Wednesday, August 1, 2018

बाइक राइडर गजेन्द्र रौतेला के कुछ रोमांचक एहसास

गजेन्द्र रौतेला पेशे से शिक्षक हैं मन से विद्यार्थी. मैंने उन्हें एक बेहद क्रिएटिव ऊर्जा से लबरेज और संवेदनशील युवा के रूप में जाना है. कक्षा में वे बेहतरीन प्यारे दोस्त जैसे शिक्षक होते हैं, कैमरा उठा लेते हैं तो न सिर्फ खूबसूरत नजारों को कैद करते हैं कैमरे में बल्कि खबरों का, सामजिक सरोकारों का आईना बन जाते हैं. माउंटेनिंग, बाइकिंग, ट्रेकिंग, उनके पक्के दोस्त सरीखे हैं. केदारनाथ आपदा का समय हो या हाल ही में साम्प्रदायिकता की चपेट में अगस्त्यमुनि को झुलसने से बचाने की कवायद, गजेन्द्र सबसे पहले हाजिर होते हैं. उनकी जो बात इन सबसे परे उन्हें खास बनाती है वो है उनकी सादादिली. वो अपने किसी भी काम का जिक्र सुनकर गहरे संकोच में धंस जाते हैं. गजेन्द्र ने अपना एक यात्रा संस्मरण 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए देकर 'प्रतिभा की दुनिया' का मान बढाया है.- प्रतिभा


पढ़ने लिखने की संस्कृति के बहाने बाईक राइड वाया अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग (9:45 AM)-गैरसैंण-भिकियासैंण-रामनगर-काशीपुर-APF संस्थान दिनेशपुर उधमसिंहनगर 7:30 PM

दिनांक: 21 जून 2018
कभी-कभी खुद से बातें करते हुए अपने आस-पास की चीजों को महसूस करते हुए बाइक राइड करना एक अलग एहसास देता है। गुजरते वक़्त हर जगह की सरसराती कहीं गर्म, कहीं ठंडी हवा उस जगह के एहसास को भीतर तक महसूस करा लेती है।लगभग दो दशक बाद फिर से अगस्त्यमुनि से दिनेशपुर(रुद्रपुर) तक बाइक से गुजरने का मौका मिला ।बहुत सी चीजों में बदलाव भी देखा तो राज्य बनने के बाद भी बहुत कुछ यथावत भी।लगभग 350 किमी की इस बाइक राइड में गैरसैंण को राजधानी बनने की आस लगाए भी देखा तो बंजर होते खेत और खंडहर होते घर भी। बहुत कुछ झकझोर भी गया तो कुछ उम्मीदें बढाते प्रयोग भी। रामगंगा के किनारे बसा गणाई चौखुटिया के आस पास के रुपाई होते सेरे (खेत) आज भी यही बता रहे हैं कि जहाँ स्वाभाविक रूप से संसाधन उपलब्ध हैं वहाँ लोगों ने इनका भरपूर उपयोग भी किया है। वहीं दूसरी तरफ देवभूमि कहे जाने वाले राज्य में प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर वृद्ध केदार भगवान भी वैसे ही उपेक्षित हैं जैसे हमारे समाज में भी वृद्धजन उपेक्षित हैं यह अद्भुत साम्य है जहाँ इंसान और भगवान में कोई फर्क नहीं दिखता।

भतरौजखान के आस-पास का इलाका राज्य बनने अट्ठारह वर्षों के बाद भी पानी के संकट से जूझ रहा है।महिलाएं और बच्चे अपनी दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा पानी की जद्दोजहद में लगा दे रहे हैं। पूरे रास्ते भर छोटे-बड़े डिब्बों के साथ बच्चे और महिलाएं पानी के लिए भटकते हुए दिख जाते हैं। जबकि भतरौजखान के आस-पास का पूरा इलाका गढ़वाल क्षेत्र के लगभग धनौल्टी जैसा ही है । यदि इसको भी एक टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित किया जाता तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी विकसित होते। भतरौजखान और मोहान के बीच का क्षेत्र कुछ छिटपुट बदलाव के बावजूद आज भी वैसा ही दिखता है जैसा राज्य बनने से पहले था। हाँ, कुछेक निजी पर्यटन व्यवसायियों द्वारा स्थापित कुछ अभिनव प्रयोग जरूर दिखाई दे जाते हैं।लेकिन दूसरी तरफ कभी उत्पादक रहे खेत और खंडहर होते घर हमारी आधुनिक जीवनशैली तथा पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी को बयां करती है। कभी अन्न उत्पन्न कर रहे इन बंजर खेतों में आज डिजिटल इंडिया के मोबाइल टावर उग आए हैं।यह नए उभरते भारत की एक बानगी भर है।यह भी सोचनीय है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य की जो सांस्कृतिक पहचान स्थापित होनी चाहिए थी अफसोस है उसमें आज भी हम बहुत पीछे हैं। अब देखना यह है कि इन खोखली हो चुकी जड़ों के सहारे ये दरख़्त कब तक बची -खुची मिट्टी के सहारे अपना अस्तित्व बचाये रख सकते हैं यह एक बड़ा प्रश्न है।


दिनांक : 26 जून 2018

स्थान : दिनेशपुर(रुद्रपुर) 5:30 AM-हल्द्वानी-भीमताल-भवाली-गरमपानी-भुजान-रिची-बिनसर महादेव(अल्मोड़ा)-भिकियासैंण-गैरसैंण-रुद्रप्रयाग-अगस्त्यमुनि (9PM)
दूरी लगभग 350 KM

अक्सर हम लोग किसी भी यात्रा की विशेष रूप से तैयारी और खास योजना बनाकर निकलते हैं । लेकिन कई बार इस तरह की योजनाबद्ध तरीके से की गई यात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण नए रास्तों की तलाश और नई जगहों को देखने की चाह में की गई आवारगी भरी यात्रा ज्यादा प्रभावी और यादगार हो जाती हैं।वैसे ही रही इस बार की मेरी 700 किमी की अकेले की बाइक राइड। एपीएफ के सौजन्य से 25 जून को सम्पन्न हुई 'पढ़ने लिखने की संस्कृति' के समागम के पश्चात 26 जून की सुबह 5:30 पर दिनेशपुर से वाया हल्द्वानी,भीमताल,भवाली पहुंचा तो डेढ़ दशक पुरानी यादें ताजा हो गई।

जिस सलडी में उस वक़्त गिने चुने कुछ ही कच्चे ढाबे थे वहां आज खूब सारे पक्के ढाबे दिखाई दे गए और चहल-पहल भी। भीमताल में कम होता पानी और चारों तरफ बड़े-बड़े होटलों की संख्या बढ़ते जाना मन में चिंता भी बढ़ा गई। भवाली का मेरा आशियाना जोशी जी की पीली कोठी भी कुछ उदास सी दिखी ज्यादातर बच्चे रोजगार के लिए बाहर ही हैं शायद इसलिए । कुछ देश में तो कुछ विदेशों में।यही हमारे पहाड़ की नियति है । चाहे वो गाँव हो या कोई कस्बा पलायन की मार सभी जगह है लेकिन इसका प्रभाव अलग-अलग दिखता है । जहां एक तरफ कस्बे वाले एक निश्चित अवधि में आते-जाते रहते हैं वहीं दूसरी तरफ सुदूर गाँव से गए वाशिंदे को अक्सर शहर निगल जाते हैं। भवाली के बाद गरमपानी में दुकानें तो बढ़ी हैं लेकिन जिस पानी के धारे के कारण गरमपानी को जाना जाता था वो धारा भी अब हमारी चेतना और संवेदनाओं की तरह लगभग नदारद ही है। जो धारा पहले सार्वजनिक था अब उसमें जितना भी पानी शेष बचा है पाइपों में कैद होकर व्यक्तिगत हो गया है।डर लगता है कि यह व्यक्तिगत होने का सुख किसी दिन खुद से बातें करने के लिए खुद की अनुमति ही न माँगने लगे ।भयावह होगा वह दिन तो।सोचिएगा जरूर।खैरना होते हुए रानीखेत का परम्परागत रास्ता चुनने के बजाय मैंने भुजान होते हुए भिकियासैंण पहुंचने का विकल्प चुना।अक्सर नए रास्ते आपको नए किस्म की चुनौती और एक नई दृष्टि भी देते हैं । भुजान से तीपोला सेरा,तुनाकोट सेरा,बगवान और विशालकोट गाँव होते हुए रिची पहुंचा।भुजान से कुजगड़ नाले के साथ-साथ चलते यह देखकर सुखद एहसास हुआ कि उस बीस -पच्चीस किलोमीटर के क्षेत्र में कुजगड़ के दोनों ओर सब्जी उत्पादन का शानदार काम हो रहा है। और उससे भी बड़ी बात यह कि वो भी सिर्फ स्थानीय लोगों के द्वारा।नेपाली मूल या अन्य कोई भी नहीं। मेरे लिए ये जानकारी किसी आश्चर्य से कम नहीं थी।अक्सर इस तरह की सब्जी उत्पादन का कार्य अधिकांशतः हमारे यहां नेपाली मूल के नागरिक ही करते हैं।तिपोला सेरा में सब्जी उत्पादक लाल सिंह जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि-"हमारे क्षेत्र में बाहरी मजदूर कोई मिलता ही नहीं है इसलिए सारा काम खुद ही करना पड़ता है। बीज-खाद आदि खैरना-गरमपानी से या फिर हल्द्वानी से ही लाते हैं और बेचते भी वहीं हैं।सरकार द्वारा न तो बेचने के लिए कोई सुविधा दी गई है और न ही खाद-बीज की ही।सब कुछ स्वयं ही व्यवस्था करनी पड़ती है । यहां तक कि नहरों की मरम्मत तक भी हमें ही करनी पड़ती है।सरकार की गिनती में ये कोई काम थोड़े ही न हुआ ।" लेकिन ये देखकर मैं भी हैरान था कि बिना पानी वाले उखड़ के खेतों में भी स्थानीय लोग उखड़ के अनुकूल सब्जी उत्पादन कर रहे थे। सलाम है ऐसी जीवट जिजीविषा के लोगों के लिए।मेरे लिए तो यह दृश्य एक तरह से आंखें खोलने वाला ही था।

उसके बाद विशालकोट के आस-पास किसी नवयुवक द्वारा लिफ्ट माँगे जाने पर कुछ दूरी के लिए एक नया साथी मिल गया।पूछने पर पता चला कि इस बार दसवीं पास कर ग्यारवहीँ में गया है और नाम है रोहित मिश्रा।वह राजकीय इंटर कॉलेज पन्तस्थली में है और अपने ममाकोट आया हुआ था और गाड़ी न मिलने के कारण परेशान था और जाना था बिनसर महादेव में चल रही पूजा और मेले में। रिची तक साथ आने के बाद मेरा भी मन हुआ कि क्यूँ न साथी का साथ पूरा निभाया जाए तो हम भी चल दिए साथ बिनसर महादेव के रास्ते पर अपने नौजवान दोस्त रोहित मिश्रा के साथ 8 किलोमीटर दूर बिनसर महादेव। बिनसर महादेव पहुंचते ही समझ आया कि वास्तव में यह कितना बड़ा मेला है।दो घण्टे मेले की रौनक देखने के बाद रिची में खाना खाने के बाद दस-बारह किलोमीटर चला हूँगा तो पिछली रात की अधूरी नींद जोर मारने लगी।सड़क किनारे दाहिने तरफ एक सुनसान सा वीरान पड़ा मंदिर एक सुकून भरी नींद के लिए सबसे बढ़िया विकल्प मिल गया तो वहीं एक-डेढ़ घण्टे की मीठी नींद सो लिए।ट्रक के तेज हॉर्न ने नींद में खलल डाली तो मन ही मन शब्दों से पवित्र कर दिया उसको भी । आखिर मंदिर का प्रभाव जो हुआ ठैरा।सुस्ताते हुए भिकियासैंण होते हुए गैरसैंण-कर्णप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए रात 9 बजे लगभग 350 किमी की बाइक राइड के बाद अगस्त्यमुनि घर पहुंचे।

इस दौरान यह समझ भी आया कि चाहे कुमाऊं हो या गढ़वाल क्षेत्र महिलाओं की घास-लकड़ी-पानी की दिक्कतें एक सी ही हैं।राज्य को बनाने में जिस मातृ शक्ति ने सबसे ज्यादा संघर्ष और यातना झेली राज्य बनने के 18 वर्षों बाद भी उन की मूलभूत समस्याएं जस की तस हैं।आदिबद्री के आस-पास किसी नवयुवती को घास की कंडी पीठ पर लादे बारिश की रुमझुम में सरपट स्कूटी में भागते देखा तो लगा कि आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल ऐसे भी हो सकता है।लेकिन जिनके पास सीमित साधन हैं या फिर उम्रदराज ईजा-आमा हैं उनका क्या ? तो खयाल आया कि क्या 108 जैसी इमरजेंसी सेवा की तरह ही कोई घसियारी एक्सप्रेस जैसी कॉल 10.......जैसी सेवा शुरू नहीं की जा सकती ? अक्सर देखा जाता है कि सड़कों पर हमारी माँ-बहनें जंगल से घास-लकड़ी लाने के बाद थकी -हारी सड़कों पर किसी ट्रक-गाड़ी का इंतज़ार करते हुए घण्टों भूखे-प्यासे गुजार देती हैं।उसके बाद भी यदि कोई रहमदिल ड्राइवर हो तो गाड़ी रोक लेता है अन्यथा फिर सड़क की दूरी भी फिर पैदल ही नापना शुरू।ज्यादा नहीं तो कम से कम पहाड़ की रीढ़ कही जाने वाली इन माँ-बहनों के लिए सरकार का महिला एवं बाल कल्याण विभाग या फिर बहुत सारी निष्क्रिय पड़ी सहकारी समितियों के द्वारा इनके कार्यबोझ को कम करने की कोई कोशिश तो की ही जा सकती है।और यह काम कोई असम्भव जैसा भी नहीं क्योंकि अक्सर महिलाएं वक़्त चाहे कोई भी हो समूह में ही जाती हैं घास-लकड़ी लेने के लिए जंगल।जब इनके द्वारा लाये गए घास से पल रहे जानवरों के दूध के कलेक्शन और बिक्री के लिए दुग्ध समितियां और गाड़ी हो सकती हैं तो इनके कार्यबोझ को कम करने के लिए 'घसियारी गाड़ी' क्यों नहीं हो सकती।सरकार बहादुर थोड़ा गौर जरूर कीजिए।और अगर आपके बस की बात न हो तो नाक पर हाथ रखकर जनता पर सेस लगाइए हमें खुशी होगी इसके लिए सेस देने पर।लेकिन करिये जरूर।
मेरा नई पीढ़ी के आवारा-घुमक्कड़ों से भी आग्रह है कि जहाँ तक सम्भव हो वे भी निकलें कभी कभार यूँ ही पहाड़ी रास्तों से अपने राज्य को जानने समझने और महसूस करने के लिए।पहाड़ के कठिन रास्ते होने के पूर्वाग्रहों से बाहर निकलिए और खोजिए-बनाइये अपने राज्य के नव निर्माण के नए रास्ते।तोड़ डालिए उन अवरोधों को जो आपके रास्ते की अड़चन बनें।तभी उत्तराखंड बनने की यात्रा भी सफल होगी ।अन्यथा हमारी आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी कि आखिर हमने अपनी जिम्मेदारी क्यों कर नहीं निभाई।

Sunday, July 29, 2018

असफल प्रेमिकाएं- असीमा भट्ट




वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हब्बा की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी - ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती है उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’ कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं दिन, महीने और तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते - कमली है तू
और वो खुद पर ज़ोर ज़ोर से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा था
क्या करती, ठीक से दिखा ही नहीं
असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली घबरा जाती हैं, रोती हैं तकिये
में मुंह रख कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती होगी उनके प्रेमी के कानों में
वो अच्छा हो, वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ
असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या तो पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर
वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली कलाई
किसी से न बर्दाश्त हुआ सदमा और रुक गयी दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे प्यार का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने लगे - प्यार का कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं - एक झलक देखना चाहती हूँ
छूना चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी मजबूत बाहों में पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते - ‘क्या बचपना है, यह सब बकवास है.’
ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं - खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं - यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस नहस करके रख दी उनकी जिंदगी
तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं और तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो प्रेमिकाएँ हैं
प्रेतात्माएं नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब तक वो करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार ...
https://www.youtube.com/watch?v=LhzBPGTydSs

Thursday, July 19, 2018

आपके साथ बीडी पीना तो रह ही गया नीरज जी


(एक पुराना लेख जो उनके जन्मदिन पर लिखा था.)



'आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी’ - नीरज

एक- एक नन्ही सी लड़की चुपचाप अपनी फ्रॉक के किनारी पर लगी फ्रिल को कुतरा करती थी. वो खामोश रहती थी. उसके कोई दोस्त नहीं थे. स्कूल में अपने हम उम्र बच्चों के बीच भी वो अकेली ही थी. क्लास में बैठकर क्लास के बाहर ताका करती और घंटी बजने का इंतजार करती. घन्टी बजते ही सब बच्चे खेल के मैदान की ओर दौड़ जाते और वो धीमे क़दमों से मैदान के किसी कोने में अकेले टिफिन खाती और अकेली घूमती रहती. वो टीचर्स की फेवरेट नहीं थी. घर में उससे यह पूछने वाला कोई नहीं था कि ड्रेस चेंज की या नहीं, खाना खाया या नहीं. ऐसे में भला ये कौन पूछता कि स्कूल में दिन कैसा रहा? क्योंकि उसके माँ बाप जीवन के दूसरे संघर्षों में उलझे थे. उस कक्षा एक में पढ़ने वाली नन्ही लड़की का अकेलापन भांप लिया एक शिक्षक ने जिनका नाम था गोपी सर. गोपी सर भी शायद स्कूल में, या हो सकता है जीवन में ही उस नन्ही बच्ची की तरह अकेले थे. उन्होंने स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए उस नन्ही बच्ची के तरह अकेले और उपेक्षित रह गए बच्चों की ओर हाथ बढ़ाया. ये वो बच्चे थे जिन्हें स्कूल के किसी कार्यक्रम में जगह नहीं मिलती थी, ये सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनते और ताली बजाते. गोपी सर ने उन सारे छूट गए उपेक्षित बच्चों का हाथ थामा और उनके लिए एक कार्यक्रम की योजना बनाई. कार्यक्रम तैयार हुआ ‘कवि सम्मेलन का’. कक्षा एक में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को सुंदर-सुंदर कविताओं की कुछ छोटी-छोटी लाइने दी गयीं. उन्हें बाकायदा ड्रेसअप किया गया. अब वो बच्चे भी उत्साहित थे. उन बच्चों ने पहली बार मंच पर उन कवियों की कवितायेँ पढ़ीं जिनका शायद नाम भी नहीं सुना था. जिन्हें कविता होती क्या है यह भी पता नहीं था. ये 32 बरस पुरानी बात है. वो ‘इंडियन आइडियल’ और ‘सुपर डांसर’ जैसे कार्यक्रमों का समय नहीं था. उन बच्चों के जीवन में यह छोटी सी प्रतिभागिता बहुत महत्वपूर्ण थी. गोपी सर ने उस रोज न सिर्फ उन बच्चों का हाथ थामा था बल्कि उनकी जिन्दगी में हमेशा के लिए कविता का एक बीज बो दिया था. वो नन्ही सी लड़की मैं थी. उस रात मैंने जिस कवि की कविता पढ़ी थी उनका नाम है गोपालदास नीरज. यह मेरे जीवन में कविता की पहली आहट थी. वो लाइनें टूटी फूटी सी ही याद रहीं, ‘कोई कैसे जिए अब चमन के लिए, शूल भी तो नहीं हैं चुभन के लिए’.

