बात कर रहे थे जब किसी कोचिंग संस्थान के दो साथी वहां आये. प्रिंसिपल सर ने उनकी बात को ध्यान से सुना। उन कोचिंग वाले लोगों ने अपना प्रोजेक्ट बताया कि इंटर पास करने के बाद बच्चों का एक टेस्ट लेंगे और जो टॉपर्स होंगे उनके लिए फ्री कोचिंग की सुविधा होगी. प्रिंसिपल सर ने बहुत धैर्य के साथ उनकी बात सुनते हुए कहा कि क्या आप जानते हैं ये बच्चे कहाँ से आते हैं. कितनी दूरी तय करके, कितना पैदल चलकर, किन पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्तों से? इन बच्चों के लिए यहाँ कॉलेज आना ही इतना मुश्किल है ये आपकी कोचिंग कैसे पहुँचेंगे भला. लेकिन इससे इतर एक बात मेरे मन में चल रही थी कि जो बच्चे सिलेक्ट नहीं होंगे उनके लिए क्या? यही बात प्रिंसिपल सर ने कहकर मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया.

सारी दुनिया टॉपर्स सिलेक्ट कर रही है, सबके सिलेक्शन का क्राईटरिया नामी कॉलेज अच्छे मार्क्स ही हैं. तो फिर उनका क्या जिनके सामान्य नंबर आते हैं. जो सिलेक्ट होते होते रह जाते हैं, या जो इस रेस में बहुत पीछे छूट जाते हैं, कुछ तो डर के मारे इस रेस में दौड़ते भी नहीं. क्या कोई ऐसी कोचिंग या संस्था है जो पूछती हो कि जिन बच्चों को सीखने में दिक्क्त है उनके लिए हम हैं न? जो सिलेक्ट नहीं होते हम उनका ही हाथ थामेंगे कि सिलेक्टेड लोगों के साथ तो दुनिया है ही. क्या कोई ऐसी कंपनियां हैं या कभी होंगी जो चुनकर ले जाती हों हिम्मत हारे, मुरझाये लेकिन प्रतिभाशील लोगों को इस भरोसे कि वो उनके हुनर को निखार लेंगे।

सचमुच ये अच्छे नंबरों की दौड़ ने हमारा सबसे कीमती सामान हमारे भीतर का पानी छीन लिया है. उस रोज प्रिंसिपल सर की यह बात सुनकर कि उन बच्चों का क्या जो सिलेक्ट नहीं होंगे, हमारे लिए तो वो भी उतने ही अज़ीज़ हैं, बहुत अच्छा लगा. हम कितना ही प्राइवेटाइज़ेशन की ओर भाग लें लेकिन उम्मीद सरकारी स्कूलों की ओर से ही खुलती नज़र आती है जहाँ शिक्षक हर बच्चे के साथ निजी जुड़ाव के साथ काम कर रहे हैं और किन्ही कारणों से पीछे छूट गए बच्चों के पीछे खड़े होते हैं, उनके सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं कि मैं हूँ न! उस एक लम्हे में बच्चों की आँखों में जो चमकता है न पानी वही उम्मीद है!

Monday, October 1, 2018

गाँधी जयंती और हरसिंगार



बच्चे गान्ही बाबा के जयकारे लगा रहे हैं
लाइन लगाकर घूमने आये हैं गाँधी पार्क
हालाँकि बच्चों की नजर गुब्बारे वाले पर है
और शिक्षिका की नजर बच्चों की संख्या पर
गांधी बाबा सिर्फ जयकारों में हैं

कुछ लोग छुट्टी मना रहे हैं गांधी बाबा के जन्मदिन पर
देर तक सोने और सिनेमा देखने जाने की योजना के साथ

कुछ ने धूल साफ़ की है चरखों की अरसे बाद
पहनी है गांधी टोपी
और कात रहे हैं सूत
ठीक गाँधी प्रतिमा के नीचे
फोटो के फ्रेम में एकदम ठीक से आ रहे हैं वो

तमाम राजनीतिक दल मना रहे हैं गांधी जयंती
पार्टी के झंडों और भाषणों के साथ
भाषण जिनकी भाषा में ही है हिंसा
हालांकि दोहरा रहे हैं वो बार-बार शब्द 'अहिंसा'
तैनात है तमाम पुलिस और पुलिस की गाड़ियाँ
गांधी जयंती के अवसर पर

मालाएं बार-बार चढ़ उतर रही हैं
गांधी प्रतिमा लग रही है निरीह सी
जो वो प्रतिमा न होती गांधी होते तो
तो शायद चले गये होते इस तमाशे से बहुत दूर
या खेल रहे होते बच्चों के संग

लेकिन वो प्रतिमा है और उसे सब सहना है
एक बच्ची पूछती है अपने पिता से
'पापा, गांधी जी तो कहते थे किसी को मारो नहीं
फिर इतनी पुलिस क्यों है?'
पिता के पास सिर्फ मौन है

बच्ची इस शोर से दूर पार्क में उछलती फिर रही है
हर सिंगार के पेड़ों ने फिजां को खुशबू से 
और रास्तों को फूलों से भर दिया है
मैं इन पेड़ों के नीचे धूनी जमाये हूँ

ये जो बरस रहे हैं न
नारंगी डंडी और सफ़ेद पंखुड़ियों वाले फूल
ये प्यार हैं,
इनकी खुशबू में तर रहना चाहती हूँ
टप टप टप गिरते फूलों के नीचे महसूस करती हूँ
कभी सर, कभी काँधे पर गिरना फूलों का
चुनने को फूल झुकती हूँ तो झरते हैं फूल मुझसे भी
कि कुछ ही पलों में मैं खुद हरसिंगार हो चुकी हूँ
दूर कहीं लग रहे हैं गांधी बाबा के जयकारे
जबकि मैं और वो बच्ची हम दोनों हरसिंगार चुन रहे हैं
हम दोनों की मुस्कुराहटों में दोस्ती हो गयी है.

(आज सुबह, गांधी जयंती )






Friday, September 28, 2018

फेवरेट सिनेमा- अनुरनन


ये शाम इतनी खूबसूरत है, क्या इसे मैं हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकती? जब कभी मेरा मन उदास हो जाय तब इसी शाम को क्या मैं फिर से नहीं जी सकती?
क्यों नहीं? बस करना यह है कि ऐसे लम्हों को एक याद में बदल देना है,
'शब्द होते हैं पल भर के लिए निशब्द होता है अनंतकाल के लिए.'

( फिल्म अनुरनन से)

'अनुरनन' ( resonance ) यह मेरी प्रिय फिल्मों में शुमार है. इस पर मैं बहुत तसल्ली से लिखना चाह रही थी.हालंकि तसल्ली अब भी कहाँ मिली है. सिनेमा किस तरह अपना असर दिखाता है, किस तरह वो आपके करीब आकर बैठ जाता है. किरदार आपसे दोस्ती कर लेते हैं ऐसा कुछ महसूस हुआ इस फिल्म को देखते हुए. फिल्म के सभी किरदार राहुल बोस, रितुपर्णो सेनगुप्ता, राइमा सेन और रजत कपूर बेहद संतुलित ढंग से फिल्म में अपनी भूमिकाओं में पैबस्त हैं. मानो वो अभिनय न कर रहे हों, एक खूबसूरत धुन में गुम हों. फिल्म के कुछ दृश्य तो तमाम थकन को निचोड़कर फेंक देने में कामयाब हैं.

