Sunday, October 7, 2018

इसी मौसम में


हरसिंगार खिलने के महीने को अक्टूबर क्यों कहा गया होगा लड़की को पता नहीं लेकिन उसने हथेलियों में हरसिंगार सहेजते हुए हमेशा कुछ ताकीदें याद कीं जो इस मौसम में उसे दी गयी थीं. इसी मौसम में उसने आखिरी बार थामा था एक अजनबी हाथ, इसी मौसम में उसने निगाह भर देखा था उसे. शहर की सड़कों पर उन दोनों ने इसी मौसम में एक साथ कुछ ख़्वाब देखे थे. उन ख्वाबों में ही तय किया था एक वादा कि कोई वादा नहीं करेंगे एक दूसरे से. इसी मौसम में उँगलियों ने उँगलियों से दोस्ती की थी. निगाहों ने टकराकर दिशाएं बदलना सीखा था. यही तो था मौसम जब चाय पीने की शदीद इच्छा में खोजते फिरे थे चाय की कोई गुमटी और मिल जाने पर चाय इस कदर खोये रहे थे एक दूसरे में कि चाय ठंडी हो गयी थी रखे-रखे ही. इसी मौसम में उम्मीदों की ठेली लगाने की सोची थी दोनों ने और दरिया के पानी से वादा किया था कि पानी बचाए रखेंगे दरिया में भी और आँखों में भी.

इसी मौसम लड़की ने शरमाना सीखा था, शरमाना छोड़ा भी. इसी मौसम में लड़के ने उससे कहा था, अगर मुझे पाना है तो खुद को संभालना सीखो, उठना सीखो, अकेले चलना सीखो, मुश्किलों से लड़ना सीखो, धूप को सहना सीखो, काँटों से उलझना और खुद निकलना सीखो. उसने कहा अगर मुझे पाना है तो प्यार करो खुद को, संगीत के सुरों में धूनी जमाओ, रास्तों में भटकना सीखो. उसने कहा, अगर पाना है मुझे तो प्यास संभालना सीखो, बिन मौसम की बरसातों में भीगना सीखो, बिना धूप के सूखना सीखो. उसने कहा कि अगर जीना है प्यार में तो हर पल मरना सीखो, याद की तावीज़ गले में टांगकर मेरे बगैर ही मेरे होने को महसूस करना सीखो...

जब वो सब सीख गयी तो उसने पाया कि वो किसी और के संग जीना सीख चुका था...हरसिंगार झरे पड़े थे धरती पर...इसी मौसम में...

Thursday, October 4, 2018

बचा रहे बनारस...


दाल में बचा रहे रत्ती भर नमक
इश्क़ में बची रहें शिकायतें
आँखों में बची रहे नमी
बचपन में बची रहें शरारतें
धरती पर बची रहें फसलें
नदियों में बचा रहे पानी
सुबहों में बची रहे कोयल की कूक
शामों में बची रहे सुकून की चाय
दुनिया में बची रहे मोहब्बत
और बचा रहे बनारस...

फेवरेट सिनेमा- फिलहाल


ये लम्हा फ़िलहाल जी लेने दो...

'फिलहाल' फिल्म मुझे कई कारणों से प्रिय है. बहुत सारे कारण. यह फिल्म दोस्ती पर बनी है. दोस्ती के आकाश को खिलते, निखरते देखने का सुख है इस फिल्म को देखना. यह फिल्म बनी है मातृत्व की तीव्र इच्छा और उसके तमाम एहसासों को सलीके से उभारती है, और जिस वक़्त यह फिल्म देखी थी मैं भी माँ बनने की तीव्र इच्छा में थी. यह मेघना गुलज़ार की पहली फिल्म थी. गुलज़ार साहब की बेटी के काम को देखने का रोमांच तो था ही.  इस फिल्म में मेरी प्रिय अभिनेत्रियाँ सुष्मिता सेन और तब्बू थीं. फिल्म के गीत बेहद खूबसूरत थे जो आज भी फेवरेट लिस्ट में शामिल रहते हैं.