दो- जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाये थे. घर में बेलटेक का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था, फिलिप्स का रेडियो भी था जिसका इस्तेमाल ‘बीबीसी की ख़बरें’ या ‘बिनाका गीतमाला’ और ‘हवा महल’ सुनने के लिए होता था, कभी-कभी ‘फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम’ भी. कब कौन सा कार्यक्रम रेडियो पर सुना जायेगा यह तय करने का हक बच्चों का नहीं होता था. ऐसे में टेप रिकॉर्डर आना सुखद घटना थी. चूंकि टेप रिकॉर्डर पापा लाये थे तो जाहिर है अपनी ही पसंद की चार कैसेट भी लाये थे. महीनों वो चार कैसेट ही मेरी खुराक बने रहे. उन चारों कैसेटों में से जिनमें एक थी ‘लता के सुपरहिट गीत’, दूसरी थी ‘मेरा नाम जोकर’, तीसरी थी ‘मुकेश के गीत’ और चौथी थी ‘नई उमर की नई फसल.’ मैंने पहली बार इस फिल्म का नाम सुना था. धीरे धीरे यह कैसेट मेरी फेवरेट हो गयी. ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’ तो मुझे अच्छा लगता ही था इस कैसेट का एक और गीत मुझे बेहद पसंद था, आज भी बहुत पसंद है ‘आज की रात बहुत शोख बहुत नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, अब तो तेरे ही यहाँ आने का ये मौसम है, अब तबियत न ख्यालों से बहल पाएगी...’ इस तरह कोई कैसेट जो मेरी प्रिय कैसेट के रूप में और कोई कवि या गीतकार मेरी फेवरेट लिस्ट में पहली बार शामिल हुआ वो थे गोपालदास नीरज.

पत्रकारिता के दिनों की मेरे सबसे गाढ़ी कमाई यही है कि इस दौरान ढेर सारे प्यारे लोगों से मुलाकातें हुईं, उनसे स्नेह हासिल हुआ, दुलार मिला. इसी गाढ़ी कमाई में शामिल है गोपालदास नीरज का नाम भी.

अब तक मैं उन्हें काफी पढ़ चुकी थी. उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. अख़बारों में जिस तरह की अफरा-तफरी के माहौल में काम होता है उसमें महसूस करने की स्पेस बहुत कम होती है. उनका इंटरव्यू लेना एक असाइनमेंट भर था. यह उन दिनों की बात है जब मेरी नयी-नयी शादी हुई थी और जैसा कि नयी शादी के बाद का तमाशा होता है पार्टीबाजी, सोशलाइज़िंग वगैरह तो उसका दबाव भी था. तो मुझे ऑफिस से रात नौ बजे निकलकर इंटरव्यू लेना था और साढ़े नौ बजे साड़ी पहनकर किसी पार्टी में जाना था (तब तक ‘न’ कहना सीखा नहीं था).

बहरहाल, जल्दी-जल्दी में इंटरव्यू हुआ और अच्छा हुआ. अगले दिन हिंदुस्तान अख़बार में ‘नीरज खड़े प्रेम के गाँव’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ. मैंने साड़ी लपेटकर, लिपस्टिक पोतकर पार्टी भी अटेंड की लेकिन मन उखड़ा ही रहा. मुझे लगा मैं मिली ही नहीं नीरज जी से, इसे क्या मुलाकात कहते हैं, इसे क्या बात होना कहते हैं. स्टोरी भले ही सफल रही हो लेकिन मन खिन्न ही रहा लम्बे समय तक. हालाँकि इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी सुनाई थी, बहुत मन से.

खैर, वक़्त ने न्याय किया. इसके बाद मेरी नीरज जी से कई मुलाकातें हुईं. कुछ अख़बारों में दर्ज हुईं कुछ नहीं भी क्योंकि अब तक मेरी उनसे दोस्ती हो चुकी थी. वो शहर में होते तो हम जरूर मिलते. ढेर सारी बातें करते. मैं उन्हें सुनती ज्यादा, सवाल कम करती. पूछकर जानना मुझे सूचनात्मक ही लगता है, महसूसने की आंच में पकते हुए यात्रा करना असल में जानने की ओर जानना लगा हमेशा सो कोशिश भर यही किया, और असाइनमेंट के बोनस में खूबसूरत दोस्तियाँ और स्नेह हासिल किया.

एक शाम जब वो मंच पर थे तो मुशायरे की स्तरहीनता से मेरा मन बहुत उदास हुआ था. उस शाम नीरज जी ने याद किये थे वो तमाम मुशायरे जब मंच पर साहिर, शैलेन्द्र, कैफ़ी वगैरह हुआ करते थे. वो उन सोने सी दमकती रातों का जिक्र करते हुए बहुत खुश थे, उनकी आँखों में चमक थी. उन्होंने गीतों की यात्रा पर बात की. किसी बात के अर्थ किस तरह खुलते हैं, गीत किस तरह दार्शनिक यात्रा तय करते हैं और सुनने वालों को न सिर्फ सुकून देते हैं बल्कि उनका परिमार्जन भी करते हैं, एक अलग यात्रा पर ले जाते हैं यह लिखने वालों और सुनने वालों दोनों को समझने की जरूरत है. साहिर और शैलेन्द्र को वो काफी याद करते.

मैंने उनसे एक मुलाकात में जिक्र किया अपने बचपन वाले कवि सम्मेलन का और उनकी उस कविता भी जो मुझे ठीक से याद भी नहीं रही...वो हंस दिए थे उस बचकाने से किस्से पर. उन्हें भी कविता याद नहीं थी. वो हमेशा खूब पढ़ने को कहते, जिन्दगी जीने को कहते. उनकी कविताओं को उनके कमरे में चाय पीते हुए सुनना किसी ख़्वाब को जी लेने जैसा होता था...उनका कविता पढ़ने का ढंग मुझे बहुत म्यूजिकल लगता. हालाँकि उनकी आवाज कांपने लगी थी. लखनऊ में चारबाग के पास के एक होटल में उनसे अब तक की आखिरी मुलाकात हुई थी, उस रोज उन्हें चलने में काफी दिक्कत हो रही थी. मेरा मन बहुत उदास था. आयोजकों ने उनके सम्मान के साथ इन्साफ नहीं किया था. उनके रहने की व्यवस्था बहुत सामान्य थी. जबकि उसी कार्यक्रम के लिए आये प्रसून जोशी सरीखे लोगों के लिए दिव्य व्यवस्था थी.

हम बुजुर्गों के सम्मान का भाषण देना जानते हैं, उनके नाम उनकी शोहरत को कैश कराना भी जानते हैं लेकिन उनके साथ इन्साफ नहीं करते. सचमुच मेरा मन बहुत उखड़ा था, वो शायद मेरा मन पढ़ चुके थे. बीड़ी पी चुकने के बाद उन्होंने मेरा मन हल्का करने को कहा ‘एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ.’ मैंने छलक आये अपने आंसुओं को सहेजते हुए कहा था, ‘अरे आपसे तो मिलना होता ही रहता है, अभी आप आराम करिए, फोटो फिर कभी खिंचवा लेंगे.’ वो हंस दिए थे...’क्या पता अगली बार हो ही नहीं’. मेरी आंसुओं को सहेजने की सारी मेहनत वो बेकार कर चुके थे...तस्वीर खींची जा चुकी थी...मन की उदासी कायम ही रही...आज उनका जन्मदिन है...उन्हें बहुत बहुत याद करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर रही हूँ. दुआ कर रही हूँ कि सेल्फियों और फेसबुक के लाइक्स की भीड़ में बदलता यह समाज, तमाम सामाजिक खांचों में बंटा समाज, हिंसा और आत्ममुग्धता से तृप्त होता समाज, नकली संवेदनाओं का नया मार्केट बनता यह समाज अपनी इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों को सहेजना सीख सके...काश!

प्यारे नीरज जी, आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपसे मिलना है जल्दी ही फिर से और सुननी हैं बहुत सी कवितायेँ...इस बार आपकी बीड़ी भी पियूंगी...पक्का. लव यू ऑलवेज, हैपी बर्थडे!


Saturday, July 14, 2018

आइये चलें विदेश बिना पासपोर्ट वीजा

हेम पन्त रचनात्मक ऊर्जा से भरे उन युवाओं में से हैं जो अपने हर लम्हे को भरपूर जीने में और उस जिए से समाज को जोड़ने में यकीन करते हैं. पेशे से इंजीनियर हेम क्रिएटिव उत्तराखंड मंच से शुरुआत से जुड़े हैं. उन्होंने पढ़ने लिखने की संस्कृति के विकास के लिए एक सृजन पुस्तकालय बनाया है. वो 'क' से कविता से जुड़े हैं. थियेटर करते हैं. घुम्म्क्कड़ी, संगीत, साहित्य पढ़ने में खूब रूचि रखते हैं और हर काम में कुछ नया करने को बेताब रहते हैं. पिछले दिनों वो नेपाल यात्रा पर गए तो उन्होंने 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए कुछ संस्मरण लिखे।आइये पढ़ते हैं उनके संस्मरण- प्रतिभा 

नेपाल का एक दृश्य 
एक दृश्य जहाँ हम ठहरे गये 

प्राकृतिक विविधता और हर तरह के पर्यटक के अनुसार मनोरंजन साधनों के कारण नेपाल फिर से तेजी के साथ घुमक्कड़ों की पसन्द बनता जा रहा है। सीमा पार करने की सुगम सुविधाओं के कारण भारत से हर साल भारी संख्या में लोग नेपाल घूमने जाते हैं। लम्बे समय तक राजनैतिक अस्थिरता के बाद अब उथल-पुथल रुक गई है, संविधान का निर्माण हो चुका है और अब नेपाल के लोगों को उम्मीद है कि देश में तेजी से विकास होगा।

पिछले दिनों साथी सुनील सोनी के साथ उनकी कार से नेपाल के दो राज्यों में घूमने का मौका मिला। रविवार दिन में लगभग 4 बजे रुद्रपुर से निकलने के बाद हम दोनों लोग बनबसा (गड्डाचौकी) बोर्डर से होते हुए उसी शाम 7 बजे महेन्द्रनगर पहुंचे। अब रुद्रपुर से बनबसा तक सड़क की स्थिति बहुत अच्छी है। नेपाल की सीमा में प्रवेश करने के बाद कार का शुल्क (लगभग 300 भारतीय रुपये प्रतिदिन) देकर आसानी से रोड परमिट बन जाता है। हम लोगों का रात का विश्राम धनगढ़ी में था। महेन्द्रनगर से धनगढ़ी तक शुक्लाफांटा नेशनल पार्क के बीच से गुजरते हुए बहुत ही सुगम सड़क है। नेपाल में हर जगह सड़कों का काम बहुत तेजी से हो रहा है।

रात लगभग 9.30 बजे हम लोग धनगढ़ी शहर पहुंचे जहाँ हमारे मेजबान श्री केदार भट्ट जी हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मूल रूप से पिथौरागढ़ के निवासी श्री केदार भट्ट धनगढ़ी शहर के प्रतिष्ठित शिक्षक हैं। लगभग 40 साल से नेपाल में रहते हुए उन्होंने शहर में विज्ञान शिक्षक के रूप में बहुत नाम कमाया है, अभी भी धनगढ़ी में कई स्कूलों के साथ जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। श्रीमती भट्ट भी योग प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं।

नेपाल में संविधान निर्माण के बाद 7 राज्यों का निर्माण किया गया है और अब वहां भारत की तरह ही त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। धनगढ़ी शहर को राज्य-7 की राजधानी बनाया गया है। यह एक तेजी से उभरता हुआ शहर है। शहर के आसपास ही भारतीय मूल के लोगों द्वारा संचालित कृषि आधारित औद्योगिक प्रतिष्ठान भी हैं। सड़कों के चौड़ीकरण का काम चल रहा है और बाजार-दुकानों में आधुनिकता की झलक दिखाई देने लगी है। एक अच्छी बात ये भी है कि नेपाल में अधिकांश दुकानें महिलाओं द्वारा चलाई जाती हैं। धनगढ़ी में कई उच्चस्तरीय पेशेवर शैक्षिक संस्थान भी हैं। यहां नॉर्वे की सहायता से स्थापित चेरिटेबल 'गेटा नेत्र अस्पताल' में आधुनिक मशीनों की मदद से सस्ती चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। इस अस्पताल में यूपी-बिहार की तरफ से भी लोग आंखों के ऑपरेशन करवाने आते हैं। दिनभर धनगढ़ी घूमने के बाद अगले दिन हमने नेपालगंज जाने का विचार बनाया।

अगली सुबह 6 बजे हम दोनों लोग कार से नेपालगंज शहर की तरफ निकले जो धनगढ़ी से लगभग 200 किमी दूर है। इस रास्ते पर लगभग 20 साल पहले भारत ले सहयोग से 22 पुलों का निर्माण किया गया है। सड़क बहुत ही अच्छी है। एक पहाड़ी श्रृंखला अधिकांश रास्ते में सड़क के समानांतर चलती है। सड़क के किनारे हरियाली भरे खेत, छोटे कस्बे और ग्रामीण जीवन के खूबसूरत नजारे दिखते हैं। जगह जगह धान की रोपाई लगाते हुए नेपाल के लोग पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर और खुशहाल नजर आते हैं। बीच रास्ते में 'घोड़ा-घोड़ी ताल' नामक एक सरोवर है जहां खूब कमल के फूल खिलते हैं। आगे जाकर चिसापानी नामक स्थान पर 'करनाली नदी' के ऊपर जापान के सहयोग से एक भव्य पुल बना हुआ है। इस पुल को पार करते ही 'बर्दिया नेशनल पार्क' का इलाका शुरू हो जाता है।

नेपाल में सभी संरक्षित वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना के हाथों में है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरती हुई शानदार सड़क पर भी सेना लगातार गश्त करती है। इस सड़क से गुजरते हुए कहीं भी रुकने की मनाही है। गाड़ी से प्लास्टिक या अन्य गन्दगी फेंकने पर भारी जुर्माना लगता है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरने वाले East-West National Highway पर वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए एक अनूठा तरीका है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' में प्रवेश करते ही वनचौकी पर रुककर वाहन का टाइम कार्ड बनता है। एक चौकी से दूसरी चौकी की दूरी के बीच 40किमी/घण्टा की स्पीड से दूरी तय करनी होती है। 13किमी दूरी के लिए लगभग 20-22 मिनट तय है। रास्ते मे कहीं भी गाड़ी रोकने की अनुमति नहीं है। जल्दी पहुंचने का मतलब है कि आपने गाड़ी तेजी से चलाई है और देरी से पहुंचने का मतलब आप रास्ते में कहीं रुके थे। दोनों स्थितियों में जुर्माना हो सकता है। जंगल से बाहर निकलते समय सेना द्वारा गाड़ी की एक बार फिर से अच्छी तरह जांच की जाती है। गाड़ी से जंगली जानवर को चोट पहुंचाने पर 6 महीने की सजा और एक लाख नेपाली रुपये जुर्माना।

नेपाल में ज्यादातर लोग बस-मैटाडोर से सफर करते हैं। रोड पर ट्रैफिक बहुत ज्यादा नहीं है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि 200% कस्टम ड्यूटी के कारण कार और बाइक बहुत महंगी हैं। भारत में जो कार ₹5 लाख की है वो नेपाल में ₹15 लाख में आएगी (लगभग 23-24 लाख नेपाली रुपये) बड़े और मध्यम स्तर के शहरों के बीच Air Connectivity भी बहुत अच्छी है। सड़कों की स्थिति ठीकठाक है और भारतीय गाड़ियों के लिए बहुत सुगमता है। हमारे साथी मुकेश पांडे और उमेश पुजारी पिछले साल इसी रास्ते बाइक पर पूरा नेपाल लांघते हुए भूटान तक गए थे।

भारत के लोगों के साथ नेपाल के निवासी बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। भाषा सम्बन्धी कोई खास समस्या भी नहीं होती। अकेले घूमने के शौकीन लोगों के लिए नेपाल में कई सुविधाएं उपलब्ध हैं और पारिवारिक भ्रमण के लिए भी नेपाल एक सुरक्षित स्थान है।

तो अगर आप दुनिया घूमने का शौक का शौक रखते हैं तो नेेेपाल से शुरुआत कीजिए, बिना पासपोर्ट और वीजा

‘नहीं, कभी नहीं’ के उस पार



इन दिनों वॉन गॉग साथ रहते हैं. सुबह की चाय हम साथ पीते हैं, शाम को हम एक साथ देखते हैं थके हुए सूरज का घर जाना और आसमान पर रंगों का खेल. रात हम बारिशों की धुन सुनते हैं. हम साथ होते हैं लेकिन खामोश रहते हैं.

मुझे यूँ चुप होकर साथ रहने वाले दोस्त अच्छे लगते हैं. रात भर बारिश हुई. गॉग और मैं इस बारिश की बाबत खामोश रहे. वो इस वक़्त प्रेम पर अटके हुए हैं, शायद मैं भी. ‘इस वक़्त’ के बारे में सोचकर ‘किस वक़्त नहीं’ मुस्कुरा रहा है.

यूँ प्रेम पर अटके होने का अर्थ है, उदासी के निकट होना. उदासी बरस जाए तो राहत हो, शायद इसीलिए मुझे बरसना पसंद है, गॉग को रंग बनकर बिखरना. हम दोनों एक दीवार के इस पार हैं जिसे उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार का नाम दिया है. वो बोल रहा है, मैं चुप हूँ. प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार चाइना वॉल से भी बड़ी और मजबूत लगती है. लेकिन दीवार के इस पार खड़ा प्रेम, हमेशा उस पार के ‘नहीं, कभी नहीं’ के आगे सजदे में रहता है. पीसा की मीनार ने क्या पता इन प्रेमियों से झुककर रहना सीखा हो.

वॉन गॉग थियो को लिखी अपनी चिठ्ठियों में लिखते हैं, ‘‘तुम बतलाओ कि क्या तुम्हें यह विस्मित नहीं करता कि कोई प्रेम इतना गंभीर और भाव-प्रवण हो सकता है कि कैसे भी बर्फीले ‘नहीं, कभी नहीं’ के बावजूद निष्कम्प जलता रहे? मुझे तो लगता है कि यह अत्यंत ही स्वाभाविक और सामान्य है.’’

