Saturday, May 12, 2018

माँ के लिए


अगर हम रोक सके हैं तुम्हें अपने हिस्से के सुख

हमारी खातिर सहेजने से
अपनी पसंद की चीज़ें
छुपाकर हमारे लिए रखने से
गर्म फुल्के खिलाने को देर रात तक जागने से

अगर तुम्हें नहीं भूलने दिया कि
खाने में क्या-क्या पसंद है तुम्हें
रंग कौन से खिलते हैं तुम पर
और गाने कौन से गुनगुनाती थीं तुम कॉलेज में
किस हीरो की फैन हुआ करती थीं तुम
तो शायद हम बचा सके हैं 'माँ' के भीतर
माँ के अलावा भी जो स्त्री है उसे

'निरुपमा राय मत बनो' कहकर
जब हम खिलखिलाते हैं न
तब असल में बदलना चाहते हैं
तमाम माँओं की त्यागमयी छवि
महिमामंडन वाली माँ के पीछे नहीं छुपाना चाहते हम
खुलकर जीने वाली,
अपनी मर्जी का करने वाली स्त्री को

तुम जब जीती हो न अपने लिए भी
तब खिलता है हमारा मन
जब तुम छीनकर खाती हो आइसक्रीम
तब लगता है कि बचा सके हैं हम अपनी माँ को
उसके भीतर भी, अपने भीतर भी

तुम रसोई से में पकवान बनाने से
ज्यादा अच्छी लगती हो, कैंडी क्रश खेलती हुए
बारिश में भीगने पर डांटते-डांटते खुद भीगते हुए
अच्छी लगती हो, गलत के खिलाफ लड़ते हुए
नाराज होते हुए कि 'चुप रहना किसने सिखाया तुम्हें
लड़ जाना हर मुश्किल से मैं हूँ अभी'

तुमने ही तो सिखाया
हर सफलता पर पाँवो को जमीं पर टिकाये रखना
जीना जी भर के और जीने देना भी
तुमने सिखाया तुमसे भी लड़ लेना कभी कभी
और मना लेना भी एक-दूसरे को

तुममें तुम्हारा बचा रहना ही हमारा होना है.

Friday, May 11, 2018

और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.


जिन्दगी में किसी ख़ुदा की जरूरत नहीं. ख़ुदा आया भी अगर तो दोस्त की तरह. साथ में चाय पी, गप्पें मारीं, एक दूसरे से गिले शिकवे किये लेकिन सजदे नहीं किये. क्योंकि मोहब्बत में या दोस्ती में हम सज़दे करते थकते नहीं, लेकिन किसी की ख़ुदाई के आगे घुटने कभी टेके नहीं. जो टेके होते तो जीवन शायद थोड़ा आसान हुआ होता. यानि जीवन का यूँ पेचीदा होना खुद चुना है और इस चुनाव पर फ़ख्र है. तो ऐ दुनिया के ख़ुदाओं, खुद को ख़ुदा समझने वालों, दोस्त बनकर ख़ुदा में तब्दील होने वालों, पतली गली से निकल लो क्योंकि हम मोहब्बत के सजदे में हैं.

दोस्त बन-बन के मिले, मुझको मिटाने वाले,
मैंने देखे हैं कई रंग जमाने वाले.

मैं तो इखलाक़ के हाथों ही बिका करता हूँ
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.

Wednesday, May 9, 2018

बेटी के नाम खत


ओ लाडली,

कोई ताकीद नहीं है यह 
बस एक बात है 
इसे सुनो सिर्फ बात की तरफ 
मानने के लिए नहीं, सोचने के लिए 

जो लोग डरायें तुम्हें 
उनसे डरना नहीं, 
भिड़ने को तैयार रहना 
ताकत जुटाना 
मजबूती से लड़ना और जीतना 
लेकिन बचाए रखना एक कोना संवाद का भी
कोमलता का भी 
हो सकता है उनके भीतर कोई दोस्त मिल जाए 
वो भय जो तुम्हें दिखा रहे थे 
उनका ही कोई भय निकले वो 
और अब तक हिंसक दिखने वाले 
दिखने लगें निरीह और मासूम 

जो विनम्रता और स्नेह से आते हों पेश 
उनसे मिलना मुस्कराकर 
करना बात मधुरता से 
भरोसा करना उन पर 
उनके कहे का रखना मान भी 
कहना अपना मन भी 
लेकिन बचाकर रखना एक संशय का कोना भी 
कि न जाने विनम्रता की परत
कब उतर जाए 
और स्नेह का कटोरा फूटा निकले 
उनके कोमल स्पर्श में कांटे उगते महसूस होने लगें 
खुद को महफूज रखने के लिए 
जरूरी है बचाए जाने 
थोड़े संशय और बहुत सारा भरोसा 

#बेटियां 



Tuesday, May 8, 2018

माँ


मां
वो मुस्कुराती कम है
बहुत कम
हंसती हैं कभी-कभार लेकिन
देखा नहीं कभी
मुरझाते हुए
उदास
निराश

उसे कभी प्रेम करते हुए
भी नहीं देखा
माथे पर किसी ममत्व भरे चुम्बन की
स्मृति नहीं
न याद है
हुलस के गले लगाना
न लोरी, न लाड

उसे रोते हुए भी कम ही देखा है
न देखा है शिकायत करते कभी
देखा उसे बस काम करते,
दौड़ते-भागते

जब वो परेशान हुई
तब और काम करने लगी
शिकायत हुई कोई
तो और काम
भावुकता ने रोकनी चाही कोई राह
तो और काम

मां एक मजबूत स्तम्भ है
बिना ज्यादा किताबों में सर खपाए
वो जानती है
जीवन के रहस्य
वो समझती
कि बुध्ध होना सिर्फ
आधी रात को घर छोड़ना नहीं
न जंगलों में भटकना भर

दाल  में संतुलित नमक डालना भी है 
दुनिया में प्रेम बचाए रखने सा महत्वपूर्ण काम

मां के पास
समष्टि का समूचा ज्ञान है
जल से पतला ज्ञान
मां अपने ज्ञान को
जीते हुए
धूप में बैठकर मटर छीलती है
बेवजह खुश होने पर लगाती हैं फटकार
यही होता है हमारे लिए माँ का प्यार.  

Thursday, May 3, 2018

क्या यह कोई यूटोपिया है ?

- प्रतिभा कटियार

सोचा था कुछ ख्वाब बुनूँगी, पालूंगी पोसूंगी उन ख्वाबों को. उनकी नन्ही ऊँगली थामकर धीरे-धीरे हकीकत की धरती पर उतार लाऊंगी. फिर वो ख्वाब पूरी धरती पर सच बनकर दौड़ने लगेंगे. नफरत का शोर थमेगा एक दिन कि लोग थक जायेंगे एक-दूसरे से नफरत करते-करते. बिना जाति धर्म देखे किसी के भी कंधे पर सर टिकाकर सुस्ताने लगेंगे. सोचा था एक रोज जिन्दगी आजाद होगी सबकी किसी भी तरह के भी से, और आज़ादी के मायने नहीं कैद रहेंगे कागज के नक्शे पर दर्ज कुछ लकीरों में. सोचा था कविताओं से मिट जाएगा सारा अँधेरा एक दिन और धरती गुनगुनायेगी प्रेम के गीत. नहीं जानती थी कि यह कोई यूटोपिया है, नहीं जानती थी कि ये ख्वाब देखने वालों की आँखों को ही ख़तरा होगा एक रोज. नहीं जानती थी कि जिन्दगी को सरल और प्रेम भरा बनाने का ख्वाब इतना जटिल होगा और उसे नफरत से कुचल दिया जाएगा.



हमारे सामने जो समाज है, जो आसपास से उठता धुआं है, यह जो मानव गंध है, हथियारों की आवाजें हैं, मासूमों की कराहे हैं, जुर्म हैं, जुर्म छुपाने के इंतजामात हैं वो किसने बनाये हैं आखिर? क्या हम सब इसमें शामिल नहीं हैं. हालात के प्रति निर्विकार होना भी हालात में शामिल होना ही है. अपने प्रति हो रहे जुर्मों को न समझ पाना भी एक समय के बाद अज्ञानता नहीं मूर्खता बन जाती है.



राजनीति से परे कुछ भी नहीं, मौन भी राजनीति है, बोलना भी. किस वक़्त मौन होना है किस वक़्त चीखना है सब राजनीति है, इस राजनीति को समझना जरूरी है. हर किसी को. कोई राजनैतिक दल नहीं होते कभी इंसानों के साथ वो खड़े होते हैं अपने दलगत स्वार्थों के साथ. उनकी भाषा,उनके जुमले, उनके आंसू, उनके वादे सब झूठ है, हमें खुद खड़ा होना एक दूसरे के साथ मजबूती से ठीक उसी तरह जैसे हम खड़े थे अंग्रेजों के खिलाफ. देश के भीतर के, अपने आसपास के और कई बार तो अपने ही भीतर के दुश्मन को पहचानना होगा हमें. कि अब नहीं तो कब आखिर?



यह हमारे बच्चों के लिए जरूरी है. उनके आज के लिए उनके आने वाले कल के लिए. कैसा आज दिया है हमने अपने बच्चों को, कैसा भविष्य रख रहे हैं हम उनकी हथेलियों में क्या हम सचमुच सोच नहीं पाते? क्यों हमारी आँखों में ठूंस दिए गए दृश्य ही हमारा सम्पूर्ण सत्य बन जाते हैं और हम उन जबरन दिखाए दृश्यों के आधार पर खून खराबे पर उतर आते हैं. इससे ज्यादा दुखद क्या होगा कि हमने दर्द का बंटवारा कर लिया है. एक धर्म का दर्द दूसरे धर्म के दर्द से बदला ले रहा है. ईश्वर सो रहा है बावजूद हमारे तमाम घंटे घड़ियाल बजाने के. अल्लाह भी खामोश है सब देख रहा है चुपचाप हालाँकि अज़ान की आवाज गूंजती है वक़्त की पाबंदी के साथ.



मुझे ये दुनिया नहीं चाहिए. मैं अपने बच्चों को डर के साए में घर से विदा नहीं करना चाहती, मैं नहीं चाहती कि मेरा बच्चा किसी भी तरह की किसी से भी नफरत के करीब से भी गुजरे, इन्सान ही नहीं पशु, पक्षी प्रकृति से भी उसे हो वैसा ही लगाव जैसा मुझे है उससे. क्या यह असम्भव है? क्या हम सब ऐसा नहीं चाहते? इसके लिए कोई कानून नहीं आएगा इसके लिए हमें अपने भीतर उतरना पड़ेगा. जबरन हमारे भीतर जो बंटवारे उंच नीच, धर्म जाति स्त्री पुरुष की खाइयाँ बना दी गयी हैं हमारे जन्म से ही उसे पहले समझना होगा, उसे पाटना होगा. कि जन्म सबका धरती पर हुआ है इस धरती को खूबसूरत बनाने और पहले से खूबसूरत धरती के सौन्दर्य को जीने के लिए. शुरुआत हमको ही करनी होगी खुद से. आइये, खुद से बात करना शुरू करें बिना किसी पूर्वाग्रह के...

Wednesday, May 2, 2018

नए ज़माने की नयी इबारतों के बीच


संवेदनायें बन गयी हैं मैनेजमेंट के कोर्स का चैप्टर
बाज़ार ने हड़प ली है मासूमियत, अल्हड़पन, मातृत्व जैसे शब्दों की नमी
बच्चे जानने लगे हैं कि मदद के बदले मिलते हैं नम्बर
लपकने लगे हैं वो ज़रूरतमंदों की मदद की ओर
मदद के लिए नहीं, नम्बरों के लिए

बचे रहें ज़रूरतमंद हमेशा
इसका इंतजाम करती है राजनीति
ताकि मददगार ऊंचे करते रहें कॉलर
जयकारे लगते रहें महान और दयालु लोगों के नाम के
और वोट बैंक सुरक्षित रहे

गरीबी' अब समस्या नहीं इम्तिहानों में आने वाले नम्बर है
सत्ताओं की झोली भरने वाला वोट है
वाद विवाद, प्रतियोगिता और निबन्ध का विषय है
कविताओं, कहानियों, उपन्यासों की ऊष्मा है
फ़िल्मी कहानियों की बासी पड़ चुकी स्क्रिप्ट है

शिक्षा रह गयी है डिग्रियों का ढेर
स्कूल कॉलेज बन चुके हैं कारखाना
ऊंची नौकरी, रुतबा और पैसा कमाने का

वैज्ञानिक डरते हैं काली बिल्लियों के रास्ता काटने से
गणितज्ञ बचाकर रखना चाहते हैं
गणित के डर से बना बाज़ार
अंग्रेजी ने झुका रखा है अन्य भाषाओं का सर
और हिंदी दिखा रही है अकड़ लोक की भाषाओं को


केबीसी ने हड़प लिया है ज्ञान का अर्थ
कि सूचनाओं का संग्रह नहीं होता ज्ञान
और जो होता वो ज्ञान तो जुए के खेल में न होता तब्दील


प्रेम अब बन गया है फैशन
फेसबुक, ट्विटर का प्रोफाइल स्टेट्स
कॉफ़ी हाउस की मुलाकातों का उबाल
फ़िल्मी दृश्यों में एक-दूसरे को खोजते हुए
सेल्फी से ब्रेकअप तक का सफर

दुःख किसी इश्तिहार सा टंगा है फेसबुक वॉल पर
प्रेम उमड़ा पड़ रहा है उबाऊ कविताओं में
रिश्ते दम तोड़ रहे हैं उफनती तस्वीरों के नीचे
मुस्कुराहटों के भीतर पल रहा है गहरा अवसाद

जेल जा रहे हैं देश और समाज के बारे में सोचने वाले
और देशप्रेम के शोर के बीच
सुरक्षा की मांग के लिए मार खा रही हैं लड़कियां

देश और समाज से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं पार्टियों के झंडों के रंग
कश्मीर अब अपनी खूबसूरती की लिए नहीं धारा 370 के लिए जाना जाता है
गाँव किसानों की समस्याओं, धान की खुशबू, गेहूं की लहक के लिए नहीं
फ़िल्मी दृश्यों या शादियों की थीम के लिए खंगाले जाते हैं


'सब कुछ ठीक है' के चुन्धियाए हुए दृश्यों के बीच
एक बच्चा मिट्टी पर उकेर रहा है कुछ सपने
कोई युवा अपनी जड़ों की तलाश में लौटता है अपने पुरखों के गाँव
कोई स्त्री याद करती है
कुँए पर पानी भरती बुआ और चाचियों के कहकहे
रहट की आवाज़, पुआल के ढेर और ताज़ा बनते गुड़ की खुशबू

(प्रभात खबर में प्रकाशित )

https://l.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fwww.prabhatkhabar.com%2Fnews%2Fnovelty%2Fpratibha-katiyar-prabhat-khabar-literature%2F1086893.html&h=ATNvbDhpgr_6NlhaHuEh_D05nPJby_mtFTVzZYAZ1WE7ejNdgD19JcCuj-pzDxeFWWCDEkMTTpCwpL29MhWrZ5-4Nk3iAvNWGPk-a0ZEdoLTUydWXkYo

हमारे बच्चों को किसी से कम मत समझिये



- प्रतिभा कटियार

उत्तराखंड में इस बरस एनसीईआरटी की किताबें चलेंगी. इस खबर के साथ ही समूचे उत्तराखंड में दो तरह की हलचल पैदा हुई. एक जिसमें थोड़ी एन्ग्जाईटी यानि थोड़ा तनाव था, कैसी किताबें होंगी, क्या होगा, कैसे मिलेंगी बच्चों को, क्या वो हमारे बच्चों के लायक होंगी, क्या हमारे बच्चे उन किताबों के लायक होंगे आदि दूसरी हलचल थी बाजार की जो इस फैसले से होने वाले व्यावसायिक नुक्सान के चलते आहत था, लेकिन एक तीसरे तरह की हलचल भी देखने को मिली जिसमें ख़ुशी और संतोष शामिल था कि ‘अरे वाह हमारे बच्चों को भी अब अच्छी किताबें मिलेंगी, वही किताबें जो प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के पास होती हैं.’ दरअसल यह तीसरी हलचल अक्सर पहली और दूसरी हलचल के नीचे अक्सर दब सी जाती है जबकि बदलाव की शुरुआत इसी हलचल से होनी है.