बेहद सुंदर भरोसे और प्यार भरे रिश्तों के बीच भी अचानक किस तरह समाज अपनी गलतफहमियों की टोकरी उठाये दाखिल होता है और फिर होता ही जाता है. जिस वक़्त आर्टिकल 497 को लेकर तरह तरह की विवेचनाएँ आ रही हों उस वक़्त ऐसे रिश्तों के ताने-बाने से गुंथी फिल्म को दोबारा देखा जाना चाहिए. समाज की गलतफहमियों वाली टोकरी उतारकर दूर रख आने से जिन्दगी कितनी खूबसूरत, कितनी आसान हो सकती थी लेकिन ऐसा होना कहाँ आसान है.

फिल्म कई परतों में खुलती भी है और हमारी तमाम परतों को खोलती भी है. सच कहूँ तो इस फिल्म ने बहुत सुकून बख्शा था एक वक़्त में. सिनेमोटोग्राफ़ी सुंदर है. फिल्म के तमाम दृश्य किसी तिलस्मी सौन्दर्य से भरपूर नजर आते हैं. बात करने को दिल नहीं चाहता, सिर्फ उन दृश्यों में गुम जाने को जी चाहता है अपनी साँसों की आवाज सुनते हुए.


Monday, September 17, 2018

फेवरेट सिनेमा- सिमरन



प्यारी सी है सिमरन...

अगर बात सिर्फ बंधनों को तोड़ने की है तो बात जरूरी है लेकिन बात जब बंधनों को पहचानने की हो तो और भी ज़रूरी हो जाती है. सही गलत सबका अपना होता है ठीक वैसे ही जीवन जीने का तरीका भी सबका अपना होता है. भूख प्यास भी सबकी अपनी होती है, अलग होती है. हमारा समाज अभी इस अलग सी भूख प्यास को पहचानने की ओर बढ़ा नहीं है. सिमरन उसी ओर बढती हुई फिल्म है.

जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है.

शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में.

वो अपने पिता से कहती है, 'हाँ मैं गलतियां करती हूँ, बहुत सी गलतियां करती हूँ लेकिन उन्हें मानती भी हूँ न'. वो जिंदगी का पीछा करते-करते कुछ गलत रास्तों पर निकल जाती है मुश्किलों में फंसती चली जाती है लेकिन हार नहीं मानती। उसकी संवेदनाएं उसका साथ नहीं छोड़ती। बैंक लूट के वक़्त जब एक सज्जन को दौरा पड़ता है तो उन्हें पानी पिलाती है.' बैंक लूट की घटना के बाद किस तरह ऐसे अपराधों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार मान लिए जाने की आदत है लोगों में इस पर अच्छा व्यंग्य है साथ ही एक मध्यमवर्गीय भारतीय पिता की सारी चिंता किसी भी तरह बेटी की शादी पर ही टिकी होती हैं इसको भी अंडरलाइन करती है फिल्म।

सिमरन एक साफ़ दिल लड़की है. छोटे छोटे सपने देखती है, घर का सपना, जिंदगी जीने का सपना, शादी उसका सपना नहीं है, वो प्यार के नाम पर बिसूरती नहीं रहती लेकिन किसी के साथ कोई धोखा भी नहीं देती। गलतियों को जस्टिफाई नहीं करती, उनसे बाहर निकलने का प्रयास करती है. प्रफुल्ल के किरदार को कंगना ने बहुत प्यार और ईमानदारी से निभाया है. फिल्म शादी, ब्वॉयफ्रेंड, दिल टूटने या जुड़ने के किस्सों से अलग है. तर्क मत लगाइये, सही गलत के चक्कर में मत पड़िये बस कंगना से प्यार हो जाने दीजिये।

पिछले दिनों अपने बेबाक इंटरव्यू को लेकर कंगना काफी विवाद में रही है. विवाद जो उसकी साफगोई से उपजे। कौन सही कौन गलत से परे एक खुद मुख़्तार लड़की कंगना ने अपना मुकाम खुद बनाया है.... उसकी हंसी का हाथ थाम लेने को जी करता है, सब कुछ भूलकर जिन्दगी को जी लेने को दिल करता है.

Sunday, September 16, 2018

नायिका उस प्रेम से बाहर नहीं आ सकी थी


और मैंने पाया है अक्सरहाँ यह गुण तुम्हारी नायिका में कि वह घटनाओं में, संबंधों में, अनुष्ठानों में, कार्यक्रमों में, संवादों में, बारिशों में, स्वप्नों में आसानी से प्रवेश करती नहीं। और फिर जो भीतर चली ही जाए तो बाहर लौटती नहीं। बिना ओर-छोर के जंगल में भटकती जाने कौन-सी जड़ी-बूटी खोजती फिरती तुम्हारी नायिका। जीवन की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते तुम्हारी कथाओं की जल भरी बावड़ी में उतर डुबकी लगाने वाली नायिका। फिर नर्मदा तट पर दीयों की झिलमिल संग डूबते-उतराते किसी अँधेरे ज़ेहन में उतर जाने वाली तुम्हारी नायिका।

नहीं, प्रेम से ही नहीं, तुम्हारी यह नायिका कहीं से भी बाहर नहीं आती। बल्कि ये बाहर आने के सारे विकल्पों पर कँटीली बाड़ खींचकर जंगल में प्रवेश करती है। ऐसी नायिका को जीवन की वह गुमी हुई बूटी न मिले तो भला किसे मिले ?

और वह पुरुष, जिसके पास हज़ार ज़िम्मेदारियों का विलाप रहा होगा, हमेशा एक हड़बड़ी रही होगी, गहमागहमी रही होगी; वह पुरुष कहीं प्रवेश नहीं करता पूरा-पूरा। वह, जो दिखता है परिवार में भी, ऑफ़िस की मीटिंगों में भी, अख़बार की सुर्ख़ियों पर बिला नागा प्रतिक्रियाओं में भी, घड़ी में भी, कैलेंडर में भी, स्मृतियों में भी, प्रेम में भी, वह कहीं नहीं है।
क्योंकि बात बड़ी सीधी है कि जो हर कहीं है, वह कहीं नहीं है।

और तुम्हारी यह दुष्टना नायिका, प्रतिभा !

वह एक अछूते गिटार के तारों में तक प्रवेश कर गयी है, जिसे कभी बजाया नहीं जाता। उस गिटार की असह्य धुन पूरी कहानी में गूँजी है।

ओह ! ऐसा आरोह !

मैं तुम्हें बताऊँ, मेरी दोस्त !
कि वह गिटार तुम्हारी कहानी का सबसे मुख्य क़िरदार है।
और बहुत रुलाया तुमने मुझे ऐसी रुत में
कि जब बाद बारिश सूरज तक चिपचिपाता है
कि जब मैंने ख़याल किया था कि नहीं देखनी है एक और बार 'द जैपनीज़ वाइफ़'
कि जब मुझे प्रेस करनी थी मटकुल की वह लेसदार रेड फ़्रॉक
कि जब मुझे समझना था इन दिनों कैसे रुपये किलो टमाटर का भाव
कि जब मुझे अकेले ढूँढ़ निकालना था ट्रेन में अपनी सीट
कि जब मुझे आँखें मूँद कर देखना था अपनी श्वास का विलोम
कि जब मुझे नज़र में आती चीज़ों को भी कर देना था नज़रअंदाज़
कि जब मुझे उड़ने देनी थी अपनी हँसी की तितलियाँ
तब मेरी दोस्त !
तुमने भेजीं मेरे लिए बेहिसाब बारिशें
मिलनी चाहिए तुम्हें इसकी कुछ तो सज़ा
कि जब इस मौसम में, प्रतिभा !
सूरज तक चिपचिपाता है
मैंने तय किया कि रहूँगी दिन भर एरिक क्लैप्टन के
मनभेदिये गिटार के साथ

टियर्स इन हैवन.. टियर्स इन हैवन
टियर्स इन..