यह स्वाभाविक और सामान्य होना सबके हिस्से नहीं आता, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रेम सबके हिस्से नहीं आता. तो इस प्रेममय उदासी के अपने जीवन में आने के प्रति आभारी होना चाहिए हमें. लेकिन हम तो शिकायत से भर उठते हैं.

गॉग कहता है, ‘’प्रेम इतना सुदृढ़, सच्चा और सकारात्मक भाव है कि इसमें अपनी भावनाएं वापस लेना उतना ही असम्भव है जितना अपने प्राण ले लेना.’ मेरा जीवन और मेरा प्रेम दोनों एक हैं. मेरे लिए फ़िलहाल यह ‘नहीं, कभी नहीं’ बर्फ की एक सिल्ली है, जिसे मैं अपने सीने के ताप से पिघलाने में जुटा हूँ.’

गॉग की तरह शायद बहुत सारे प्रेमी अपने सीने के ताप से ‘नहीं, कभी नहीं’ की बर्फ की सिल्ली को पिघलाने की कोशिश में होंगे. शायद न भी हों. गॉग ने अपने रंगों और लकीरों को जीवन से लिया है. उसने जिन रंगों का प्रयोग किया वो दुकान से लिए भले ही गए होंगे लेकिन उन्हें जीवन के, महसूसने के पानी में घोलकर उसने रचा वो अद्भुत है. उसने बिना जिए एक लकीर भी नहीं खींची, यूँ ही सांसों को आने-जाने का क्रम होने से बचाकर रखा, जिया उसने शायद तभी उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार के आगे ‘वही और दूसरी कोई नहीं’ की लकीर खींच दी. उसने थियो को लिखा, ‘मैं इसे कमजोरी न मानकर ताकत मानता हूँ. वह मेरा एकमात्र आधार है जिससे मैं हटना नहीं चाहता.’

‘नहीं, कभी नहीं’ का विलोमार्थी क्या होता होगा. गॉग ने इस विलोमार्थी को ‘वही, और कोई नहीं’ से गढ़ा. उसने भाई को लिखा कि, ‘अगर तुम्हें कभी प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ सुनने को मिले तो उसे चुपचाप स्वीकार मत करना.’

तो चुपचाप न स्वीकार करने का क्या अर्थ है आखिर, युद्ध करना, किससे, ‘नहीं कभी नहीं’ से या ‘वही और कोई नहीं’ से. अक्सर लोगों को इन दोनों के ही आगे घुटने टेकते पाया है. आज जो ‘वही, और कोई नहीं’ है कल वह ‘कोई और’ किस तरह हो जाता होगा मालूम नहीं. कभी-कभी लगता है, ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार से टकराना हमारे भीतर का कोई ईगो तो नहीं. तब तक उससे टकराना जब तक वो टूट न जाए. एक बार जो वो टूट गया तब? इसके आगे एक गहन शांति है. इस ‘नहीं, कभी नहीं’ का होना असल में हमारे होने को बचाए हुए है. यही उम्मीद है. गॉग कहते हैं कि, ‘’हम हमेशा यह बतलाने की स्थिति में नहीं होते कि वह क्या है जिसने हमें ढांप रखा है, बंदी बना रखा है. जो हमें दफन किये देता है, हालाँकि हम उन चट्टानों, उन दरवाजों, उन दीवारों को बखूबी महसूस करते हैं. क्या यह सब हमारी कल्पना या फंतासी है? मुझे नहीं लगता और मैं पूछता हूँ, हे ईश्वर! यह कितनी देर चलेगा, क्या आजीवन ऐसा ही कोहरा बना रहेगा? तुम जानते हो इस कारावास से मुक्ति कहाँ है? केवल एक सच्चे और गहरे प्रेम में.’’

सच्चा और गहरा प्रेम. क्या इसके अलावा भी कोई प्रेम होता है. प्रेम है तो उससे बड़ा सच कोई नहीं और उसकी गहराई आपको उदास सागर में डुबो देगी. ऐसे ही आता है प्रेम, सब ध्वस्त करते हुए. यही निर्माण की प्रक्रिया है. बिना प्रेम में पड़े हुए लोगों को कभी मालूम नहीं होता कि उन्हें प्रेम नहीं हुआ है, उन्हें उम्र भर मालूम नहीं होता इसलिए वो उदासी को प्रेम नहीं पढ़ पाते और प्रेमियों को ‘दुखी आत्मा’ कहते हैं. जबकि असल में वो सुखी आत्माएं ही हैं.

गॉग लिखते हैं, ‘’इस प्रेम की शुरुआत से जैसे यूँ लग रहा था कि इसमें मुझे खुद को पूरा झोंक देना है. बिना आगा पीछा सोचे, यूँ कूद पड़ने में ही थोड़ी उम्मीद है. पर फिर मैं थोड़ी या अधिक उम्मीद के बारे में क्यों सोचूं. प्रेम करते वक्त क्या मुझे यह सब फालतू बातें याद रखनी चाहिए. हरगिज नहीं. हम प्रेम करते हैं क्योंकि हम प्रेम करते हैं. बस. कल्पना करो कि एक स्त्री क्या सोचेगी यदि उसे पता चले कि सामने वाला उससे प्रेम निवेदन तो कर रहा है किन्तु एक हिचक के साथ. क्या तब उसका उत्तर ’नहीं, कभी नहीं’ से अधिक कठोर न होगा? ओह थियो, छोड़ो. कुछ और बात करते हैं. प्रेम तो सिर्फ प्रेम है, उसके आगे पीछे कुछ नहीं. उसमें डूबा हमारा मन एकदम साफ़ चमकीला और खुला होता है, न भावनाएं छुपाई जाती हैं न आग बुझाई जाती है. केवल एक सहज स्वीकार- खुदा का शुक्र है यह मोहब्बत है!”

ह्म्म्म खुदा का शुक्र है कि मोहब्बत है. खुदा का शुक्र है कि है ‘नहीं, कभी नहीं’ भी. क्या हमने प्रेम में पड़े हुए लोगों के साथ पेश आना सीखा है. क्या हमने मनुष्य के तौर पर किसी दूसरे मनुष्य के साथ पेश आना भी सीखा है? हम लोगों के सुखों को दुखों में बदल देने में माहिर लोग हैं शायद इसीलिए प्रेमी अपना एकांत गढ़ लेते हैं. दुःख का एकांत. जहाँ प्रेम, उदासी, ईश्वर, सब साथ रहते हैं. गॉग का यह कहना विभोर करता है कि, ‘’तुम मुझे इस ‘नहीं, कभी नहीं’ पर बधाई दो.’’

हम सांत्वना देते हैं इश्क में दुःख को जीते व्यक्ति को, हम उसे बधाई नहीं देते, गॉग सिखाता है हमें कि प्रेम में डूबे व्यक्ति से किस तरह पेश आना चाहिए. क्योंकर सोचना विचारना, क्या हो जाएगा उससे. कि प्रेम तो मृत्यु की तरह अनपेक्षित है. आपका बस तो उस पर चलना है नहीं तो आने दो उसे यूँ ही अपने बहाव में. सुनो ध्यान से कि ‘’जब भी प्रेम में पड़ो- बिना किसी हिचक के उसके साथ बह जाना. या फिर यूँ कहें कि जब तुम प्रेम में पड़ोगे तो तुम्हारी सारी हिचकिचाहट अपने आप ही दूर हो जाएगी. इसके अलावा जब तुम प्रेम करोगे तुम पहले से ही अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त तो नहीं होओगे पर बावजूद इसके मुस्कुराओगे.’

‘’कुछ भी हमें जीवन के यथार्थ के उतना करीब नहीं ले जाता, जितना सच्चा प्रेम. सच मानो, प्रेम के छोटे-छोटे दुःख भी मूल्यवान हैं.’’ इसलिए किसी की सिसकियों पर आंसुओं में डूबे चेहरे पर कभी तरस मत खाओ उसे प्रेम से देखो और उसके सुख को महसूस करो.

एक जन्म माँ बाप देते हैं, दूसरा जन्म देता है प्रेम. कि जीवन के अर्थ बदलने लगते हैं समूची सृष्टि को प्रेम और सद्भाव से भर देने की इच्छा प्रेम ही तो है. कि ‘’जबसे मैंने प्रेम के असली स्वरूप को जाना है, मेरे काम में सच्चाई बढ़ी है.’’

यह सच्चाई सिर्फ काम में नहीं जीवन में भी बढ़ी है शायद, इसे बढ़ना ही है और...और..और... बस कि प्रेम पर भरोसा रखना!

(पढ़ते हुए वॉन गॉग के खत, भाई थियो के नाम)

पुस्तक- मुझ पर भरोसा रखना
अनुवाद- राजुला शाह
प्रकाशक- सीज़नग्रे

https://www.prabhatkhabar.com/news/novelty/diary-of-a-writer-pratibha-katiyaar/1182628.html

Thursday, July 12, 2018

यह बारिश नहीं प्रेम है...


उस लड़की को भीगते देख 
मत होना नाराज उस पर 
न भागना उसकी मदद को 
न ताकीद देना उसे 
जल्दी घर पहुँचने की 
बुखार से बचने की 
कि उसने जान-बूझकर 
अपनी छतरियां गुमाई हैं 

------------

बहुत सारे कामों की लिस्ट जेहन में लिए 
तेज़ क़दमों से सड़कें नापते हुए 
जिन्दगी की भागमभाग को सहेज पाने में 
सिरे से नाकाम होते हुए 
झुंझलाते हुए 
जब आप हों कहीं पहुँचने की जल्दी में  

मौसम साफ़ देख न रखा हो छाता ही साथ 
न रेनकोट ही 

कि अचानक आ जाए तेज़ बारिश 
संभलने का मौका न दे रत्ती भर 
तर-बतर कर दे सर से पाँव तक 
किसी दुकान में 
किसी बस स्टैंड में ठहरकर
बारिश से बचा लेने की 
गुंजाईश तक न मिले 

तो समझ लेना 
यह बारिश नहीं प्रेम है...

Wednesday, July 11, 2018

ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...



एक पुराना ख़्वाब था, कच्चा सा ख़्वाब कि किसी रोज किसी पहाड़ी गांव में बारिश की धुन बरसेगी रात भर, बूँदें लोरियां सुनाएंगी और मैं सारी रात बूंदों की आवाज ओढकर चैन से सोऊँगी. शायद उस चैन की नींद की तलाश में नींदे भी खूब भटक रही थीं. आपको पता हो न हो आपके ख़्वाबों को जिन्दगी के रास्तों का पता मालूम होता है शायद. जिस वक़्त मैं अपने सपनों पर खुद ही हंस रही होती थी वो सपने हकीकत में ढलने की तैयारी में थे. बारिशों के गाँव में रहती हूँ इन दिनों. सिरहाने बूंदों का राग बजता है, सुबहें धुली-धुली और खिली खिली सी हैं...ये जो बरसे हैं रात भर तेरी याद के बादल हैं, मेरे ख़्वाब के बादल हैं...ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है

जिंदगी से दोस्ती कराई थी तुमने माधवी. गोवा का वो समंदर, डूबते सूरज के पीछे भागना, समंदर की लहरों को एक साथ उठते और गिरते देखना, सब याद है. देर रात तक बेवजह हँसते जाना, सुनना कहानियां एक दूसरे से, तुम्हारा मुझे अगरबत्ती जलाना सिखाना सब खिला हुआ है। मैं हमेशा तुम्हें अपने पास महसूस करती हूँ माधवी, जोर की झप्पी और हैप्पी बर्थडे। देख न, जुलाई में कितने सारे प्यारे लोगों का जन्मदिन होता है न? एक तुम, एक मैं और बाकी बहुत सारे लोग... 

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है- प्रतिभा 

1.

यात्रा से पहले

यात्रा और आत्महत्या से पहले
जहां तक हो सके
सब साफ़ छोड़ना चाहिए
दर्ज है
यात्रा की किसी किताब में

आत्महत्या कायर करता है
यात्रा साहसी का काम है
और साफ़ है सब-कुछ
पहले ही

एक अनंत यात्रा से पहले
एक और यात्रा
एक लंबी यात्रा से पहले
एक छोटी यात्रा

मन कब का गया
श्यामदेश की यात्रा पर
देह सामान बटोर रही है।

2.

यात्रा से लौटकर
यात्रा से लौटती हूं
तो कई दिनों तक घर
अस्त-व्यस्त रहता है

एक-एक कर अटैची से
बाहर आता है सामान
वही पुरानी जगह
ले लेने के लिए
कुछ सुखद स्मृतियां
और
सघन अनुभव भी
निकलते हैं

सामान सहेजती
सोचती हूं हर बार यही
यात्राएं कैसे परिष्कृत कर देती हैं
मनुष्य को भीतर से
निर्रथक व नगण्य
लगने लगता है बहुत कुछ
दृष्टि बदल देता है
जीवन के प्रति नया कोण

एक यात्रा से लौट
मैं दूसरी यात्रा पर
निकल जाना चाहती हूं।

3.

पर घर न छूटे
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
न कोई पर्वत छूटे
न जंगल
न दरिया
न पठार
न बियाबान छूटे
न सागर
न रेत
न तलछट
न कोई दर्रा छूटे
न कंदरा
न घाटी
न आकाश
न उत्तर छूटे
न दक्षिण
न पूरब
न पश्चिम
न रंगीनी छूटे
न वीरानगी
न आनगी छूटे
न रवानगी
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
कि धरती का
कोई छोर न छूटे
पर घर न छूटे
यह संभव कहां!

4.
हर सुबह देखती हूं
हर रोज़
बेकल रात को
बुनती हूं
इक नया सपना

कुछ सपने सदाबहार हैं
तितली कोई पकड़कर
बंद करना हौले से मुट्ठी
या उड़ते जाना अविराम
मीलों ऊपर, दिशाहीन

हर सुबह देखती हूं
हथेली पर बिखरे
तितलियों के वो
रंग अनगिन
और
रंग देती हूं तुम्हें
हर सुबह देखती हूं
हथेली पर ठहरा वो
आकाश अनन्त
और
भर लेती हूं उड़ान
लिए साथ तुम्हें।

5.
स्मृतियों में पहाड़
धौलाधार की पहाड़ियों पर
बर्फ़ झरी है बरसों बाद
और कई सौ मील दूर
स्मृतियों में
पहाड़ जीवंत हो उठे हैं
कहीं भी जाओ
पीछा नहीं छोड़ते पहाड़
संग चलते हैं
जीवन भर
वही हिम
वही उजास
वही उल्लास
स्मृतियों में उदात्त पहाड़
स्मृतियों में धवल चांदनी
स्मृतियों में निरभ्र शांति
मैं संतृप्त रहने की चेष्टा में हूं
स्मृतियों का शोर जारी है।

Monday, July 9, 2018

यही तो है मौसम


जिन्दगी की तमाम आपाधापियों के बीच कोई दोस्त किसी दूर के शहर में होकर भी आपके जीवन की नमी को सहेज देता है, उम्मीद को टूटने से बचा लेता है. इन बॉक्स में कुछ इस तरह खिलती हैं उम्मीदें बिना किसी संवाद के. हमें अभी होना सीखना है कि किसी की जिन्दगी में कैसे हुआ जाता है, कैसे रहा जाता है और किस तरह जिंदगी को मानीखेज बनाया जाता है...

बादलों का नाम न हो,
अम्बर के गाँवों में 
जलता हो जँगल 
खुद अपनी छाँव में 
यही तो है मौसम 

तुम और हम 
बादलों के नग़में गुनगुनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं
मुश्किल है जीना 
उम्मीद के बिना 
थोड़े से सपने सजाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं 

रास्ता अकेला हो, 
हर तरफ़ अंधेरा हो 
रात भी हो घात की, 
दिन भी लुटेरा हो 
यही तो है मौसम 
आओ तुम और हम 
हम दर्द को बाँसुरी बनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं...
(फिल्म थोड़ा सा रूमानी हो जायें)