इस तीसरी हलचल में वो शिक्षक शामिल हैं जो सचमुच अपने बच्चों (स्कूल के बच्चों) को बेहतर नागरिक बनाना चाहते हैं, वो चाहते हैं कि किसी से कम न आंकें जाएँ उनके बच्चे, वो भी अवसरों का पूरा लाभ ले सकें क्योंकि उन्हें अपने बच्चों पर यकीन है कि वो योग्यता में किसी से कम नहीं हैं. अगर कोई फासला है उनमें और अन्य बच्चों में तो वो है हालात का, सुविधाओं का. जिसके लिए किसी भी सूरत से न वो बच्चे जिम्मेदार हैं न ही उनके माता पिता. इन्हीं हालात में, उन्हीं सीमित सुविधाओं (जिसमें भरपेट खाना न मिलना भी शामिल है) के बीच अगर कोई है जो इन बच्चों का हाथ थामकर उन्हें मुख्यधारा में चलने, दौड़ने और बेहतर जीवन जीने, सुंदर नागरिक बनाने में मदद कर सकता है वो है शिक्षक. ये वो शिक्षक हैं जो समझते हैं अपना दायित्व.

इन शिक्षकों को आप कभी यह शिकायत करते नहीं पायेंगे कि, ‘इन बच्चों को कोई सिखा नहीं सकता.’ ‘क्योंकि इनके माँ बाप घर पर ध्यान ही नहीं देते, हम कितना कर लेंगे’ ‘जब ये रोज स्कूल आते ही नहीं, तो इन्हें कौन पढ़ा लेगा’ ‘इनसे कुछ न हो पायेगा, कितना भी कर लो.’ इन नकारात्मक जुमलों को ये शिक्षक आसपास फटकने नहीं देते कि वो समझते हैं कि उनके सामने जो बच्चे हैं हो सकता है पूरी नींद लेकर ही न आये हों, हो सकता है उन्हें भरपेट खाना ही न मिला हो. वो जानते हैं कि स्कूल से जाने के बाद उन्हें परिवार के पोषण के लिए घर के कामों में मदद करनी होती है, खेतों में काम करना होता है, ठेला लगाना होता है, मजदूरी करनी होती है या कुछ और भी. ऐसे में अगर ये बच्चे स्कूल आ रहे हैं तो यह भी कोई कम महत्वपूर्ण बात नहीं है. ये शिक्षक बच्चों के अभिभावकों से बच्चों के घर पर न पढने की शिकायत नहीं करते बल्कि उन्हें आश्वासन देते हैं कि उनका बच्चा बाकी बच्चों से कम नहीं है, और जो परेशानी उसे सीखने में आ रही है उसे दूर करने की जिम्मेदारी खुद शिक्षक की है, अभिभावकों की नहीं.

ये शिक्षक लड़ जाते हैं उन लोगों से जो सरकारी स्कूल के बच्चों यानि ‘उनके बच्चों’ को जरा भी कमतर समझते हैं. ऐसे शिक्षकों का होना कोई यूटोपिया नहीं है, उनसे आप उत्तराखंड के तमाम स्कूलों में मिल सकते हैं. मेरी मुलाकात तो खूब होती रहती है, और मैं इन मुलाकातों को याद रखती हूँ. हाल ही में देहरादून जिले के डोईवाला ब्लॉक में ऐसे शिक्षकों के एक समूह से मिलने का अवसर हुआ. मौका था एनसीआरटीई की किताबों की समीक्षा का. जो दरअसल समीक्षा से ज्यादा उन किताबों से रू-ब-रू होने का अवसर था. शिक्षकों ने पूरे दो दिन लगाए और किताबों को ठीक से उल्टा-पुल्टा पढ़ा, समझा वह भी लर्निंग आउटकम के सापेक्ष कि आखिर ये किताबें शिक्षा के उन उद्देश्यों के कितने करीब हैं जो इनसे अपेक्षित हैं.

शिक्षक पूरे मनोयोग से किताबों में डूबे रहे, चर्चाएँ की, कुछ नोट्स बनाए, कुछ चीज़ें बिन्दुवार नोट कीं. अंत में जब अनुभवों की साझेदारी के दौरान कुछ शिक्षकों ने आशंका जाहिर की कि ‘किताबें तो बहुत अच्छी हैं लेकिन शायद उनके स्कूल के बच्चे अभी इन किताबों की योग्यता नहीं रखते’ तो तीसरी हलचल यानी सकारात्मक सोच वाले तमाम शिक्षकों ने लगभग मोर्चा ले लिया कि उनके बच्चों को कमतर न समझा जाय. उन्होंने स्पष्ट कहा, ‘एनसीआरटीई की किताबें हर लिहाज से बेहतर हैं और यह ख़ुशी की बात है कि उनके बच्चों को ये किताबें मिलने वाली हैं. हो सकता है पहले साल किताबों से रिश्ता बनाने में शिक्षकों और बच्चों दोनों को थोड़ी ज्यादा मशक्कत करनी पड़े लेकिन बहुत जल्द रिदम बन जायेगी.’ सवाल उठे कि ‘इन किताबों में राज्य के संदर्भ नहीं है, लोक से जुड़ाव नहीं है’ जिसके जवाब में शिक्षकों ने खुद कहा कि, ‘कोई भी पाठ्य पुस्तक एकमात्र जरिया नहीं होता पढ़ाने का. इसमें मौजूद किसी भी पाठ को स्थानीय संदर्भ से जोड़कर शिक्षक पढ़ा सकते हैं. किसी अन्य पठन सामग्री की मदद भी ले सकते हैं.’

एक सवाल उठा कि, ‘हमारे यहाँ के बच्चे तो अभी ठीक से हिंदी नहीं पढ़ पाते ऐसे में उन्हें अंग्रेजी कैसे पढ़ाई जायेगी’ जिसका जवाब भी वहां मौजूद शिक्षकों ने ही यह कहकर दिया, ‘अगर हम शिक्षक ठीक से प्रयास करेंगे अपने बच्चों पर भरोसा करेंगे तो वो हिंदी और अंग्रेजी सब सीख जायेंगे.’ बातचीत का अंत हुआ इस वाक्य के साथ ‘हमारे बच्चों को (सरकारी स्कूलों के) किसी से कम मत समझिये.’

यह सारी बातचीत शिक्षकों के बीच की है जिसमें पहली हलचल यानी नकारात्मक भाव लगभग अलग-थलग पड़ चुका था. यह संवाद इतना सुंदर और इतना आशावान था कि इसके आगे सारी नकारात्मकताएँ औंधे मुंह गिरी पड़ी थीं. जिन शिक्षकों को अपने बच्चों पर इतना भरोसा है उनके रास्ते में भला कौन सी अडचन आ सकती है बस कि इस तीसरी हलचल यानी सकारात्मक प्रयासों की, सकारात्मक सोच की हलचल को और तेज़ करना है, दूर तक इसका विस्तार करना है.

Thursday, April 26, 2018

‘क' से कविता की अल्मोड़िया चाल


‘​क से कविता’ आयोजित करने वाले भी भली—भांति जानते हैं कि वह अचानक नए लोगों को खड़ा कर रही है। दरअसलए उत्तराखंड की जमीन में मौजूद साहित्यानुराग की उर्वर शक्ति ही इसकी बुनियाद बनाती है। लोग हैं इसलिए वे कविता को आमंत्रित करते हैं.
उत्तराखंड के सभी जनपदों में ‘क से कविता’ मंच गठित
- भास्कर उप्रेती 

आख़िरकार अल्मोड़ा नगर में 25 मार्च को ‘क से कविता’ की शुरुआत हो गयी. शुरुआत भी एक मुकम्मल शुरुआत. इधर ‘क से कविता’ ने ‘ए’ से शुरू होने वाले अल्मोड़ा में अपना परचम लहराया, उधर महान कविताफरोश सुभाष रावत ने लंबी और गहरी साँस ली। उन्होंने जब गहरी संतोष भरी साँस ली तो हम सब कविता प्रेमियों को भी अपनी खुदी पर नाज हो आया. क्यों न होता ? उत्तराखंड ऐसा प्रदेश बन गया था, जहाँ अब हर जिले में कविताएं हो रही थीं। फ्रीफंड की कविताएं. मार्च के महीने में साहित्य के कई मठों में कवियों पर खूब फंड उड़ेला जाता है। यहाँ जनता अपना प्यार कविताओं पर उंडेल रही थी।

कविता कहने के लिए लोग घरों से निकल पड़ते हैं या कविताओं को होस्ट करने के लिए घरों में बुलाते हैं। कवि समाज के लोग नहीं, यह लोग हैं फकत कविताप्रेमी लोगण् जोअपनी नहीं दूसरों की कविताएं पढ़ते हैं. वे जगह—जगह की कविताएं पढ़ते हैं। लोक की कवितायेँ, जन की कवितायेँ, हिंदी की कवितायेँ, भारतीय भाषाओं की कवितायेँ, विश्व भाषाओं की कविता। नारी कविता, दलित कविता, गोरी कविता, काली कविता।

कोई भी पूछना चाहेगा कविता क्यों? कविता ही क्यों
मगर हमने इस सवाल का उत्तर कभी नहीं तलाशना चाहा कविता को खुद बताने दो।

सुभाष भाई पिछले दो साल से अपने सपने को लेकर हर शनिवार दिल्ली से भागे चले आते हैं। कभी पिथौरागढ़, कभी अगस्त्यमुनि तो कभी उत्तरकाशी। 1994 में उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान उनकी थियेटर टीम ने एक नाटक जगह—जगह किया था। उसका नाम था मिशन 2020। नाटक एक प्रदेश के रूप में अवतरित हो रहे उत्तराखंड की खूबियाँ बताता था। उत्तराखंड बना नहीं था, उसे बनना था। लेकिन, उस समय उसके बीज जिस भांति अंकुरित हो रहे थे, उससे शेक्सपियर के जूलियट सीजर नाटक सी डरावनी ध्वनियाँ गूँज रही थीं। आज का उत्तराखंड वही है जो कला दर्पण का नाटक भविष्यवाणी में कह रहा था। मगर, ऐसा ही उत्तराखंड चाहिए था हमें।

हमें तो रामगढ़ की चोटी पर बैठे टैगोर वाला उत्तराखंड चाहिए था। हमें महादेवी का उमागढ़ वाला उत्तराखंड चाहिए था। हमें चंद्रकुंवर बर्त्वाल वाला हिमवंत चाहिए था। हमें लैंसडाउन की उकाव से उमड़ते नागार्जुन के घिरते बादल चाहिए थे। हमें स्वामी मन्मथन और प्रो. डी.डी. पंत के सपनों का विश्वविद्यालय चाहिए था, गिर्दा का ‘धुर जंगल फूल फूलो यस जतन करुलो’ और ‘हाँ न पटरी माथा फोड़े ऐसा हो स्कूल हमारा’ वाला प्रान्त चाहिए था। उसमें गुमानी के ‘काफल’ चाहिए थे, मोहन उप्रेती के हुड़के की थाप होनी थीं। घाटियों और धुरों में पंडित उदयशंकर का आलाप सुनाई पड़ना था। मगर हो न सका।

जो था और है वह है पस्ती थियेटर ठप, जनगीत चुप, लेखक गायब, कवि लापता। पत्रकार पतित, शिक्षक गैर—हाज़िर। दोष किसको ? सरकार का सरकार जिसके बारे में सब कहते हैं उनकी हो नहीं सकती, उनके लिए कुछ कर नहीं सकती।

बातें थीं, चिंताएं थीं। शोक था, विलाप था, मगर पहल नहीं थी। पहल करें भी तो करें कैसे? तानाशाह का भय कंपित करता था। चेतन, अर्द्धचेतन, अवचेतन सब एक नियति के शिकार।

इसी बीच देहरादून में कुछ प्राणियों ने एक यूटोपिया रचा। जैसे शमशेर कहते थे न ‘कविता न सही’ हाथ की छटपटाहट ही सही. बैठे—ठाले इन प्राणियों को सपना आया. ‘प्रतिरोध न सही, कविता ही सही. कविता होने लगी। देहरादून से यह हल्द्वानी पहुँची। फिर उत्तरकाशी, टिहरी, श्रीनगर, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, रुद्रपुर, खटीमा, लोहाघाट, रुड़की, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अब अल्मोड़ा, अल्मोड़ा ‘अ’ से और ‘ए’ से शुरू होता है, लेकिन अल्मोड़ा को शुरू होने में थोड़ा टैम लग गया।

पाश कहते हैं न, ‘सपनों के लिए लाज़िमी है झेलने वाले दिलों का होना’ कविता के सपने उन्हें कैसे आएंगे जो कभी बेचैन नहीं होते। लेकिन रेत में अपनी मुंडी घुसेड़ देने से तो अच्छा है कविता ही पढ़ लें। अपनी बेचैनी को कोई ठौर तो मिले. दुनिया से रुखसत होते हुए यह तो कहा जा सकेगा कि नहीं बदल सके हम दुनिया यारो, मगर हमने सपनों के बीज तो जगह—जगह फेर दिये. सपने बचे रहेंगे तो बदलने की भी कूबत बनी रहेगी।

खैर थोड़ी सी बात ‘क से कविता’ की अल्मोड़िया चाल की। 25 मार्च की सुबह नौकरी के काम से मैं रुद्रपुर के कॉर्बेट इन में पड़ा हुआ था। पता नहीं किस गरज से मैंने कमरे की चिटकनी नहीं लगायी। सुबह के खर्राटों में मेरे मोबाइल की चीख उठी। किसी तरह सिकुड़ते—सिकोड़ते हुए मोबाइल उठाने को होता हूँ तो खुली आँखें अचंभित हो उठती हैं। मेरे सामने एक स्मार्ट सा आदमी अपनी दंतमाला खोले मुस्कान बिखेर रहा था। मन से एक आवाज आई. ओह यह कविता का विदूषक! जी हाँ कविताफरोश सुभाष रावत वह और पहले आ चुके थे. फ्रेश हो चुके थे। अब हाज़िर हो रहे हैं।

शायद यह बात उन्होंने निम की ट्रेनिंग में सीखी होगी। सीधे रिपोर्ट करते हुए कहते हैं—जी हाँ हम पहुँच चुके हैं। हेम पंत कुछ ही मिनटों में हाज़िर होते होंगे। हम ठीक 6 बजे यहाँ से रवाना हो जायेंगे। मेरे मन से आवाज आई— ‘यह साँचे में ढला हुआ आदमी कैसे कविता का आदमी हो गया। ‘कविता का आदमी तो शर्तिया बेतरतीब होना चाहिए। बहरहाल हेम भी उस समय प्रकट हो गए। वो भी इनसे कम नहीं हैं। सुभाष दा चलो लेट नहीं होना है। 10 बजे शुरू हो जाएगा।

मुझे याद आया कि बीते दिन यह योजना बनी थी कि अल्मोड़ा में ‘क से कविता’ करने के लिए सुभाष दा और हेम रानीखेत के बाटे अल्मोड़ा पहुँचेंगे। अल्मोड़ा में नीरज भट्ट जी—जान से कविता कराने को जुटे हुए हैं। मैंने दोनों को शुभकामनाएं दीं, ‘कविता का अंतिम किला’ फतह करने के लिए। अंतिम इस मायने में कि अब तक 12 जिलों में ‘क से कविता’ होने लगी थी।

मेरे खाप में लटपटी नींद चपड़—चपड़ कर रही थी। मैं सोने की कोशिश करने लगा मगर तभी पता नहीं क्यों मृणाल पाण्डे की किताब का टाइटल मेरे जेहन में गूँज पड़ा। ‘ओ रे अल्मोड़ा’। मैं अचकचाकर बैठ गया। मैंने मोबाइल से सुभाष दा को धात लगायी, मुझे भी ले जाओ, मेरा मन भी आने का कर रहा है। वहां से दोनों खितखित करने लगे। देखा कविता का कमाल! मैं झटपट तैयार हुआ और हम कार में जा घुसे। सुभाषदा रोडवेज की बस से अब तक कविता—धर्म के प्रचार—प्रसार को गए हैं। पिछली दफा तो वे मेरी बाइक की पीठ पर बैठकर बागेश्वर पहुंचे थे। जहाँ से फिर भराड़ी पहुँच गए। फिर गरुड़—कौसानी होते हुए वापिस दिल्ली की बस में जा घुसे थे। हम उनकी बहादुरी की सान में धार लगाते रहे। मगर इस बार हेम ने तय किया था कि कविता के होलटाइमर को थोड़ा आराम के साथ कविता—स्थल तक ले जाया जाए।