**

[ प्रतिभा की ताज़ा कहानी के भीतर चले जाने के बाद ]


#बाबुषा

Saturday, September 15, 2018

फेवरेट सिनेमा- जापानीज़ वाइफ


एक फिल्म देखी थी जापानीज़ वाइफ. यह धीरे-धीरे सरकती हुई फिल्म है ठीक वैसे ही जैसे आहिस्ता-आहिस्ता नसों में उतरता है प्यार. कोई हड़बड़ी नहीं पूरे धैर्य के साथ. यह फिल्म जेहनी सुकून की तलाश को पूरती है, सुख क्रिएट करती है और उसे सहेजकर आगे बढती है. अपर्णा सेन की यह फिल्म मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है. इस फिल्म को देखते हुए प्रेम की साधारणता के साथ उसकी उच्चता को एक साथ महसूस किया मैंने. 

यह कहानी दो ऐसे प्रेमियों की है जो पत्रों के माध्यम से एक दुसरे को जानते हैं. स्नेहमोय (राहुल देव) एक स्कूल टीचर है और उसकी दोस्ती जापान की मियागी (Chigusa Takaku)से हो जाती है. यह दोस्ती खतों के माध्यम से होती है फिर यह खतों के माध्यम से ही प्रेम में बदलती है और फिर ब्याह में. इस दौरान स्नेहमोय के घर में एक विधवा स्त्री संध्या अपने 8 बरस के बच्चे के साथ आती है, उस बच्चे के साथ स्नेहमोय का भावनात्मक लगाव फिल्म में खिलता है साथ ही संध्या की चुप चुप सी उपस्थिति में एक अलग सा खिंचाव है. रिश्तों के पेचोखम में उलझाये बगैर फिल्म प्रेम की सादगी को संभाले हुए आगे बढती रहती है.

इस ज़माने में जब वाट्सप पर फेसबुक पर सेकेंड्स में सन्देश जा पहुँचते हों, वीडियो कॉल के जरिये दुनिया के किसी भी कोने में बैठे किसी भी व्यक्ति से झट से कनेक्ट किया जा सकता हो उस दौर की प्रेम की कहानी को महसूस करना जब कि चिठ्ठियाँ खुदा की किसी नेमत ही मालूम हुआ करती थीं और डाकिया बाबू खुदा के बंदे लगते थे अलग ही अनुभव देता है. ट्रंक कॉल के पैसे जमा करना, कॉल न लगना या आवाज न आना, बात भी न हो पाना और पैसे भी लग जाना, आँख भर-भर चिठ्ठी का इंतजार करना और चिठ्ठी मिलने पर सुख से छलक पड़ना. प्रेम में मिलने का अपना महत्व है लेकिन यह प्रेम कहानी लौंग डिस्टेंस रिलेशनशिप की कहानी एक अलग ही परिभाषा गढ़ती है प्रेम की. प्रेमी जो कभी मिले नहीं उनके प्रेम की प्रगाढ़ता किस तरह फिल्म में खिलता है इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. फिल्म के दृश्य, बारिश, जंगल, नदी सब प्रेम को कॉम्प्लीमेंट करते हैं.

मुझे इस प्रेम कहानी का अंत और भी खूबसूरत लगता है हालाँकि इसके अंत से काफी सारे व्यावहारिक लोग असहमत हो सकते हैं लेकिन चूंकि प्रेम की शुरुआत और अंत सिर्फ प्रेम है किसी घटना का कोई आकार लेना नहीं इस लिहाज से इस कहानी का अंत कुछ भी होता इसे इतना ही खूबसूरत होना था. टिपिकल बॉलीवुड अंत से इसे बचाकर अच्छा ही किया है अपर्णा सेन ने. 15 बरस का प्रेम और एक भी मुलाकात नहीं...झर झर झरते आंसुओं के बीच इस प्रेम कहानी को देखना मैं कभी भूल नहीं पाती.

राहुल बोस मेरे प्रिय कलाकार हैं उन्होंने इस बार भी मोहा है लेकिन फिल्म के अन्य कलाकारों राइमा सेन, मौसमी चटर्जी और Chigusa Takaku ने भी अच्छा अभिनय किया है. अनय गोस्वामी की सिनेमोटोग्राफ़ी कमाल की है.

Friday, September 14, 2018

बारिश का बोसा और सितम्बर


चुपके से दबे पाँव आता है सितम्बर
पीठ से पीठ टिका कर बैठ जाता है
झरनों का संगीत सुनाता है
ओढाता है
बदलते मौसम की नर्म चादर
उंगलियों में सजाता है हरी दूब से बनी मुंदरी
और मंद-मंद मुस्कुराता है मूँद कर आँखें

दूर जाती खाली सड़क पर रख देता है इंतजार
पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस

बारिश का बोसा देता है सितम्बर
पलकों पर रखता है सुकून की नींद के फाहे
सांसों की मध्धम आंच पर सेंकता है सीली ख्वाहिशें
मोहब्बत पर यकीन की लौ तेज़ करते हुए
धीमे से मुस्कुराता है सितम्बर

जिन्दगी को जिन्दगी बनाता है सितम्बर

Thursday, September 13, 2018

फेवरेट सिनेमा - बियोंड द क्लाउड्स


यह फिल्म मैंने हाल ही में देखी और यकीन मानिए इसका जादू उतरा नहीं अब तक. माजिद मज़ीदी की फिल्म कुछ ज्यादा ही उम्मीद से न देखी जाय ऐसा न होना नामुमकिन है. चिल्ड्रेन ऑफ हेवेन का असर तारी होने लगता है फिल्म देखने से पहले हालाँकि किसी भी फ़िल्मकार के लिए यह अच्छी बात नहीं कि इस तरह वो उम्मीद के बोझ से दब जाता है लेकिन बात अगर मज़ीदी की हो तो वो कितनी भी उम्मीदों को पंखों की तरह हल्का बनाना जानते हैं बोझ नहीं बनने देते. यह फिल्म फ्रेम दर फ्रेम बांधती है. मज़ीदी का निर्देशन अनिल मेहता का कैमरा और रहमान का संगीत इसे खूबसूरत अनुभव में ढालते हैं. इस फिल्म का जौनर डिसाइड करना थोड़ा मुश्किल है. इशान खट्टर की यह पहली फिल्म है लेकिन उन्हें देखकर कतई नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है. उनकी आँखें वादा भरी आँखें हैं कि निराश नहीं करूँगा. यह वादा उन्होंने हाल में रिलीज धड़क में बखूबी निभाया. बहन की भूमिका में मालविका ने भी बहुत अच्छा काम किया. 

मुम्बईया भाईगिरी, लड़ाई, झगड़ा, भागमभाग, हिंसा के बीच फिल्म किस कदर नरम मुलायम है यह इसे देखकर ही जाना जा सकता है. यह कहानी एक भाई और बहन की है. बड़ी बहन को रोज पति से पिटते देखते और खुद भी अपने बहन के पति से बेइंतहा पिटता वो नन्हा भाई एक दिन घर से भाग जाता है और बड़ा होकर ड्रग्स माफियाओं के साथ काम करने लगता है. हालाँकि इस सबके पीछे उसके मन में एक सुंदर जिन्दगी का सपना है. मन में बहन के लिए नाराजगी है जो जल्दी ही खत्म हो जाती है. नाटकीय मोड़ों से गुजरती फिल्म में बहन का जेल जाना, वहां दूसरी महिला कैदी के बच्चे से उसकी दोस्ती होना एक अलग ही मुकाम पर ले जाता है फिल्म को. मासूम से कुछ धागे देह पर तैरते महसूस होते हैं. इधर भाई बहन के साथ बलात्कार करने वाले के बच्चों के साथ है और उनके मोह में बंधने लगता है. मज़ीदी ने छायाओं और संगीत के साथ मासूम मुस्कुराहटों का खूबसूरत कोलाज रचा है. बादलों के पार सपनों की जो गठरी है उसका रास्ता दिखाया है. यह फिल्म साथ रह जाने वाली फिल्मों में से एक है. मुझे इस फिल्म में बच्चों के साथ फिल्माए दृश्य, दीवार का पेंटिंग में तब्दील होना, छायाओं में कहानियां बनना बेहद खूबसूरत लगा. और यह भी कि बचपन हर हाल में बचपन है उसे मुस्कुराने का पूरा हक है. 