https://www.youtube.com/watch?v=_C6WzQkKbys

Saturday, July 7, 2018

कितना सुख है मिलकर सीखने में


जैसा हम सोचते हैं, योजना बनाते हैं वैसा हमेशा कहाँ होता है. इसी तर्ज पर 6 जुलाई की सुबह की शुरुआत हुई. ठीक साढ़े नौ बजे प्राथमिक विद्यालय करनपुर पहुंची और पहुँचते ही एहसास हुआ कि जिस उद्देश्य से आई हूँ वह तो संभव नहीं क्योंकि आभा भटनागर मैम छुट्टी पर थीं और गीता कौशिक मैडम एक ही कक्षा में सभी क्लास के बच्चों को बिठाकर कुछ काम कर रही थीं. जिस वक़्त मैं वहां पहुंची गीता जी कुछ अभिभावकों से बात कर रही थीं. इस बीच मैंने बच्चों से बातचीत शुरू की. शुरुआत का सिरा था गर्मी की छुट्टियों वाला.
‘गर्मी की छुट्टियाँ कैसी रहीं?’ सवाल के साथ सभी बच्चे एक सुर में बंध गए.
‘बहुत अच्छी.’ बच्चों ने उत्साह से जवाब दिया.
‘छुट्टियों में क्या-क्या किया?’
‘घूमने गए, खेले, पढाई की.’
‘कहाँ-कहाँ घूमने गए?’
‘हरिद्वार, ऋषिकेश, मसूरी, नानी के घर, सहस्त्रधारा’.
‘अच्छा, घूमने गए तो क्या-क्या देखा?’
‘डोरिमान देखा पार्क में, नदी देखी, जंगल देखे, सड़क देखी, खूब मजे किये.’
‘नानी-दादी के घर क्या-क्या किया?’
‘हलवा खाया, पूड़ी खाई, मिठाई खाई.’ कुछ बच्चों ने जोड़ा ‘डांट भी खाई.’ जिसके बाद सारे बच्चे हंस दिए.
अब तक गीता मैम वापस आ गयी थीं. वो भी अब बातचीत में शामिल हो गयीं.
‘अच्छा कितने बच्चों ने छुट्टियों में खाना बनाया?’
करीब आधे बच्चों ने हाथ उठाया. जिन्होंने नहीं उठाया वो उम्र में बहुत छोटे थे. हाथ उठाने वाले बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे. रोहित ने बताया कि उसने हलवा बनाया, मीट बनाया. प्रियंका ने बताया उसने कढ़ी बनानी सीखी. और भी बच्चों ने इसमें चीजें जोड़ीं.
‘अच्छा रोहित ने हलवा बनाया. सूजी का हलवा. कितने लोगों को हलवा पसंद है?’
‘हमको’ पूरी कक्षा के हाथ उठ गये.
‘अरे वाह, अच्छा यह बताओ कि हलवा कितनी चीज़ों से बनता है?’
‘गाजर से, सूजी से, लौकी से’
‘आलू का हलवा, शकरकंद का हलवा किसने खाया है?’
किसी का हाथ नहीं उठा.
अच्छा गीता मैडम से पूछो उनको आता है क्या आलू और शकरकंद का हलवा बनाना.
बच्चों ने पूछा तो मैडम ने कहा कि ‘हाँ मुझे बनाना आता है और यह बहुत स्वादिष्ट होता है.’ बच्चों ने मैडम से आलू का हलवा बनाने की विधि पूछी जिसे मैडम ने ख़ुशी से विस्तार से बताया. विधि में ड्राई फ्रूट आने पर बच्चों ने उसके बारे में अलग से पूछा.
इसके बाद कौन सा फल, कौन सी सब्जी कहाँ होती है इसे पर फटाफट सवाल जवाब वाला खेल हुआ.
भुट्टा, सिंघाड़ा, जामुन, आम, चुकन्दर, आड़ू, बैंगन, भिन्डी, राजमा, लोबिया, आदि कहाँ पैदा होते हैं. पानी में, जड़ में या पेड़ पर. इस जल्दी-जल्दी बताना था. बच्चों में बताने का उत्साह भी खूबी था. इस जल्दबाजी में कभी कढ़ी पेड़ पर लग गयी और कभी हलवा जमीन में उग गया. इसके बाद जो मजेदार दृश्य बना वह देखने लायक था. सब पेट पकडकर हंस रहे थे. इस पूरे संवाद में गीता मैडम को बड़ा अच्छा लग रहा था. उनकी नजर उन बच्चों पर थी जो अक्सर चुप रहते हैं. वो चुप अब भी थे लेकिन उनके चेहरे बोल रहे थे. इसके बाद बातचीत का रुख थोड़ा बदला.
‘बड़े होकर कौन क्या क्या बनना चाहता है?’
प्रतिमा, दिव्यांशु, कोमल, मोहन ने डाक्टर बनने की इच्छा जताई, कुछ बच्चों ने पुलिस बनने की इच्छा जताई, कुछ ने किसान बनने की, कुछ ने कहा वो हवाई जहाज चलाएंगे.
कक्षा में काफी जोश आ चुका था. बच्चे बहुत खुश थे और अपने भविष्य के सपनों के बारे में बात कर रहे थे. कक्षा दो में पढने वाले दिव्यांशु को बार-बार बोलने का मन हो रहा था लेकिन अपनी बारी आने पर वो शरमा जा रहा था. हमने एक छोटी सी स्किट आनन-फानन में की. प्रियंक से कहा कि दिव्यांशु डाक्टर है तुम जाओ मरीज बनकर. एक बच्चा (नाम याद नहीं) प्रियंक के साथ गया.
प्रियल- डाक्टर साहब डाक्टर साहब बहुत तेज बुखार है.
शर्माते हुए अंगूठा मुंह में डालता है
प्रियल(प्रियल कक्षा 4 के हैं)- अरे डाक्टर साहब शरमाओ नहीं मेरा इलाज करो.
दिव्यांशु और शरमाने लगता है. कक्षा के बाकी बच्चों को बहुत मजा आ रहा है.
प्रियल- दवाई दे दो डाक्टर साब लेकिन सुई मत लगाना.
यह बात डाक्टर दिव्यांशु को जंच गयी. वो प्रियंक को सुई लगाने का अभिनय करने लगा. प्रियंक भागा, दिव्यांशु पीछे-पीछे भागा. गीता मैडम समेत सभी बच्चों की हंसी रुक ही नहीं रही थी.
एक छोटा सा ब्रेक बच्चों को देना चाहा कि बातचीत करते हुए काफी देर हो चुकी थी लेकिन बच्चों को कोई ब्रेक नहीं चाहिए था.
अब बात शुरू की सपनों की. कौन-कौन सपने देखता है, तुम्हारा क्या सपना है? बड़े होकर पुलिस या डाक्टर बनने वाले सपने में और सोते हुए जंगल में खो जाने वाले सपने में क्या फर्क होता है. सारे बच्चे अपने सपनों के बारे में बताने को बेचैन हो उठे जिसे घर से लिखकर लाने और मैडम को देने की बात तय हुई. सब बच्चे अपने सपनों के बारे में लिखेंगे यह तय हुआ. इसके बाद उनके सामने एक नया सवाल आया.
‘यह जो तुम्हारे सपने हैं, ये तुम्हें किसने बताये?’
‘यह तो हमने खुद सोचा.’ बच्चों ने कहा.
‘ओह. यह सोचना क्या होता है? यह कैसे होता है?’
सोचना मतलब कुछ सोचना. नन्हे आदि ने कहा. मतलब अपने आप से कुछ सोचना, कुछ ऐसा जो किसी ने हमें बताया न हो, कुछ ऐसा जो हमको करने का मन हो. नन्ही कोमल ने कहा, जैसे सोचना कि शाम को खाने में क्या मिलेगा. अब बात बढ़ने लगी थी. सोचना कि स्कूल से जाकर क्या-क्या करेंगे, बड़े होकर क्या बनेंगे. अब सोचने पर खूब बात होने लगी.
‘अब सोचते-सोचते थक गए न हम, चलो कुछ और करें.’ जैसे ही मैंने यह कहा, बच्चे खुश हो गए. बाल लेखन कैम्प के दौरान धोरण स्कूल की शिक्षिका अंजलि गुप्ता ने एक बार एक कविता कराई थी वो मुझे बहुत पसंद आई थी. यह कविता कक्षा 2 की गणित की (एनसीईआरटी) पुस्तक में है भी. मैंने सोचा था आज यही कविता बच्चों के साथ करते हुए इस पर बात करेंगे. इत्तिफाक था कि आज ही सुबह गीता मैम ने यह कविता बच्चों को सिखाई थी. अब बारी बच्चों की थी मुझसे कविता करवाने की. बच्चे कविता बोल रहे थे और मुझे एक्शन करने थे.
धीरे-धीरे मेरे साथ एक्शन में और बच्चे भी शामिल होते गए. कविता कुछ इस तरह थी
एक बुढिया ने बोया दाना
गाजर का था पौध लगाना
गाजर हाथोंहाथ बढ़ी
खूब बढ़ी भई खूब बढ़ी...
कविता लम्बी है और भाषाई सौन्दर्य के साथ गणित की अवधारणाओं से भी जुडती है. लेकिन अभी हम सिर्फ कविता का आनंद ले रहे थे. गाजर को खेत से उखाड़ने में एक-एक कर लोगों का जुटते जाना कविता का आकर्षण था और अंत में गाजर का उखड़ना, उसको धोना और हलवा बनाना बच्चों को आनंदित कर रहा था. वैसे भी आज हलवे की बात काफी हो भी चुकी थी. कविता खत्म हुई.
‘किसको-किसको स्वाद आया हलवे का?’
खूब हाथ उठे.
‘किसको किसको स्वाद आया?’ इस पर थोड़े कम लेकिन कुछ उठे. जो हाथ उठे उन्होंने कहा, ‘मैडम जी खूब मीठा है हलवा.’
अपनी कल्पना के संसार में कैसे हम कुछ भी पा सकते हैं, कुछ भी महसूस कर सकते हैं यही बात अब उनके सामने थी. इस पर बात करते हुए बच्चों से कहा चलो कल्पना का एक खेल खेलते हैं. सब लोग अपनी आँखें बंद करते हैं. एकदम चुपचाप. सोचो कि हम गाजर के खेत में हैं. बच्चे बोले ‘हाँ, मैडम जी हरे-हरे खेत में. चारों ओर हरा ही हरा.’ नन्ही मुस्कान आधी आँख खोलकर दूसरों को देखने की कोशिश कर रही थी. बाकी बच्चे खेत में थे. ‘हवा चल रही है. धीरे-धीरे.’ मैंने कहा. बच्चों ने जोड़ा. ‘गाजर की पत्तियां हिल रही हैं.’ अभिनव ने हाथ को लहराकर पत्तियों के हिलने का संकेत दिया.
‘हवा अब तेज़ चलने लगी है,’ मैंने कहा. बच्चों ने आगे जोड़ा, ‘अब गाजर की पत्तियां जोर-जोर से हिल रही हैं...ठंडी हवा है मैडम जी.’
‘चिड़िया उड़ रही हैं मैडम जी.’ गीता मैडम यह सब देखते हुए मुस्कुरा रही थीं.
‘चलो अब आँखें खोलते हैं.’ गाजर का खेत कैसा था?
‘बहुत मजा आया मैडम जी. अगली बार हलवाई की दुकान में ले जाना वहां गाजर का हलवा भी मिल जाएगा.’ वैभव ने मुस्कुरा कर कहा.
‘कविता कैसी लगी?’
‘बहुत अच्छी’
‘खेत की सैर कैसी थी?’
‘बहुत मजेदार.’
‘अच्छा बताओ कविता या कहानी कैसे बनती होगी?’ मेरे मन में इस बातचीत का अंत बच्चों के द्वारा बनाई एक कविता से ही कराने की योजना थी.
बच्चों ने सोचना शुरू किया. गीता मैडम ने जोड़ा कि वो कविता कहानी बनवाती हैं बच्चों से. कुछ शब्द देकर उनसे कविता या कहानी बनाने को कहती हैं. कुछ बच्चे बहुत अच्छी कवितायेँ कहानियां बनाते हैं. लेकिन सब नहीं बना पाते. मैं उनकी बात को ध्यान से सुनते हुए बच्चों से बातचीत भी करती जा रही थी. बच्चों ने जवाब देना शुरू किया.
‘कविता या कहानी शब्द से बनती है’
‘वाक्य से बनती है.’
‘कलम से बनती है’
‘किसी बात से बनती है’
‘मैडम जो शब्द देती हैं उससे बनती है’
‘और अगर मैडम कोई शब्द न दें तो?’
‘तो कैसे बनेगी कविता, नहीं बनेगी’ बच्चों ने कहा.
एक बच्चे ने कहा, ‘बनेगी तब भी क्योंकि तब हम सोचकर बनायेंगे.’ यही मेरा केंद्र बिंदु था कि कहानी या कविता सोचने से बनती है.
मैंने कहा आज हम सब मिलकर अपनी खुद की कविता बनायेंगे. बच्चों ने कहा कविता नहीं, कहानी. कविता तो आज हो गयी. घडी की सुई का इशारा था कि वक़्त ज्यादा नहीं है. 30 बच्चों के साथ कहानी बनने में वक़्त लगेगा लेकिन आखिर मुझे बच्चों की इच्छा के अनुरूप कहानी की ओर ही मुड़ना पड़ा.
यह कहानी सबकी कहानी होगी. इस कहानी में वो होगा जो हम चाहेंगे. वैसे होगा जैसे हम चाहेंगे. बच्चे यह सुनकर काफी खुश हुए. उनके चेहरों की चमक लगातार बढती जा रही थी. अब बारी थी सबको अपने अपने किरदारों के बारे में सोचना की. किसकी कहानी में कौन होगा, एक किरदार के बारे में सोचना था. राजा रानी, हाथी, शेर, मोर, जंगल, खरगोश, किसान, राजकुमारी, चुड़ैल, डायनासोर, कौआ और बहुत सारे किरदार उस क्लास में अब दाखिल हो चुके थे. अब मौसम आने लगे थे, कहीं हवा चलने लगी, तो कहीं बारिश होने लगी. बच्चों की कल्पना के घोड़े भागते ही जा रहे थे. घडी बता रही थी कि छुट्टी होने का वक़्त करीब है और कहानी अभी शुरू भी नहीं हुई बनना.
आखिर मोहित ने कहानी शुरू की. जिसे एक-एक करके बच्चे बढ़ाते गए और कहानी में अपने किरदारों को, अपनी कल्पनाओं को जोड़ते गए. आइये कहानी की ओर चलते हैं... 

'एक राजा और रानी थे, जो अपने बड़े से महल में आराम से रहते थे. उनकी एक छोटी सी प्यारी सी बेटी थी. एक दिन राजा रानी महल में झूले में बैठे थे, खूब ठंडी हवा चल रही थी. वहीँ पास में उनकी बेटी यानि राजकुमारी खिलौनों से खेल रही थी. पास में एक प्यारा सा मोर नाच रहा था और राजकुमारी उसे देखकर खुश हो रही थी. तभी वहां एक शेर आ गया. राजकुमारी शेर को देखकर और भी खुश हो गयी. उसने शेर से दोस्ती कर ली. लेकिन जैसे ही वहां से खरगोश गुजरा राजकुमारी खरगोश के पीछे भागने लगी. मोर और शेर राजकुमारी को खेलते देखकर खुश हो रहे थे. तभी महल में एक किसान आया. किसान बहुत थका हुआ था, वो एक बड़ा सा जंगल पार करके राजा से मिलने आया था. राजा ने किसान से कहा तुम अभी आराम करो अभी हम राजकुमारी के लिए खिलौने लेने मॉल जा रहे हैं. राजकुमारी बहुत दिन से नए खिलौने मांग रही है, लौटकर आकर मैं तुम्हारी बात सुनूंगा. इधर राजा राजकुमारी के लिए खिलौने लेने गया, तभी वहां महल में एक चुड़ैल आ गयी और वो राजकुमारी को अपने साथ लेकर चली गयी. लेकिन यह अच्छी चुड़ैल थी. उस चुड़ैल के कोई दोस्त नही थे इसलिए वो राजकुमारी को अपना दोस्त बनाना चाहती थी, इसलिए उसे अपने घर ले आई थी. चुड़ैल ने राजकुमारी को खिलौने दिए, नयी ड्रेस दी और उसे मैगी बनाकर खिलाई. चुड़ैल ने उसे खोये की बर्फी भी खिलाई. उधर राजा रानी जब महल में लौटे और राजकुमारी को नहीं देखा तो बहुत रोये. तब किसान ने कहा, महाराज, आप रोयें नहीं मैं राजकुमारी को ढूंढकर लाऊँगा. किसान राजकुमारी को ढूँढने निकला तो एक कौआ किसान के साथ हो लिया. उसने देखा था चुड़ैल को राजकुमारी को ले जाते हुए. कौए की मदद से किसान चुड़ैल के घर पहुँच गया. उसने देखा राजकुमारी तो चुड़ैल के पास खूब खुश है. किसान ने चुड़ैल से कहा, राजकुमारी के मम्मी पापा बहुत रो रहे हैं, हमें राजकुमारी को वापस महल ले जाना चाहिए. चुड़ैल ने कहा कि ठीक है, लेकिन मैं भी राजकुमारी के साथ चलूंगी. ये मेरी बेस्ट फ्रेंड है. किसान मान गया. एक झाडू पर सबसे आगे चुड़ैल बैठी फिर राजकुमारी और सबसे पीछे किसान. झाड़ू उड़ते हुए महल में पहुंची. राजा रानी राजकुमारी को देखकर बहुत खुश हुए. शेर, मोर, हाथी, खरगोश भी बहुत खुश हुए. राजा ने चुडैल को थैंक यू कहा और उसे महल में ही रहने को कहा. और किसान को बहुत सारा ईनाम दिया.'

कहानी पूरी हो चुकी थी, इसके बनने में सारे बच्चे शामिल थे, वो बच्चे भी जो शर्मीले थे, चुप रहते थे. उन्हें साथ लेकर, उनकी कल्पना को बाहर निकालने में उनकी थोड़ी मदद की और वो कान में आकर बता गये कहानी की बढ़त को. इस कहानी की हर लाइन में बच्चे के मन की दुनिया छुपी नज़र आ रही थी मुझे, चाहे वो खिलौने हों, खोये की बर्फी या मैगी या झाड़ू पर बैठकर उड़ने का सुख. सबने अपनी कहानी पर अपने लिए तालियाँ बजाईं. छुट्टी का वक़्त हो गया था लेकिन बच्चे क्लास से जाने को तैयार नहीं थे. वो कहानी के बारे में बात करना चाहते थे. सबको उस कहानी में अपना हिस्सा अपना किरदार सबसे अच्छा लग रहा था. प्रमोद ने पीठ पर बस्ता चढाते हुए कहा, ‘देखा मेरे किसान ने बचा लिया न राजकुमारी को.’ तभी मुस्कान ने शरमाते हुए कहा, ‘और मेरी चुड़ैल कितनी अच्छी थी’. दिव्यांशु ने कहा, ‘और मेरा मोर भी तो सुंदर था.’ तभी आदि ने कहा ‘मेरा डायनासोर तो आया ही नहीं...’ अरे हाँ, डायनासोर तो रह ही गया, हम सबने सोचा. चक्कर में पड गए कि इस कहानी में डायनासोर कहाँ और कैसे फिट होगा. तभी कोमल ने कहा, ’राजा और रानी डायनासोर वाला खिलौना लेने ही तो मॉल गये थे.’ और इस तरह कोमल ने समस्या सुलझा दी.

कहानी बन चुकी थी, छुट्टी हो चुकी थी, लेकिन कहानी बच्चों के साथ ही घर जा रही थी. गीता मैम खुश थीं कि कई बच्चों ने पहली बार कहानी बनने में अपनी भूमिका निभाई.

मैंने बच्चों से विदा ली तो उन्होंने जल्दी फिर से आने का वादा करने को कहा. ‘पक्का प्रॉमिस मैम, जल्दी आओगी न’ मुस्कान ने कहा. मैंने कहा ‘हाँ’. मेरी वापसी के कदमों में सुख था कि कितना कुछ सीख सकी हूँ आज.

Friday, July 6, 2018

बदलाव की इच्छा का सुख



यूँ तो भीतर एक उथल-पुथल सी हमेशा चलती रहती है कि जो कर रही हूँ उसमें कितनी सार्थकता है. जिन रास्तों पर दौड़ रही हूँ, वो कहीं पहुंचेंगे भी या नहीं. यह बात, जिन्दगी के रास्तों की नहीं अपने पेशेवर काम के संदर्भ में कर रही हूँ. हर दिन खुद के ‘किये’ पर सवाल करना जैसे आदत हो, और ‘न किये पर’ सवाल करना और पक्की आदत. इन्हीं उहापोह के बीच काम करना आसान करने के जो भी बिंदु मिलते हैं उन्हें सहेजती चलती हूँ. क्योंकि यहीं से और गति के साथ चलने की ऊर्जा मिलती है.

ऐसे ही कुछ अनुभवों से भरा-पूरा गुजरा जून का महीना. जिन सरकारी शिक्षकों के काम करने की नीयत पर, जिनके काम की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाने से न कभी सिस्टम हिचकिचाता है, न समाज यह उन्हीं सरकारी शिक्षकों की बाबत है. अपनी छुट्टियों के दिनों में परिवार के साथ समय बिताने, सिनेमा देखने जाने, रिश्तेदारों के यहाँ जाने आदि को स्थगित करके बिना किसी सरकारी आदेश के, शुद्ध रूप से अपनी इच्छा से अगर अपनी छुट्टियों के चार दिन (कुछ तो 8, और कुछ 12 दिन भी) अपनी कक्षा कक्ष प्रक्रियाओं को बेहतर कर पाने के उद्देश्य से किसी कार्यशाला में जाते हैं तो यह सामान्य बात नहीं है. उनके भीतर सीखने की, बेहतर करने की, अपने बच्चों को नए-नए तरीकों से, रोचक तरह से पढ़ाने की यह इच्छा बेहद उत्साहजनक है.