मटकोटा मोड़ से गुजरते हुए हमें पहले पत्रकार जगमोहन रौतेला और फिर मीडिया—गुरु भूपेन सिंह की भी फाम हो आई। ‘चलोगे? पहले रानीखेत में उमेश डोभाल और फिर अल्मोड़ा की धार में कविता कौन भला ऐसा रोमानी सपन ठुकराए। जग्गू दादा बोले, यार वैसे तो फूफाजी की तेरहवीं हैं, लेकिन वहां भी चलूँगा तो ठीक ही हुआ। भुप्पी दा बोले ‘अरे मुझे डिस्टर्ब क्यों कर देते हो बार—बार, अब कह रहे हो तो जाना ही पड़ेगा। इस तरह हम पांच जन हल्द्वानी से हो गए। उस दिन तो ऐसा लग रहा था मानो किसी से भी कविता के लिए चलने को कहते चल ही देता।

रानीखेत में हम ख़राब वक़्त शुरूहोने से ठीक पहले पहुँचे। सौज्यू की बकेट पर बनी सुंदर और सार्थक कलाकृतियों को देख मन प्रसन्न हो उठा। ललित कोठियाल ने टीम हल्द्वानी की चिप लगाकर हम लोगों का ग्रुप फोटो खेंचा। सभागार में हालाँकि चारु तिवारी बोलकर निमा चुके थे। लेकिन शेखर दा मंद—मंद लौ में सुलगरहे थे। उत्तराखंड की दशा, दिशा, दृष्टि का समूचा—समग्र आख्यान। हमारा रिवीजन हो गया। उनसे तो एक ही बात सौ—सौ बार सुनने का मन करता है। राजदूत भंडारी जी जैसे ही संस्कृत का उच्चार करते हुए आये तो हमने बाहर निकलकर गढ़वाल के ओने—कोने से पहुंचे मित्रों से मिलने—भेंटने का लुत्फ़ उठाया। देहरादून से योगेश दा ‘भट्ट’ अपनी अदा के साथ आये थे। मनीष सुन्द्रियाल हमेशा की तरह मौजूद थे। व्योमेश जुगरान जी से सकल रूप में पहली भेंट थी। एक कोने से अपने 23 साल पुराने दगड़ीयों के साथ अरुण कुकसाल टिमटिमा रहे थे। महेश पाण्डेय जी और पी.सी. तिवारी जी की शिकायतों ने भी हमें और परिपूर्ण किया। अंदर पुरस्कारों का रेला शुरु हुआ। इधर से गीता गैरोला दीदी की टोली जीप भरकर आ धमकी। साथ में पंखुड़ी और सुमन केसरी। हम धन्य हुए। गीता दी जहाँ न पहुंचें वो कार्यक्रम ही क्या।

नीरज बार—बार समय से आने का अलार्म बजा रहे थे तो हम खिसक लिए। भूपेन सिंह को वहीं छोड़ना पड़ा क्यूंकि उन्हें मीडिया के हालातों पर कुछ जरूरी बात वहाँ रखनी थीं। कठपुड़िया में दाल—भात खाया। पहाड़ी खाना खिलाने की जिरह की मगर दाज्यू बोले कोई नहीं खाता सैप अब आप कह रहे होए लेकिन यहाँ के गिराक तो अरहर की दाल ही मांगने वाले हुए। छोटे स्टेशन के लिहाज़ से बहुत सारी खाने की दुकानें हैं यहाँ लेकिन सब के बाहर मोमो के ही चिट लटके हैं।

खैर हम थोड़ी देर में कोसी पुल की तारीफ करते—करते स्यालीधार पहुँच गए। अब जाकर कविता पर बात फोकस हुई। सुभाष दा का निर्देश हुआ नीरज को फोन लगाकर पूछो कितने आए। कितने वाला सवाल बहुत जरूरी था. अल्मोड़ा में कविता को कैसे देखा जाएगा जाने. इसी बीच हेम को कल्याण मनकोटी ने आने की इत्तिला दी. अब हम एक—एक क्षण में और सुनना चाहते थे। लोग जुड़ रहे थे, मगर कितने आएंगे टोटल धुंधलका था। हमने मित्र पुलिस की अनुपस्थिति देखकर माल रोड की बाइक पार्किंग में कार घुसेड़ दी और दौड़े—दौड़े जी.जी.आइ.सी. की सीढ़ियाँ उतरनी शुरू कीं ताने से अंदर देखा कुछ लोग थे। फिर हाल में पहुंचे ठीक—ठाक लोग थे।

नीरज को भी ठीक-ठीक नहीं पता था. कविता क्या बला है. हल्की बूंदाबादी शुरू हो चुकी थी पर हौले—हौले लोग बढ़ ही रहे थे। संख्या 25 पार हुई तो हमने सभा शुरू करने की घोषणा की। चेहरे के अंदर चेहरे पढ़ने में अल्मोड़यों का कोई सानी है ? धीर—गंभीर चेहरों के भीतर बैठा प्रश्नवाचक जानने को उत्सुक था कि आखिर ये क्या बेचने आये हैं और क्या भिड़ा के जाना चाहते हैं। इनमें दुकानदार थे, छात्र थे, शिक्षक थे, इंजीनियर थे समाजसेवी थे। नीरज जैसे अपरिभाषित युवा भी थे। टुकुर—टुकुर ताक रहे नीरज पंत जी को कुछ—कुछ आईडिया था प्रभात उप्रेती जी की सिफारिशी सूचनाओं की वजह से। मगर, बाकी सबकी आँखों में प्रश्न अधिक थे। हम थोड़ा तो ताड़ गए, यहाँ ऐसे ही दाल नहीं गलेगी।

अल्मोड़ा एक नाम नहीं एक विचार है

अल्मोड़ा हम सबके लिए उत्तराखंड के लिए और कहना चाहिए नार्थ इंडिया के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। और हम बेहद खुश हैं कि आज हम अल्मोड़ा में हैं। तने हुए चेहरे थोड़ा मुलायम पड़े। मगर क्या अल्मोड़ा में अल्मोड़ा है। हम पूछने आए हैं जिसे हम अल्मोड़ा नाम से जानते हैं, क्या यह वही अल्मोड़ा है। पी.सी. जोशी का अल्मोड़ा, हुड़किया वकील वाला, मोहन उप्रेती वाला। सुमित्रानंदन पंत वाला। गौरीदत्त पांडेय वाला। खुशीराम वाला ? वही अल्मोड़ा है जहाँ गुरदत्त को, जोहरा को और बलराज साहनी को पंडित उदयशंकर ने साधा था। निश्चित रूप से इस आक्रामकता से प्रश्नवाचक सामान्य मुद्रा में आ गए। हमने बताने की बजाय पूछने की कोशिश की। हमें अफ़सोस है अल्मोड़ा में कविता शुरू होने में वक़्त लग गया। मगर क्या कोई कविता अल्मोड़े के बगैर पूरी हो सकती है? हम इसीलिए यहाँ आये हैं।

सच में यह कोई पेंतरेबाजी वाला मामला नहीं था। हमें वाकई जानना था कि वो अल्मोड़ा जिसे दुनिया जानती है, आज इतना चुप क्यों है। वीर बालकों के जोखिमों वाला अल्मोड़ा इतना नपा-तुला क्यों है ? इस शुरुआती बातचीत के बाद हम सब एक धरातल पर थे। हम यह मान रहे थे कि अल्मोड़े को चुप नहीं रहना चाहिए और समय आ गया है कि अल्मोड़ा बोले. सबको जगाने वाला अल्मोड़ा आज चुप नहीं रह सकता। सुभाष दा ने कविता कविता की घंटी बजायी और उधर अल्मोड़ा की आवाज सुलगने लगी। पहले धीमी—धीमी, फिर मध्यम और फिर गगन हिलोर कर।

नीरज पांगती से सुनाना शुरू किया। पांगती ने पाश की ‘सबसे खतरनाक’ सुनाई. महेंद्र ठकुराटी ने मीरा के छंद गाये। नीरज पंत ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ‘तुम सोचते होगे’ और बल्ली सिंह चीमा की ‘भूख से लड़ते हुए इंसान’ पेश की। मनीष पंत ने योगेश की कविता ‘नहीं दवाई अम्मा’। मोतीप्रसाद साहू ने अवध बिहारी श्रीवास्तव की ‘मंडी चले कबीर’, चंद्रा उप्रेती ने महाश्वेता देवी की ‘आ गयी तुम’, ललित योगी ने जयशंकर प्रसाद की ‘सब जीवन बीता जाता है’ सुनाई। राजेंद्र भट्ट ने गिर्दा की ‘ततुक नी लगा उदेख’ गाई तो हेम ने हीरा सिंह राणा की ‘लस्का कमर बाँधा’ गाई. दीपा गुप्ता ने हरिवंशराय बच्चन की ‘दिन जल्दी जल्दी ढलता है’, प्रतिभा ने देवल आशीष की ‘प्रिय तुम्हारी सुधि को मैंने’, नीरज भट्ट ने चंद्रकुंवर बर्त्वाल और दुष्यंत कुमार, जगमोहन रौतेला ने मदन मोहन डुकलान, भास्कर ने केदारनाथ सिंह की, सुभाष रावत ने कैश जौनपुरी की ‘मैं नमाज नहीं पढूंगा’ सुनाई। लक्ष्मी आश्रम कौसानी से आई मीनू ने अपने मधुर कंठ से ‘मैं तुमको विश्वास दूं, तुम मुझको विश्वास दो’ गाकर सभी के कंठ को समवेत कोरस में बदल दिया. खैर 28 जनों में से 25 ने कविताएं पढ़ीं और अल्मोड़ा में ‘क से कविता’ का शानदार आगाज हो गया। अलग-अलग तेवर और कलेवर की कविताएं सामने आयीं. यह खुद से या समूह के विवेक से ही हो गया कि इसमें भिन्नता और विविधता को जगह मिल पाई।

‘क से कविता’ के कुछ नियम बनाये गए हैं या कहें वह नियम नैसर्गिक रूप से विकसित होते गए हैं। सुभाष ने बताया कि अपनी नहीं, अपने दोस्त की नहीं, अपनी पसंद की बड़ी कविता यह पहली शर्त है। दूसरा, किसी भी बैठक में कोई अध्यक्ष नहीं, कोई विशेष नहीं। बराबर सभी सम्मानीय। तीसरा, एक व्यक्ति की एक ही कविता। चौथा, जगह ऐसी चुनें जो सबको भाये। जहाँ सब आना पसंद करें। उन्होंने बताया कि कविता को लिखकर या प्रिंट कराकर साथ लायें। कविता स्थल पर पहुंच कर कविता ढूंढना कविता की गंभीरता को कम करता है। एक नियम यह भी बताया गया कि समूह में यदि कोई बड़ा कवि भी है तो भी उसकी कविता कोई और नहीं पढ़ सकेगा। हाँ कवि की अनुपस्थिति में उसकी कविता लायी जा सकती है. मीडिया में छपने—छपाने की रस्म से बचा जाएगा। मीडिया को जब तक खुद इसे कवर करना जरूरी न लगे, तब तक कोई मीडिया के पास नहीं जायेगा। कविता को साहित्यिकों और उनके संस्कारों से बचायेंगे।

हल्द्वानी की पहली बैठक में एक विचित्र अनुभव हुआ था. कार्यक्रम में थोड़ा विलंब से आये तारा चन्द्र त्रिपाठी और अनिल भोज ने अचानक अपनी कविताएं पढ़ना शुरू कर दीं। बीच में किसी ने आगाह किया कि यहाँ अपनी कविता पढ़ने का नियम नहीं हैं, तो दोनों वरिष्ठजन रुष्ठ हो गए। तब किसी ने कहा, अरे चलेगा, एक आध तो चल सकती हैं, सीनियर आदमी हैं। तब सुभाष ने कड़ा स्टैंड लेते हुए कहा कि बिल्कुल नहीं चलेगी। नहीं लाये हैं तो कोई बात नहीं। सुन भी तो सकते हैं। बाकी लोग लाये हैं, उन्हें सुनेंगे। उस दिन हल्द्वानी में सुभाष दा का यह स्टैंड कईयों को थोड़ा अखरा तो सही, लेकिन आगे इसने हमारी बड़ी मदद की। हल्द्वानी में ही नहीं और जगह भी। लोगों को खासकर साहित्यिकों को अपनी कविता सुनाने की आदत हो गयी है। यह आदत डी.एन.ए. में ही शामिल हो गयी है। इस आदत ने कविता का बड़ा नुकसान किया है। ‘क से कविता’ आंदोलन के इन नियमों की वजह से कई बार बड़े कवियों की प्रतिभागिता से वंचित रहना पड़ता है। लेकिन वह यदि दूसरे की कविता सुनने नहीं आ सकते, ऐसा कलेजा नहीं रख सकते तो हम उनसे वंचित रहना ही पसंद करते हैं। इसका बड़ा लाभ यह हुआ है कि कविता का संकुचित लगने वाला दायरा अब काफी चौड़ा गलियारा बन गया है। शुरुआत में लोग अपनी पाठ्य पुस्तक के ज़माने वाली कविता भी ले आते हैं। फिर कॉलेज के दिनों की रोमानी कविता और शायरियां। कुछ लोग जिनका साहित्य की दुनिया से कम एक्सपोजर रहा होता है, भजन—कीर्तन टाइप भी ले आते हैं। लेकिन धीरे—धीरे कविता की तलाश शुरू हो जाती है. घर में मौजूद सामग्री कम लगने लगती है. समूह में आई एक भी अच्छी कविता लोगों को अपनी रुचि का परिष्कार करने के लिए प्रेरित करती है। फिर अच्छी से अच्छी कविता लाने की होड़ मच जाती है। इस परिष्करण के लिए किसी आलोचना, समालोचना, सौन्दर्यबोध या प्रवचन की जरूरत नहीं पड़ी। लोग बिना कहे खुद के विवेक से समझते जाएँ, यही सबसे बढ़िया समझ है।

‘क से कविता’ का पहला साल पूरा हुआ तो प्रदेश भर के कविता प्रेमी मार्च 2017 में दून विश्वविद्यालय, देहरादून में एकत्र हुए थे। एक बड़ा जलसा हुआ था। जैसे अपने शहर में हम अपने आप से आते हैं, वैसे ही वहां भी पहुंचे। ‘​क से कविता’ आंदोलन को एक शक्ल देने में जुटी रही प्रतिभा कटियार और गीता गैरोला ने इस आयोजन को कविता के बड़े उत्सव के रूप में कल्पित किया, यहाँ से मिली ऊर्जा ने इसे नई—नई जगहों में फ़ैलने की प्रेरणा दी। देहरादून में अब तक लगातार 25 बैठकें, जबकि हल्द्वानी—रुद्रपुर में 18 बैठकें हो चुकी हैं।

कुछ जगहों पर लोगों ने इसके अपने फॉर्मेट भी बनाए हैं। जैसे किसी कविता को मंचित करके प्रस्तुत करना या किसी बार एक ही कवि की अनेकों कविताएं पढ़ना। या सबके द्वारा किसी महाकाव्य के अंश पढ़ना। कविता वीडियो देखना और बनाना। कविताओं को पोस्टर में लाना निश्चित रूप से कविता के प्रसार के लिए ऑनलाइन माध्यमों का काफी इस्तेमाल होता है। यूनिट स्तर, प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर इसके अलग—अलग मंच हैं। जहाँ यह द्विगुणित—बहुगुणित होती रहती है। ‘क से कविता’ हैदराबाद, लखनऊ, दिल्ली, गुड़गाँव, पुणे, मस्कट, न्यूयॉर्क आदि तक भी पहुंची है। मगर, इसका जो रूप उत्तराखंड में देखने को मिला है वह नायाब है। यहाँ ये निरंतरता के साथ हो रही है और इसका फैलाव भी हो रहा है। कई बार साथी मजाक करते हैं, कुछ लोग हर प्रदेश में एक पार्टी की सरकार लाने में लगे हैं और कुछ लोग देश के कोने—कोने में कविता प्रदेश बनाने का काम कर रहे हैं। काश इस देश में एक दिन कविता का राज हो!