इस फिल्म को मेघना ने बहुत ही प्यार से बनाया, हर फ्रेम, हर शॉट एकदम तसल्ली से. स्क्रिप्ट एकदम बंधी हुई. न कोई जल्दबाजी न कोई ठहराव. सरोगेसी पर पहले भी फ़िल्में बन चुकी हैं लेकिन इस विषय को डील करते समय जिस तरह की इंटेसिटी जिस तरह की भावनात्मक जर्नी की जरूरत थी वो फिल्म में दिखती है. मातृत्व का एहसास दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास, माँ बनने की इच्छा, इमोशनल उतार-चढ़ाव, मातृत्व की उस इच्छा को एक दोस्त के द्वारा समझा जाना और दुनिया के सबसे खूबसूरत एहसास को दोस्त को तोहफे में देना.

सुष्मिता भले ही कम फिल्मों में दिखी हों लेकिन मुझे उन्हें परदे पर देखना सुखद लगता है, तब्बू को भी. इन दोनों को दोबारा कभी किसी फिल्म में नहीं देखा. यह असल में सुष्मिता और तब्बू की फिल्म है जिसमें संजय सूरी और पलाश ने रंग भरे हैं. ये लम्हा फ़िलहाल जी लेने दो, ले चलें डोलियों में तुम्हें गर इरादा करो, सोलह सिंगार करके सहित तमाम गाने अच्छे लगते हैं. इस फिल्म का जिक्र भी हो तो मन को कुछ खुश खुश सा महसूस होता है...

Wednesday, October 3, 2018

उम्मीद यहीं कहीं है



उस रोज मैं देहरादून के एक इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ कुछ बातचीत कर रही थी. दूरस्थ इलाके के इस इंटर कॉलेज में बच्चे कई कई किलोमीटर की पहाड़ियों से उतर कर आते हैं और प्रिंसिपल सर इस बात के मर्म को समझते हैं इसलिए भरपूर कोशिश करते हैं कि बच्चों की पढ़ने की इच्छा के चलते इतने दूर चलकर आने को ज्यादा से ज्यादा सम्मान कैसे दिया जाय, कैसे बच्चों के समय व पढ़ने की इच्छा को भरपूर खुराक दी जाय. इसी बाबत यहाँ शिक्षक साथियों के साथ हर महीने अकादमिक चर्चा की शुरुआत हुई है.

उस रोज भी हम उसी बाबत बात कर रहे थे जब किसी कोचिंग संस्थान के दो साथी वहां आये. प्रिंसिपल सर ने उनकी बात को ध्यान से सुना। उन कोचिंग वाले लोगों ने अपना प्रोजेक्ट बताया कि इंटर पास करने के बाद बच्चों का एक टेस्ट लेंगे और जो टॉपर्स होंगे उनके लिए फ्री कोचिंग की सुविधा होगी. प्रिंसिपल सर ने बहुत धैर्य के साथ उनकी बात सुनते हुए कहा कि क्या आप जानते हैं ये बच्चे कहाँ से आते हैं. कितनी दूरी तय करके, कितना पैदल चलकर, किन पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्तों से? इन बच्चों के लिए यहाँ कॉलेज आना ही इतना मुश्किल है ये आपकी कोचिंग कैसे पहुँचेंगे भला. लेकिन इससे इतर एक बात मेरे मन में चल रही थी कि जो बच्चे सिलेक्ट नहीं होंगे उनके लिए क्या? यही बात प्रिंसिपल सर ने कहकर मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया.