Wednesday, September 12, 2018

फेवरेट सिनेमा- कभी अलविदा न कहना


'कभी अलविदा न कहना' जाने क्यों यह फिल्म मुझे काफी अच्छी लगी थी जबकि स्टार फेवरेज्म बिलकुल नहीं है इसका कारण.यह फिल्म रिश्तों के उन पेचोखम को खोलती है जो बेहद बारीक़ हैं और जिन पर समाज अभी भी ठीक से बात नहीं करता. शादी होती है क्योंकि शादी होनी होती है. प्यार वही है जैसा फिल्मों में देखा, किताबो में पढ़ा या दोस्तों से सुना. यह फिल्म इस देखे सुने के पार जाने का प्रयास करती है.

कोई बहुत अच्छा होगा तो उससे प्यार हो ही जायेगा यह भला किस तरह संभव है ठीक उसी तरह जैसे किसी से प्यार न होने का कारण उस व्यक्ति का बुराइयों से भरा होना भी क्यों जरूरी है. दो बहुत अच्छे लोगों में भी सब कुछ अच्छा, ठीक तथाकथित आदर्श होते हुए भी प्रेम का एलिमेंट मिसिंग हो सकता है लेकिन इस मिसिंग होने की समझ न तो व्यक्तियों में है न समाज में. अगर किसी से अलग होना है तो उसकी हजार कमियां सामने रखनी होती हैं और किसी का हाथ थामना हो तो उसकी हजार अच्छाईयां.जबकि मन का बावरा पंछी उस डाल पर जाकर भी बैठ सकता है जिसके फल उसे पसंद न हों. इस फिल्म में किसी को हीरो किसी को विलेन नहीं बनाया गया. शादी के पक्ष में बेमतलब के तर्क नहीं रखे गये. बस नहीं है तो नहीं है प्यार शादी में. कोई जबरदस्ती है क्या कि होना ही चाहिये क्योंकि पति अच्छा कमाता है, गुड लुकिंग है, केयरिंग है या पत्नी सुंदर है, डायनमिक है, इसी चश्मे से लोगों को, रिश्तों के देखने वाले समाज के लिए इस फिल्म को हजम करना आसान नहीं हुआ था.

यह फिल्म संवेदनशील होने वाले उस चश्मे से भी धूल पोछती है जहाँ हम अतिरिक्त केयर करके या ख्याल रखके भी एक अनमना सा बोझ डालते हैं साथी पर और अपने भीतर अनजाना सा सुपिरियटी कॉम्प्लेक्स पाल लेते हैं.

उस वक़्त भी इस फिल्म पर काफी बवाल हुआ था. हमने अख़बार में इस पर लम्बे समय तक परिचर्चा भी चलाई थी. बवाल होता भी क्यों न कि अच्छा घर, नाक नक्शा, खानदान, सैलरी देखकर रिश्ते तय करने वाला समाज जो है यह. और शादी के बाद कितनी भी सडन, घुटन, पीड़ा क्यों न हो भीतर शादी के फ्रेम को चमका कर रखने वाला समाज जो है यह. इस फिल्म ने मेरे लिहाज से इस तरह सोचने, देखने और महसूस करने की स्पेस की बात की थी.2006 में आई करन जौहर की इस फिल्म का संगीत भी अच्छा था.



Saturday, September 8, 2018

सवाल करना बड़ी ज़हमत है जो लोकतंत्र लेकर आता है- नवनीत बेदार

नवनीत बेदार को उनके नजदीकी यहाँ तक कि उनके गुरुजन भी अक्सर ‘बेदार साहब’ के नाम से बुलाते हैं | वो तब से साहब हैं जब वर्तमान वाले चर्चित ‘साहब’, ‘साहब’ नहीं बने थे | शाहजहाँपुर में पैदा हुआ यह शख्स न सिर्फ घनघोर यारबाज़ है बल्कि बेतरह लड़ाकू और पढ़ाकू भी | मुझे याद है जब बिलकुल कड़क कलफ लगे झक्क सुफैद कुर्ता-पायजामा पहने बेदार साहब से मैं पहली बार मिला था | वो जेएनयू का सतलज हॉस्टल था और बेदार साहब की धज जेएनयू के मिजाज़ से मेल नहीं खा रही थी | मैं किसी ‘इंकलाबी’ काम से ही यहाँ आया था | साहब को देख कर इन्कलाब से रिसाव शुरू हो चुका था | मैंने कहा ‘नमस्ते सर!’ और अपना परिचय दिया | साहब उठकर खड़े हुए...मेरी पीठ पर धौल मारी और कहा ‘चलो पहले चाय पीकर आते हैं’ फिर बेतकल्लुफ़ी से कहा ‘यार ये सर-वर मत कहा करो...सीधे नाम लेकर बुलाया करो!’ मैं अब समझ रहा था कि जेएनयू लिबास में नहीं मिजाज़ में बसता है | मैंने उनकी बात आंशिक रूप से मान ली और अब मैं उन्हें ‘नवनीत सर’ कह के बुलाता हूँ |- प्रियंवद अजात 

आप ही बताएं कि अगर ‘ख’ जो ‘क’ से सिर्फ 10 वर्ष छोटा है और ‘क’ की पैदाइश 1940 की है और ‘ख’ की 1950 की और किसी संवाद में ‘क’, ‘ख’ से कहे कि आप अभी बच्चे हैं तो इसे कैसे देखा जाए। जब मैंने इसे लोकतंत्र के संदर्भ में देखा और सवाल किया ‘कि क्या अपने से 10 वर्ष छोटे को बच्चा कहना लोकतांत्रिक है? तो इस पर कोई ‘प’ ‘फ’ ‘ब’, मुझको ही समझाने लगे कि आप अशिष्ट हैं और आप अभद्रता कर रहे हैं। जितनी आपकी उम्र है उतना समय तो क ने लिखते हुए बिताया है... वगैरह वगैरह। लगे हाथों उन्होंने जे. एन. यू को भी कोस लिया कि उस विश्वविद्यालय ने मुझ जैसे हीरे भी निकाले हैं। (यहां ये बताना कम जरूरी नहीं होगा कि ये ‘क’ ‘ख’ और ‘प’ ‘फ’ ‘ब’ सब निरे साहित्यिक जीव हैं और देखने में प्रगतिशील से लगते हैं। क तो कई जगह कोर्स में भी शामिल हैं। ‘ख’ और ‘प’ ‘फ’ ‘ब’ के भी कई उपन्यास और किताबें प्रकाशित हैं।) हमारी एक शिकायत ख से भी है कि उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया।