उत्तराखंड में हर जिले में कविता होने का यह मतलब कतई नहीं है; जिसे ‘​क से कविता’ आयोजित करने वाले भी भली—भांति जानते हैं कि वह अचानक नए लोगों को खड़ा कर रही है। दरअसलए उत्तराखंड की जमीन में मौजूद साहित्यानुराग की उर्वर शक्ति ही इसकी बुनियाद बनाती है। लोग हैं इसलिए वे कविता को आमंत्रित करते हैं. लोग खुद कुछ कर रहे हैं इसलिए वे इस आंदोलन से जुड़ना चाहते हैं। लक्ष्मी आश्रम की एक छात्रा ने हमसे कहा, अरे आप लोग तो हमारा ही काम कर रहे हैं। हम लोग भी आजकल गीतों की यात्रा पर निकले हैं, गाँव—गाँव जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि लोग बिखरे हुए हैं। लोग साहित्य के कर्मकांडी रस्मो—रिवाज से इतने आजिज आ चुके हैं कि उन्हें उसमें ताजगी की उम्मीद ही नहीं लग रही. समाज का सांस्कृतिक विघटन कला और कलाबोध के विघटन को भी जन्म देता है। मगर यह शक्ति भी कला में ही है जो टूटे—बिखरे को जोड़ देता है। अभी-अभी तक गिर्दा इसका जीवंत उदाहरण थे, जो तरह—तरह की सूत को कातने वाली तकली थे। इस तकली का हमारे बीच से अनुपस्थित हो जाना एक खालीपन दे गया।

उत्तराखंड में और जगहों की भांति अल्मोड़ा के प्रश्नवाचक साथियों को भी ‘क से कविता’ का विचार बहुत भा गया। एक साथी तो इतने भावुक हो गए कि बोलने लगे, हमेशा ही दूसरों की कविताओं को सुनता आया हूँ। कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन खुद भी दूसरों को सुनाऊंगा। हम अपनी न सही, अपनी पसंद की कविता दूसरों को सुना सकते हैं, उनसे साझा कर सकते हैं, यह विचार खुद में अदभुत है।

यह भावना हमें कई जगह दिखी है। ऐसे साथी मिल जाते हैं जिनकी डायरियों में बेहतरीन कविताओं का सत्व है. ऐसी डायरियां आखिर कब बोलेंगी। वो चयन और परख किसके काम आएगी। कब तक लिखने वाले पढ़ने वालों पर हावी रहेंगे। और लिखे हुए का परीक्षण कैसे होगा ? यह काम ही ‘क से कविता’ कर रही है। यह साहित्य के जनतांत्रिकरण का आन्दोलन है। यह पढ़ने—लिखने की संस्कृति का एक ताजा आंदोलन है।

कर्बला के मोड़ से उतरते उतरते हम सब अचानक ही और एक साथ हँस दिये, तो हो गया। एक ने कहा। दूसरे ने कहा तो कुछ करने लगो तो कुछ हो ही जाता है. तीसरे ने कहा कविता ने शोकाकुल आत्माओं को मुक्ति दे दी। अगले ने इस बात का प्रतिकार किया नहीं जनाब इस आंदोलन ने कवियों और लेखकों की जकड़न से कविता को मुक्ति दी। हां कविता सही हाथों में आनी शुरू हुई है। तरह—तरह के विचार, विश्लेषण मगर कविता को वाकई नयी ऑक्सीजन तो मिल ही गयी, यह एक तथ्य है। हम अल्मोड़ियों की तरह बोलने लगे थे। ‘लैन करणक मन ज ह्वोलो तो कसिक नी होल, ह्व़े जाल, अल्मोड़िया चाल दरअसल वो चाल है जो किसी भी परिस्थिति में पिटना और पराजित होना पसंद नहीं करती. जुगतकि चक्रव्यूह को भेद लें.

हमने ‘क से कविता की माँ ; मनीष गुप्ता ने प्रतिभा कटियार को यही नाम दिया था. को अल्मोड़ा की बैठक के कुछ फोटो ‘व्हाट्सएप’ की. फिर और कुछ जिलों के साथियों को लोग पूछते ही हैं कहाँ से आया कविता का यह मंच ? कुछ लोग पूछते हैं कौन है मुखिया ? साहित्य की गलियों में फिरने वाले कुछ जासूस खुलासा करते हैं कि मनीष गुप्ता का है, कि नए ‘क से कविता’ एक स्वतंत्र विचार है। सही मायनों में यह पाठकों का मंच है. मनीष का एक मंच है जो कि एक निजी यू ट्यूब चैनल है. ‘हिन्दी कविता’ नाम से वे अपनी तरह से हिंदी कविता की सेवा करते हैं. और कहना चाहिए उन्होंने वीडियो माध्यम से और नामी लोगों से कविताएं पढ़ा कर नई ऊर्जा का संचार किया है। मनीष, प्रतिभा, लोकेश और सुभाष दा की बातचीत में पल रहे विचार के शुरुआती साक्ष्य भी रहे. फिर इसमें गीता गैरोला, नूतन गैरोला, प्रभात उप्रेती आदि अनेक जनों के सुझाव जुड़े और आज यह इस शक्ल में है।

Saturday, April 21, 2018

पढ़ती हूँ उनकी चुप

पढ़ती हूँ उनकी चुप जो रहते हैं आस पास
दीखते हैं अक्सर हँसते हुए सहज से
कभी-कभार चुप हो जाते हैं
फिर लौट आते हैं सहजता ओढ़कर

पढ़ती हूँ उनके भीतर की उथल-पुथल
जिसे भीतर दबाये वो जुटे हैं
इस देश, इस समाज को बेहतर बनाने में

वो देश जो अब उन्हें अपना मानने से इंकार करने लगा है
वो देश जिससे उन्हें भी है उतना ही प्यार
जितना है हम सबको
लेकिन उनका देश प्रेम संदिग्ध हो गया है अचानक
उन्हें प्रमाण देना होता है पल-पल
अपनी देशभक्ति का
उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाने को मजबूर किया जाता है
जबकि वो असल में नहीं लगाना चाहते
किसी भी देश या व्यक्ति के खिलाफ नारे
कि नफरत से नफरत को कैसे जीत सकता है कोई

गलती से भी पाकिस्तानी गायक, खिलाड़ी या साहित्य
की तारीफ़ से उन्हें सायास बचना होता है
उन्हें किराये के मकान आसानी से नहीं मिलते
यात्राओं में उनकी जांच ज्यादा मुस्तैदी से की जाती है

वो फेसबुक, ट्विटर पर कुछ लिखने से बचते हैं
बच्चों को जल्दी से सुला देते हैं
बीवी की आँख में छाए डर का सामना नहीं कर पाते
किसी किताब में गड़ा देते हैं आँखें

गुझिया और सिंवई का स्वाद साथ में लेते हुए
बड़े हुए थे जिन दोस्तों के साथ
उनके हाथ अब कंधे पर महसूस नहीं होते

पढ़ती हूँ उनके भीतर का संसार
जिसे वो लिख नहीं पायेंगे कभी
जिसे छुपाने के लिए वो मुस्कुराते रहेंगे आसपास ही.

Saturday, April 14, 2018

हरसिंगार सी झरती है फिल्म 'अक्टूबर'


सामने स्क्रीन पर क्या चल रहा था, क्या नहीं, पता नहीं लेकिन देह पर हरसिंगार झरते से महसूस हो रहे थे. बेहद कड़वे मन, कसैले समय में किसी फिल्म का रुख करना असल में खुद को निजात देने की कोशिश करने जैसा था. कुछ भी नहीं पता था फिल्म अक्टूबर के बारे में सिवाय शुजीत सरकार के. जैसा मेरा मन उलझा हुआ था वैसी ही उलझी हुई सी फिल्म शुरू हुई. फिल्म का मुख्य किरदार ('नायक' कहने का मन नहीं कर रहा कि शुजित ने उसे नायक की तरह गढ़ा भी नहीं है) भी उलझा हुआ ही दिखा. यूँ लगा परदे पर अपने भीतर की बेचैनी को देख रही हूँ. कौन सी बेचैनी, कैसी उलझन? पता नहीं.

वो उलझनें बहुत आसान होती हैं जिनके बारे में हम स्पष्ट होते हैं, जो सामने से दिखती हैं लेकिन उनका क्या जो खुद को ही समझ में नहीं आतीं. लेकिन हर वक्त परेशान करती रहती हैं, चैन से रहने नहीं देतीं. न दोस्त समझ पाते हैं, न घरवाले. कहाँ से समझेगा कोई जब खुद को ही कुछ समझ नहीं आता बस कि जो जैसा है, वैसा मंजूर नहीं होता. दीवार पर जोर से मुक्का मारने का जी चाहता है, बीच सड़क पर जोर से चिल्लाने का या तौलियों को जूतों से कुचलने का.

डैन (वरुण धवन) ऐसी ही उलझनों से गुजर रहा है. रोज डांट खाता है, हर काम में गलती करता है जिसका उसे कोई अफ़सोस नहीं. दोस्त उसका साथ तो देते हैं, समझ नहीं पाते. इन्हीं उलझनों के दरमियाँ जिन्दगी एक नया पन्ना खोलती है, बिलकुल अनपेक्षित. उसके साथ काम करने वाली उसकी सहयोगी (ठीक से दोस्त भी नहीं) एक भयानक एक्सीडेंट का शिकार हो जाती है और कोमा में चली जाती है.

अस्पताल, नर्स, डाक्टर, महंगे बिल, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच की जंग और डैन. फिल्म बहुत धीरे-धीरे आगे बढती है बिलकुल उसी तरह जैसे सरकता है बुरा वक़्त धीरे-धीरे. व्यवहारिक होने न होने की तंग गलियों से गुजरते हुए, हर बात को लॉजिक के लेंस से देखने और न देखने के फासले को साफ़ करते हुए फिल्म जिन्दगी के बेहद करीब जाती नज़र आती है.

दुःख तब दुःख नहीं लगता जब आप उसे स्वीकार कर लेते हैं कि हाँ यह तो है फिर उससे लड़ते हैं प्यार से, दुश्मनी से नहीं. मुश्किल वक्त में भीतर की ताकत को समेटा कैसे जाता है, कैसे उसमें रंग भरे जाते हैं यह निर्देशक शुजीत सरकार और फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी ने सलीके से परदे पर रचा.

वरुण धवन के दीवानों को शायद इसमें उनका वरुण धवन न मिले लेकिन जो मिलेगा वो उन्हें हैरत में डाल देगा. वनिता संधू पहली फिल्म में ही दिल जीत लेती हैं और गीतांजली राव की अदाकारी भी आपका हाथ थाम लेती है. यह फिल्म दिल में उतरने वाली फिल्म है, बहुत धीरे-धीरे, जैसे उतरते हैं हरसिंगार के फूल शाखों से और जैसे घेरती है उनकी खुशबू. देर तक असर रहने वाला है फिल्म का. इसे देखते हुए रिल्के याद आते रहे, 'अगर तुम्हारे जीवन में अब तक जाने हुए दुःख से (वो अवसाद कहते हैं) बड़ा दुःख गुजर रहा है, तो तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए बल्कि जीवन का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है.'

कैमरे का  काम यानी सिनेमेटोग्राफी, बैक ग्राउंड म्यूजिक, कम, छोटे और प्रभावी संवादों ने फिल्म को खास बनाया है. फिल्म सिनेमा हॉल में छूट नहीं जाती, साथ चली आती है न जाने कब तक साथ रहने को जैसे साथ चलती रहती है कोई कविता, किसी नदी की नमी, किसी पेंटिंग की लकीरें, उसके रंग.

यह अक्टूबर हर महीने में घुल जाएगा.

Friday, April 13, 2018

मुझे तेज़ धार वाली कवितायें चाहिए


मुझे तेज़ धार वाली कवितायें चाहिए
जिनके किनारे से गुजरते ही लहूलुहान हो जाए जिस्म
जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे
सब कुछ सह लेने वाला सब्र

मुझे ढर्रे पर चलती जिन्दगी के गाल पर
थप्पड़ की तरह लगने वाली कवितायें चाहिए
कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन
और आखिर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल

मुझे बारूद सरीखी कवितायें चाहिए
जो संसद में किसी बम की तरह फूटें
और चीरकर रख दें बहरी सरकारों के
कानों के परदे

मुझे बहुत तेज़ कवितायें चाहिए
साँसों की रफ़्तार से भी तेज़
समय की गति से आगे की कवितायें
हत्यारों के मंसूबों को बेधती कवितायें
और हो चुकी हत्याओं के खिलाफ
गवाह बनती कवितायें

मुझे चाहिए कवितायें जिनसे
ऑक्सीजन का काम लिया जा सके
जिन्हें घर से निकलते वक़्त
सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सके
जिनसे लोकतन्त्र को
भीड़तंत्र होने से बचाया जा सके

मुझे चाहिए इतनी पवित्र कवितायें कि
उनके आगे सजदा किया जा सके
रोया जा सके जी भर के
और सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सके

मुझे चूल्हे की आग सी धधकती कवितायें चाहिए
खेतों में बालियों सी लहलहाती कवितायें चाहिए
मुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कवितायें चाहिए
भोली गिलहरी सी फुदकती कवितायें चाहिए


मुझे इस धरती पर मनुष्यता की फसल उगाने वाली कवितायें चाहिए.

अपना हक छीन लेने वाली कवितायें चाहिए

मुझे स्थिर तालाब में
एक शरारती बच्चे द्वारा फेंकें गए कंकड़
सरीखी कवितायें चाहिये
जो स्थिरता को भंग कर दें

हाथ से छू जाए तो लहू रिसने लगे
ऐसे सीसे से सने मांझे सी कवितायेँ चाहिए.
अपने हक के लिए सदियों तक धरने पर बैठने वाली नहीं
उठकर अपना हक छीन लेने वाली कवितायें चाहिये

रोजमर्रा की ऊब भरी जिन्दगी से टकराने वाली
रोज नए रास्तों की तलाश करने वाली कवितायें चाहिए
सरहदों पर खिंची सीमाओं को मिटा देने वाली
सत्ताओं को औंधे मुंह गिरा देने वाली कवितायें चाहिये

मुझे बच्चों के बस्तों में छुपाकर रखी गयी कॉमिक्स सी कवितायें चाहिए
बिना पुकारे तुम तक पुकार बनकर पहुँच जाने वाली कवितायें चाहिये

मुझे शरद के कंधे से टिककर
दूर कहीं गुम हो जाने वाले रास्तों को
ताकती कवितायें चाहिए
तुम्हारी याद की तरह
अदरक वाली चाय में घुल जाने वाली कवितायें चाहिए.

Thursday, April 12, 2018

पुलिस, पुजारी और देश


जब कुछ भी नहीं पता था देश और समाज के बारे में. कानून और अपराध के बारे में. नहीं पता था धर्म का काम क्या है, कैसा होता है आस्थाओं का चेहरा, कि पुलिस किसे बचाती है, किससे बचाती है. (और वक़्त आने पर पुजारी और पुलिस से कौन बचाता है ) बहुत कम उम्र की एक छोटी सी बच्ची को तब से डर लगता था पुलिस और पुजारी दोनों से.

मंदिर में जाती तो प्रसाद देने वाला पुजारी को कभी प्रेम से, भक्तों को सम्मान से देखते हुए, कभी उनसे इंसानों की तरह पेश आते नहीं देखा. प्रसाद लेने के लिए जो लाइन लगा करती थी उसमें अपना नम्बर आते-आते वो लड़की डर से कांपने लगती थी बावजूद इसके कि साथ होते थे तमाम घरवाले, फिर भी. मोटे तोंद वाले पहलवान नुमा पुजारी ने उसके ठीक पहले वाली औरत को डांट दिया था. किसी तरह अपना नम्बर आते ही बेहद सावधानी से अपनी नन्ही हथेलियाँ प्रसाद लेने के लिए बढ़ा दिया करती थी. इतनी सावधानी से कि पुजारी की उँगलियाँ छू न जाएँ कहीं. टीका लगाते वक़्त कहीं पीठ पर हाथ न फेर दे पुजारी. एक बार आशीर्वाद देते हुए सर पर रखा हाथ उसकी पूरी पीठ पर फिसलता गया था, कई महीनों तक अंगारों सी दहकती रही थी उसकी पीठ. हालाँकि उसे नहीं बताया गया था 'बैड टच' के बारे में.

वो अख़बार नहीं पढ़ती थी, टीवी उन दिनों हुआ नहीं करते थे फिर कैसे उसके मन में पुलिस के प्रति इतना भय भर गया. पुलिस को देखते ही भीतर तक सहम जाया करती थी. माँ के पीछे छुप जाया करती थी लेकिन माँ से इस बारे में कुछ कह नहीं पाती थी. एक बार रेलवे स्टेशन पर एक पुलिसवाले को देखकर वो इतना डर गयी थी कि कई दिन तक उसे बुखार रहा. कोई नहीं समझ पाया था कि वो डर उस पुलिसवाले की उन नज़रों से उपजा था जो दूर से उसे देख रही थीं, और अश्लील तरह से मुस्कुरा रहा था वो. हालांकि किसी ने नहीं बताया था उसे सच्ची और झूठी मुस्कुराहटों के बारे में, अच्छी और बुरी निगाहों के बारे में.