सारी दुनिया टॉपर्स सिलेक्ट कर रही है, सबके सिलेक्शन का क्राईटरिया नामी कॉलेज अच्छे मार्क्स ही हैं. तो फिर उनका क्या जिनके सामान्य नंबर आते हैं. जो सिलेक्ट होते होते रह जाते हैं, या जो इस रेस में बहुत पीछे छूट जाते हैं, कुछ तो डर के मारे इस रेस में दौड़ते भी नहीं. क्या कोई ऐसी कोचिंग या संस्था है जो पूछती हो कि जिन बच्चों को सीखने में दिक्क्त है उनके लिए हम हैं न? जो सिलेक्ट नहीं होते हम उनका ही हाथ थामेंगे कि सिलेक्टेड लोगों के साथ तो दुनिया है ही. क्या कोई ऐसी कंपनियां हैं या कभी होंगी जो चुनकर ले जाती हों हिम्मत हारे, मुरझाये लेकिन प्रतिभाशील लोगों को इस भरोसे कि वो उनके हुनर को निखार लेंगे।

सचमुच ये अच्छे नंबरों की दौड़ ने हमारा सबसे कीमती सामान हमारे भीतर का पानी छीन लिया है. उस रोज प्रिंसिपल सर की यह बात सुनकर कि उन बच्चों का क्या जो सिलेक्ट नहीं होंगे, हमारे लिए तो वो भी उतने ही अज़ीज़ हैं, बहुत अच्छा लगा. हम कितना ही प्राइवेटाइज़ेशन की ओर भाग लें लेकिन उम्मीद सरकारी स्कूलों की ओर से ही खुलती नज़र आती है जहाँ शिक्षक हर बच्चे के साथ निजी जुड़ाव के साथ काम कर रहे हैं और किन्ही कारणों से पीछे छूट गए बच्चों के पीछे खड़े होते हैं, उनके सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं कि मैं हूँ न! उस एक लम्हे में बच्चों की आँखों में जो चमकता है न पानी वही उम्मीद है!

Monday, October 1, 2018

गाँधी जयंती और हरसिंगार



बच्चे गान्ही बाबा के जयकारे लगा रहे हैं
लाइन लगाकर घूमने आये हैं गाँधी पार्क
हालाँकि बच्चों की नजर गुब्बारे वाले पर है
और शिक्षिका की नजर बच्चों की संख्या पर
गांधी बाबा सिर्फ जयकारों में हैं

कुछ लोग छुट्टी मना रहे हैं गांधी बाबा के जन्मदिन पर
देर तक सोने और सिनेमा देखने जाने की योजना के साथ

कुछ ने धूल साफ़ की है चरखों की अरसे बाद
पहनी है गांधी टोपी
और कात रहे हैं सूत
ठीक गाँधी प्रतिमा के नीचे
फोटो के फ्रेम में एकदम ठीक से आ रहे हैं वो

तमाम राजनीतिक दल मना रहे हैं गांधी जयंती
पार्टी के झंडों और भाषणों के साथ
भाषण जिनकी भाषा में ही है हिंसा
हालांकि दोहरा रहे हैं वो बार-बार शब्द 'अहिंसा'
तैनात है तमाम पुलिस और पुलिस की गाड़ियाँ
गांधी जयंती के अवसर पर

मालाएं बार-बार चढ़ उतर रही हैं
गांधी प्रतिमा लग रही है निरीह सी
जो वो प्रतिमा न होती गांधी होते तो
तो शायद चले गये होते इस तमाशे से बहुत दूर
या खेल रहे होते बच्चों के संग

लेकिन वो प्रतिमा है और उसे सब सहना है
एक बच्ची पूछती है अपने पिता से
'पापा, गांधी जी तो कहते थे किसी को मारो नहीं
फिर इतनी पुलिस क्यों है?'
पिता के पास सिर्फ मौन है

बच्ची इस शोर से दूर पार्क में उछलती फिर रही है
हर सिंगार के पेड़ों ने फिजां को खुशबू से 
और रास्तों को फूलों से भर दिया है
मैं इन पेड़ों के नीचे धूनी जमाये हूँ

ये जो बरस रहे हैं न
नारंगी डंडी और सफ़ेद पंखुड़ियों वाले फूल
ये प्यार हैं,
इनकी खुशबू में तर रहना चाहती हूँ
टप टप टप गिरते फूलों के नीचे महसूस करती हूँ
कभी सर, कभी काँधे पर गिरना फूलों का
चुनने को फूल झुकती हूँ तो झरते हैं फूल मुझसे भी
कि कुछ ही पलों में मैं खुद हरसिंगार हो चुकी हूँ
दूर कहीं लग रहे हैं गांधी बाबा के जयकारे
जबकि मैं और वो बच्ची हम दोनों हरसिंगार चुन रहे हैं
हम दोनों की मुस्कुराहटों में दोस्ती हो गयी है.