इस अनुभव से गुजरते हुये मुझे एक वाक्या याद आ गया। जे. एन. यू. के दिनों में एक मित्र के साथ पुरुषोत्तम अग्रवाल जी के यहां बैठा था, हम किसी चर्चा में मशगूल थे कि इसी दौरान एक मित्र ने बीए के विद्यार्थियों को ‘बच्चे’ कह दिया। मुझे याद है मित्र के इस सम्बोधन पर तुरंत पुरुषोत्तम सर ने नाराज़ होते हुए टोका और उसे समझाया कि लोकतंत्र में आप एक मतदाता हो चुके व्यक्ति को किसी भी हालत में बच्चा नहीं कह सकते। इस वाकये के कुछ दिन पहले ही स्कूल आफ सोशल सांइसेज़ में मैंने एक छात्र को अपने प्रोफेसर को नाम से पुकारते देखा था, मुझे उस वक्त एक छात्र का अपने प्रोफेसर का सीधे नाम लेना अजीब लगा। यह शायद इसलिए कि मेरे सामाजीकरण के दौरान मैंने अपने से बड़ों को पुकारते वक्त नाम के साथ जी,सर या भाई कहते ही पाया था। जब पुरुषोत्तम अग्रवाल सर से इस संदर्भ में और बातचीत हुई तो मुझे उस छात्र का अपने प्रोफेसर का नाम लेकर पुकारना भी समझ में आया और मन में लोकतंत्र की समझ भी कुछ मजबूत हुई ।

आज जब क, प फ ब के साथ संवाद की ये घटना घटी तो अपनी लोकतंत्र की समझ पर मेरा भरोसा थोड़ा और बढ़ गया। मुझे लगता है कि किसी को ‘बच्चा’ कहना एक बेहद गैरजिम्मेदाराना और सामंती सोच का परिणाम है। इसमें उम्र की दृष्टि से माने जाने वाले अवयस्क भी शामिल हैं। यहाँ बच्चा कहने के पीछे दो भाव छुपे नज़र आते हैं- एक- आपको अभी समझ नहीं है, आपने अभी दुनिया नहीं देखी है और आपको अभी बहुत कुछ (मुझसे) सीखना है। और ‘मैं’ जो आपको बच्चा कह रहा हूं, बहुत दुनिया देख चुका हूं और मेरे पास आपके सीखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन आप बच्चे हैं इसलिए आप मुझसे सीखने लायक भी नहीं हैं। या ये भी समझा जा सकता है कि आप अभी बहुत छोटे हैं मुझसे बात न करें। मुझे बात करने के लिए बराबर वाले चाहिए।‘ ये सब सामंती मानसिकता के व्यवहार हैं, बच्चे बड़ों के बीच में न बैठें, उनके कहे को सर झुकाकर मान लें, जबानदराज़ी तो बिल्कुन न करें। वरना पछताएंगे। (घर में तो ऐसे मौकों पर तुरंत पूजन भी शुरू हो जाता था।) और किसी बड़े ‘महान’ के विरुद्ध कुछ भी कह देना और सवाल पूछ लेना तो ब्लास्फेमी टाइप कुछ हो जाता है।

मेरी लोकतंत्र की इस समझ को और मजबूती मिली हमारे दूसरे साथी रोहित धनकर से। रोहित ने भी, जो मुझसे लगभग 20 वर्ष बड़े हैं हमेशा नाम से ही बुलाने को प्रेरित किया। लेकिन क्या करें अपनी सामंती परवरिश जो ठहरी कि ‘जी’ लगाए बगैर अपुन रोहित बोल ही नहीं पाए।

हां, तो दिगंतर में रहते हुए मेरी दो तरह की समझ बनी, एक- शिक्षा, जीवन के अनुभवों का ही विस्तार है। उससे अलग कोई अजूबी चीज नहीं है जो मिल गई तो आप विशिष्ट बन जाते हैं। आप अपने अनुभवों में ही कबीर, गांधी और जायसी को नहीं ढा़ल पाए तो पढ़ने-लिखने का कोई फायदा नहीं। दिगंतर में ही रहते समय ये भी समझा कि बच्चा पैदा ही सीखने के लिए होता है और जन्मते से ही सीखना शुरू कर देता है। और इसलिए किसी के अनुभव को कमतर कहना केवल इसलिए जायज़ नहीं हो जाता कि बाई चांस वो आपके बाद पैदा हुआ है। एक नागरिक के तौर पर एक बच्चे के और एक वयस्क के अधिकार बराबर हैं और लोकतंत्र यही सिखाता है। एक और बात, हमारे यहां बचपन और बच्चे को लेकर समझ काफी कच्ची रही है। उनकी छवियां अक्सर बड़ों के मिनिएचर या लघु रूप में देखी जाती रही हैं। बच्चे के अपने वजूद को दरकिनार किया जाता रहा है और माना जाता रहा है कि वह बड़ा होकर ही कुछ बनेगा। यानी अभी वह ‘कुछ नहीं’ के आस-पास ही है। बच्चा भी स्वयं को इसी तरह से देखने का आदी हो जाता है और अपने वर्तमान को तिलांजलि देकर अपने बड़ों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनने के प्रयास में जुट जाता है। हम सब वैसे ही कुछ-कुछ बने हैं और कुछ नहीं बन पाए हैं। हम अपने बड़ों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनने के प्रयास में न तो वो बन पाते हैं जो बड़े हमें बनाना चाहते हैं और न ही अपनी खुदी, अपनी स्वयं की इच्छा को बचा पाते हैं।

यहाँ एक और बात ध्यान देने की है कि आमतौर पर यह भ्रम है कि सीखने की प्रक्रिया में बड़ा ही छोटे को सिखा सकता है। क्योंकि छोटा तो अपरिहार्य रूप से बड़े से ज्यादा जान ही नहीं सकता, अत: उसके पास अपने से बड़ों को सिखाने के लिए कुछ हो ये संभव ही नहीं। ऐसे में एक बात और निकलती है कि सिखाई जाने वाली चीज़, जिस पर बड़े का ही अधिकार है, वह कुछ स्थायी किस्म की है और एक परम्परा से उसके पास आई है और थाती के तौर पर उसे अपनी अगली पीढ़ी को आगे देकर जाना है। यानि ज्ञान स्थायी है, परिवर्तनशील नहीं। और परिणामस्वरूप जो थाती के रूप में परम्परा से होकर आया है वही सही है और उसके अतिरिक्त सब कुछ गलत है और अस्वीकार्य है। ( शायद पीढ़ियों के बीच का गतिरोध ‘जनरेशन गैप’ इसी में जन्म लेता है)

दूसरी बात, सवाल करना एक और बड़ी ज़हमत है जो लोकतंत्र लेकर आता है। इसीलिए किसी सामंती समाज में सवाल करना अच्छा नहीं माना जाता। यदि आप अपने से बड़े से सवाल करते हैं या उनकी बात को टोकते हैं तो उसे जबान लड़ाना, बदजुबानी करना, अभद्रता और अशिष्टता कहा जाएगा। और अगर कहीं ये सवाल किसी ऐसे स्थापित व्यक्ति से हों तो समझो कि ब्लास्फेमी हो गई। कुछ लोग धर्म-ध्वजा लेकर आपके पीछे पड़ जांएगे और आपसे आपके शिजरे के साथ आपकी जड़ें खोद-खोदकर समूलोच्छेद करने को उतारू हो जाएंगे। ज़रा सोचिए ऐसा क्यूँ होता है? दरअसल, हमें स्कूल में भी सवाल करना नहीं बल्कि उत्तर देना सिखाया जाता रहा है और जो सवाल पूछे भी जाते रहे हैं वो सवाल भी बेहद कमज़र्फ किस्म के होते हैं, मानो सवाल केवल इसलिए पूछे जा रहे हैं कि अमुक परीक्षा में पास होना है। ज़ाहिर है कि जब सवाल पूछना सिखाया ही नहीं गया तो सवाल का पूछा जाना अशिष्टता और अभद्रता तो लगेगी ही। एक छात्र के रूप में हमें जो शिक्षक ने बता दिया बस वही अंतिम सत्य है, उसके न दांए देखने की जरूरत है और न बांए देखने की।