आज समूचा देश पुलिस और पुजारियों की गिरफ्त में है. इतना अँधेरा है चारों ओर, इतना खौफ़. रास्ता कोई नहीं. और यह कोई दुर्घटना नहीं है, इस अँधेरे को बाकायदा उगाया गया है, बोया गया है. हम समझ क्यों नहीं पाते कि हमारे खिलाफ हमें ही इस्तेमाल किया जा रहा है सदियों से.


Thursday, April 5, 2018

मारीना मेरा पहला प्यार

जिसे आप प्यार करते हैं उस पर लिखना मुश्किल होता है. इसी मुश्किल के कुछ हिस्से 'समास 16' में प्रकाशित हुए हैं. यह शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक के अंश हैं. मुझ तक इन अंशों को पढने के बाद प्रतिक्रियाएं तो पहुँचती रहीं लेकिन पत्रिका जाने कैसे रास्ते भटकती रही, मुझ तक पहुंची नहीं. आखिर एक सैलानी काम आया, संजय सैलानी ने पत्रिका भेजी जो मुझे आज ही मिली है. यह मेरे और मारीना के प्यार की दास्ताँ है. समझने वाले समझते ही हैं कि प्यार की दास्ताँ जैसी भी हो हर बार पलकें नम कर जाती है. 


मरीना त्स्वेतायेवा (8 अक्तूबर १८९२- 31 अगस्त १९४१)

मरीना त्स्वेतायेवा रूस की एक महान कवियत्री हैं. ‘थे’ शब्द का इस्तेमाल मैं जानबूझकर नहीं कर रही हूँ कि मैंने जिस मारीना को जाना था वो अपने समय और काल को पार करके मुझसे मिली थी. पहली ही मुलाकात में उससे दोस्ती हो गयी थी और उसके बाद यह दोस्ती अब तक बनी हुई है. मेरी मारीना तस्व्तायेवा से दोस्ती करवाई थी डा वरयाम सिंह ने. उनकी पुस्तक कुछ ख़त कुछ कवितायेँ मैंने करीब १४ बरस की उम्र में पढ़ी थी. उस छोटी सी उम्र में मुझे क्या समझ में आया क्या नहीं लेकिन कुछ तो था जिसने जिन्दगी को देखने का, रिश्तों को समझने का, भावनाओं को महसूस करने का ढब ही बदल दिया. ‘जीवन में मुझे मुलाकातें अच्छी नहीं लगतीं, माथे टकरा जाते हैं, जैसे दो दीवारें. इस तरह भीतर जाया नहीं जाता. मुलाकातें मेहराब होनी चाहिए.’ या किसी के विचार तो पसंद हो सकते हैं पर उसके नाखूनों के आकार सहन नहीं भी हो सकता है. उसके स्पर्श का प्रतिउत्तर तो दिया जा सकता है पर उसके मूल्यवान भावों का नहीं. ये अलग लग क्षेत्र हैं. आत्मा आत्मा से प्रेम करती है, होंठ, होंठो से लेकिन अगर आप इन्हें मिलाने लगेंगे या मिलाने का प्रयास करेंगे ईश्वर न करे आप सुखी नहीं होंगे.

जिन्दगी के प्रति प्रेम से भरी एक बच्ची किस तरह बड़े होते हुए चीज़ों को देखती है, महसूस करती है, रूस की क्रांति के दिन, पहले और दूसरे विश्व युध्ध का समय, पिता ईवान व्लादिरिमोविच इतिहासकार और रूस के संग्रहालय के संस्थापक. पिता की दूसरी पत्नी से जन्मी मारिना और अनास्तासिया दो बहनें. पिता की पहली पत्नी से जन्मे आंद्रेई और वलेरिया के साथ उनके रिश्ते. माँ की उदासियाँ, बीमारियाँ, माँ की असमय मौत और इन सबके बीच मारीना का भटकता कवि मन. कमसिन उम्र का प्यार और विवाह. पति का व्हाइट आर्मी से जुड़ा होना, देश के बिगड़ते राजनैतिक हालात और जूझना आर्थिक हालात से भटकना दर ब दर. भूख से बचाने के लिए बेटी को अनाथालय में छोड़ने का निर्णय और उसकी मृत्यु, बेटी के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाना कि दूसरी बेटी को तेज़ ज्वर. फिर देश से बाहर जाना. निर्वासन के अनुभव, पीड़ा, संघर्ष. आखिरी सांस तक जिन्दगी के लिए/प्रेम के लिए शिद्दत से महसूस करना और अंत में छूट ही जाना सब कुछ.

मारीना जिन्दगी के प्रति आकंठ प्रेम से भरी थी. प्रेम ही उसके लिए जिन्दगी का दूसरा नाम था. उसे अपने लिखे में ही मुक्ति मिलती थी. जिन्दगी की कठोरतम परिस्थितियों में भी उसने लिखना नहीं छोड़ा. लिखना उसके लिए सांस लेने जैसा था. अपनी आखिरी साँस लेने से पहले भी वह लिख रही थी. वो लिखती थी डायरी, खत, कवितायेँ, संस्मरण. उसे बहुत जल्दी किसी से भी प्रेम हो जाता था...लेकिन प्रेम के मायने उसके लिए दुनियावी मायनों से बहुत अलग थे.

डा वरयाम सिंह ने मारीना से मुलाकात कराकर उससे और मिलने की उसे और जानने की प्यास को बढा दिया था. कई बरस तक ‘कुछ ख़त कुछ कवितायेँ’ ‘आयेंगे दिन कविताओं के’ और बाद में ‘बेसहारा समय में’ पढ़ती रही. (ये तीनों किताबें डा वरयाम जी के ही अनुवाद हैं) इस बीच कुछ संस्मरण लिखे मारीना पर जिसमें मैं उससे बातें करती थी, सवाल करती थी. इन्हीं सबके दौरान एक बार एक दोस्त ने कहा कि इतना ही प्यार है मारीना से तो मिल आओ न वरयाम जी से. वरयाम जी से मिलने की बात सुनते ही मेरी आँखें भर आई थीं. आखिर वही तो थे जिन्होंने हाथ पकडकर दोस्ती करायी थी मारीना से. 2009 में मैं जे एन यू गई वरयाम जी से मिलने. वो बहुत प्रेम से मिले, उन्होंने मेरे द्वारा मारीना पर लिखे छुटपुट संस्मरण पढ़े, मेरे और मारीना के प्रेम के किस्से सुने और कहा, ‘तुम करोगी मारीना पर काम.’ ये उनका प्यार था कि उन्होंने मारीना पर रूसी भाषा वाली काफी किताबें मुझे दीं. मेरे लिए रूसी भाषा की वो किताबें सिर्फ कुछ काले अक्षर भर थीं फिर भी उन अक्षरों को छूते हुए महसूस करना था मारीना को उसकी भाषा में.

वरयाम जी ने जे एन यू मारीना पर सामग्री तलाशने में मदद की. मारीना को जितना जाना और जानने की इच्छा होती गयी. उसके और मेरे दरम्यान न सिर्फ सौ साल से अधिक का फासला था बल्कि बल्कि भाषाएँ भी दीवार थीं. जानकारियां आधी अधूरी ही मिलती रहीं. एक जगह से मिली जानकारी दूसरी जगह से मिली जानकारी से अलग होती तो मुश्किल और बढ़ जाती. ऐसे में मेरी सारी दुविधा को दूर किया मारीना ने ही कि मैंने उस पर किताब नहीं उसके बारे में इकठ्ठी की गयी जानकारियों पर आधारित कुछ संस्मरण लिखे. प्यार से. वो लगातार एक दोस्त की तरह इस पूरी यात्रा में मेरे पास रही, मेरे साथ रही.भाषा हमारे दरम्यान एक ही थी प्रेम की. तथ्य हो सकता है कुछ ऊपर नीचे हो गए हों लेकिन उसके भाव बचाए रखने का पूरा प्रयास किया है. उसे भाषा से पार जाकर, देश की सीमाओं से पार जाकर सुनने का, उसके लिखे को महसूस करने का प्रयास किया है. इसीलिए इसे नाम दिया है.’मारीना मेरा पहला प्यार’. उसके जीवन का जो टुकड़ा यहाँ दिया है उसका संदर्भ इतना है कि रूस से निर्वासित होकर जब मारीना पराये देशों में भटक रही थी, जिन्दगी के टुकड़े समेट रही थी तो बीच में कुछ हिस्सा प्राग में भी बीता. ये प्राग में बीते उसके दिनों की झलक है. ये अंश संवाद प्रकाशन से प्रकाशित होकर जल्द आने वाली पुस्तक ‘मारीना त्स्वेतायेवा मेरा पहला प्यार’ से हैं.



Tuesday, April 3, 2018

जब वह खुद से खुश नहीं रहती


वो जब अपने पास लौटना चाहती हैं
तो लौटती हैं रसोई में
बटोरना चाहती हैं सबकी मुस्कुराहटें
तो इंटरनेट पर खोजती हैं नयी-नयी  रेसिपी

भीतर के बिखराव सिमटते नहीं
तो समेटने लगती हैं बिखरा घर
पड़ोसन से बन सकें अच्छे रिश्ते
शामिल होती है मोहल्ले की चर्चाओं में

घरवालों को फ़ालतू सा लगता है उनका पढ़ना- लिखना
इसलिए किताबों को स्टोर में रख
किताबों वाली जगह पर सजाती हैं शो पीस

कोई कुहासा झांकता है पलकों से जब भी बाहर
उसे दिखाती हैं गुलदान में सजाये ताजा फूल
मन की चिड़िया उड़ने को होती है बेताब
तो देखती हैं चिड़ियों से भरा आसमान

उनसे सब खुश रहते हैं तब
जब वह खुद से खुश नहीं रहतीं,


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Sunday, April 1, 2018

सुकून नहीं संभलता


विरह संभल जाता है, दुःख संभल जाता है, मुश्किलें पार हो जाती हैं लेकिन वो एक लम्हा जो दिल से दिल की राह लेता हुआ आँखों में जा बैठता है वो संभाले नहीं संभलता. वो एक हाथ जो ठीक उस वक़्त काँधे पर महसूस होता है जब आप तन्हाइयों के रसातल में डूबते जा रहे हों उस हाथ की छुअन का जादू नहीं संभलता. इंतजार संभल जाता है, बाट जोहना संभल जाता है, महबूब की एक नज़र नहीं संभलती,आंसू संभल जाते हैं, पीड़ा की तो जैसे आदत सी हो चली हो, लेकिन राहत भरा एक पल का साथ नहीं संभलता. दूर देश बैठे किसी की याद में होने वाली आवाजाही नहीं संभलती, उस देश की हवाओं में घुलकर आने वाली सांसों की जुम्बिश नहीं संभलती, चौदस का चाँद संभल जाता है, रातरानी की खुशबू संभल जाती है, दोस्त की हथेलियों में हथेलियाँ छुपा देना और चुपचाप साथ चलते जाने का सुख नहीं संभलता...

मौसम अंगड़ाई ले रहा, जागती हुई रात का जादू सांसें ले रहा है, इश्क़ शहर में नन्हे से ख़्वाब को सर्द हवाओं ने आ घेरा है, जिसे गर्म साँसों की चादर में सुकून है...ये सुकून नहीं संभलता. सच्ची.

(इश्क़ शहर, मुद्दत बाद मिला इतवार)

Wednesday, March 21, 2018

यूं मिलती है कविता मुझसे...


एक बहुत पुराना लेख याद दिलाया दोस्त अखिलेश्वर पांडे ने. जिसे लिखकर भूल गयी थी. मेरे लिए कविता ही जीवन है और यह एक पाठकीय प्रतिक्रिया है, कि मन के तमाम उतार चढ़ावों को ठौर मिला कविताओं को पढ़ते हुए ही. आज जब विश्व कविता दिवस मनाया जा रहा है तब मैं पलट रही हूँ स्मृतियों के कुछ पीले पड़ चुके पन्ने...

- प्रतिभा कटियार

अपनी स्मृतियों को रिवाइज करती हूं तो खुद को स्मृति के उस पहले पन्ने के सामने खड़ा पाती हूं, जिस पर मरीना ने लिखा था, मुलाकातें मुझे अच्छी नहीं लगतीं. माथे टकरा जाते हैं. जैसे दो दीवारें. मुलाकातें मेहराब होनी चाहिए. उस वक्त मेरी उम्र कोई दस या बारह वर्ष के आसपास रही होगी. और मरीना की ये पंक्तियां उसकी कविता की लाइनें भी नहीं थीं. लेकिन ये शब्द $जेहन में ठहर गये. इन्हीं का हाथ पकड़कर मैंने कविता की दुनिया में प्रवेश किया. कविता मुझे हमेशा लुभाती रही. इसके बाद देश और विदेश के न जाने कितने कवियों को पढ़ा. पाश, ब्रेख्त, नेरूदा, शिंर्बोस्का, शमशेर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अज्ञेय, मुक्तिबोध, जाने कितने नाम आसपास मंडराते रहते हैं. कितनी कविताएं हैं, जो हमेशा साथ चलती रहती हैं.
कविताओं के संसार में विचरने और उससे बाहर आने के दौरान समय एक बात मैंने शिद्दत से महसूस की कि कविता कहां है और कहां नहीं यह सवाल अब तक अनुत्तरित ही है. मैंने कई बार कविता को वहां पाया, जहां उसके होने की उम्मीद नहीं थी. मसलन कभी किसी की बात में, कभी किसी मुलाकात में, फिल्म के किसी डॉयलॉग में, किसी कहानी के एक अंश में, तेज धूप में नंगे पांव भागती जाती स्त्री के आंचल में छुपे एक मासूम की मुस्कुराहट में. इसके उलट कई बार कविता वहां नहीं भी मिली, जहां इसकी तलाश थी. मसलन किसी के कविता संग्रह में, किसी कवि गोष्ठी में, कविता के किसी ब्लॉग पर. यह अजीब सा इत्तफाक अब तक लगातार उपस्थित या अनुपस्थित होता रहता है. इसी बीच ऐसा भी होता है कि कोई सुंदर कविता न$जर से गुजरती है और दिल और दिमाग में हमेशा के लिए ठहर जाती है.

मेरे लिए कविता गहरी संवेदना से उपजी ऐसी अभिव्यक्ति है जो आगे बढ़कर पढऩे वाले की अनुभूतियों को गले लगा लेती है. उसे उद्वेलित करती है, कभी-कभी तो शांत भी करती है. उसे प्यार करती है तो उसके साथ सदा के लिए जज़्ब हो जाती है. पाठक चाहकर भी उस कविता से पीछा नहीं छुड़ा पाता फिर कविता का आकार कवि से बड़ा हो जाता है.

समकालीन दौर में कविता के सम्मुख मुझे सबसे बड़ी चुनौती यही लगती है कि कविता को जहां होना चाहिए वो अक्सर वहां नहीं होती. अखबारों में काम करते हुए साहित्य पेज की जिम्मेदारी निभाते हुए कविताओं के ढेर में खुद को खूब धंसा हुआ पाया है. लेकिन उस ढेर में अक्सर कविताएं नहीं होती थीं. यही कारण था कि कविता प्रेमी होने के बावजूद एक समय में कविता के नाम से खौफ़ खाने लगी थी. आज भी कमोबेश वैसे ही हालात हैं. ढेरों ब्लॉग्स हैं, पत्रिकाएं हैं, रचनाधर्मिता अपने चरम पर है लेकिन कविता कहां है? कहां है वो कविता जो अपने समय को, समाज को रेखांकित करती है. कहां है वो कविता जो हमारा हाथ पकड़कर कहती है, हम हैं ना. वो कविता कहां है जिसकी उंगली पकड़कर हम अवसाद की लंबी यात्रा से विराम पायें. ऐसा नहीं है कि ऐसी कविताएं नहीं हैं लेकिन बहुत कम हैं.

कविता की फॉर्म या टेक्नीक को लेकर मेरा कोई आग्रह कभी नहीं रहा. छंदबद्ध हो या न हो, वो गद्य शैली में हो या पद्य शैली में, उसके संग कितने भी प्रयोग किये गये हों लेकिन उसमें एक अनुभूति हो और इतनी सामथ्र्य हो कि वो अपने रस को खोये बगैर अपने भीतर विचार को पल्लवित होने दे और पाठक से एकाकार हो सके. उसके भीतर प्रवेश करने के लिए पाठक को मशक्कत न करनी पड़े.