बीते जून में पूरे उत्तराखंड में हुई 80 कार्यशालाओं में करीब 1600 शिक्षकों ने इन कार्यशालों में भाग लेकर शिक्षा को लेकर फैली उन भ्रांतियों को मुंह चिढ़ाया है जिनके तहत शिक्षा जगत के सिर्फ नकारात्मक पक्ष को ही बार-बार सामने रखा जाता रहा है.

जब भी इन शिक्षकों से मिलती हूँ, मन में एक ही सवाल होता है कि आखिर क्या है जो उन्हें अपने काम के प्रति इतनी सकारात्मकता से भरता है. क्या है जो व्यवस्थागत अडचनों के बावजूद उनका रास्ता आसान करता चलता है. पाया कि इन शिक्षकों में अपने काम को लेकर एक आदर भाव है. यह बात उत्तराखंड के शिक्षकों के (सब नहीं) संदर्भ में ही कह रही हूँ. कितने ही शिक्षक मिलते हैं जो अपने परिवार का समय स्कूलों में लगा रहे हैं. कुछ निजी सहयोग से अपने स्कूलों को संवार रहे हैं. अपने बच्चों की एफडी तोड़कर अपने स्कूल की दीवारें व छत पक्की बनवाना कोई मामूली बात तो नहीं है. लेकिन इन शिक्षक साथियों को अपने पेशे के प्रति इस तरह के गैर मामूली लगाव का कोई भान भी नहीं है. यह इल्म न होना उनके काम के सौन्दर्य को बढाता है. अगर आप इनसे मिलेंगे और उनकी तारीफ करेंगे तो ये शिक्षक साथी संकोच से भर उठेंगे. हालाँकि ये शिक्षक लगातार यह मानते हैं कि उन्हें और नए तरीके जानने की जरूरत है ताकि बच्चों को बेहतर ढंग से सिखा सकें. इसीलिए वो अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन के टीचर्स लर्निग सेंटर्स या स्वैच्छिक शिक्षक मंच (वीटीएफ) में छुट्टी के दिनों में या काम के दिन में स्कूल की छुट्टी के बाद आते हैं. गर्मी और जाड़े की छुट्टियों में खुद की क्षमता संवर्धन हेतु आते हैं. बिना किसी सरकारी आदेश के बिना कहीं से कोई शाबासी मिलेगी ऐसी इच्छा के.

स्वैच्छिक प्रतिभाग कितना महत्वपूर्ण होता है इसका उन्हें अंदाजा है और यही बात काफी हद तक उनकी कक्षाओं में भी दिखती है. कोई भी तब बेहतर सीखता है जब या तो उसकी सीखने की प्रबल इच्छा होती है या जरूरत. इसलिए स्कूलों में सबसे पहले बच्चे का आने का मन होना, स्कूल में उसका रहने का मन होना, स्कूल में खुश महसूस करना कुछ भी सीखने-सिखाने से पहले की जरूरतें हैं. बच्चे जितना अपने शिक्षक से लगाव महसूस करते हैं उतना जल्दी सीखते हैं. सीखने को लेकर आत्मविश्वास भी जरूरी है. यह बात कि सीखा जा सकता है, सीखने की क्षमता है, बड़ों और बच्चों दोनों को सीखने की ओर बढाता है.

सीखने-सिखाने से जुडी कुछ इन्हीं संवेदनशील बातों का ध्यान रखते हुए गर्मी की छुट्टियों में अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन द्वारा कार्यशालाएं आयोजित की गयीं और उनमें शिक्षकों का प्रतिभाग उत्साहजनक रहा. यूँ तो यह बदलाव की एक बहुत छोटी सी शुरुआत है. लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी रोशनियों में आने वाले कल का उजाला छुपा है. ‘कुछ बदल गया है’ के उत्सव के तौर पर नहीं ‘कुछ बदलने की इच्छा’ के तौर पर शिक्षकों के इस प्रतिभाग का सुख तो महसूस किया ही जा सकता है. बाकी सफर तो अभी शुरू हुआ है...

Tuesday, July 3, 2018

इस लम्हे के टूटकर बिखर जाने से पहले...


सुनो,

यह कोई खत नहीं है, बात है. इसे पढना मत. सुनना.

रात भर बारिश हुई है. मध्धम लय की बारिश. बिलकुल तुम्हारी याद के जैसी. बीच-बीच में जैसे याद की लय तेज़ होती है न, वैसे ही बारिश की भी लय बढ़ी. लेकिन उसे अपना सम पता है. जाये कितना ही ऊपर नीचे लेकिन ठहरती वहीं हैं अपने सम पर.

बरसती रात के बाद की सुबहों के लिए तुम्हें मेरा पागलपन तो याद ही होगा. अब वो पागलपन नहीं रहा. तमाम पागलपन भी उसी सम पर जाकर ठहर गया है. पता है आंगन में लगे अनार की पत्तियां मुस्कुरा रही हैं. वो जब मुस्कुराती हैं तो कितनी भली लगती हैं, तुम्हें बताना चाहती हूँ.

हल्के हरे को जैसे नर्म हाथों से कथ्थई रंग ने छू भर दिया हो. बरसकर थमी बूँदें पत्तियों पर अटकी हुई हैं. उन पर पड़ रही हैं ठंडी धूप की किरणें. मैं एकटक इन पत्तियों को देख रही हूँ. जैसे कोई जादू. ऐसा सौन्दर्य, कितनी शीतलता है इस लम्हे में. कितना सघन सौन्दर्य. मैं इन पलों के सजदे में हूँ.

इस सुख को जीते हुए इस लम्हे के टूटकर बिखर जाने का डर भी है. डर है कि अभी धूप तनिक तेज़ हो जाएगी और यह लम्हा टूटकर बिखर जाएगा. या बहुत तेज़ आ जाएगी बारिश तब भी तो गुम हो जायेगा न यह लम्हा. या कोई मुझे पुकार लेगा कहीं से, कोई फोन आ जायेगा ज़रूरी या कोई मेहमान बजाएगा कॉलबेल और यह लम्हा गिरकर छन्न से बिखर जाएगा. या हो सकता है ऐसा कुछ भी न हो और यह लम्हा वहीं अटका रहे. मैं ही इस लम्हे से बेज़ार हो जाऊं, हालाँकि इसकी संभावना कम ही है. देखो न, ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा लेकिन ऐसा कुछ हो जाएगा की आशंका इस लम्हे में शामिल हो चुकी है. हालाँकि मैं चाहती थी इस लम्हे में सिर्फ मैं और तुम होते, चुप और साथ.

हवा से पत्तियां हिलने लगी हैं. जैसे मध्धम लय पर नृत्य कर रही हों हौले-हौले, अपने पंखों पर अटकी बूंदों को गिरने दिए बगैर. 'नृत्य कर रही हैं' बारिश के ठीक बाद बहती मंद हवा की लय पर झूमती पत्तियों को देखते जाना सुख है. इस सुख को महसूस करते हुए मौन में तुमसे संवाद करना सुख है.

इस लम्हे के टूटकर बिखर जाने से पहले या इस लम्हे की यात्रा पूरी होने से पहले मैं इस लम्हे से खुद को अलग कर लेना चाहती हूँ. इस तरह तीव्र इच्छाओं को महसूस करना, उन्हें पालना-पोसना और जब वो मुक्कमल हकीकत में ढलने लगें उनसे मुंह मोड़ लेना मैंने तुमसे ही सीखा है.

पहले मुझे बहुत बुरा लगता था ठीक उस वक़्त जब बमुश्किल होने वाली मुलाकातों में मिलन का सुख जब कोरों पर अटका होता था तुम्हारा कहना, 'तो अब मैं चलूँ?'. वो अटका हुआ सुख एकदम से कितना निरीह कितना कातर हो जाता था, एक शब्दहीन उदासी मुझे घेर लेती थी, तुम बिना नज़र मिलाये चले जाते थे, बिना मुड़कर देखे भी बारिश में भीगते हुए या धुप में सूखते हुए. तुम चले जाते थे. वो शब्दहीन उदासी मेरे साथ वापस लौटती. मैं बरसों इस उदासी के साथ रही हूँ. मुझे सुखों की आहट से डर लगने लगा है. वो आसपास से गुजरते भी हैं तो घबरा जाती हूँ कि उन सुखों के आने से पहले उनके खो जाने का डर आता है. यह खो जाने का डर इतना बड़ा होता है कि उसके आगे सारे सुख बौने लगते हैं. सबसे ज्यादा बौना लगता है तुम्हारे आने का, तुमसे मिलने का सुख कि तुम्हें खो देने का डर सबसे बड़ा जो है. जानती हूँ तुम्हें इस बारे में बात करना पसंद नहीं. अब मुझे भी पसंद नहीं.

इतने बरसों बाद मैंने भी तुम्हारी तरह कुछ हद तक सुखों के टूटने से पहले उनसे खुद को अलग करना सीखा है. कुछ हद तक ही. वो सारा जिया हुआ उस न जिए हुए के आगे किस कदर छोटा है, कितना कम है समझ पाती हूँ अब. 'होना' असल में 'न होने में' ही तो छुपा है. वो छुपा है होने की इच्छा में.

फिर से बारिश शुरू हो चुकी है. वो लम्हा अभी कुछ देर और ठहरेगा. बूंदों के साथ अनार की पत्तियों का खेल कुछ देर और चलेगा शायद. मैं उस दृश्य से बाहर हूँ हालाँकि वो दृश्य मेरे भीतर. अब वो लम्हा बीतकर भी बीत नहीं पायेगा. मेरे जिए में वो हमेशा यूँ ही महकता रहेगा. मेरा जिया जब मेरी स्मृतियों में बदल जाएगा तब इसके रंग फीके पड़ जायें शायद. क्योंकि मेरे पास अब रंग नहीं हैं. मेरी स्मृतियों के रंग भी सब उड़ गए हैं. कुछ स्मृतियाँ चटख रंगों की तलाश में कभी-कभी व्याकुल हो उठती हैं फिर उदास होकर धूसर रंगों में पनाह लेती हैं. मेरे पास अब कोई रंग नहीं हैं. मेरे सारे रंग मैंने तुम्हारे साथ विदा कर दिए थे. न, न नाराज मत हो. जानती हूँ मेरी ऐसी बातें तुम्हें पसंद नहीं लेकिन क्या करूं सच तो वही है कि अंतिम विदा के वक़्त किसी टहनी पर अटकी पीली पड़ चुकी पत्ती सा तुम्हारा हाथ अब तक थमा नहीं है. ओ हेनरी की कहानी 'द लास्ट लीफ' जैसा लगता है तुम्हारा विदा के लिए हिलता हाथ. उस पत्ती के हरे को भूरे रंग ने घेर लिया था. भूरे के कोने में पीलेपन ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी. यह पीला धीरे से भूरे को अपनी जद में लेगा और फिर हरे को. और एक रोज तेज़ हवा का झोंका, या शायद धीमी हवा भी पत्ती को पेड़ से अलग कर देगी. फिर वो पत्ती नीचे गिरेगी लहराते हुए, अपने हरे से पीलेपन की यात्रा पर इठलाते हुए. पीलेपन की ओढनी पहने वो अपने जैसी तमाम पत्तियों से मिलेगी, तमाम पीली पत्तियों से. वो खुश होगी कि डाल से बिछड़ने के अपने सबसे बड़े डर से अब वह मुक्त है. तभी एक उदास आँखों वाली लड़की वहां से गुजरेगी और अनायास उस पत्ती को अपनी हथेलियों पर रखेगी. उस पत्ती को वो सहलाएगी बार-बार. वो उसमें बचे हुए हरे को ढूंढ निकलना चाहेगी. वो लड़की उस पत्ती में वही हरा ढूंढ रही होगी, जो मैं ढूँढती फिरती हूँ जीवन में. क्या वो लड़की मैं हूँ, या वो पत्ती मैं हूँ. क्या दुनिया की तमाम लड़कियां पीली पड़ चुकी उम्मीदों वाली पत्ती में अपने हिस्से का हरा तलाशने में जुटी हैं. शायद. ऐसा ही हो काश! वो इन पत्तियों में हरा तलाश लेंगी एक दिन और इस धरती का तमाम हरा सहेज देंगी

यूटोपिया सा लगता है न सब कुछ. लेकिन यह यूटोपिया न हो तो क्या रह जाएगा भला.

बारिश अब भी हो रही है. मैं कनखियों से अनार की डाली को देखती हूँ. कुछ इस तरह कि देख भी लूं और नहीं देखा है का भ्रम भी बचा लूं. बारिश स्टेशन आने पर धीमी होती ट्रेन की रफ़्तार सी हो चली है. अब वहां उस अनार की डाल पर एक बुलबुल आकर बैठ गयी है. वो अकेली है. उसका साथी भी वहीं कहीं होगा आसपास. दादी ने बचपन में बताया था कि बुलबुल हमेशा जोड़े में रहती है. इन दिनों रोज बुलबुल के जोड़े को देखकर दादी की बात याद करती हूँ. दादी नहीं जानती थीं मेरे भीतर बुलबुल होने की इच्छा को उन्होंने ही रोपा है. बुलबुल के जोड़े को देखती हूँ तो पनीली आँखों में मुस्कान खिल उठती है.

तुम क्या कभी बुलबुल के बारे में सोचते होगे. या इन बारिश में भीगती अनार की पत्तियों के बारे में, या किन्ही भी पत्तियों के बारे में, या ओ हेनरी की 'द लास्ट लीफ' के बारे में, या विदा के वक़्त अपने उस हिलते हुए हाथ के बारे में जो अब भी हिल रहा है...

Friday, June 29, 2018

खलिया टॉप के बहाने रामगंगा घाटी की पुरानी याद- भास्कर उप्रेती



भास्कर उप्रेती विकट यायावर हैं. यात्रायें उनके रग-रग में समायी हैं. मानो जिन्दगी की हर मुश्किल का हल उन्हें यात्रा में मिलता हो. हर सवाल के जवाब, सुकून सब वो यात्राओं से पाते हैं. यात्राओं में रचे-बसे इस सैलानी युवा ने उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे को पैदल नापा है. उनकी यात्रायें सुनियोजित, आरामतलब नहीं होतीं. वो कभी भी उठकर चल पड़ने की कैफियत रखते हैं. यात्राओं के प्रति उनका यह प्रेम ऐसा सुंदर है कि उनकी बेटी का नाम ही 'यात्रा' पड़ा. भास्कर के तीज त्यौहार, यात्रा (बिटिया) का जन्मदिन सब यात्राओं में मनते हैं. वो एक चेतन पत्रकार रहे हैं, देश दुनिया के मसायलों पर नज़र भी रखते हैं और बेबाक राय भी. पढ़ने-लिखने को आत्मसात किया है. साहित्य में उनकी खूब गहरी पैठ है. भास्कर ने अपनी एक यात्रा का छोटा सा टुकड़ा 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए लिखा है...इस बहाने इस संस्मरण को पढने का सुख अब हम सबका साझा सुख है. - प्रतिभा


2018 अप्रैल अंतिम सप्ताह में अचानक कपकोट से तेजम जाने का प्रोग्राम बन गया. आकर्षण था इन दो जगहों को जोड़ने वाली सड़क. कार्यक्रम को और रंगत देने के लिए उसमें खलिया टॉप का ट्रेक सोच लिया गया. करीब 15 साल पहले इस मार्ग से पदयात्रा की थी. काफी महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी लेकिन पदयात्रा के चौथे दिन ही जब मुनस्यारी सामने आ गया, हम निराश हो बैठे. कभी सोचा भी न था कि पिथौरागढ़ का अंतिम छोर और बागेश्वर का अंतिम छोर यूँ आपस में गुंथे पड़े होंगे. जैसे पिंडारी ग्लेशियर जाने पर पता चलता है चमोली में आ गए हैं. खैर, हमने अपनी योजना को और धार दी. पदयात्रा को पहले मुनस्यारी से मदकोट तक विस्तार दिया, फिर दूसरे हिस्से में पिथौरागढ़ से गंगोलीहाट की पदयात्रा.

तो नई यात्रा के वर्णन से पहले पुरानी यात्रा. दरअसल कोई यात्रा नई नहीं होती और कोई यात्रा पुरानी भी नहीं होती. यात्रा एक निरंतर संवाद की स्थिति है. कई बार आप मीलों चल लेने के बाद भी ठहराव की स्थिति में ही होते हैं और कई बार बैठे-ठाले आपको पुरानी स्मृतियाँ वेगवान कर देती हैं. 

वर्ष 2003 में शोध-छात्र सुरेश भट्ट की पीएचडी कार्य के बहाने सरयू, रामगंगा और धौली घाटियों में पदयात्रा का मौका बना था. सुरेश जी 'कुमाऊँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था' विषय पर गाँवों का सर्वे करना चाहते थे और विनोद पाण्डेय और मुझे कपकोट से मुनस्यारी का ट्रेक करना था. यह एक यादगार यात्रा रही. भारी जलालत के बाद नैनी ताल माउंटेनियरिंग क्लब (एन.टी.एम.सी.) की सदस्यता मिली. रुक्सैक, मैट, रोप आदि हाथ लगे. एन.टी.एम.सी. के संस्थापक और तत्कालीन निदेशक चंद्रलाल साह ठुल्घरिया उर्फ़ बूबू ने 14 दफ़ा एप्लीकेशन लिखवाई अंग्रेजी में. विनोद और मैं तो चिढ़ ही गए थे तब. मगर, अंत: मैं उन्होंने बोला कि अब हमारे पास एक ‘स्टैण्डर्ड एप्लीकेशन’ हो गयी है, हमारी साँस में साँस आई. अब जो भी आएगा वो इसे देखकर लिखेगा. ठुल्घरिया बूबू तहजीब पसंद व्यक्ति थे और हर काम तो जतन से करते, वह चाहे फिर किसी खड़ंजे में लेटकर गुनगुनी धूप का आनंद लेने जैसा मामला ही क्यों न हो.

नैनीताल से चलते समय ही यह निर्णय हो गया कि यह पदयात्रा हम जनसहयोग से करेंगे. छात्र जीवन में जैसी कि आदत होती है सब कुछ भकोस लेने की, हमने ग्रामीणों से उनके ज्ञान का सब कुछ एक साँस में गड़क लेना चाहा जो हज़म नहीं हो सका. ये अनुभव के साथ ही जाना कि जीवन में अधिक भागीदारी हो तो बहुत कम प्रश्नों से भी काफी ज्ञान बटोरा जा सकता है.