सवाल करना दरअसल परम्परा के प्रति एक अस्वीकार को दर्शाता है। इसका कारण भी शायद वह परम्परागत ज्ञान और उसका स्वरूप ही रहा हो जिसमें कतिपय कथनों के लिए कोई तर्क आवश्यक नहीं माना गया। जो कह दिया गया उसे मान लया गया। जब कभी हितों में टकराव हुआ और उसके लिए तर्क खोजे गये या उस पर सवाल पूछे गए, तो उसे वचन के प्रति विद्रेाह माना गया और उसे दबाने के प्रयास किए गए। इसके कई उदाहरण आपको साहित्य से लेकर धर्म-परम्पराओं में देखने को मिल जाएंगे।

अक्सर बड़ों के अगम्भीर व्यवहार को बचपना और मूर्खतापूर्ण व्यवहार को बचकाना कह कर खिल्ली उड़ाने के पीछे भी आप बच्चे के प्रति व्यस्क की हिकारत देख सकते हैं। यानि फिर वही भाव कि बच्चे तो गम्भीर और ज्ञान की बात करने वाले हो ही नहीं सकते। बच्चों के गीत और प्रार्थनाएं भी कुछ इसी तरह से पेश किए जाते हैं कि ‘ हम सब बच्चे हैं नादान’…… , स्वयं को मूढ़मति के रूप में स्थापित करते हुए ऊपर वाले से ज्ञान मांगा जाता है। हमारी परम्परा में नादानी और बच्चे एक दूसरे के पर्याय से लगते हैं।

ऐसे परिवेश में एक बार फिर से समझने की जरूरत है कि बच्चे को लोकतंत्र के जानिब से देखा जाए, परम्परागत नज़रिए को ताक पे रखते हुए।

पुन: बाद में चर्चा के अंत में ‘क’ ने स्वीकार किया कि ‘बच्चे हो’ जैसा मुहावरा अपना अर्थ खो चुका है।

नवनीत बेदार को मैंने हमेशा एक बेहद सरल, सादा और स्पष्ट इन्सान के तौर पर पाया है. बजरिये देवयानी मैंने नवनीत में एक दोस्त को पाया. नवनीत के साथ बैठना, बात करना इतना सहज होता है कि लगता है दुनिया में ऐसे लोगों की कितनी जरूरत है जिनके साथ आप इस कदर सहज हो सकें कि स्त्री पुरुष का भेद मिट जाए.  ऐसे ही एक मित्र हैं प्रियंवद. नवनीत के बारे में ठीक से बात कर पाने के लिए मुझे प्रियंवद ही याद आये. नवनीत का लिखा पहली बार 'प्रतिभा की दुनिया' में आया है लेकिन यह सिलसिला बनेगा इस उम्मीद से-- प्रतिभा 

Wednesday, August 29, 2018

खेल


यह एक खेल है इन दिनों
काफी लोकप्रिय होता खेल
हालाँकि नहीं हुई है अभी इस खेल की इंट्री
ओलम्पिक, एशियाड में

जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय का भेदभाव मिटाकर
सब इस खेल में शामिल हैं
न न, कैंडी क्रश या फॉर्म हाउस नहीं
इस खेल में इंटरनेट की दुनिया में
न शामिल लोग भी शामिल हैं
गरीब से गरीब भी
अमीर से अमीर भी

रोजगार नहीं?
कोई गम नहीं
घर में रोटी नहीं?
कोई बात नहीं
बच्चियों का बलात्कार?
ओह, दुःख हुआ
गाँव बह गये?
बुरा हुआ, कुदरत का कहर
केरल की बाढ़?
उफ्फ्फ...हम कर भी क्या सकते हैं
किसानों की आत्महत्या?
भई, इतना भी तूल मत दो इन घटनाओं को
कवियों और लेखकों की गिरफ्तारी?
उन्हह, वो इसी लायक हैं.

यही है वो खेल
एक हाथ का दर्द कम करने को
दूसरे हाथ में ज्यादा चोट देना
बुखार की शिकायत करने पर
कैंसर की बात छेड़ देना
एकता की बात करते करते
अलगाव के बीज बोना
धर्म और जातीय विभेद से लड़ने की तक़रीर पढ़ते-पढ़ते
और गहरी करते जाना खाई
संवेदना का जाप करते हुए
नफरत के हथियार पैने करते जाना
हिंसा और नफरत के इस खेल में
स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर, हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, शूद्र
शामिल करना सबको

यह सबको एक-दूसरे के प्रति नफरत से भर देने का खेल है

खिलाडियों की भीड़ है, भीड़ का उफान है
भीड़ का उत्साह देखिये इस खेल को खेलते वक्त
एक भी मौका चूक न जाए इसलिए वीडियो रिकॉर्डिंग मुस्तैदी से
फारवर्ड का अचूक अस्त्र और उत्साह बढ़ाता है खेल के प्रति

कुछ सड़क पर उतरकर खेल रहे हैं
कुछ न्यूज़ रूम में बैठकर
कुछ चौराहों पर,
कुछ चाय की गुमटियों पर
कुछ कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए खेल रहे हैं
कुछ दांत भींचते हुए खेल रहे हैं स्मार्ट फोन के स्क्रीन पर
फेसबुक पर भी हैं बहुत से खिलाड़ी

जो इस खेल में शामिल नहीं हैं
उनकी चुप्पी शामिल है इसमें

जो मुखर होकर इस खेल के विरोध में हैं
वो या तो गायब हो जाते हैं अचानक जादू से
या 'अपनी मौत का जिम्मेदार खूद हूँ'
की चिट्ठी लिखकर झूल जाते हैं फंदे पर
या घर के भीतर कोई अदृश्य जादूगर आकर
कर जाता है उनकी हत्या
बिना कोई सुराग छोड़े

इस खेल के नियम ऐसे हैं कि हत्यारों के खिलाफ
नहीं मिलते कोई सुबूत
और लेखकों, कवियों, छात्रों,
और इस खेल में न शामिल हुए लोगों के खिलाफ
सुबूतों का ढेर मिल जाता है

कुछ भी हो हिंसा और नफरत के इस खेल ने
समूचे देश को एक सूत्र में बाँध रखा है.

Friday, August 24, 2018

साथ


जब मैं जीने की बात करती हूँ
तब असल में मैं
बात करती हूँ, अपने जीने की ही
मेरी जीने की बात करना
क्यों लगता है तुम्हें
मेरा तुम्हारे विरुद्ध होना

जब मैं हंसती हूँ खुलकर, खिलखिला कर
तब तुमसे कोई बैर नहीं होता मेरा
न मेरी हंसी होती है तुम्हें चुनौती देने के लिए
सदियों की उदासी से
मुक्त होने की ख्वाहिश भर है यह हंसी
मेरी यह हंसी क्यों लगती है तुम्हें
तुम्हारे विरोध में उठा कोई स्वर

जब मैं चलती हूँ तेज़ क़दमों से
तुमसे आगे निकलने की कोई होड़ नहीं होती
तुम्हारे साथ होने के सुख से
भरने की इच्छा होती है मन में
पीछे चलते हुए नहीं पाया मैंने साथ का सुख
शायद नहीं पाया तुमने भी

सांसों में 'जीवन' पाना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ ही, तुम्हारे बिना नहीं
मेरे जीने की इच्छा से तुम डर क्यों जाते हो भला ?