मशक्कत, यह शब्द आजकल कविताओं से संग काफी जुड़ा हुआ पाती हूं. अक्सर अपने साथियों से सुना है. जो कविता के खांटी पाठक नहीं हैं, कहते हैं कि यार कविता समझ में नहीं आती. उन्हें जब कविता को खोलकर समझाया तो उन्हें आनंद आया. तो नई कविता को अपने भीतर थोड़ा सा सहज भाव लाने की जरूरत मुझे महसूस होती है. दुरूहता, जटिलता और बोझिलता कविता के रस को कम न कर दें. कविता का अंतिम शरण्य तो पाठक ही है ना अगर वो उस तक ही नहीं पहुंच रही है तो कुछ तो सोचना होगा.

अब सवाल पाठक का है तो पाठक की चिंता कोई कवि क्यों करे. कविता लिखते वक्त कवि किसी के बारे में नहीं सोचता. वो एक गहन पीड़ा से गुजर रहा होता है. उससे मुक्ति का उसके पास एक ही रास्ता होता है कविता. न वो पाठकों के बारे में सोचता है, न संपादकों के बारे में वो बस अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने के बारे में सोचता है. उस वक्त कविता की टेक्नीक, उसे कैसा होना चाहिए, कैसा नहीं होना चाहिए इस बारे में सोचने की फिक्र नहीं होती. ऐसे में वो भला पाठक के बारे में क्योंकर सोचे.
एक पुल चाहिए- कवि की अपनी सीमाएं हैं और पाठक की अपनी. लेकिन दोनों की सीमाओं के बीच एक पुल की दरकार होती है. जो उन दोनों को करीब लाती है. कविता भी है और उसके पाठक भी लेकिन उन दोनों का संयोग करने वाले पुल अक्सर जर्जर पाये जा रहे हैं. इन पुलों में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, संग्रहों के अलावा भी कुछ चीजें शामिल होने की जरूरत है. पिछले दिनों मैंने थियेटर एप्रिसिएशन और फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स के बारे में सुना. तभी यह ख्याल आया कि ऐसा ही कुछ कविता के बारे में क्यों नहीं होना चाहिए. पाठक तक पहुंचने की सारी यात्रा कवि ही क्यों तय करे, कुछ यात्रा तो पाठक को भी तय करनी चाहिए. अपनी समझ, सामथ्र्य को परिष्कृत और सुदृढ़ करते हुए कविता की ओर प्रस्थान करने के लिए.

विचार, प्रतिबद्धता, शुद्धता, सामाजिक परिवर्तन में कविता की भूमिका जैसे सवालों से बहुत दूर होता है कवि मन जब वो कविता लिख रहा होता. किसी श्रेणी का ख्य़ाल रखकर कविता नहीं लिखी जाती. हां, लिखे जाने के बाद वो किस श्रेणी में आती है, यह अलग बात है. कविता लिखना शब्दों से खेलना नहीं है. सुंदर शब्दों में भावों को उड़ेलना भर नहीं है, पूरे समय, समाज से जुडऩा है. कवि की प्रतिबद्धताएं, समझ, दृष्टि, संवेदना जितनी सक्रिय होती है कविता अपने आप उसी दिशा में जाती है. ये श्रेणियां हैं तो बहुत महत्वपूर्ण लेकिन कवि को इनसे निरपेक्ष होकर ही रहना चाहिए. क्योंकि तीव्र अनुभूति वाली प्रेम कविताओं में ऐसे राजनैतिक और सामाजिक सरोकारों को जज्ब होते भी देखा है जो राजनैतिक और तथाकथित प्रतिबद्ध कविताओं में नहीं दिखता. कविता अपने मूल में जितनी सहजता से सामने आती है वही ठीक है.

जहां तक सामाजिक सरोकारों की बात है तो मन में हमेशा से यह सवाल रहा कि हमारे यहां कब किस कवि को उसकी कविता के चलते जेल में डाला गया. कब किस कविता को प्रतिबंधित किया गया. कविता पूरे वेग के साथ बिना किसी की परवाह के अपने समय की जटिलताओं के खिलाफ खड़ी होती है . मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसी कविताओं की तलाश हमेशा रहती है जो पढऩे वालों की आत्मा पर चोट करे. जिसका असर सदियों तक बना रहे. बनावटी प्रतिबद्धता, बनावटी सरोकार कविता की कलई अपने आप खोल देते हैं. कवि को लगता है कि उसने तो कमाल कर दिया था लेकिन असल में कमाल हो नहीं पाता. यानी कविता लिखने से पहले कवि का आत्मिक और वैचारिक शुद्धिकरण (माफ़ कीजिए ये काफी दक्षिणपंथी शब्द है फिर भी जरूरी है). उसकी समझ का साफ होना बहुत जरूरी है. क्योंकि उलझी हुई समझ से लिखा गया कहां ठहरेगा? ये हम सब जानते हैं. पानी के बुलबुले से उठेंगे फिर गुम हो जायेंगे और हम रोते रह जायेंगे कि मेरी कविता को पहचान नहीं मिली. यही है आज की कविता के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है. एक अच्छी रचना को साधुवाद देना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है एक बुरी रचना की आलोचना करना. आलोचना की आज के दौर में सख्त जरूरत है. तीखी आलोचना. जो कविता की दुनिया में उग आये कूड़ा-करकट को साफ करे और सुंदर कविताओं का रास्ता साफ करे. आलोचनाएं निष्कपट होनी चाहिए और उन्हें पूरी सहदयता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए.

Tuesday, March 20, 2018

कवि की मृत्यु पर कोहराम


- देवयानी भारद्वाज

मृत्यु एक गरिमामय कर्म है
एक सार्थक जीवन के बाद
चुचाप उठ कर चल देना
जिए गए जीवन के प्रति
गहरी श्रद्धा
ऐसी मृत्यु
जिसे आप अपने मौन में
जज़्ब करते हैं धीरे-धीरे

मृत्यु कोई हादसा नहीं
हत्या या असामयिक मृत्यु
यहाँ मेरा सन्दर्भ नहीं
एक भरपूर जीवन के बाद
विदा की घड़ी
जैसे दूर क्षितिज पर
ढल रहा हो सूरज
धीरे-धीरे
जबकि दीप्त है पृथ्वी
अब भी उसकी आभा में

बिना शोर
बिना कोहराम के
चला गया एक कवि
जैसे चले गए उसके पूर्ववर्ती
जैसे चले जायेंगे अभी और भी कई
अपने जाने के सही समय पर

कवि की मृत्यु पर कोहराम
शोक संदेशों और श्रद्धांजलियों की बाढ़
मृत्यु की गरिमा पर चोट सा पड़ता है
वह जहाँ चला गया है
वहां नहीं पहुंचेंगे तुम्हारे शोक सन्देश
उसके पीछे
इतना शोर मत मचाओ
वह लिख रहा है
अपनी अंतिम कविता
उसके आस पास थोडा धीरे बोलो
कुछ शोर कम मचाओ

Saturday, March 17, 2018

एक दुःख है जो झरा नहीं



ये झर जाने के दिन हैं इसलिए खूब झर रही हूँ. झर झर झर. पूरी तरह से झर जाना चाहती हूँ. सांस सांस झर जाना चाहती हूँ. देह से झरती इक इक साँस को झरते हुए देख रही हूँ. ठीक उसी तरह जैसे देखती हूँ पेड़ों से गिरते पत्तों को. झरना दुःख नहीं है, पूरा होना है. लम्हों का पूरा होना, साँसों का पूरा होना. स्वाभाविक जो भी है सुख है, झरना भी, उगना भी. प्रेम भी, विरह भी. जीवन भी, मृत्यु भी.

मैंने मृत्यु को कई बार अपने आसपास देखा है, स्पर्श किया है. देह की मृत्यु को भी और देह में मृत्यु को भी. कई बार लगता है मैंने चखा है मृत्यु को, मेरी जिह्वा पर स्वाद है मृत्यु का और वो बुरा नहीं है. यह अवसाद नहीं है, यह जीवन है. जीवन में होना है, जीवन की इच्छा का होना है. बहुत सारा जीने की ख्वाहिश है ये.

झील के किनारे की वो रात याद आ रही है जब सिगरेट के धुएं के बीच एक जोर से आई सिसकी को जिगरी दोस्तों से छुपा लिया था. समन्दर किनारे की वो रात भी याद आ रही है जब सारी रात लहरों को काटते हुए काट रहे थे दुःख और बेवजह के ठहाकों में खुद को छुपा रहे थे. उन लहरों में खुद को बहा आये थे, उन बेवजह के ठहाकों में जीने की इच्छा को बचा लाये थे.

मृत्यु में कोई दुःख नहीं है जीवन में है. जीवन जिए बिना मरने को तैयार नहीं हूँ. हालाँकि इस युध्ध में मरती हूँ रोज ही. देह की मृत्यु के अपने मायने हैं. उनमें कुछ दुःख भी हैं, कुछ बेबसी भी. उन दोस्तों को याद करती हूँ जो देह से मुक्त हुए. कमल जोशी की वॉल पर रोज ही जाती हूँ, मनोज पटेल को पढ़ते-पढ़ते ही सो जाती हूँ अक्सर. और भी कुछ दोस्त हैं जो चुपके से चले गए. किसी दिन मैं भी चली जाऊंगी. बिना किसी को कुछ भी बताए. बस कि सैलाब से डर लगता है. पीछे से उठने वाले शोर से डर लगता है, रूदन की वीभत्सता डराती है बहुत.

मृत्यु जब शांति है तो मृत्यु के बाद इतना कोहराम क्यों...देह की मृत्यु पर ही कोहराम क्यों? जीते जी मरते हुए लोग आस पास होते हैं हम उन्हें देखते भी नहीं.

मुझे न ये दुनिया कभी समझ आती है, न ये ही लगा कि दुनिया को मैं समझ आती हूँ. बस कि बिना जिए मरने को जी नहीं करता इसलिए हर लम्हे को पूरी शिद्दत से जीती हूँ. हालाँकि रोज ही देखती हूँ एक एक कर हाथेलियों से झरती लकीरों को...एक रोज झर जायेंगी सारी लकीरें, फिर उगेगा कुछ नया.

झर रहा है झर झर झर मौसम
पत्ते ही नहीं झर रहे पेड़ों से
जिए जा चुके लम्हे झर रहे हैं
कुछ बिना जिए लम्हे भी
देखा देखी आतुर हैं झरने को

जी जा चुकी साँसे झर रही हैं
उम्मीदों की शाख पर अटकी
पीली पड़ चुकी आखिरी पत्ती
झर सकती है किसी भी वक़्त

चांदनी झर रही है बेवजह बेपनाह
जीवन का मुसाफ़िर चल रहा है लगातार
झर रही हैं दूरियां

एक दुःख है जो झरा नहीं पूरा
मोहब्बत की आखिरी लकीर
अभी अटकी है हथेलियों में
उसी में अटकी हैं आखिरी साँसे

मृत्यु नहीं है हालाँकि देह का झरना.

Tuesday, March 13, 2018

सपने वाला खेल


'आओ सपनों वाला खेल खेलते हैं, तुम मुझे अपना सबसे प्रिय सपना देना, मैं अपना सबसे प्रिय सपना तुम्हें दूंगा. हम एक दूसरे के सपनों को जियेंगे.'  लड़के ने कहा.

लड़की ने कहा, 'तुम. मेरा सबसे प्यारा सपना तुम हो'
लड़का हंस दिया, ' अम्म्म...मेरा सबसे प्यारा सपना है मेरे पास बहुत सारे पैसे हों, मुझे सारी दुनिया के लोग जानते हों.सम्मान करते हों
'
लड़की लड़के का सँभालने लगी. उसके पास पैसा है, शोहरत है लेकिन लड़की उदास है.

लड़का खुद के इर्द-गिर्द घूमता फिरता है. खुद के आगे न कुछ देख पाता है, सुन पाता है. वो भी बेहद उदास रहता है.

इस खेल के नियम ठीक नहीं थे. 

Saturday, March 10, 2018

तुम गाना गीत


जब गुजरना सहराओं से
गुनगुनाना नदियों और झरनों के गीत
जब गुजरना पथरीले ऊबड़ खाबड़ रास्तों से
गुनगुनाना हरियाली के, पगडंडियों के खेतों के गीत
जब अँधेरा बिगुल बजाये कान पर
तुम गुनगुनान रौशनी के गीत

जब जिन्दगी उदासियों की बाड़ लगाये
तुम गाना खिलखिलाहटों के गीत

जब मृत्यु हाथ थामे
तुम मुस्कुराना और गाना जिन्दगी के गीत.

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कभी-कभी कोई सवाल न पूछकर भी
दी जा सकती है राहत
कभी कुछ न पूछकर भी और कभी
मौन रहकर भी

हमेशा साथ होने के लिए नहीं जरूरी होता
साथ में होना
कभी दूर रहकर भी दिया जा सकता है साथ

प्यार के लिए गले से लगाना ही काफी नहीं होता
कई बार लगाने पड़ते हैं थप्पड़
बकनी पड़ती हैं गलियां
और बनानी पड़ती है बेस्वाद चाय

दोस्त, सांत्वना से बचो
जब जरूरी लग रहा हो सांत्वना देना
कि सांत्वना से बड़ा दंश कोई नहीं.

Monday, March 5, 2018

मिलन


जब तुम्हें देखता हूँ तब तुम्हें सोचता नहीं हूँ 
जब तुम्हारे पास आता हूँ, तब रास्ते में कहीं खो जाता हूँ
जो तुम्हारे पास पहुँचता है वो कोई और होता है
तुम जिससे मिलकर खुश होना चाहती थी
उससे मिलकर उदास होती हो
और जो तुम्हारे पास पहुँचता है वो गुनहगार
हालाँकि रास्ते में भटक जाने का गुनाह मेरा है, उसका नहीं
मैं रास्ते में भटका हुआ तुम्हारी उदासी से बहुत दूर होता हूँ
और वो उस उदासी को अपने कन्धों पर उठा पाने में लगातार नाकाम

उसके साथ चलते हुए तुम पीपल के पेड़ की ओट से झांकते चौथ के चाँद को देखती हो
चाय पीने की इच्छा को उपेक्षित करती हो
ठीक उस वक़्त मैं अपने भटकाव के रस्ते में मिली एक गुमटी में
चाय पीते हुए मैं तूम्हारे बारे में सोचता हूँ
तुम्हारी उँगलियों के नर्म स्पर्श के बारे में
तुम्हारी आँखों में उतरी उस नदी के बारे में
जिसकी तेज़ धार में हमारे ढेर सारे चुम्बन प्रवाहित हैं

मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
और मैं तेज क़दमों से तुमसे मिलने को चल देता हूँ
जब मैं तुम्हारे पास पहुँचता हूँ तुम अपनी उदास आँखें लिए जा चुकी होती हो
मेरी देह पर तुम्हारा रुदन बिखर जाता है

मैं जानता हूँ कि अब जबकि तुम जा चुकी हो
मैं तुम्हारे ही बारे में सोचता रहूँगा देर तक
पीपल की कोई पत्ती टूटकर कांधों पर गिरी है
वो पत्ती मेरा दर्द समझती है शायद
क्या वो पत्ती तुम हो ?
(5 फ़रवरी 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Monday, February 26, 2018

फेनिल लहरों का दुलार...


छोड़ जाऊंगी तुम्हारे लिए
बसंत का सारा उजास
रक्तिम आभा उगते सूर्य की

छोड़ जाउंगी फसलों से भरे खेत
वक़्त पे आने वाला मानसून
बर्फ से ढंकी वादियाँ
जंगल की खुशबू और
पत्तियों की सरसराहट का संगीत

शरारतें छोड़ जाऊंगी उस नन्हे मेमने की
जिसे तुमने एक बार उठाया था गोद में
वो बारिश की पहली बूँद जिसके नाक पर गिरने के इंतजार में
तुम घूमती थीं नाक उठाये पूरे आंगन में

तुम्हारी हथेलियों में रख जाऊंगी
जिन्दगी जीने की ख्वाहिश वाले सोने से चमकते सिक्के
छोड़ जाऊंगी तुम्हारे लिए
फेनिल लहरों का दुलार...