हम लोगों ने भराड़ी से चलना शुरू किया था. पहला दिन तो शिखर पर्वत और गुफा से मिलने-भेंटने में लग गया. रास्ते में मिले फ़ॉरेस्ट गार्ड नंदाबल्लभ तेवाड़ी जी ने हमें यहाँ के समृद्ध वन के बारे में विस्तार से बताया मगर गुफा में प्रवेश के समय उनसे थोड़ा बहसबाजी जैसी भी हो गयी. वह गुफा में प्रवेश के नियम बता रहे थे. गुफा के प्रवेश द्वार पर लिखा था- 'यहाँ महिलाओं का प्रवेश वर्जित है'. हमारे साथ कोई महिला साथी नहीं थी लेकिन हमें यह नियम पसंद नहीं आया तो तेवाड़ी जी ने हमें 'सोच समझकर बनाए गए नियमों का सम्मान' करने के लिए कहा. दूसरा नियम था, 'चमड़े से बनी चीजों के साथ गुफा में प्रविष्ठ न होने का'. तेवाड़ी जी ने बताया कि ऐसा करने से बड़ा अनिष्ट होता है. हमने कहा चलिए आजमा लेते हैं; वह अँधेरी गुफा में हमें बीच में छोड़कर भाग खड़े हुए. बड़ी टॉर्च भी उन्हीं के पास थी. बकौल तेवाड़ी जी उनका बेटा बाबा यानी भोले महराज के आशीर्वाद से ही फ़ौज में भर्ती हो सका था और वे इस कानूतोड़क प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे. खैर विनोद ने ठान लिया था कि चमड़े की बेल्ट पहनकर ही गुफा में प्रवेश करेगा और उसने तेवाड़ी जी को बताया कि उसकी बेल्ट शुद्ध चमड़े की बनी है. नंदावल्लभ जी हमें ऊपर चढ़ते हुए बता ही चुके थे कि हम झोपड़ा उतरे बगैर ही शामा पहुंचे सकते हैं. वापसी में हमने दुबटिया से शामा का ट्रेक पकड़ लिया. यह भी करीब आठ किलोमीटर लंबा रहा था और हमें यहाँ शामा से करीब ढाई किलोमीटर पहले सड़क पर उतरना था. यह घना और नम जंगल था. रास्ते की कांठियों में हमें वनसुपारी के पत्ते नज़र आए तो हम उनकी जड़ें उखाड़ने में जुट गए. चूँकि पानी हमारा खत्म हो चुका था, सो यह शरीर में पानी की भरपाई करने के लिए बढ़िया चीज मिल गयी. शामा के लिए जाते वक़्त सड़क में हमें मैदान से यहाँ नियुक्त हुए एक आयुर्वेदिक डॉक्टर मिले. उन्हें हमने जोशो-खरोश से अपनी यात्रा का मकसद बताया. लेकिन उन्होंने हमें उतना ही ठंडा करने की कोशिश की. 'यहाँ क्या है भेड़-बकरियों के सिवा'. आसमान भी पूरा नहीं दिखाई देता. कोई सुविधा नहीं. क्या जानना है इतना पैदल चलकर यहाँ के बारे में? हमने जितना संभव था उन्हें इस अभियान की पवित्रता के बारे में बताने की कोशिश की लेकिन वह भी अपनी जगह उतने ही अडिग बने रहे.

शामा की उस शाम में हमने दुनिया की बेहतरीन चायें पीं. भट्ट जी ने एक कस्बाई लोहार का इंटरव्यू लिया लेकिन उसने अपना और भट्टी का फोटो खिंचवाने से इंकार कर दिया. शायद यह समझकर कि हम उसकी गरीबी को दिखाना चाहते हैं. स्वाभिमानी लुहार था वो.

पहली रात शामा और पनियाली गांवों के लोगों के बीच बितायी. तब नैनीताल डीएसबी के हमारे सीनियर रहे डॉ राजेंद्र कोश्यारी शामा गाँव की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के काम में जुटे थे. उनका घर पास में ही चीटाबगड़ गाँव में है. राजेंद्र भाई ने ग्रामीण आजीविका पर काम करने के अपने अनुभव हमारे साथ साझा किये. वह वहां सब्जी उत्पादन, मुर्गीपालन, बकरी पालन, पालीहाउस आदि पर काम कर रहे थे और उनके शुरुआती अनुभव अच्छे थे. उन्होंने हमें बताया कि फंडिंग और प्रोजेक्ट से चलने वाली योजनाएं उन्नत आईडियाज तो लाती हैं. सवाल उनको लोगों द्वारा सतत रूप से अपनाने का ही है. राजेंद्र भाई ने बताया कि इस संबंध में सरकार की भूमिका बेहद अहम् है और वही अपनी भूमिका नहीं निभा रही है. यदि गाँव के लोग शिमला मिर्च का उत्पादन करते हैं और यह उत्पाद निश्चित रूप से जैविक श्रेणी के हैं. तो सरकार का काम है कि वह किसानों का उत्पाद सुरक्षित रूप से स्टोर करने के उपाय करे, उत्पादों का सर्टिफिकेशन करवाए और उनका बाजार तलाशने में में किसानों की मदद करे. ग्राहकों का भी हक़ है कि वह कीमत देने पर ताजा और पुख्ता उत्पाद हासिल कर सकें. दरअसल यही कड़ी नहीं जुड़ सकी है.

जब हम ढूँढते-खोजते राजेंद्र भाई के पास पहुँचे तो उन्होंने आनन-फानन में हमारे भोजन की व्यवस्था पास के शामा क़स्बे में बने ढाबे में करायी. तब फुटबाल का विश्व कप चल रहा था और पुरानी शुष्क जिंदगी से विमुख हमारे साथी सुरेश जी पर फुटबाल का नशा तारी था. लेकिन उनसे कहीं अधिक ढाबे वाले दानू भाई पर. पता नहीं उन्होंने कितनी रोटियां सेंकी और पता नहीं हम कितनी खा गए. उधर अर्जेंटीना की टीम उरुग्वे पर गोल दाग रही थी और दानू भाई के अभ्यस्त हाथ उतनी ही गोल फुल्कियाँ परोस डाल रहे थे. ‘फुल डाईट’ वाला हिसाब हुआ तो मेहमानों की पौ बारह हो गयी ठहरी. वैसे भी खाने के डबल तो हमारे मेजबान राजेंद्र भाई को ही चुकाने थे. हमने तो जाते ही ऐलान कर दिया था कि हम जनसहयोग से ही यह यात्रा कर रहे हैं. राजेंद्र दाज्यू को भी यहाँ उनके कॉलेज से आए दोस्तों पर न्योछावर होने में क्या दिक्कत हो सकती थी. शिखर की आठ किलोमीटर की चढ़ाई और फिर शिखर से शामा उतरने से मित्र बैकटीरियाज भुकान हो रखे थे. 


अगला पड़ाव था रमाणी गाँव. अलसुबह चलकर हम दुपहरी में पहुँच गए थे गाँव की सरहद तक. शामा से कुछ मील सड़क-सड़क चलने के बाद गाँव की पगडंडी पकड़ ली गयी. एक बुबू ने हमें बताया कि कभी यह मार्ग जोहार और बागिसर (बागेश्वर) को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग था. शौका लोग इसी रास्ते बागेश्वर के नुमाइश खेत में लगने वाले मशहूर मेले में जाते. हो सकता है मालूशाही से मिलने गयी राजुला भी इसी मार्ग से चली हो (राजुला मालूशाही उत्तराखंड के लोक में प्रचलित लोक कथा है). उन्होंने यह भी बताया कि नुमाइश खेत के मेले में रमाणी के नारिंग (संतरों) का लोगों को इंतजार होता. रमाणी का संतरा सबसे महंगा भी बिकता. लेकिन, गाँव में अब कम लोग रह गए हैं और संतरों में भी कोई कीड़ा आ लगा है. अब दाने का आकार भी छोटा होता है और स्वाद में कमी आई है. यहाँ बकरी पालन आजीविका का मुख्य साधन था. मिट्टी की ऊपरी परत बारिश ने खरोंच डाली थी और अब नीचे से सलेटी मिट्टी उभर आई थी. जो उत्पादन के लिहाज़ से मुफीद नहीं थी. सो, खेती से बागवानों का मोहभंग तेज हो गया. हम अपने पीछे एक अत्यंत समृद्ध मिश्रित वन छोड़ आये थे. लेकिन यहाँ से आगे का दृश्य एकदम अलग था. नीचे पसरी रामगंगा घाटी में एक मायूस सफेदी छाई थी. सब कुछ सफ़ेद. बादल, पहाड़, पत्थर, मिट्टी, नदी, पानी सब.
वनस्पतियाँ भी अब कम हो रही थीं. सुरेश जी ने कुछ और घरों का सर्वे किया और फिर हम ढलान से उतार लगे. हम जिस घर से गुजरते वहां से हिदायत मिलती रास्ता अब चलन में नहीं है, सावधानी से आगे बढ़ना. कहीं-कहीं पर साँप और ग्वाण का भी भय रहेगा. सड़क का रास्ता काफी पहले दूसरी तरफ मुड़ चुका था और दरअसल भू-स्खलन से सड़क जगह-जगह मटियामेट हो चुकी थी. गाँव वालों ने बताया कि 60 के आस-पास इस सड़क का सर्वे हुआ था. 80 के आस-पास यह खुदी और 90 के आस-पास इसमें समतलीकरण का काम चला लेकिन यह चालू हालत में कभी भी नहीं आ सकी और अब तो जीर्ण-शीर्ण ही हो चुकी थी. 
हम रात तक तेजम पहुँचने का लक्ष्य लेकर चले थे और नीचे घाटी में उतर
रहे थे, जहाँ हमारी मुलाकात रामगंगा से होनी थी. जिस खड़ंजे से हम उतर रहे थे उसका मटमैला रंग धीरे-धीरे सफेदी लेने लगा था. तटवर्ती क्षेत्र होने से यहाँ गंग्लोड़े तो मिलने लगे थे लेकिन उस पर भी सफेदी तारी थी और यह अच्छा संकेत नहीं था. यह सफेदी धीरे-धीरे पैरों की फिसलन में बदल गयी. सफ़ेद पत्थर और उससे चूरा हुई सफ़ेद बजरी में चाँदी सी चमक थी/ यह जूतों की ग्रिप नहीं बनने दे रही थी. अब सूरज पहाड़ के दूसरी ओर जा रहा था और हम छाया से घिर रहे थे. दिन भर तपे खड़िया-पत्थर हमारे शरीर को पसीने से तर कर देने के लिए काफी थे. संभलकर और धीरे-धीरे चलने से हमारी गति प्रभावित हुई. किसी तरह रगड़ते हुए हम रामगंगा की गोद में आ गए थे. जहाँ हम उतरे थे वहां नदी का पाट बहुत चौड़ा था और पानी भी छितराया हुआ. आधा मील आगे बढ़े तो यही पानी एक संकरी धार में बदल गया था. यहीं पास में झील बन गई थी. ऐसी झीलें वहीं बनती हैं जहाँ पानी में भँवर हो.

मेरे दोनों तैराक मित्रों का मन हुआ कि यहाँ स्नान कर लिया जाय. उमस से मुक्ति के लिए इससे अच्छी बात और हो भी क्या सकती थी लेकिन जैसे ही दोनों नदी में कूदे तो मालूम पड़ा पानी बर्फानी है. एक मिनट के भीतर ही दोनों बाहर छिटक गए. दोनों ने फिर से हिम्मत दिखाई और फिर नदी को अपने शरीर का रहा-सहा ताप सौंपकर ताजगी बटोरी. नदी का पाट आगे भी चौड़ा था लेकिन रास्ता जहाँ नदी की धार झुकी थी उसके सिरहाने से होकर जा रहा था. धीरे-धीरे शाम भी हो रही थी तो हम इसी हल्के-हल्के रास्ते से ऊपर चढ़ने लगे. अब यहाँ से कोई भूला-भटका ही गुजरता है सो जगह-जगह कंटीली झाड़ियाँ भी हम पर झपट रही थीं.

हमारे दाहिनी हाथ में अब एक विशाल पहाड़ था जो उर्ध्वाकार रूप से स्खलित हो रहा था. ऊपर जंगल था लेकिन वह इस तरह से फट पड़ा था मानो उस पर अभी-अभी वृष्टि हुई हो. हम जितना आगे बढ़ रहे थे उतना ही उसे फैलता हुआ देख रहे थे. इतना बड़ा भू-स्खलन हम पहली बार देख रहे थे. एक जगह हल्का सा कांठा आया, सुरेश जी उसे पार कर गए थे लेकिन पार करते-करते वे कातर हो उठे. जिस महीन पगडंडी से हम गुजर रहे थे उसकी मिट्टी में बहुत अधिक फिसलन थी और एक खड़ा पहाड़ था. दूसरी तरफ गहरी खाई. खाई सीधे नदी में गिर रही थी. यह भयाक्रांत करने वाला था. सुरेश जी ने चिल्लाकर हमें आगाह किया तो हम और सजग हो गए. ट्रेकिंग में इस तरह की सावधान मुद्राएँ कई बार नुकसान ही करती हैं. मैं बहुत संभलकर सरक रहा था और पैरों को थिराने के दौरान ये याद नहीं रहा कि मेरे रुक्सैक के ऊपर तिरछी रखी मैट पीछे उभरी चट्टान से जा लगी है. विनोद मेरे ठीक पीछे था. मुझे ढलकता देख उसने मुझे आगे को धकेल दिया. दो छोटी झाड़ियाँ मेरे हाथ आयीं जिसमें से एक उखड़ गयी जबकि दूसरी अपनी जगह अड़ी रही. इसी भरोसेमंद जड़ ने मेरी जान बचा ली. मैट की ऐसी भूमिका को समझकर विनोद ने अपने बैग की मैट अलग निकाल ली और वह चुपके से आगे निकल आया. अब तक रोमानी रही यात्रा के बीच में मिला यह सबक हम तीनों को कंपित कर देने वाला क्षण था. हमारे पैर अब वाकई जमीन में आ गए थे. 

देर शाम हम रामगंगा नदी पर बने झूला पुल को पार कर तेजम पहुँच गए. तेजम गहरी रात की मानिंद सुनसान लग रहा था. धुरों में रहने के आदी हम लोगों के लिए घाटी की यह समय से पहले की पस्ती कुछ गजबजाने वाली थी. विनोद ने बताया कि उसके गाँव बेतालघाट से भी आसमान छोटा ही दीखता है. एक तरफ कालाखेत वाला पहाड़, एक तरफ बधानथली और एक तरफ घोड़ियाहल्सू. जब तक आप ऊंची डांडी-कांठ्यु से आसमान नहीं निहारते, यह काफी बड़ा होता है. हालाँकि प्रकृति से साक्षात्कार की बात हो तो यह मैदानों की बजाय पहाड़ों में ही अधिक हो पाता है. यहाँ अधिक आयाम मिल जाते हैं. अपने ननिहाल के गाँव शुमगढ़ से मुझे भी एक छोटा का आसमान नज़र आता था, जिसे मैं बड़ी हसरत भरी नज़रों से देखता था. यह आसमान तो ऐसा था जैसे कि पहाड़ों के ऊपर एक नीले रंग का ढक्कन रख दिया हो. गर्मियों में उस काले-भुतहा पहाड़ के चीड़ों पर जब आग धधकती तो वह और भी अधिक डरावना हो जाता.

तो खैर, हम अपने दूसरे महत्वपूर्ण पड़ाव तेजम में थे. नदी घाटी में आमतौर पर पायी जाने वाली खुशबू यहाँ मिल रही थी. गाँव के बीच बनी पगडंडी में गोबर-खाद की महक तो थी ही आदमी की गुवैन भी थी. जैसे-जैसे हम नदी तट से थोड़ा ऊपर पहुँचे यह गंध जाती रही. नदी तट के पास जानवरों के खरीक भी थे, आमतौर पर यह विष्ठास्थल भी होते हैं. अब हमें रात के लिए ठौर तलाशनी थी. पहले दिन शिखर धार का ट्रेक तो पैर सहन कर गए थे लेकिन आज शामा से तेजम तक उतरने में अँगूठे बुरी तरह दुःख रहे थे. ऊपर से रामगंगा घाटी की चिपचिपी उमस से बदन पसीना-पसीना हो गया था. रूह को आराम की सख्त दरकार थी. सख्त जान भट्ट जी झटपट आराम की तरफ मुड़ने और आसरा ढूँढने को उद्द्त न थे. उन्होंने अपना सर्वे कार्य शुरू कर दिया, हम भी बेमने से साथ लग गए.

उन्होंने पहले ओखल कूटती महिलाओं से बात की और फिर उन महिलाओं ने उन्हें कालीन बुनती एक महिला के पास भेज दिया. भट्ट जी की निश्चिंतता हमें उग्र बना रही थी. ठहरेंगे कहाँ, खाएंगे क्या? खैर, रात की आहट ने भट्ट जी को जगाया और फिर हम अलग-अलग घरों में गए. गहरी थकन के बाद अपनी मुस्कान बचाए रखते हुए अपनी पदयात्रा का मंतव्य बताते, रहने-खाने की व्यवस्था की जिरह करते.

तेजम गाँव में थोड़ी देर फिरते हुए अहसास हुआ कि यहाँ ठौर पाना इतना आसान नहीं होगा. यह रोड-हेड की जगह है. शुरुआती घर दलित परिवारों के थे. वहां लोग बातचीत तो कर रहे थे लेकिन आसरा मांगने पर भारी संकोच से भर जाते. हमने भरसक कोशिश की कि वे तैयार हो जायें लेकिन किसी ने हमारा प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया. फिर हम सवर्ण परिवारों की तरफ गए, ये क्या यहाँ तो उन्हें कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. उन्हें हममें कोई इंटरेस्ट नहीं था और वे चाहते थे कि हम टल ही जाएँ. लेकिन, हम जाते तो कहाँ जाते. आगे गाँव कितना दूर है कोई यह बताने को भी तैयार न था. ट्रेकिंग के बाद जब रात का आसरा आसानी से न मिले तो थकान सर में चढ़ जाती है. हम बेतरह चूर हो चुके थे. हमें शिखर गुफा में किए गए पाप याद आने लगे और नंदावल्लभ तेवाड़ी का अट्टहास करता चेहरा!

इत्ते में एक व्यक्ति सड़क से गुजर रहा था तो विनोद ने कूदकर उसके सामने पूरी सामर्थ्य से पीड़ा और जरूरत बयां कर दी. वो आदमी तीन नौजवानों को इस तरह से बेसहारा, बे-आबरू देखकर पसीज गया. उसने तपाक से कहा कि पंचायत घर में व्यवस्था कर देते हैं. मैं सयाना जी से बात करके आता हूँ.

पंचायत घर: हमारे सामने पंचायत घर की छवियाँ तैरने लगीं. इससे अच्छा तो गाँव के स्कूल का कमरा ही खोल देते. खैर, यह वक़्त अपनी फ़रमाइश पेश करने का बिल्कुल नहीं था. हम पंचायत घर के खुलने का इंतजार करने लगे. लेकिन, बहुत देर तक वह व्यक्ति नहीं लौटा तो हम फिर आशंकाओं से घिरने लगे. भूख भी भड़क रही थी. हम यूँ ही एक बड़े ढुंगे (गोल चट्टान) से सटकर सुस्ताने के लिए लधार लग गए. करीब 40 मिनट बाद वह व्यक्ति एक बुजुर्ग को साथ लेकर आ गए. शायद यही सयाना जी थे. उन्होंने हमारे बारे में हर संभव तहकीकात की. वह एस.एस.बी. के गुरिल्ला रह चुके थे. जब तसल्ली हो गयी तो उन्होंने अपनी खल्दी से पंचायत घर की चाबियाँ निकालीं और हमारे लिए जिरह कर रहे व्यक्ति को सौंप दीं.