(आज सुबह, गांधी जयंती )






Friday, September 28, 2018

फेवरेट सिनेमा- अनुरनन


ये शाम इतनी खूबसूरत है, क्या इसे मैं हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकती? जब कभी मेरा मन उदास हो जाय तब इसी शाम को क्या मैं फिर से नहीं जी सकती?
क्यों नहीं? बस करना यह है कि ऐसे लम्हों को एक याद में बदल देना है,
'शब्द होते हैं पल भर के लिए निशब्द होता है अनंतकाल के लिए.'

( फिल्म अनुरनन से)

'अनुरनन' ( resonance ) यह मेरी प्रिय फिल्मों में शुमार है. इस पर मैं बहुत तसल्ली से लिखना चाह रही थी.हालंकि तसल्ली अब भी कहाँ मिली है. सिनेमा किस तरह अपना असर दिखाता है, किस तरह वो आपके करीब आकर बैठ जाता है. किरदार आपसे दोस्ती कर लेते हैं ऐसा कुछ महसूस हुआ इस फिल्म को देखते हुए. फिल्म के सभी किरदार राहुल बोस, रितुपर्णो सेनगुप्ता, राइमा सेन और रजत कपूर बेहद संतुलित ढंग से फिल्म में अपनी भूमिकाओं में पैबस्त हैं. मानो वो अभिनय न कर रहे हों, एक खूबसूरत धुन में गुम हों. फिल्म के कुछ दृश्य तो तमाम थकन को निचोड़कर फेंक देने में कामयाब हैं.

बेहद सुंदर भरोसे और प्यार भरे रिश्तों के बीच भी अचानक किस तरह समाज अपनी गलतफहमियों की टोकरी उठाये दाखिल होता है और फिर होता ही जाता है. जिस वक़्त आर्टिकल 497 को लेकर तरह तरह की विवेचनाएँ आ रही हों उस वक़्त ऐसे रिश्तों के ताने-बाने से गुंथी फिल्म को दोबारा देखा जाना चाहिए. समाज की गलतफहमियों वाली टोकरी उतारकर दूर रख आने से जिन्दगी कितनी खूबसूरत, कितनी आसान हो सकती थी लेकिन ऐसा होना कहाँ आसान है.

फिल्म कई परतों में खुलती भी है और हमारी तमाम परतों को खोलती भी है. सच कहूँ तो इस फिल्म ने बहुत सुकून बख्शा था एक वक़्त में. सिनेमोटोग्राफ़ी सुंदर है. फिल्म के तमाम दृश्य किसी तिलस्मी सौन्दर्य से भरपूर नजर आते हैं. बात करने को दिल नहीं चाहता, सिर्फ उन दृश्यों में गुम जाने को जी चाहता है अपनी साँसों की आवाज सुनते हुए.


Monday, September 17, 2018

फेवरेट सिनेमा- सिमरन



प्यारी सी है सिमरन...

अगर बात सिर्फ बंधनों को तोड़ने की है तो बात जरूरी है लेकिन बात जब बंधनों को पहचानने की हो तो और भी ज़रूरी हो जाती है. सही गलत सबका अपना होता है ठीक वैसे ही जीवन जीने का तरीका भी सबका अपना होता है. भूख प्यास भी सबकी अपनी होती है, अलग होती है. हमारा समाज अभी इस अलग सी भूख प्यास को पहचानने की ओर बढ़ा नहीं है. सिमरन उसी ओर बढती हुई फिल्म है.

जाहिर है हिंदी फिल्मों में भी एक लम्बे समय तक अमीरी गरीबी, जातीय वर्गीय भेद, सामंती पारिवारिक दुश्मनियों के बीच प्यार के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद में लगा हिंदी सिनेमा अंत में मंगलसूत्रीय महिमा के आगे नतमस्त होता रहा. फिर समय आया कि अगर एक साथी बर्बर है, हिंसक है, बेवफा है तो कैसे सहा जाए और किस तरह उस साथी को वापस परिवार संस्था में लौटा लाया जाए, लेकिन इधर हिंदी सिनेमा ने नयी तरह की अंगड़ाई ली है.