Wednesday, August 1, 2018

बाइक राइडर गजेन्द्र रौतेला के कुछ रोमांचक एहसास

गजेन्द्र रौतेला पेशे से शिक्षक हैं मन से विद्यार्थी. मैंने उन्हें एक बेहद क्रिएटिव ऊर्जा से लबरेज और संवेदनशील युवा के रूप में जाना है. कक्षा में वे बेहतरीन प्यारे दोस्त जैसे शिक्षक होते हैं, कैमरा उठा लेते हैं तो न सिर्फ खूबसूरत नजारों को कैद करते हैं कैमरे में बल्कि खबरों का, सामजिक सरोकारों का आईना बन जाते हैं. माउंटेनिंग, बाइकिंग, ट्रेकिंग, उनके पक्के दोस्त सरीखे हैं. केदारनाथ आपदा का समय हो या हाल ही में साम्प्रदायिकता की चपेट में अगस्त्यमुनि को झुलसने से बचाने की कवायद, गजेन्द्र सबसे पहले हाजिर होते हैं. उनकी जो बात इन सबसे परे उन्हें खास बनाती है वो है उनकी सादादिली. वो अपने किसी भी काम का जिक्र सुनकर गहरे संकोच में धंस जाते हैं. गजेन्द्र ने अपना एक यात्रा संस्मरण 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए देकर 'प्रतिभा की दुनिया' का मान बढाया है.- प्रतिभा


पढ़ने लिखने की संस्कृति के बहाने बाईक राइड वाया अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग (9:45 AM)-गैरसैंण-भिकियासैंण-रामनगर-काशीपुर-APF संस्थान दिनेशपुर उधमसिंहनगर 7:30 PM

दिनांक: 21 जून 2018
कभी-कभी खुद से बातें करते हुए अपने आस-पास की चीजों को महसूस करते हुए बाइक राइड करना एक अलग एहसास देता है। गुजरते वक़्त हर जगह की सरसराती कहीं गर्म, कहीं ठंडी हवा उस जगह के एहसास को भीतर तक महसूस करा लेती है।लगभग दो दशक बाद फिर से अगस्त्यमुनि से दिनेशपुर(रुद्रपुर) तक बाइक से गुजरने का मौका मिला ।बहुत सी चीजों में बदलाव भी देखा तो राज्य बनने के बाद भी बहुत कुछ यथावत भी।लगभग 350 किमी की इस बाइक राइड में गैरसैंण को राजधानी बनने की आस लगाए भी देखा तो बंजर होते खेत और खंडहर होते घर भी। बहुत कुछ झकझोर भी गया तो कुछ उम्मीदें बढाते प्रयोग भी। रामगंगा के किनारे बसा गणाई चौखुटिया के आस पास के रुपाई होते सेरे (खेत) आज भी यही बता रहे हैं कि जहाँ स्वाभाविक रूप से संसाधन उपलब्ध हैं वहाँ लोगों ने इनका भरपूर उपयोग भी किया है। वहीं दूसरी तरफ देवभूमि कहे जाने वाले राज्य में प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर वृद्ध केदार भगवान भी वैसे ही उपेक्षित हैं जैसे हमारे समाज में भी वृद्धजन उपेक्षित हैं यह अद्भुत साम्य है जहाँ इंसान और भगवान में कोई फर्क नहीं दिखता।

भतरौजखान के आस-पास का इलाका राज्य बनने अट्ठारह वर्षों के बाद भी पानी के संकट से जूझ रहा है।महिलाएं और बच्चे अपनी दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा पानी की जद्दोजहद में लगा दे रहे हैं। पूरे रास्ते भर छोटे-बड़े डिब्बों के साथ बच्चे और महिलाएं पानी के लिए भटकते हुए दिख जाते हैं। जबकि भतरौजखान के आस-पास का पूरा इलाका गढ़वाल क्षेत्र के लगभग धनौल्टी जैसा ही है । यदि इसको भी एक टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित किया जाता तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी विकसित होते। भतरौजखान और मोहान के बीच का क्षेत्र कुछ छिटपुट बदलाव के बावजूद आज भी वैसा ही दिखता है जैसा राज्य बनने से पहले था। हाँ, कुछेक निजी पर्यटन व्यवसायियों द्वारा स्थापित कुछ अभिनव प्रयोग जरूर दिखाई दे जाते हैं।लेकिन दूसरी तरफ कभी उत्पादक रहे खेत और खंडहर होते घर हमारी आधुनिक जीवनशैली तथा पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी को बयां करती है। कभी अन्न उत्पन्न कर रहे इन बंजर खेतों में आज डिजिटल इंडिया के मोबाइल टावर उग आए हैं।यह नए उभरते भारत की एक बानगी भर है।यह भी सोचनीय है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य की जो सांस्कृतिक पहचान स्थापित होनी चाहिए थी अफसोस है उसमें आज भी हम बहुत पीछे हैं। अब देखना यह है कि इन खोखली हो चुकी जड़ों के सहारे ये दरख़्त कब तक बची -खुची मिट्टी के सहारे अपना अस्तित्व बचाये रख सकते हैं यह एक बड़ा प्रश्न है।


दिनांक : 26 जून 2018

स्थान : दिनेशपुर(रुद्रपुर) 5:30 AM-हल्द्वानी-भीमताल-भवाली-गरमपानी-भुजान-रिची-बिनसर महादेव(अल्मोड़ा)-भिकियासैंण-गैरसैंण-रुद्रप्रयाग-अगस्त्यमुनि (9PM)
दूरी लगभग 350 KM

अक्सर हम लोग किसी भी यात्रा की विशेष रूप से तैयारी और खास योजना बनाकर निकलते हैं । लेकिन कई बार इस तरह की योजनाबद्ध तरीके से की गई यात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण नए रास्तों की तलाश और नई जगहों को देखने की चाह में की गई आवारगी भरी यात्रा ज्यादा प्रभावी और यादगार हो जाती हैं।वैसे ही रही इस बार की मेरी 700 किमी की अकेले की बाइक राइड। एपीएफ के सौजन्य से 25 जून को सम्पन्न हुई 'पढ़ने लिखने की संस्कृति' के समागम के पश्चात 26 जून की सुबह 5:30 पर दिनेशपुर से वाया हल्द्वानी,भीमताल,भवाली पहुंचा तो डेढ़ दशक पुरानी यादें ताजा हो गई।