हम स्वाभाविक रूप से उस भले आदमी के आगे नतमस्तक हो गए. सड़क से थोड़ी ऊपर ही पंचायत घर था. भले आदमी ने जैसे ही मुख्य दरवाजा खोला तो हम जन्नत में थे. यह पंचायत का बैठक कक्ष था, जिसमें बड़े-बड़े सोफे लगे थे. फिर हमने झट से अन्दर बेडरूम में भी झाँक लिया. यहाँ तो डनलप के गद्दे थे. विनोद तो ख़ुशी के मारे चीख ही पड़ा. भले आदमी ने बाहर श्रोत से पानी का जग भी भर दिया और बताया कि थोड़ी देर में सयाना जी आने ही वाले होंगे. मुझे थोड़ा आगे जाना है, इजाजत दीजिये, हमारा मन हुआ कि खुदा के भेजे इस फ़रिश्ते से चिपटकर गले लग जाएँ लेकिन विनम्रता से उसका शुक्रिया कर उसे विदा किया.

फिर हम तीनों एक दूसरे को देखकर मुस्कराए-खिलखिलाए. जाहिर है आगे बात करने के लिए एक सुंदर विषय था. आखिर यह पंचायत घर इतना सुंदर और आरामदेह क्यों? हम बात करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह किसी व्यक्ति ने धर्मार्थ बनाया होगा. कुछ लोग समाज में ऐसे होते हैं जिन्हें पुण्य की तलाश रहती है. यह ऐसे ही किसी व्यक्ति का कारनामा होगा. बात करते-करते मैं और विनोद सोफे में ही ढुलक गए. खुरदुरी यात्रा के बाद गुदगुदे सोफे. भट्ट जी अपनी दैनंदिन डायरी लिखने बैठ गए, हमारी आँख लग आई थी कि इतने में दरवाजे पर सयाना जी खटखट करते हैं. भट्ट जी दरवाजा खोलते हैं.

यह क्या सयाना जी का पूरा परिवार ही चला आया है और सबके हाथ में कुछ न कुछ है. हम लज्जा से चूर हो गए. हमारे लिए इतना सब. दो-दो रोटी दे देते क्या कम था! हमसे न धन्यवाद कहा जा रहा था न ही हमारी फटी आँखें छुप पा रही थीं. हमने सयाना जी से बैठने के लिए कहा. हमारी हालत काटो तो खून नहीं जैसी. सयाना जी ने ही बोलना शुरू किया. आप लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. नन्ताल से आए हैं. गांवों को जानना चाहते हैं. यह बहुत अच्छी बात है. उनकी इतनी सी बात थी कि हम थोड़ा सहज हो सके. 'जी, आप जैसे लोगों का सहयोग मिलता रहे तो हम तो चलते रहें... ही...ही ही...' भट्ट जी ने कुछ इस तरह से उनका जवाब दिया. हमें यह बड़ा अजीब लगा लेकिन यह भट्ट जी का नैसर्गिक रूप था. माहौल अब काफी हद तक सामान्य था. हम लोग एक आलीशान गेस्ट हाउस में रुके थे और तमाम व्यंजन हमारे सामने थे.

विनोद ने संवाद आगे बढ़ाने के लिए कुमाऊंनी में पूछाः ''बूबू तुमर नाम की हय?'' बूबू ने कहा, 'मैं रावत हूँ.' फिर थोड़े से विराम के बाद बोले, “हम लोग भोटिया रावत हुए. यह पूरा गाँव हमारा ही हुआ''. बुबू ने बताया कि पहले तेजम एक पड़ाव था, अब गाँव और क़स्बा जैसा हो गया है.'' बूबू ने कहा कि आप लोग पहले भोजन कीजिये, फिर गाँव के कुछ लोग आएंगे. मैंने उन्हें यहाँ आपके आने की सूचना दी है. शायद यह भी यहाँ का दस्तूर है कि लोग मेहमानों से मिलने-भेंटने आते हैं.

इस बात से हमारी पदयात्रा करने की सार्थकता सिद्ध हो गई. हम इतने आनंद और संतोष की स्थिति में आ गए कि अब बुबू से सवालों-जवाबों का सिलसिला ही चल निकला. हम भुक्कड़ों की तरह भोजन पर टूट पड़े थे और बातें भी करते जाते. यहाँ आकर पहली बार मालम पड़ा कि रावत भोटिया भी होते हैं. दूसरा इस तरह की मेजबानी भी वही कर सकते थे. लेकिन, बुबू से जो पहला बुनियादी सवाल हमने किया कि 'यह पंचायत घर ऐसा क्यों है? क्या यह धर्मार्थ है?' बुबू ने हँसकर जवाब दिया; ''नहीं नहीं, यह धर्मार्थ नहीं है. यह तो पंचायत का कुछ पैसा था. उसमें हम लोगों ने कुछ मिलाया और यह थोड़ा काम का बन गया. उन्होंने बताया कि यह गाँव का सबसे अच्छा घर है. जहाँ मेहमानों को टिकाया जाता है”. 'मेहमान माने कौन? खुद ही पूछा और खुद ही जवाब दिया. “आप जैसे लोग नहीं. टूरिस्ट भी नहीं. हमारे बच्चे जो बाहर से यहाँ आते हैं. उन्हें थोड़ा सुभीता चाहिए न?''; और यह कहकर वह खुद ही जोर से हँस पड़े.

थोड़ी देर में मालूम पड़ा कि बूबू यानी सयाना जी का बेटा अमेरिका में डॉक्टर है. गाँव के सभी लोग बहुत पढ़े-लिखे और अच्छी नौकरियों में हैं. कुछ आईएएस और आईपीएस भी इस गाँव से हैं. थोड़ी देर बाद गाँव के दो बुजुर्ग और आ गए. उन्होंने सयाना जी से कान में कुछ कहा, मगर हम समझ नहीं पाए. लेकिन सयाना जी से रहा नहीं गया और उन्होंने कह ही दिया. “देखिए बच्चो हमारे यहाँ कुछ रिवाज हैं. आप क्या लेते हैं कुछ?” हम फिर भी समझ नहीं पाए. उन्होंने तसल्ली से कहा, 'देखिये जबरदस्ती नहीं है लेकिन रिवाज हुआ ये मुझे इन दो साथियों ने याद दिलाई. मुझे भी ध्यान था मगर माइंड से निकल गया”. हमने पहले कहीं सुना था भोटिया परिवार मेहमानों को स्वागत के समय चकती यानी गाँव में बनी हुई शराब पेश करते हैं. हमने विनम्रता से मना कर दिया यह कहते हुए कि लेते तो ले ही लेते.

हम भोजन पा चुके थे और आराम चाहते थे, मगर भट्ट जी अपना रजिस्टर खोलकर बुजुर्गों के सामने पाल्थी मारकर बैठ गए. उन्हें भी अच्छा लगा उनके बारे में कोई जानना चाहता है. सयाना जी की आवाज आ रही थी. “देखिये पहले तेजम मुनस्यार, थल और दानपुर के बीच की बड़ी मंडी था. व्यापार होता था खूब दम-ठुलंग, जड़ी-बूटी-मोंगे. लामा लोग भी आते थे तिब्बत से. बागिसर का मेला..सारा सामान यहाँ जमा होता था. यहीं से जरूरत के मुताबिक जाता था. चीनियों ने डिस्टर्ब कर दिया. फिर तो ख़तम जैसा ही हो गया. उनके साथी उनके साथ सहमति की होई होई कर रहे थे. हम थकान के आगे नतमस्तक थे. कब आँख लगी मालूम ही नहीं पड़ा. सुबह भट्ट जी को जगाकर पूछा कि रात कब तक बात चलती रही, कब गए बूबू लोग?

हमें याद आया कि शामा धुरा से एक बंगाली परिवार भी हमारे साथ चला था, जो बीच में भी हमें एक बार मिला, लेकिन बाद में नहीं दिखा. शायद वह दूसरे रास्ते निकल गया हो या कफनी ग्लेशियर की तरफ मुड़ गया हो. उनके पास भी हमारी तरह भिगोये गए घोड़िया-चनों की बोतल थी. पदयात्राओं में भीगे चने से बढ़िया कोई भोजन नहीं.

अगला दिन ट्रेकिंग के हिसाब से लंबा रास्ता था मगर इस रास्ते में एक बड़ा आकर्षण था. बिर्थी का झरना. बहुत सुना था इसके बारे में. आज देखना भी हो जाएगा. शमशेर की कविता हमारे साथ थी. 'मुझे प्यास के पहाड़ों में लिटा दो. जहाँ मैं एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ. मुझको सूरज की किरणों में जलने दो ताकि उसकी आँच और लपट में तुम फौवारे की तरह नाचो’. आज भट्ट जी प्रसन्नचित्त थे. होते भी क्यूँ नहीं, कल शाम उन्हें ज्ञान का जो जखीरा मिला था वो इस शोध-यात्रा को मुकम्मल करने और परवान चढ़ाने के लिए कैटेलिस्ट से कम न था.

हम खेलते, गाते, कूदते-फाँदते, कुलाँचें मारकर आगे बढ़ रहे थे. हम हिरण तो न थे पर हिरण बनने की कोशिश कर रहे थे. दिन के मुतालिक क्वीटी, बिर्थी, गिरगांव तल्ला, रातापानी आदि में सर्वे कार्य किया गया. मगर, विनोद और मेरी दिलचस्पी बिर्थी फाल और पर्यटन के अंतर्संबधों में अधिक थी. कुदरत ने क्या जो गजब नेमत बख्शी है बिर्थी झरने के रूप में. सदाबहार झरना और वो भी रोड हेड से लगा हुआ. मुन्सियारी तब कुछ पर्यटक जाने लगे थे और इधर आस-पास के स्कूलों-कॉलेजों से भी कुछ दल बिर्थी फाल देखने आते हैं. लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से न यहाँ कोई ढाबा है, न कोई भुट्टा-ककड़ी बेचने वाला, न कोई 'हमारे होटल आओ' कहने वाला. आपको बिर्थी में रुचि है तो आइये, देखिये और जाइए. हमें अच्छा भी लगा, क्यों सारे पर्यटक स्थल एक जैसे हों. हमने जितना हो सकता था उतना बिर्थी फाल को देखा और फिर उसी के रास्ते से लगी गिरगाँव की पगडंडी पकड़ ली.

स्थानीय लोगों ने बताया था कि हम रात तक मुन्सियारी पहुँच सकते हैं और यह बात हमें जितना गुदगुदाने वाली थी उतनी ही निराश करने वाली. निराश इस मायने में कि हम कई दिन की मानसिक तैयारी से चले थे इस पदयात्रा पर. कपकोट से मुन्सियारी पदयात्रा अपने आप में एक मह्त्वाकांक्षी बात लगती थी. हमें पहला झटका लगा जब हम समय से पहले तेजम पहुँच गए. दूसरा अब यह समाचार कि हम आज रात में ही मुन्सियारी पहुँच जाने वाले हैं. तब इस यात्रा में मजा ही कहाँ रहा?

लेकिन, मजा था. मजा छुपा पड़ा था गिरगांव की चढ़ाई में. समुद्र के तल से हम जैसे-जैसे ऊपर उठ रहे थे तो साँस चढ़ रही थी. दूसरी तरफ जूतों के अन्दर कुछ गुदगुदी मचने लगी. यह गुदगुदी जूतों के सिलाई-छिद्रों से अन्दर जा घुसी जोंकें कर रही थीं. शुरू-शुरू में तो हम जूते खोलते, जौंक हटाते और फिर चल पड़ते. मगर, यह बार-बार होने लगा. हम बहुत कम धूप देखने वाले आद्र वन से गुजर रहे थे. यह वन मिश्रित वन था. बांज-बुरांश-रियांज-उतीस-फल्यांट और पतेलों से भरा हुआ छड़म-छड़म-छड़म की आवाजें तब तक भली थीं, जब तक जोंकें नहीं आईं थीं. जौंकें कितनी जो ताकतवर होती है यह पाठ आज हमें जानना था. यह सही मायनों में जौंकों की राजधानी थी.

हमारा पिकप गिर गया. अब बचते-बचाते हम फूक-फूककर आगे सरक रहे थे. हालाँकि हमारे साथ बिर्थी गाँव से चले ठेले (ट्रक) घुमावदार, लंबे मोड़ों से आते हुए हमें नहीं पछाड़ पा रहे थे. सच मानिए जो कल रात खातिर हुई थी तेजम गाँव में, आज उसका पाई-पाई हमसे निचोड़ा जा रहा था. लेकिन, कुछ जगहें जहाँ जौंकों ने हम पर रहम किया हम वन्यता की. जैव-विविधता की शान में बोल सके. ऐसे स्थलों पर तो हमने जौंकों के भी गुण गा दिए. गिरगांव पार करने-करने तक अँधेरा गहरा गया था. चौमास आया नहीं था अभी लेकिन उसकी पूरी दस्तक हो चुकी थी. आसमान शाम ढलते ही गहरा और गाढ़ा हो गया. मुँह फेर कर देखा तो हमारे पीठ पीछे के पहाड़ों पर गहरा सलेटी रंग पोता जा चुका था. उजाले की एक किरण तक देख पाना मुमकिन न था. लंबे ट्रेक, उमस, थकान ने हमारी हड्डियों के जोड़ खजबजा दिए. किसी तरह कालामुनि टॉप तक पहुँच गए. आगे मुनस्यार का संसार था लेकिन आगे बढ़ा नहीं जा सकता था. आठ-साढ़े आठ बजा होगा शायद हमने कालामुनि मंदिर का गेट खटखटाया. हमारे ऐसा करते ही भयानक गर्जना वाले तीन भोटिया कुत्ते एक साथ भौंकने लगे. हमारी रूह काँप गयी. साफ़-साफ़ देखना मुमकिन नहीं था, लेकिन उनकी बड़ी-बड़ी और रौबीली आँखें चमक रही थीं. मानो आँखें ही कुत्ते हों और आँखों का आकार कुत्तों से बड़ा हो. हम सहमकर बैठ गए. हमारा भरोसा मंदिर के अन्दर था. हम बाहर थे और यह भय सता रहा था कि यदि ये कुत्ते गेट से बाहर आ गए तो हमारी बोटियाँ चबा जायेंगे. थोड़ी देर सुस्ताने के बाद जब कुत्तों की सिंह गर्जना हल्की हुई तो हमने फिर से गेट खटखटाया. इस बार थोड़ा आग्रहपूर्वक. लेकिन कुत्तों को हमारी ये गुस्ताखी एकदम रास नहीं आई. वे और अधिक ताव में आकर हम पर बरस पड़े. वे वाकई डरावने थे, जरूर ताकतवर भी होंगे.

जोहार से भेड़ चराने हमारे जंगलों से गुजरने वाले भेड़-दलों के साथ ऐसे आक्रांत करने वाले कुत्ते देखे थे. उन्हें देखकर बाघ को भी जोखिम उठाते नहीं बनता था. हम बुरी तरह निराश हो गए. कड़ाके की ठंड थी और बर्फानी हवाएं सरककर निकल रही थीं. हल्की-हल्की बूंदाबादी भी शुरू हो चुकी थी. ऐसे में यहाँ हिमकण भी आना संभव था. हमने जोर-जोर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया. कुत्ते भौंक रहे थे और हम चीख रहे थे. कुछ तो हम अपने बचाव में ऐसा कर रहे थे और कुछ हमारी थकान से मिला चिड़चिड़ापन हमसे ये करा रहा था. मंदिर का गेट न खुला तो आज मौत तय है. मुन्सियारी दूर थी और इस मौसम में वहां जा नहीं सकते थे. चाहकर भी नहीं जा सकते थे क्यूंकि अब पैर उठ ही नहीं रहे थे

एक घंटा होने को था तो मंदिर के भीतर कुछ हरकत शुरू हुई. एक कड़कड़ाती हुई आवाज हम तक आई. ये बाबाजी थे जो स्वयं गेट पर आये थे. शायद उन्होंने बारिश और ठण्ड को देखते हुए हमारे बारे में कुछ निर्णय ले लिया. उन्होंने कुत्तों को झिड़ककर दूर हटने का आदेश दिया और गेट खोल दिया. लेकिन बाबाजी ने हमसे कोई बात नहीं की और वहां मौजूद एक आदमी को आवाज लगायी. उन्होंने उस आदमी को हमें साथ ले जाने और खाने की जरूरत होने पर कुछ खिला देने का आदेश सुनाया. वह दूर इंतजार कर रहे अपने कुत्तों के साथ मुख्य मंदिर की ओर चल दिए. आदेशित आदमी चुपचाप हमें एक तरफ को ले गया. चलते-चलते ही वह अचानक एक गुफानुमा कमरे में घुस गया. हमने कुछ देर इंतजार किया लेकिन जब वह बाहर नहीं आया तो मैं भी गुफा में घुस गया. यह बहुत कम ऊंचाई का गोठ था. यहाँ सीधी कमर उठा नहीं जा सकता था. मैंने आदेशित आदमी से पूछा कि क्या हमें यहीं रहना है. वह कुछ बुदबुदाया और फिर उसने हाथों से इशारा किया कि अपने साथियों को अंदर बुला लूं.

मालूम पड़ा यह आदमी एक चरवाहा (बद्दी) है जो अपने पुश्तैनी खरीक में अड्डा जमाए है. उसने हमें बताया कि मंदिर बहुत बाद में बना, उनका यह पुराना अड्डा है. अब उसका खरीक मंदिर परिसर में आ गया है. उसकी बातों से हमें महसूस हुआ कि वह बाबाजी के आदेश से खुश नहीं था. मगर, वह बाबाजी को कुछ कह भी नहीं सकता था. हम लोग किंकर्तव्यविमूढ़ थे. खरीक गोल पत्थरों के ढेर लगाकर बनायीं गयी थी. जिसकी छत में फूस पड़ी थी. आदमी से भेड़ों की बास आ रही थी और ऐसा लगता था कि शायद कभी-कभार कुछ भेड़ें भी यहाँ चरवाहे के साथ सो जाती हैं. हमने आँखों ही आँखों में तय कर लिया कि भोजन का अब नाम न लो!