शादी, प्यार, बेवफाई के अलावा भी है जिन्दगी यही सिमरन की कहानी है. कंगना पहले भी एक बार 'क्वीन' फिल्म में अपने सपने पूरे करने अकेले ही निकलती है. शादी टूटने को वो सपने टूटने की वजह बनने से बचाती है लेकिन सिमरन की जिंदगी ही एकदम अलग है. वो प्यार या शादी की तमाम बंदिशों से पार निकल चुकी है. शादी के बाद तलाक ले चुकने के बाद अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है. उसके किरदार को देखते हुए महसूस होता है कि किस तरह नस-नस में उसकी जिंदगी जीने की ख्वाहिश हिलोरे मारती है. जंगल के बीच अपनी फेवरेट जगह पर तितली की तरह उड़ती प्रफुल्ल यानि कंगना बेहद दिलकश लगती है. उसका प्रेमी उसे कहता है, 'कोई इतना सम्पूर्ण कैसे हो सकता है, तुम्हें सांस लेते देखना ही बहुत अच्छा लगता है'. सचमुच जिंदगी छलकती है सिमरन यानि प्रफुल्ल में.

वो अपने पिता से कहती है, 'हाँ मैं गलतियां करती हूँ, बहुत सी गलतियां करती हूँ लेकिन उन्हें मानती भी हूँ न'. वो जिंदगी का पीछा करते-करते कुछ गलत रास्तों पर निकल जाती है मुश्किलों में फंसती चली जाती है लेकिन हार नहीं मानती। उसकी संवेदनाएं उसका साथ नहीं छोड़ती। बैंक लूट के वक़्त जब एक सज्जन को दौरा पड़ता है तो उन्हें पानी पिलाती है.' बैंक लूट की घटना के बाद किस तरह ऐसे अपराधों के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार मान लिए जाने की आदत है लोगों में इस पर अच्छा व्यंग्य है साथ ही एक मध्यमवर्गीय भारतीय पिता की सारी चिंता किसी भी तरह बेटी की शादी पर ही टिकी होती हैं इसको भी अंडरलाइन करती है फिल्म।

सिमरन एक साफ़ दिल लड़की है. छोटे छोटे सपने देखती है, घर का सपना, जिंदगी जीने का सपना, शादी उसका सपना नहीं है, वो प्यार के नाम पर बिसूरती नहीं रहती लेकिन किसी के साथ कोई धोखा भी नहीं देती। गलतियों को जस्टिफाई नहीं करती, उनसे बाहर निकलने का प्रयास करती है. प्रफुल्ल के किरदार को कंगना ने बहुत प्यार और ईमानदारी से निभाया है. फिल्म शादी, ब्वॉयफ्रेंड, दिल टूटने या जुड़ने के किस्सों से अलग है. तर्क मत लगाइये, सही गलत के चक्कर में मत पड़िये बस कंगना से प्यार हो जाने दीजिये।

पिछले दिनों अपने बेबाक इंटरव्यू को लेकर कंगना काफी विवाद में रही है. विवाद जो उसकी साफगोई से उपजे। कौन सही कौन गलत से परे एक खुद मुख़्तार लड़की कंगना ने अपना मुकाम खुद बनाया है.... उसकी हंसी का हाथ थाम लेने को जी करता है, सब कुछ भूलकर जिन्दगी को जी लेने को दिल करता है.