(5 फरवरी 2018 के सुबह सवेरे में प्रकाशित)

Tuesday, February 20, 2018

वो दिन मुझसे खेल रहा है...



सीढियां उतरती हूँ तो जी चाहता है सीढियां ख़त्म ही न हों कभी. रास्तों पर निकलती हूँ तो चलती ही जाती हूँ लगातार, बिना थके, बिना रुके. खूब बात करती हूँ लोगों से लेकिन जीती हूँ ख़ामोशी ही. 'हाँ, सब ठीक है' दूसरों को बताते हुए किसी मन्त्र की तरह दोहराती हूँ. चाहती हूँ कोई आसपास न हो, कोई भी नहीं. हालाँकि जानती हूँ कोई है भी नहीं. कभी होगा भी नहीं. जो साथ थे  वो भी भरम ही थे होने का कि असल में वो तब भी कभी नहीं थे जब वो थे...इसलिए अब जो साथ है वो इस बात को समझ पाना भर है.

एक लम्बे समय से खुद को किसी कारागार में पा रही हूँ. हर उदास करने वाली चीज़ अच्छी लग रही है. ये उदासी का मौसम है. भीतर भी, बाहर भी. जिन पंक्षियों को उड़ते देख खुश होती थी अब खुश नहीं होती. अपनी उदासी को पहचानती हूँ. उसे हाथ में लेकर गोल-गोल घुमाती हूँ, उसे मेज पर अख़बार के ठीक बगल में. रख देती हूँ, उदासी उसके प्रति मेरी इस बेजारी से परिचित नहीं है इसलिए चौंक रही है.

यह अलग सा अनुभव है कि उदासी है लेकिन उदास नहीं हूँ, ठीक वैसे ही जैसे जीवन है लेकिन जीवन में नहीं हूँ

मोह कोई नहीं है सिवाय एक कप चाय पीने की इच्छा के कि आखिर एक दिन सब छूट ही जाना है.
टटोलती हूँ तो वो छूट जाने वाला दिन बहुत आसपास लगता है...

वो दिन मुझसे खेल रहा है...

Sunday, February 18, 2018

उनका सम्मान उनका हक है


एक मेज बड़ी सी. उस मेज के उस पार जमीन पर दरी बिछाकर बैठे बच्चे. उनकी आँखों में ‘कुछ मिलेगा’ की उम्मीद. मेज के इस पार कुछ गर्वीले लोग. मेज पर प्लास्टिक के फूलों वाला गुलदान. जमा किये गए कुछ गाँव के लोग भी. गर्वीले लोग एक-एक कर भाषण देते हैं, जिसे सुनते हुए बच्चे ऊब रहे हैं. उनकी नजर उन बंद डिब्बों में है जिनमें उनको दान में दिए जाने वाला सामान बंद है. शिक्षिकाएं बच्चों की लाइन लगवाकर दान लेने के लिए तैयार करती हैं. दान में पेन्सिल, और कॉपियों का सेट है, एक पैकेट बिस्कुट का है और एक पैकेट जूस. देने वाले ने अपनी पोजीशन फोटो के हिसाब से ठीक सेट की. दूसरे साथी ने अच्छी तस्वीरों के लिए कैमरा मुस्तैद कर लिया है. ‘लडकियों को आगे करो, लड़कियों को आगे करो’ का स्वर गूंजता है. ‘बेटी पढ़ाओ’ के नारे की भरपाई तस्वीर में नज़र आये इसका ख्याल रखा गया. बच्चे बिस्कुट के पैकेट खोलते हैं, बड़े चाय नमकीन खाते हुए अपनी दानवीरता पर मुग्ध हैं. शिक्षिकाएं खुश हैं कि उनके स्कूल के बच्चों को ‘कुछ तो मिला’. ये सरकारी स्कूल के बच्चे हैं. 
अपने काम के सिलसिले में मुझे अक्सर सरकारी स्कूलों में जाने का अवसर मिलता है. इस दौरान इस तरह के दान के माहौल वाले दृश्य कई बार नज़रों से गुजरे हैं. स्कूलों से लौटते समय आमतौर पर हमेशा कोई न कोई एक सवाल साथ लौटता है जो महीनों सोने नहीं देता. (कभी-कभी कुछ सुकून देनी वाली संतुष्टियाँ भी लौटती हैं.) दान की इस प्रक्रिया में लगे स्कूल के दो घंटे का समय और बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों में एक अलग तरह की कृतज्ञता की भावना भी लम्बे समय से ऐसी ही बेचैनी का सबब है.

पहला सवाल तो यही कि दान शब्द की अवधारणा क्या है, कहाँ से आती है, इसके निहितार्थ क्या हैं. दूसरे दान करने वाले व्यक्ति का उद्देश्य क्या होता है, क्या इससे उसके भीतर किसी तरह का अपराध बोध कम होता है या दानवीर होने का अहंकार पुष्ट होता है. तीसरे दान लेने वाले व्यक्ति को हम किस तरह देखते हैं.

दान देने वाला सुपीरियर और लेने वाला इन्फीरियर ही क्यों होता है हमेशा. हालाँकि जातीय समीकरणों के मद्देनजर मामला एकदम उलटा नजर आएगा जहाँ भरे पेट ब्राह्मण को भी भूखे पेट किसान व अन्य लोग दान देते हैं. लेकिन यहाँ बात सरकारी स्कूलों के संदर्भ में ही केन्द्रित करना ठीक है.

सरकारी स्कूलों के बच्चों को इस तरह दान केन्द्रित बनाने के अर्थ क्या हैं आखिर? और यह किस कीमत पर हो रहा है? दान की प्रक्रिया क्या है? क्यों है? फिल्म हिंदी मीडियम का वह दृश्य याद आता है जहाँ नायिका और नायक को जब यह एहसास हो जाता है कि उन्होंने किसी गरीब की जगह पर अपने बच्चे का एडमिशन कराके उसका हक छीना है तो इस अपराधबोध से बचने के लिए वो (नायिका) बड़े नामी स्कूल से अपने बच्चे को निकालकर उस गरीब बच्चे को उसका हक लौटा देने की बजाय उस सरकारी स्कूल की मदद करने जा पहुँचते हैं जहाँ वो बच्चा पढ़ रहा है जिसका हक उनके बच्चे ने मारा है. फर्नीचर और किताबों की मदद, स्कूल को बेहतर बनाने की मदद, रंगाई पुताई सब. इसके साथ ही अपराध बोध खत्म.

हम ऐसे ही समाज बनते जा रहे हैं. अपने बेहतर होने के गर्व से उन्नत हमारा माथा और अकड़ी हुई गर्दन हमारे अहंकार का ही प्रतिरूप है. फिर यह कैसा बेहतर होना है. सरकारी स्कूल के बच्चों के सम्मान के बारे में आखिर किस तरह सोचता है यह समाज? वो ज़रूरतमंद हैं यह सोचकर अपनी अहम पुष्टि के तमाम दरवाजे लोगों को वहां खुलते नज़र आते हैं. राजनैतिक, धार्मिक, सामजिक बैनर के तहत यहाँ दान दिए जाते हैं. कभी-कभार लोग अपने बच्चों का जन्मदिन मनाने भी यहाँ आ पहुंचते हैं. जन्मदिन वाला बच्चा बाकी बच्चों को गिफ्ट देता है, बाकी बच्चे लाइन लगाकर गिफ्ट लेते हुए उसकी लम्बी उम्र की दुआ करते हैं. दान लेते हुए बच्चों की तस्वीरें खींची जाती हैं, सोशल मीडिया पर अपनी पीठ ठोंकी जाती है. जबकि दूसरी ओर एक पूरी पीढ़ी हाथ बढ़ाने और कृतज्ञ होने की आदी होते हुए, दान दाता के जयघोष में अपनी आवाज ऊंची करते हुए बड़ी होती है.

समानता, समता के संवैधानिक मूल्यों में क्या अवसरों की समानता के साथ सबके लिए बराबर सम्मान की बात भी निहित नहीं है? जब भी मैं इन सवालों से जूझ रही होती हूँ तो कुछ लोग कहते हैं कि ‘इसका क्या मतलब है कि किसी की मदद ही न की जाए?’ मैं कहती हूँ मदद कहाँ है यह, यह तो आत्मप्रचार है, आत्म संतुष्टि है और सामने वाले के सम्मान के साथ खिलवाड़ भी है. सुना था कि असल दान वो होता है जिसमें दाहिने हाथ से दिया जाय और बाएं हाथ को खबर न लगे. देने के साथ ही देने वाला भी भूल जाय.

जब तक किसी भी समाज में एक हाथ फैला रहेगा और दूसरा हाथ देने वाला बना रहेगा तब तक समता और समानता एक सपना ही बना रहेगा. अगर इसकी जड़ें स्कूल स्तर पर ही पनपने लगें तो चिंता और भी बढ़ जाती है. अगर शिक्षक अपने स्कूलों को मिलने वाली मदद के बदले अपने बच्चों की प्रदर्शनी लगाने से बचने को तत्पर हों, बच्चों को जो भी चीज़ें मिलें उन्हें इस तरह मिलें कि वो उनका ही हक हैं किसी के द्वारा दी गयी खैरात नहीं, जिसमें उनका सम्मान पूरी तरह बचा रहे तो शायद एक छोटी सी शुरुआत हो सकती है. इस शुरुआत में मिड डे मील परोसती भोजनमाता का स्नेहिल व्यवहार, स्कूल से मिलने वाली ड्रेस और किताबें देते समय शिक्षक का व्यवहार सब कुछ शामिल है. इस सबके लिए हमें पहले खुद यह समझना होगा कि सरकारी सकूलों के बच्चों का सम्मान बचाना है, उन्हें अपने सम्मान और हक के बारे में बताया जाना भी जरूरी है. बाकी हिंदी, गणित, विज्ञान तो बाद की बातें हैं जो लम्बे समय से हो ही रही हैं. लेकिन ऐसा हो सके इसके लिए बच्चों के सम्मान की जरूरत को महसूस करना जरूरी है.

(सुबह सवेरे में प्रकाशित )

Tuesday, January 30, 2018

पुकार लेना बारिश


कई बार चाहा अपना नाम बदल लूं, नदी रख लूं अपना नाम. कभी जी करता कोई बारिश कहकर पुकारे तो एक बार. बहुत दिल चाहता कोई गुलमोहर कहता कभी. कभी मौसम कहकर पुकारे जाने का दिल चाहता कभी गौरेया, कभी तितली, कभी धान, कभी सरसों कभी रहट.  मैं अपने बहुत सारे नाम रखना चाहती थी, लेकिन मेरा एक नाम रखा जा चुका था लिहाजा उसी नाम की परवरिश करने लगी, धीरे-धीरे उसी नाम को प्यार भी करने लगी.

एक वक्त ऐसा भी आया जब मुझे मेरे नाम में ही बारिश, सूरज, नदी, गौरेया, गुलमोहर सब सुनाई देने लगा. कोई पुकारता प्रतिभा तो लगता किसी ने बारिश कहकर दी हो आवाज...और मैं रुक जाती, अगर प्रतिभा की पुकार में मुझे बारिश, मौसम, गुलमोहर या नदी न सुनाई देता तो मैं आगे बढ़ जाती। अरे हजारों प्रतिभा हैं, मैं ही क्यों रुकूं?

भाषा की दुकानों में मेरे नाम का अर्थ जो भी रहा हो मेरे लिए मेरे नाम का अर्थ अब भी वही है जो कुदरत के रंग हैं। 

मैं जो अपने बारे में बताना चाहती थी, उसे सुनने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं थी। लोग वही सुनना चाहते हैं जो वो सुनना चाहते हैं। इसलिए बचपन से हमें वही बोलने की प्रैक्टिस करवाई जाती है, जो लोग सुनना चाहते हैं। बहुत सारी जिंदगी जी चुकने के बाद हमें समझ में आता वो जो हम रहे हैं अब तक वो तो कोई और था, जो मुझमें जीकर चला गया।

मेरे भीतर कोई और जीकर न चला जाए इसकी पूरी कोशिश करती हूँ तुम भी देना मेरा साथ इस कोशिश में इसलिए जब पुकारना मेरा नाम तो पुकार लेना बारिश...

Saturday, January 20, 2018

मुन्नार की पुकार और जीने की तलब


जीवन से जैसे-जैसे नमी की कमी होती जाती है सपने में नदियों, झरनों, समन्दर, बारिश की आवाजाही बढ़ जाती है. पिछ्ला पूरा बरस सपने में बारिशों का बरस रहा. आँख खुलती तो एक लम्हे की फुर्सत का मुंह ताकते भागती फिरती. आंखें मूंदती तो कोई नदी पुकार लेती. यह नदी, जंगल, झरने या समन्दर और रास्तों की पुकार न होती तो जीवन कितना उदास बीतता. छोटे बच्चे जिस तरह माँ के आंचल को हथेलियों में दबाकर सोते हैं उसी तरह इन पुकारों को मुठ्ठियों में भींचकर सो जाती. इस सोने में सुख था. यह पुकार असल में यात्राओं की पुकार थी. जिन्दगी के सबसे मुश्किल दिनों में यात्राओं ने हाथ थामा था. पीठ सहलाई थी. रास्तों ने प्यार किया था, मौसमों ने कलेजे से लगाया था. भीतर की तमाम जद्दोजहद, उतार चढ़ाव, उलझनों को यात्राओं में पिघलते देखा है, महसूस किया है. यात्राओं ने सारी अकराहटों, टकराहटों को धो सोखकर, धो पोंछकर, ताजा और ऊर्जावान बनाकर वापस भेजा फिर से जिन्दगी से जूझने को. मेरा तजुर्बा कहें या ढब कि जिन्दगी से जूझे बगैर जिन्दगी हाथ नहीं आती और इसके लिए बहुत ताकत चाहिए. यह बात कि यह ताकत यात्राओं से मिलती है सबसे पहले बताई थी मेरी प्यारी दोस्त निधि सक्सेना ने. उसका यात्रा संस्मरण पढ़ते हुए हूक उठी थी बस निकल पड़ने की. बस इस हूक का उठाना ज़रूरी था. इसके बाद इस हूक को सहेजना.

यह अजीब बात है कि मेरी यात्राओं से दोस्ती तब हुई जब जिन्दगी से कट्टी हुई. लेकिन धीरे-धीरे यह बदला भी कि जिन्दगी से कट्टी हुए बगैर भी यात्राओं से दोस्ती बनी रही. 

हरा और पानी मेरी कमजोरी है. एक तिनका हरा देखकर जो जो बावली हो जाती हो अगर उसे हरे का समन्दर मिल जाए तो उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. हैवलॉक, कश्मीर, लन्दन, स्कॉटलैंड सब मुझे मंत्रमुग्ध करता रहा. उत्तराखंड के हरे ने, यहाँ की बारिशों ने तो हाथ थामकर रोक ही लिया है. 

कई सालों से मुन्नार का हरा आकर्षित करता रहा है. मुन्नार एक पुकार बनकर भीतर बसा हुआ है बरसों से. किन्ही बेहद दर्दमंद दिनों में, उदासी के लिहाफ दुबके हुए मुन्नार की टिकट करा ली. जिन्दगी ने हंसकर कहा, जाने नहीं दूँगी, कि हजार मुश्किलें जाने से ठीक पहले. लेकिन उस ख्वाब की पुकार और सामने रखी टिकट हौसला बनाये रहे. मैंने जिन्दगी से कहा, 'लड़ मत, तुझसे वहीँ मिलूंगी, मुन्नार के हरे समन्दर, झरनों के बीच, 
आज यात्रा का आरम्भ है हालाँकि मैं जानती हूँ कि अपने भीतर तो मैं बरसों से इस यात्रा में हूँ. पिछली यात्रा लंदन की थी कोई डेढ़ बरस पहले. उसके बाद अब निकलना है. ऐसा नहीं कि इस बीच कहीं जाना नहीं हुआ. बल्कि पिछला बरस तो भागते ही बीता, बैंगलोर, हैदराबाद, रायपुर, भोपाल ,जयपुर दिल्ली लखनऊ की तो बात ही नहीं. लेकिन कहीं जाना यात्रा में होना नहीं होता शायद, यात्रा पर निकलने से पहले, सामान पैक करते हुए खुद को अनपैक करना ज़रूरी होता है. तमाम मसायलों को ब्रेक देना. जेहन को खाली करना ज़रूरी है. 