जिस सलडी में उस वक़्त गिने चुने कुछ ही कच्चे ढाबे थे वहां आज खूब सारे पक्के ढाबे दिखाई दे गए और चहल-पहल भी। भीमताल में कम होता पानी और चारों तरफ बड़े-बड़े होटलों की संख्या बढ़ते जाना मन में चिंता भी बढ़ा गई। भवाली का मेरा आशियाना जोशी जी की पीली कोठी भी कुछ उदास सी दिखी ज्यादातर बच्चे रोजगार के लिए बाहर ही हैं शायद इसलिए । कुछ देश में तो कुछ विदेशों में।यही हमारे पहाड़ की नियति है । चाहे वो गाँव हो या कोई कस्बा पलायन की मार सभी जगह है लेकिन इसका प्रभाव अलग-अलग दिखता है । जहां एक तरफ कस्बे वाले एक निश्चित अवधि में आते-जाते रहते हैं वहीं दूसरी तरफ सुदूर गाँव से गए वाशिंदे को अक्सर शहर निगल जाते हैं। भवाली के बाद गरमपानी में दुकानें तो बढ़ी हैं लेकिन जिस पानी के धारे के कारण गरमपानी को जाना जाता था वो धारा भी अब हमारी चेतना और संवेदनाओं की तरह लगभग नदारद ही है। जो धारा पहले सार्वजनिक था अब उसमें जितना भी पानी शेष बचा है पाइपों में कैद होकर व्यक्तिगत हो गया है।डर लगता है कि यह व्यक्तिगत होने का सुख किसी दिन खुद से बातें करने के लिए खुद की अनुमति ही न माँगने लगे ।भयावह होगा वह दिन तो।सोचिएगा जरूर।खैरना होते हुए रानीखेत का परम्परागत रास्ता चुनने के बजाय मैंने भुजान होते हुए भिकियासैंण पहुंचने का विकल्प चुना।अक्सर नए रास्ते आपको नए किस्म की चुनौती और एक नई दृष्टि भी देते हैं । भुजान से तीपोला सेरा,तुनाकोट सेरा,बगवान और विशालकोट गाँव होते हुए रिची पहुंचा।भुजान से कुजगड़ नाले के साथ-साथ चलते यह देखकर सुखद एहसास हुआ कि उस बीस -पच्चीस किलोमीटर के क्षेत्र में कुजगड़ के दोनों ओर सब्जी उत्पादन का शानदार काम हो रहा है। और उससे भी बड़ी बात यह कि वो भी सिर्फ स्थानीय लोगों के द्वारा।नेपाली मूल या अन्य कोई भी नहीं। मेरे लिए ये जानकारी किसी आश्चर्य से कम नहीं थी।अक्सर इस तरह की सब्जी उत्पादन का कार्य अधिकांशतः हमारे यहां नेपाली मूल के नागरिक ही करते हैं।तिपोला सेरा में सब्जी उत्पादक लाल सिंह जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि-"हमारे क्षेत्र में बाहरी मजदूर कोई मिलता ही नहीं है इसलिए सारा काम खुद ही करना पड़ता है। बीज-खाद आदि खैरना-गरमपानी से या फिर हल्द्वानी से ही लाते हैं और बेचते भी वहीं हैं।सरकार द्वारा न तो बेचने के लिए कोई सुविधा दी गई है और न ही खाद-बीज की ही।सब कुछ स्वयं ही व्यवस्था करनी पड़ती है । यहां तक कि नहरों की मरम्मत तक भी हमें ही करनी पड़ती है।सरकार की गिनती में ये कोई काम थोड़े ही न हुआ ।" लेकिन ये देखकर मैं भी हैरान था कि बिना पानी वाले उखड़ के खेतों में भी स्थानीय लोग उखड़ के अनुकूल सब्जी उत्पादन कर रहे थे। सलाम है ऐसी जीवट जिजीविषा के लोगों के लिए।मेरे लिए तो यह दृश्य एक तरह से आंखें खोलने वाला ही था।

उसके बाद विशालकोट के आस-पास किसी नवयुवक द्वारा लिफ्ट माँगे जाने पर कुछ दूरी के लिए एक नया साथी मिल गया।पूछने पर पता चला कि इस बार दसवीं पास कर ग्यारवहीँ में गया है और नाम है रोहित मिश्रा।वह राजकीय इंटर कॉलेज पन्तस्थली में है और अपने ममाकोट आया हुआ था और गाड़ी न मिलने के कारण परेशान था और जाना था बिनसर महादेव में चल रही पूजा और मेले में। रिची तक साथ आने के बाद मेरा भी मन हुआ कि क्यूँ न साथी का साथ पूरा निभाया जाए तो हम भी चल दिए साथ बिनसर महादेव के रास्ते पर अपने नौजवान दोस्त रोहित मिश्रा के साथ 8 किलोमीटर दूर बिनसर महादेव। बिनसर महादेव पहुंचते ही समझ आया कि वास्तव में यह कितना बड़ा मेला है।दो घण्टे मेले की रौनक देखने के बाद रिची में खाना खाने के बाद दस-बारह किलोमीटर चला हूँगा तो पिछली रात की अधूरी नींद जोर मारने लगी।सड़क किनारे दाहिने तरफ एक सुनसान सा वीरान पड़ा मंदिर एक सुकून भरी नींद के लिए सबसे बढ़िया विकल्प मिल गया तो वहीं एक-डेढ़ घण्टे की मीठी नींद सो लिए।ट्रक के तेज हॉर्न ने नींद में खलल डाली तो मन ही मन शब्दों से पवित्र कर दिया उसको भी । आखिर मंदिर का प्रभाव जो हुआ ठैरा।सुस्ताते हुए भिकियासैंण होते हुए गैरसैंण-कर्णप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए रात 9 बजे लगभग 350 किमी की बाइक राइड के बाद अगस्त्यमुनि घर पहुंचे।

इस दौरान यह समझ भी आया कि चाहे कुमाऊं हो या गढ़वाल क्षेत्र महिलाओं की घास-लकड़ी-पानी की दिक्कतें एक सी ही हैं।राज्य को बनाने में जिस मातृ शक्ति ने सबसे ज्यादा संघर्ष और यातना झेली राज्य बनने के 18 वर्षों बाद भी उन की मूलभूत समस्याएं जस की तस हैं।आदिबद्री के आस-पास किसी नवयुवती को घास की कंडी पीठ पर लादे बारिश की रुमझुम में सरपट स्कूटी में भागते देखा तो लगा कि आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल ऐसे भी हो सकता है।लेकिन जिनके पास सीमित साधन हैं या फिर उम्रदराज ईजा-आमा हैं उनका क्या ? तो खयाल आया कि क्या 108 जैसी इमरजेंसी सेवा की तरह ही कोई घसियारी एक्सप्रेस जैसी कॉल 10.......जैसी सेवा शुरू नहीं की जा सकती ? अक्सर देखा जाता है कि सड़कों पर हमारी माँ-बहनें जंगल से घास-लकड़ी लाने के बाद थकी -हारी सड़कों पर किसी ट्रक-गाड़ी का इंतज़ार करते हुए घण्टों भूखे-प्यासे गुजार देती हैं।उसके बाद भी यदि कोई रहमदिल ड्राइवर हो तो गाड़ी रोक लेता है अन्यथा फिर सड़क की दूरी भी फिर पैदल ही नापना शुरू।ज्यादा नहीं तो कम से कम पहाड़ की रीढ़ कही जाने वाली इन माँ-बहनों के लिए सरकार का महिला एवं बाल कल्याण विभाग या फिर बहुत सारी निष्क्रिय पड़ी सहकारी समितियों के द्वारा इनके कार्यबोझ को कम करने की कोई कोशिश तो की ही जा सकती है।और यह काम कोई असम्भव जैसा भी नहीं क्योंकि अक्सर महिलाएं वक़्त चाहे कोई भी हो समूह में ही जाती हैं घास-लकड़ी लेने के लिए जंगल।जब इनके द्वारा लाये गए घास से पल रहे जानवरों के दूध के कलेक्शन और बिक्री के लिए दुग्ध समितियां और गाड़ी हो सकती हैं तो इनके कार्यबोझ को कम करने के लिए 'घसियारी गाड़ी' क्यों नहीं हो सकती।सरकार बहादुर थोड़ा गौर जरूर कीजिए।और अगर आपके बस की बात न हो तो नाक पर हाथ रखकर जनता पर सेस लगाइए हमें खुशी होगी इसके लिए सेस देने पर।लेकिन करिये जरूर।
मेरा नई पीढ़ी के आवारा-घुमक्कड़ों से भी आग्रह है कि जहाँ तक सम्भव हो वे भी निकलें कभी कभार यूँ ही पहाड़ी रास्तों से अपने राज्य को जानने समझने और महसूस करने के लिए।पहाड़ के कठिन रास्ते होने के पूर्वाग्रहों से बाहर निकलिए और खोजिए-बनाइये अपने राज्य के नव निर्माण के नए रास्ते।तोड़ डालिए उन अवरोधों को जो आपके रास्ते की अड़चन बनें।तभी उत्तराखंड बनने की यात्रा भी सफल होगी ।अन्यथा हमारी आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी कि आखिर हमने अपनी जिम्मेदारी क्यों कर नहीं निभाई।