Sunday, September 16, 2018

नायिका उस प्रेम से बाहर नहीं आ सकी थी


और मैंने पाया है अक्सरहाँ यह गुण तुम्हारी नायिका में कि वह घटनाओं में, संबंधों में, अनुष्ठानों में, कार्यक्रमों में, संवादों में, बारिशों में, स्वप्नों में आसानी से प्रवेश करती नहीं। और फिर जो भीतर चली ही जाए तो बाहर लौटती नहीं। बिना ओर-छोर के जंगल में भटकती जाने कौन-सी जड़ी-बूटी खोजती फिरती तुम्हारी नायिका। जीवन की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते तुम्हारी कथाओं की जल भरी बावड़ी में उतर डुबकी लगाने वाली नायिका। फिर नर्मदा तट पर दीयों की झिलमिल संग डूबते-उतराते किसी अँधेरे ज़ेहन में उतर जाने वाली तुम्हारी नायिका।

नहीं, प्रेम से ही नहीं, तुम्हारी यह नायिका कहीं से भी बाहर नहीं आती। बल्कि ये बाहर आने के सारे विकल्पों पर कँटीली बाड़ खींचकर जंगल में प्रवेश करती है। ऐसी नायिका को जीवन की वह गुमी हुई बूटी न मिले तो भला किसे मिले ?

और वह पुरुष, जिसके पास हज़ार ज़िम्मेदारियों का विलाप रहा होगा, हमेशा एक हड़बड़ी रही होगी, गहमागहमी रही होगी; वह पुरुष कहीं प्रवेश नहीं करता पूरा-पूरा। वह, जो दिखता है परिवार में भी, ऑफ़िस की मीटिंगों में भी, अख़बार की सुर्ख़ियों पर बिला नागा प्रतिक्रियाओं में भी, घड़ी में भी, कैलेंडर में भी, स्मृतियों में भी, प्रेम में भी, वह कहीं नहीं है।
क्योंकि बात बड़ी सीधी है कि जो हर कहीं है, वह कहीं नहीं है।

और तुम्हारी यह दुष्टना नायिका, प्रतिभा !

वह एक अछूते गिटार के तारों में तक प्रवेश कर गयी है, जिसे कभी बजाया नहीं जाता। उस गिटार की असह्य धुन पूरी कहानी में गूँजी है।

ओह ! ऐसा आरोह !

मैं तुम्हें बताऊँ, मेरी दोस्त !
कि वह गिटार तुम्हारी कहानी का सबसे मुख्य क़िरदार है।
और बहुत रुलाया तुमने मुझे ऐसी रुत में
कि जब बाद बारिश सूरज तक चिपचिपाता है
कि जब मैंने ख़याल किया था कि नहीं देखनी है एक और बार 'द जैपनीज़ वाइफ़'
कि जब मुझे प्रेस करनी थी मटकुल की वह लेसदार रेड फ़्रॉक
कि जब मुझे समझना था इन दिनों कैसे रुपये किलो टमाटर का भाव
कि जब मुझे अकेले ढूँढ़ निकालना था ट्रेन में अपनी सीट
कि जब मुझे आँखें मूँद कर देखना था अपनी श्वास का विलोम
कि जब मुझे नज़र में आती चीज़ों को भी कर देना था नज़रअंदाज़
कि जब मुझे उड़ने देनी थी अपनी हँसी की तितलियाँ
तब मेरी दोस्त !
तुमने भेजीं मेरे लिए बेहिसाब बारिशें
मिलनी चाहिए तुम्हें इसकी कुछ तो सज़ा
कि जब इस मौसम में, प्रतिभा !
सूरज तक चिपचिपाता है
मैंने तय किया कि रहूँगी दिन भर एरिक क्लैप्टन के
मनभेदिये गिटार के साथ

टियर्स इन हैवन.. टियर्स इन हैवन
टियर्स इन..

**

[ प्रतिभा की ताज़ा कहानी के भीतर चले जाने के बाद ]


#बाबुषा

Saturday, September 15, 2018

फेवरेट सिनेमा- जापानीज़ वाइफ


एक फिल्म देखी थी जापानीज़ वाइफ. यह धीरे-धीरे सरकती हुई फिल्म है ठीक वैसे ही जैसे आहिस्ता-आहिस्ता नसों में उतरता है प्यार. कोई हड़बड़ी नहीं पूरे धैर्य के साथ. यह फिल्म जेहनी सुकून की तलाश को पूरती है, सुख क्रिएट करती है और उसे सहेजकर आगे बढती है. अपर्णा सेन की यह फिल्म मेरी प्रिय प्रेम कहानियों में से एक है. इस फिल्म को देखते हुए प्रेम की साधारणता के साथ उसकी उच्चता को एक साथ महसूस किया मैंने. 