कल रात तक जाने से पहले की जिन्दगी को समेटने का दबाव था. आज कुछ भी नहीं...सामने रखी टिकट मुस्कुरा रही है उसके पार मुस्कुरा रहा है एक खूबसूरत हरा समन्दर...खुद से किया वादा निभाने जा रही हूँ कि जियूंगी जी भर के इस बरस...

पहाड़ तू तो मेरा दगढ़िया ठैरा


- चन्द्रकला भंडारी

हाँला पहाड़,तू कैसे सोच सकता है कि तेरी याद नहीं आती. तूने ही तो दी थी मुझे कठोर जीवन की आपाधापियों के लाधने की शिक्षा. मैं कैसे बिसर सकती हूँ असौज(सितम्बर और अक्टूबर का महीना जिसमें पहाड़ में खूब काम होता है एक तरफ घास काटना,खेतों में अगली फसल की तैयारी करना,जाड़ों के लिए कच्ची और सुखी लकड़ियों का इंतजाम करना इन महीनों में तो पहाड़ की औरत शायद ही कभी दिन का भात खाती होगी) के महीने में नमकीन पसीना पोंछते हुए पीठ पर गाज्यो के पुले ढोते हुए अँधेरे होने से पहले घर पहुचनें की डर और बारिश की तनिक आशंका होने पर गाज्यो को एक जगह सारकर फटाफट लुटे की तैयारी करना. इजा तैयार रहती थी कि लगभग सौ पुलों याने एक लूटा बनाना. 

इजा कभी स्कूल नहीं गयी लेकिन उसका हिसाब किताब एकदम फिट रहता था. कडाके के ठण्ड में मैं और दीदी फटी एडियों को क्रैक क्रीम के बजाय कटोरी में मोम तेल की बत्ती बनाकर चीरों(विवाइयों) को डामना (भरना). सल्ला रुख से निकले छ्युल से सुबह सुबह चूल्हा जलाना और शाम को गोपत्योल व बांज की लकड़ियों से सगढ जलाना. बेशक तू शिकायत कर सकता है कि मैं भूल गई हूँ नहीं मेंरे मुंह में अभी भी भड्डू की दाल,कूण का भात,लोहे की भाद्याली का कापा, चुड़कानी और भांग की चटनी का निराला स्वाद सोचते ही उदेख लगने लगता है. एक बात तो कहना ही भूल गयी हाँ असोज में काम की असंता लगी रहती थी उसके बावजूद शाम की रामलीला में जाने का जोश. रामलीला के 11 दिनों में भी कुछ विशेष दिन सीता का स्वयम्बर,अंगद रावन संवाद,लक्षमण शक्ति,राजतिलक के लिए पिताजी से इजाजत लेने के लिए भूमिका बनाना. और पिताजी भी इस एवज में हमसे ज्यादे काम की अपेक्षा कर काम करवा लेना. मैं और दीदी शाम की ख़ुशी के चलते फट से निपटा देते थे. कोई थकान नहीं. आज मैं खोजने लगती हूँ महीने की संक्रान्ति के दिन चावल पीसकर देलीं में एपण बनाना और त्योहारों में सिंघल और बड़े. क्यों नहीं सीखा इजा से सिंघल बनाना. इजा के हाथ के तो तेरे जैसी जीवटता और मिठास थी. 

पहाड़ तू तो मेरा दगढ़िया ठैरा. अब तेरे को ना बोलूं तो किसे बोलूं घने जंगलों में लकड़ियाँ बीनना उन जंगलों में जंगली जानवरों का हमको देखा अनदेखी करना,टेढ़े-मेड़ें संकरों रास्तों से आसानी से पार कराकर घर में इजा का भद्याली में रखा हुआ चुड़कानी भात खाकर नौले में फोंला लेकर पानी भरने की हुड़क. अच्छा तुझे लग रहा रहा होगा ना ये तो गप लगा रही होगी. सच्ची बताऊँ आज भी मैं भिटोली का इन्तजार करती हूँ. घुघुतिया,उतरैणी को उसी तरह मनाती हूँ जैसा तेरे साथ मनाया करती थी बस एक अंतर आया आज मैं उसी रौ में काले कव्वा काले कव्वा नहीं कह पाती हूँ अडोस पड़ोस के साथ कॉम्पटीशन नहीं कर पाती हूँ. बच्चों को बताती हूँ तेरे साथ तो जब तक कौआ आकर हरे पत्ते में से कुछ उठा न ले तब तक पुकारते रहा करती थी. न जाने तूने कितनी परेशानियों को धैर्य से लड़ना सिखाया. कैसे भूल सकती हूँ तेरी जीवटता को. मेरे दगडी यार पहले प्यार की तरह तेरी आत्मीयता को भला मैं कैसे भूल सकती हूँ.

Tuesday, January 16, 2018

प्यार राजकुमार!


आज जो लिखने जो रही हूँ वो शायद कभी लिखा नहीं. सोचा भी नहीं. कुछ शरारती सा हो रहा है मन कि बड़े दिन बाद किसी पर दिल आया है. फ़िदा फ़िदा सा फील हो रहा है. बॉलीवुड के अभिनेताओं में सबसे पहले जिसको लेकर फ़िदा फ़िदा सा फील हुआ था वो थे शेखर कपूर. फ्रॉक वाले दिनों में 'उड़ान' धारावाहिक देखते हुए डीएम सीतापुर साहब अच्छे लगने लगे थे. आज भी लगते हैं. इसके बाद आमिर खान, अनिल कपूर से होते हुए राहुल बोस, नागेश कुकनूर, इरफ़ान, रणदीप हुड्डा (सिर्फ हाइवे फिल्म में) से चलते हुए बड़े दिन बाद मिला है कोई राजकुमार. राजकुमार राव इन दिनों नये शामिल हुए हैं पसंदीदा अभिनेताओं की लिस्ट में.

राजकुमार राव की जिस जिस फिल्म ने अलग से ध्यान खींचा था वो थी 'ट्रैप्ड'. गजब की अभिनय क्षमता. इसके बाद 'न्यूटन' ने दिल जीत लिया. 'अलीगढ' 'क्वीन' 'सिटी लाइट्स' 'हमारी अधूरी कहानी' का असर जो बैकग्राउंड में कहीं था  वो अब सामने आ गया. 'काई पो चे' का ख़ास असर नहीं हुआ था मुझ पर और 'शाहिद' अभी तक देखी नहीं है. 'ट्रैप्ड' जो मैंने हाल ही में देखी उसके बाद तो राजकुमार साहब राजकुमार हो गए. इसके बाद 'बरेली की बर्फी' में बन्दे की कलाकारी हीरो पर भारी पड़ी. किसी के फैन होने की यह इंतिहा ही होती होगी शायद कि ''मेरी शादी में जरूर आना' भी हॉल में देख आई. दिमाग फिल्म को लगातार कोसता रहा और दिल स्क्रीन पर अटका रहा. पहली बार किसी हीरो पर इस तरह फ़िदा हूँ...सुख में हूँ. जब तक कोई नया न आये राजकुमार साहब रहने वाले हैं...इरफ़ान तो हैं ही. मेरी दोस्त कहती है एक साथ कितनो की फैन हो सकती हो? मैं हंसकर कहती हूँ सबकी जगह सुरक्षित है. कोई किसी को डिस्टर्ब नहीं करता...हा हा हा...

(फीलिंग फनी)

Sunday, January 14, 2018

इच्छा और साम्थर्य की डोर पर लहराती पतंगे


नीले आसमान पर उड़ती फिरती हैं रंग-बिरंगी पतंगे कि मन बावरा हुआ जाता है, मन पतंग हुआ जाता है। आसमान छूने को बेकल पतंग। नील गगन में सजी-धजी इतराती लहराती पतंग।

जिस पतंग में मन बांधे देर से उसके लहराने में खुद को लहराते महसूस कर रही थी वो अचानक कट गई। गोल-गोल चक्कर खाती धरती पर गिर पड़ने की उदास यात्रा पर चल पड़ी वो। मन नहीं था कि आसमान चूमने की ख्वाहिश लिए जो सफर शुरू किया था वो इस तरह खत्म हो। सो नीम के एक पेड़ पर टंग गई। कई दिन टंगी रही। खुद को भरमाती रही कि कटी भले हो टूटी नहीं है, कोई उसे लूट ले ऐसा नहीं होने देगी वो। लड़कों का झुण्ड तमाम उपाय करता रहा कि उस तक पहुंच सके लेकिन वो किसी के हाथ न लगी।

पतंग कटने के साथ ही वो जो एक शोर उठा था उसमें नकारात्मक सुख था, काट देने का सुख। पतंग लूटने के लिए वो जो हुजूम दौड़ पड़ा था उसमें भी कोई छीन-झपट कर कटी हुई पतंग को हासिल करने का सुख था। जिसकी पतंग कटी उसमें पराजय का दुःख था जो प्रतिशोध में अबकी जिसने काटी थी पतंग उसकी पतंग को काटने का जुनून था और उसने एक नई पतंग को डोर पर चढ़ा दिया। डोर को ढील दी। पतंग फिर आसमान की ओर चल पड़ी। आसमान छूने नहीं, किसी की पराजय का बदला लेने। पतंग का मन कोई नहीं जानता, उसका दुःख कोई नहीं सुनता। कि वो डोर से आजाद होना चाहती है और आजाद होकर भी उड़ना चाहती है, वो हार जीत का खेल नहीं जीवन का उत्सव होना चाहती है।

बचपन में पतंग के खेल देखकर मन में इच्छा होती थी कि मैं काश पतंग होती, डोर पर सवार होकर बादलों के गांव की सैर करती। काश मैं चिड़िया होती, उड़ती फिरती आसमान में। यह उड़ान की ख्वाहिश बड़े होने के साथ-साथ सवालों में बदलने लगी कि किसी और के हाथ में डोर होने का अर्थ समझ में आने लगा। कटने और काटने का खेल समझ में आना लगा। कटते ही धड़ाम से नीचे आ गिरने का दर्द समझ में आने लगा। तो एक रोज सारी डोर काट दीं और हाथों को पंखों की तरह फैलाया, उड़ने की इच्छा में सारी ताकत भर दी और महसूस किया कि सचमुच मैं उड़ रही हूं। मैंने पाया कि इस उड़ान में अकेली नहीं हूं। क्योंकि अपने मन की डोर पर चढ़कर दुनिया भर की स्त्रियां कामनाओं के आकाश पर उड़ती फिर रही हैं। जो इस तरह नहीं उड़ सकीं वो इस नई पीढ़ी की उड़ान पर मुग्ध हो रही हैं।

ये जो डोर का खेल है न, यह सदियों पुराना है। सबको अपनी-अपनी डोर की फिक्र है। डोर की मजबूती की फिक्र है। उसकी मजबूती को किये जाते हैं तरह-तरह के उपाय कि कहीं कोई कसर न रह जाए। यह खेल कुछ इस तरह रचा गया कि स़्ित्रयों को खुद को डोर के सुपुर्द करने में आनंद आने लगा। या कहंे कि यही उनके जीवन का आनंद है यह उनके मन में पैदा होते ही भर दिया गया जिसे वो जीने लगीं। उत्सव किसी और के होते सजा-संवार कर डोर पर उन्हें चढ़ाया जाता। वो चढ़ भी जातीं इस बात से अनजान कि असल में उनके हाथ में कुछ भी नहीं। यह सजना-संवरना भी उनका नहीं, किसी और के मान का, प्रतिष्ठा द्योतक है। कि आजाद होना चाहें अगर वो गहनों के बोझ से तो परिवार की प्रतिष्ठा पर बन आती है, फलाने की बहू के गले में सोने की जंजीर तक नहीं। जंजीर, यानी चेन कितने मन से धारण करती हैं हम स्त्रियां, भला जंजीरों में कैद इच्छाओं को कैसे मिलेगा खुला आसमान और अपनी उड़ान। कि वो पतंगबाजी के खेल में बस डोर पर चढ़ाई और कट जाने पर दूसरी को चढ़ाये जाने के लिए ही तैयार की जाती हैं।

लेकिन अब यह खेल बदल चुका है। पंतगों से भरा आसमान अब दुपट्टों से भरा आसमान है। यह अब मुक्त कामनाओं से लहलहाता आसमान है। बहुत सारे ख्वाब इस आसमान पर लहरा रहे हैं। रंग-बिरंगे ख्वाब। इस छोर से उस छोर तक ये ख्वाब बिंदास उड़ते फिर रहे हैं। मानचित्र पर दर्ज सीमा रेखाओं से इन्हें कोई लेना-देना नहीं। एक हिंदुस्तानी ख्वाब तुर्की के ख्वाब से गले मिलते हुए कहता है, अरे हम तो एक जैसे हैं।

कोई सौ बरस पहले रूस के महान दार्शनिक, साहित्यकार निकोलाई के उपन्यास व्हाट इज टु बि डन की नायिका वेरा की आंखों में भी कुछ ख्वाब थे। ये वही ख्वाब मालूम होते हैं जो दरअसल अब हकीकत भी हैं।

ख्वाब और हकीकत के बीच बस जरा सा फासला होता है, इच्छाशक्ति भर का। और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की वो लाइनें कि सामथ्र्य सिर्फ इच्छा का नाम है एकदम सच मालूम होता है। बस चैकन्ना रहना है इतना कि हमारी आंखों में हमारे ही ख्वाब हों, खालिस हमारे ही। क्योंकि हम स्त्रियां बरसों से किसी और के ख्वाबों को अपना मानकर, किसी और के सुख को अपना मानकर, किसी और की जीत को, हार को अपना मानकर जिए जा रही हैं लेकिन वो जिसके ख्वाब, सुख, हार, जीत, इच्छाओं को हमने कभी धर्म, कभी रीति-रिवाज, कभी उत्सवधर्मिता के नाम पर ओढ़ा हुआ है क्या उन्होंनेे कभी हमारी इच्छाओं का मान किया। उन इच्छाओं का जो उनकी बोई हुई इच्छाओं से इतर थीं। क्या हमारे सुख उनके सुख हुए, क्या हमारी इच्छाओं को उन्होंने वैसे ही माथे से लगाया?

अगर लगाया होता तो क्यों होतीं भ्रूण हत्याएं, क्यों स्त्रियों को अपनी मर्जी से पढ़ने, जीवन साथी चुनने, खाने, पहनने, बोलने, चलने पर इतना हड़कम्प मचता है। क्यों होती हैं आॅनर किलिंग जैसी घटनाएं? उनकी इच्छा आपके सम्मान की हत्या क्यों होती भला?

यह बात पहले हम स्त्रियों को समझनी होगी कि यह जो हम हैं, क्या हम ही हैं सचमुच। यह उत्सव हमारे होने का उत्सव है क्या कि हम किसी के उत्सव का सामान भर हैं, सजी-धजी कठपुतलियों जैसे।

बहुत सारी स्त्रियों ने अपनी डोर को काट दिया है, उनकी उड़ान पर जमाना मुग्ध भी है और बौखलाया भी। वो अपने घर की स्त्रियों की डोर अब और मजबूत करना चाहते हैं। विश्वास दिलाते हैं तुम जितना उड़ना चाहो उड़ो, तुम्हें पूरी आजादी दूंगा, चिंता मत करो। लेकिन इसमें यह भाव भी निहित है कि डोर तो मेरे ही हाथ में रहेगी। कभी पिता, कभी भाई, कभी पति, कभी प्रेमी, कभी पुत्र हमारी डोर के वाहक। डोर से मुक्त होने का अर्थ किसी के विरोध में जाने, किसी के खिलाफ जंग छेड़ने का ऐलान नहीं है लेकिन डरी हुई सत्ताएं इसे इसी रूप में देखती भी हैं और प्रचारित भी करती हैं। भला बताइये, कोई अपनी मर्जी से सांस लेना चाहता है बिना आपकी परमीशन के इसमें विरोध क्या हुआ, इसमें जंग कहां से छिड़ गई?

अब स्त्रियों ने सदियों से सत्तासीन लोगों की असुरक्षा को भांप लिया है। यह डर और कुछ नहीं सत्ता खोने का डर है। जबकि स्त्रियों का इरादा सत्ता पाने का नहीं सत्ताविहीन धरती सजाने का है। कि मालिक के पदों को मिलकर ध्वस्त करो और साथी बनो। डोर सारी कट जाएं लेकिन उड़ान न कटे, न टूटे। तुम भी उड़ो जी भर के, हम भी उड़ें...यह आसमान हमारे साथ होने की खुशबू और रंगों से भर दें....

- प्रतिभा कटियार

(डेली न्यूज़ में प्रकाशित http://epaper.dailynews360.com/1499400/khushboo/10-01-2018#page/1/3)