चरवाहे की विवशता पर हमें तरस आ रहा था और उसकी विवशता की वजह भी हम ही थे. वह उनींदा लग रहा था. शायद सो ही चुका था. खरीक के अंदर भी ठंड से राहत नहीं थी सो हमने जितने कपड़े मुमकिन थे पहन लिए. विनोद और मेरे पास मैट और स्लीपिंग बैग भी थे मगर यहाँ इतनी जगह नहीं थी कि चार लोग पैर पसारकर सो सकें. सो हम उकडू हालत में सोने की कोशिश करने लगे. थकान से हमारी आँख लग आई थी. इसी दौरान खरीक में कुछ धुँआ सा आने लगा और हमारी नाकों तक मिट्टी तेल की दुर्गंध पहुँची. बद्दी चूल्हे में आग सुलगाने की कोशिश कर रहा था. उसकी लकड़ियाँ गीली थी मगर वह बिना कोई बात कहे अपने काम में लगा था. वह भट्ट जी के सारे सवालों के जवाब नहीं दे रहा था और जो दे रहा था वह भी समझना मुश्किल था कि क्या बोला होगा. शायद उसकी अपनी कोई और भाषा थी और शायद उसका स्वभाव ही ऐसा था कि कम शब्दों में ही उसका काम चल जाता था. भट्ट जी से उसने ये तस्दीक कर ली थी कि हम लोग भूखे हैं. इसलिए अब वह हमें खिलाने की जुगत में लगा था. हम दोनों कुछ घटता हुआ तो देख रहे थे लेकिन शिथिल हो चुके शरीर और अचेतनता से सब समझ नहीं पा रहे थे. हाँ, कुछ तो घट रहा है, मैंने विनोद को बताया लेकिन क्या यह अभी कहा नहीं जा सकता. आग जल गयी तो बद्दी ने एक लंबी से लौकी पत्तियों के बीच से निकाल ली और एक अभ्यस्त खुकुरी से उसे काटने में जुट गया.

भट्ट जी ने हमारी ओर देखते हुए इशारा किया सब कुछ अच्छा होगा. हम अब खाने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रह गए थे. उल्टा बद्दी भाई की स्थिति से हमें पीड़ा ही हो रही थी. फिर भी हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे. हमने देखा कि बद्दी ने लौकी को बिना तले ही कड़ाई में छौंक दिया और ऊपर से उस पर मोटा नमक छिड़क दिया. अब वह एक पीतल की थाली में आटा गूँथने लगा. हम बीच-बीच में कोई दृश्य देखते और फिर हल्की-सी झपकी हमें सुला देती. बद्दी के हाथों को देखा या बद्दी के हाथों के बारे में सपना आया जाने क्या मगर एक अजीब सी भावना मन में उपजी. फिर जब हमारी आँख खुली तो भट्ट जी और बद्दी खाना परोसने की कोशिश कर रहे थे. आज भी खुदा की रहमत से हमें भूखा नहीं सोना होगा.

बहुत कम बर्तन थे, लेकिन तीन लोगों का खाना लग रहा था. हमें सुलटा किया गया और फिर लौकी की सब्जी के साथ मोटी-मोटी रोटियां परोसी गयीं और हमने खाया भी. पता नहीं हाथ धोये कि नहीं धोये लेकिन हम भरपेट अहसास के साथ गहरी नींद सोये. इतना याद है कि बद्दी हमें खाना खिला चुकने के बाद संतुष्टि भाव से धीमा-सा मुस्कराया था और फिर वह और भट्ट जी भेड़पालन को लेकर कुछ बातें कर रहे थे. सुबह बद्दी ने ही हमें जगाया और कहा कि बाबाजी हमें याद कर रहे हैं. हम लोग जाग जाएँ और मंदिर की प्रार्थना में शामिल हों. उसने यह भी बताया कि वह आज अगले खरीक तक जाएगा. हम जल्दी तो नहीं उठे, थोड़ा और सोये, अब यह खरीक हमें अपनी-सी लगने लगी थी. सूरज की रौशनी पर्याप्त महसूस हुई तो हम झटपट उठे और अपना सामान समेटा. सामान वहीं छोड़ हम बाबाजी से मिलने गए.
बाबाजी इस समय काफी हँसमुख लग रहे थे. हमने पूछा भी कि क्या कल उन्होंने ही हमें शरण दी थी. उन्होंने बताया कि हाँ वे वही थे. बाबाजी अपनी धूनी ज़माने लगे तो इस बीच हमने मंदिर में हाथ साफ़ किए, यह रसूखदार मंदिर था और इस यात्रा में जहाँ भी हमें कुछ कमाई होती भट्ट जी ऐसे देवता और मंदिर को और पुष्पित-पल्लवित होने का आशीर्वाद जरूर देते.

हमने अपने बैग उठाये. बाबाजी को जोरो का धन्यवाद कहा और आगे बढ़ गए. जाते-जाते बाबाजी ने हमसे कहा कि बच्चा खलिया टॉप जरूर जाओ. भोले-बाबा वहीं मिलेंगे. थोड़ा आगे से खलिया बुग्याल का रास्ता निकलता था. यहाँ से पञ्चचूली और अन्य हिम दृश्यावलियों का विहंगम दृश्य दिखता है. लेकिन हमारी प्राथमिकता फ़िलहाल हिमालय नहीं यहाँ के लोग थे. 'हम पर्यटन करने नहीं आये हैं', यह अहसास भट्ट जी हमें बार-बार कराते. यह भी एक गर्वोक्ति थी कि 'हम कोई बाहर से थोड़ना आए हैं यहीं के रहने वाले हैं, प्रकृति को तो जानते ही हैं.' यह हमारा तब का तिरष्कार भाव ही था क्यूंकि उन दिनों हम घरघोर जनवादी जो थे.

रास्ते में हमें बद्दी की बड़ी याद आई. कितना सीधा और सच्चा इंसान था वो. हिमालय का दृश्य अब खुल चुका था. हम हिमालय की तरफ वाले पहाड़ में थे. वनस्पति शास्त्र के ज्ञाता विनोद ने बताया कि मध्य हिमालय की वनस्पतियों से थोड़ा फरक वाली वनस्पतियाँ दिख रही हैं. बाँज-बुरांश-चीड़-देवदार की फरक छवि को हम सबने महसूस किया.

दोपहर तक हम मुन्सियारी में थे. भट्ट जी ने पहले मुन्सियारी बाजार का सूक्ष्मता से अवलोकन किया. फिर यहाँ के व्यापारियों से बात की. यहाँ पूछने, बताने और खोजने के लिए बहुत कुछ था. सेब, राजमा, जड़ी-बूटियों, कुटीर उद्योग-पर्यटन, पर्वतारोहण, आव्रजन, पलायन, भोज्य-विविधता आदि पर ढेरों बातें की गयीं. अब तक हमारे मन में छवि थी कि भोटिया लोगों में जातिभेद नहीं होता. लेकिन, यहाँ जानकारी मिली कि यहाँ भी दो जातियाँ हैं तथाकथित निचली जाति के भोटिया लोग आज भी विकट परिश्रम करते हैं और शिक्षा कम होने से उनका सरकारी नौकरियों में जाना न के बराबर हुआ है. उनमें पलायन भी कम है सो वह आज भी यहाँ की कृषि-पशुपालन अर्थव्यवस्था की धुरी बने हुए हैं. कुमाऊं की महिलाओं के बनिस्पत यहाँ की महिलाएं अधिक स्वतंत्र और स्वायत्त हैं लेकिन यह उस तरह का मातृसत्तात्मक समाज भी नहीं है जैसे कि अकादमीशियन बता देते हैं. घर के बड़े फैसले तो पुरुष ही लेते हैं, उन्हीं का संपत्ति पर नियंत्रण भी है. बावजूद सबकुछ के हमें यहाँ की अर्थव्यवस्था में भारी ताकत दिखी. खुद से रोजगार सृजन की कूबत यहाँ सबमें कूट-कूटकर भरी है. क्षेत्र के गांवों में अब भी जबरदस्त सहकार की भावना मौजूद है. लोगों ने विपरीत मौसम के अनुसार यहाँ रहना और जीना सीखा है. भाषा के मामले में जरूर हीनभावना आई है. लोगों ने जोहारी की जगह कुमाऊंनी और हिंदी अपना ली है.

मुन्सियारी क़स्बे के बाद भट्ट जी को धौली गंगा घाटी के गांवों में सर्वे कर अपने सैम्पल साइज़ की भरपाई करनी थी. कपकोट से मुन्सियारी तक उतने गाँव नहीं मिल सके थे जितनी की उम्मीद थी. सो, इसे मुन्सियारी की तलहटी में बसे गांवों से लेकर पहले मदकोट फिर जौलजीवी तक खींचा गया. ट्रेक लंबा होने से विनोद और मेरा अहं भाव भी तुष्ट हुआ. बाद में जौलजीवी से पिथौरागढ़ जीप से गए. वहां एक-दो रोज हरीश पंत जी (सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य) जीआईसी रोड के यहाँ आराम किया. इसी यात्रा में हम पुनः एक और पदयात्रा जोड़ पाए. पिथौरागढ़ से वाया पाताल भुवनेश्वर गंगोलीहाट. शायद हमें पैदल चलने की हौस लग गयी थी. मगर, शोध-यात्रा के बरक्स हो रही पदयात्रा का उत्स तो मुन्सियारी ही था.

तब बदला क्या है?

इस बार कपकोट से मुन्सियारी की योजना गढ़ते समय पहले तो मुझे ये आश्चर्य हुआ कि 15 साल पहले हमने कोई पदयात्रा इस रूट से की थी. ओह 15 साल गुजर गए! दूसरा आश्चर्य ये हुआ कि 15 साल गुजर जाने पर भी हम उस यात्रा को शब्द में नहीं ढाल सके. यह यात्रा उन बिरल यात्राओं में थी जो हमने प्रकृति की बजाय मनुष्य को केंद्र में रखकर की थी. मनुष्य इन विकट पहाड़ों में कैसे जीता है, यह हमारी उत्कंठा का केंद्र बिंदु था. विरल आबादी थी लेकिन हमने उस पर सघन काम किया. जरूर भट्ट जी की पीएचडी थीसिस के कुछ पन्नों में उसका सत्व गया होगा और जरूर कुछ आँकड़े पुष्ट-परिपुष्ट हुए होंगे लेकिन उसका तरल रूप अनछुवा रह गया. तेजम के सयाना जी की मिजबानी के उन भावों को हम अब वैसा का वैसा तो नहीं ला सकेंगे और न ही कालामुनि मंदिर के अहाते में रह रहे बद्दी के मन में उमड़ता-घुमड़ता वो सब कुछ, जो हमारे साथ लंबे स्पर्श की तरह रहा. यही बात महसूस होती है कि जहाँ आपको कुछ नैसर्गिक, मानवीय भाव मिलें वह जरूर दर्ज हों. भौतिक जगत की छवियाँ फिर से जुटायी जा सकती हैं लेकिन तनाव के क्षणों में ‘मनुष्य-मनुष्य के बीच घटा वह खास’ नहीं लौटाया जा सकता. जबकि वही एक ऐसी चीज है जिसे मनुष्यों की अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित होना चाहिए.

भौतिक रूप से इस मार्ग में अब भी कोई ड्रामाई बदलाव नहीं आए हैं. शामा धुरा से तेजम तक पक्की डामर सड़क जरूर बन गयी है. अभी इसकी खबर बहुतों को नहीं हुई है. निश्चित रूप से यह नई सड़क अपने नए मंजरों से खाए-अघाए पर्यटकों को कुछ ताजगी दे पाए. शामा का क़स्बा थोड़ा फूल गया है. फैला नहीं है, फूल गया है अपनी ही जगह. जहाँ पहले खुली-खुली दुकानें थीं, अब वे बाज़ार के प्रिय उत्पादों से भर गईं हैं. दुकानों और मकानों के ऊपर होटलनुमा कमरे निकाल लिए गए हैं. बाकी अवस्थापना बहुत कुछ वैसी की वैसी है. बाहर का कोई आदमी एक बड़ा होटल यहाँ बना रहा है, शामा से थोड़ा पहले. राजेंद्र कोश्यारी अपना आजीविका प्रयोग बीच में छोड़ देहरादून चले गए हैं. उनके मूल गाँव चीटाबगड़ की तरफ भी उदासी पसरी है. हालाँकि नाचनी के पास से कोई नई सड़क उधर जा रही है. रमाणी गाँव लगभग पूरा उजड़ गया है. लोगों ने बताया कि 15 साल पहले जो कीड़ा यहाँ के संतरों पर लगना शुरू हुआ था, वह बाद में संतरों का जड़-मूलनाशक साबित हुआ. रमाणी के मशहूर संतरे अब केवल बुजुर्गों की यादों में हैं. सड़क रमाणी को पूरा नहीं छूती है. किनारे से निकल जाती है. सड़क अभी बेहद सँकरी है और पहाड़ में नए आने वालों के लिए खतरों से भरी हुई. लेकिन, सड़क से नदी और पहाड़ के साथ बनने वाले दिलकश-दृश्य बेहद मनोहारी हैं. अब नीचे रामगंगा नदी में आपको एक हवादार पुल मिलता है और यही नदी-पुल बागेश्वर-पिथौरागढ़ की सरहद बनाते हैं. सड़क फिर से कई घुमावदार चक्कर लेती चढ़ती है और अंततः तेजम से कुछ किलोमीटर पहले मुन्सियारी हाईवे में मिल जाती है. बीच में एक जगह से रामगंगा में सड़क डाली गयी है, जहाँ एंगलिंग की कैंप साइट है. सड़क मार्ग में तेजम अलग-थलग छूट गया है जो कभी बागेश्वर-पिथौरागढ़ के बीच की जरूरी मंडी होने से गौरवान्वित होता था. रमाणी-तेजम के मार्ग से सड़क शायद इसलिए भी न दी हो क्यूंकि रमाणी के ठीक बाजू में काफी बड़ा लैंडस्लाइड सक्रिय है. यह 15 साल पहले भी हमने इसी भुतहा रूप में देखा था. अब इसका मुँह और फ़ैल गया है. पूरा पहाड़ ऊपर से नीचे तक छलनी हो चुका है और शायद प्रकृति में हो रहे बदलाव का एक बड़ा सूचक है. कृत्रिम उपायों से इसे रोक पाना अब मुमकिन न होगा. जाने क्या चल रहा है भीतर-भीतर!

क्वीटी और बिर्थी गाँव के बीच भी एक बड़ा भू-स्खलन सक्रिय हुआ है. लेकिन, यह पहले नहीं था या छोटे रूप में रहा हो. यह भी काफी विस्तार और गहराई लिए हुए है, यह उस तरह का नदी-घाटी का भू-स्खलन नहीं है जैसा कि ऊखीमठ से जौलजीवी के बीच कई जगह देखने को मिलता है. यह सामान्य पहाड़ में है जिसमें एक तरफ गिरगांव का भारी मिश्रित जंगल है. हो सकता है इस क्षेत्र में कुछ आतंरिक संरचना बदल रही हो. बिर्थी फाल के नीचे अब कुछ दुकानें पर्यटकों के लिहाज से खुल गयी हैं, ये पास के बिर्थ्वाल लोगों की ही हैं. यहीं पास में अब केएमवीएन का भी एक बड़ा होटल बन चुका है.

मुन्सियारी से पहले जो जगह जैव-विविधता पार्क बने हैं. संभवतः यह पूर्व वन महानिदेशक डॉ. आरबीएस रावत के समय में वन पंचायतों के जमा धन से बने थे. लेकिन, अच्छी मंशा से बने और पर्यटकों को यहाँ की वनस्पतियों से परिचित कराने के लिए बने इन पार्कों की दुर्दशा देखते ही बनती है. सरकारी सिस्टम का सबसे बड़ा दोष ये है कि यहाँ एक अच्छे कदम की इतिश्री उसे उठाने वाले की विदाई के साथ ही हो जाती है. कोई नया अधिकारी उसे आगे बढ़ाने का इच्छुक नहीं रहता.

पर्यटक स्थल बन जाने से मुन्सियारी जाहिर है अपना मिजाज बदल चुका है. यह स्वाभाविक बात है लेकिन यहाँ तेजी से फलते-फूलते होटल व्यवसाय में बाहर का पैसा लगना भी अनिष्टकारी प्रतीत होता है. मुन्सियारी से ठीक पहले हिमालय की छटा को बाधित करने वाला एक विशालकाय मंदिर नुमा धर्मशाला बना है. गायत्री मन्त्र वालों के धार्मिक पर्यटन के हिस्से का निवेश लगता है. यह यहाँ सबसे अधिक अटपटा लगने वाला मामला है. मुन्सियारी में मल्लिका विर्दी के प्रयासों से शुरू हुआ होम-स्टे का प्रयोग काफी चर्चित रहा है. लाभ-वितरण के हिसाब से देखें तो यह काफी सुखद परिघटना है लेकिन यह खतरे भी साथ ला रही है. गाँव के लोग पर्यटकों को अपने घरों में टिकाकर, घर का खाना खिलाकर आतिथ्य भाव का जो मॉडल बनाना चाहते हैं, पर्यटक उस संस्कृति के नहीं हैं. लिहाज़ा यहाँ चकती पीना एक बड़ा आकर्षण बन चुका है. जाहिर है होम-स्टे ने चकती उद्योग को बढ़ावा दिया होगा लेकिन अकस्मात् हो रही कमाई इस काम में लगे लोगों का चरित्र नहीं बदलकर रख देगी, कहा नहीं जा सकता.
मुन्सियारी में महान सर्वेयर पंडित नैन सिंह रावत की स्मृति में एक पर्वतारोहण संस्थान की शुरुआत हुई है. यह एक अच्छी पहल है. निम, उत्तरकाशी जैसी संस्था बहुत कम लोगों को प्रशिक्षण दे पाती है. यह उस इच्छा का भार बाँटेगा. मगर सरकारी चाल के हिसाब से अभी इसके फलने-फूलने में बहुत देर लगनी है. अब संस्थाओं को खड़ा करने में व्यवस्था में वैसा उत्साह नहीं.

खलिया टॉप ट्रेकिंग के नक़्शे में अचानक बहुत ऊपर चला गया है. शायद मुन्सियारी कस्बे से इसकी कम दूरी ही इसकी बड़ी वजह हो. गंभीर पर्यटक तो ऐसे शिखरों और बुग्यालों में पहले भी जाते रहे हैं लेकिन यह आम आदमी के लिए भी सुगम हो गया है. पंचचूली की विहंगम छवियों का साक्षात्कार पाने के लिए यह छोटा-सा ट्रेक बड़ा उपयोगी है. खासकर, हिमालयी शिक्षा के हिसाब से बेहद फलदायी. मगर, बुग्याल में जगह-जगह बिखरी पड़ी शराब और पानी की बोतलें, नमकीनों और कुरकुरों के रैपर विनाश की पूर्वसूचना लाते दीखते हैं. हमारे यहाँ पर्यटन के लिए कोई नियम-कानून, शिक्षा और प्रशिक्षण नहीं है.

मुन्सियारी में आज बहुत लोगों को इस बात का इंतजार है कि झट से झट मिलम ग्लेशियर के पास तक सड़क चली जाए. मिलम और ऊपर घाटियों में अब बहुत कम लोग रह गए हैं. हिमालय के सामीप्य का पर्यटन ही प्रमुख आकर्षण है. जैसे-जैसे यह सड़क आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे बाजार से पूँजी यहाँ पहुंचेगी. शायद उस मॉडल में स्थानीय लोगों का मालिकाना वैसा नहीं रह सकेगा, जैसा कि वो सदियों से रहा है.