यह कहानी दो ऐसे प्रेमियों की है जो पत्रों के माध्यम से एक दुसरे को जानते हैं. स्नेहमोय (राहुल देव) एक स्कूल टीचर है और उसकी दोस्ती जापान की मियागी (Chigusa Takaku)से हो जाती है. यह दोस्ती खतों के माध्यम से होती है फिर यह खतों के माध्यम से ही प्रेम में बदलती है और फिर ब्याह में. इस दौरान स्नेहमोय के घर में एक विधवा स्त्री संध्या अपने 8 बरस के बच्चे के साथ आती है, उस बच्चे के साथ स्नेहमोय का भावनात्मक लगाव फिल्म में खिलता है साथ ही संध्या की चुप चुप सी उपस्थिति में एक अलग सा खिंचाव है. रिश्तों के पेचोखम में उलझाये बगैर फिल्म प्रेम की सादगी को संभाले हुए आगे बढती रहती है.

इस ज़माने में जब वाट्सप पर फेसबुक पर सेकेंड्स में सन्देश जा पहुँचते हों, वीडियो कॉल के जरिये दुनिया के किसी भी कोने में बैठे किसी भी व्यक्ति से झट से कनेक्ट किया जा सकता हो उस दौर की प्रेम की कहानी को महसूस करना जब कि चिठ्ठियाँ खुदा की किसी नेमत ही मालूम हुआ करती थीं और डाकिया बाबू खुदा के बंदे लगते थे अलग ही अनुभव देता है. ट्रंक कॉल के पैसे जमा करना, कॉल न लगना या आवाज न आना, बात भी न हो पाना और पैसे भी लग जाना, आँख भर-भर चिठ्ठी का इंतजार करना और चिठ्ठी मिलने पर सुख से छलक पड़ना. प्रेम में मिलने का अपना महत्व है लेकिन यह प्रेम कहानी लौंग डिस्टेंस रिलेशनशिप की कहानी एक अलग ही परिभाषा गढ़ती है प्रेम की. प्रेमी जो कभी मिले नहीं उनके प्रेम की प्रगाढ़ता किस तरह फिल्म में खिलता है इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. फिल्म के दृश्य, बारिश, जंगल, नदी सब प्रेम को कॉम्प्लीमेंट करते हैं.

मुझे इस प्रेम कहानी का अंत और भी खूबसूरत लगता है हालाँकि इसके अंत से काफी सारे व्यावहारिक लोग असहमत हो सकते हैं लेकिन चूंकि प्रेम की शुरुआत और अंत सिर्फ प्रेम है किसी घटना का कोई आकार लेना नहीं इस लिहाज से इस कहानी का अंत कुछ भी होता इसे इतना ही खूबसूरत होना था. टिपिकल बॉलीवुड अंत से इसे बचाकर अच्छा ही किया है अपर्णा सेन ने. 15 बरस का प्रेम और एक भी मुलाकात नहीं...झर झर झरते आंसुओं के बीच इस प्रेम कहानी को देखना मैं कभी भूल नहीं पाती.

राहुल बोस मेरे प्रिय कलाकार हैं उन्होंने इस बार भी मोहा है लेकिन फिल्म के अन्य कलाकारों राइमा सेन, मौसमी चटर्जी और Chigusa Takaku ने भी अच्छा अभिनय किया है. अनय गोस्वामी की सिनेमोटोग्राफ़ी कमाल की है.

Friday, September 14, 2018

बारिश का बोसा और सितम्बर


चुपके से दबे पाँव आता है सितम्बर
पीठ से पीठ टिका कर बैठ जाता है
झरनों का संगीत सुनाता है
ओढाता है
बदलते मौसम की नर्म चादर
उंगलियों में सजाता है हरी दूब से बनी मुंदरी
और मंद-मंद मुस्कुराता है मूँद कर आँखें

दूर जाती खाली सड़क पर रख देता है इंतजार
पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस

बारिश का बोसा देता है सितम्बर
पलकों पर रखता है सुकून की नींद के फाहे
सांसों की मध्धम आंच पर सेंकता है सीली ख्वाहिशें
मोहब्बत पर यकीन की लौ तेज़ करते हुए
धीमे से मुस्कुराता है सितम्बर

जिन्दगी को जिन्दगी बनाता है सितम्बर

Thursday, September 13, 2018

फेवरेट सिनेमा - बियोंड द क्लाउड्स


यह फिल्म मैंने हाल ही में देखी और यकीन मानिए इसका जादू उतरा नहीं अब तक. माजिद मज़ीदी की फिल्म कुछ ज्यादा ही उम्मीद से न देखी जाय ऐसा न होना नामुमकिन है. चिल्ड्रेन ऑफ हेवेन का असर तारी होने लगता है फिल्म देखने से पहले हालाँकि किसी भी फ़िल्मकार के लिए यह अच्छी बात नहीं कि इस तरह वो उम्मीद के बोझ से दब जाता है लेकिन बात अगर मज़ीदी की हो तो वो कितनी भी उम्मीदों को पंखों की तरह हल्का बनाना जानते हैं बोझ नहीं बनने देते. यह फिल्म फ्रेम दर फ्रेम बांधती है. मज़ीदी का निर्देशन अनिल मेहता का कैमरा और रहमान का संगीत इसे खूबसूरत अनुभव में ढालते हैं. इस फिल्म का जौनर डिसाइड करना थोड़ा मुश्किल है. इशान खट्टर की यह पहली फिल्म है लेकिन उन्हें देखकर कतई नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है. उनकी आँखें वादा भरी आँखें हैं कि निराश नहीं करूँगा. यह वादा उन्होंने हाल में रिलीज धड़क में बखूबी निभाया. बहन की भूमिका में मालविका ने भी बहुत अच्छा काम किया. 

मुम्बईया भाईगिरी, लड़ाई, झगड़ा, भागमभाग, हिंसा के बीच फिल्म किस कदर नरम मुलायम है यह इसे देखकर ही जाना जा सकता है. यह कहानी एक भाई और बहन की है. बड़ी बहन को रोज पति से पिटते देखते और खुद भी अपने बहन के पति से बेइंतहा पिटता वो नन्हा भाई एक दिन घर से भाग जाता है और बड़ा होकर ड्रग्स माफियाओं के साथ काम करने लगता है. हालाँकि इस सबके पीछे उसके मन में एक सुंदर जिन्दगी का सपना है. मन में बहन के लिए नाराजगी है जो जल्दी ही खत्म हो जाती है. नाटकीय मोड़ों से गुजरती फिल्म में बहन का जेल जाना, वहां दूसरी महिला कैदी के बच्चे से उसकी दोस्ती होना एक अलग ही मुकाम पर ले जाता है फिल्म को. मासूम से कुछ धागे देह पर तैरते महसूस होते हैं. इधर भाई बहन के साथ बलात्कार करने वाले के बच्चों के साथ है और उनके मोह में बंधने लगता है. मज़ीदी ने छायाओं और संगीत के साथ मासूम मुस्कुराहटों का खूबसूरत कोलाज रचा है. बादलों के पार सपनों की जो गठरी है उसका रास्ता दिखाया है. यह फिल्म साथ रह जाने वाली फिल्मों में से एक है. मुझे इस फिल्म में बच्चों के साथ फिल्माए दृश्य, दीवार का पेंटिंग में तब्दील होना, छायाओं में कहानियां बनना बेहद खूबसूरत लगा. और यह भी कि बचपन हर हाल में बचपन है उसे मुस्कुराने का पूरा हक है. 

Wednesday, September 12, 2018

फेवरेट सिनेमा- कभी अलविदा न कहना


'कभी अलविदा न कहना' जाने क्यों यह फिल्म मुझे काफी अच्छी लगी थी जबकि स्टार फेवरेज्म बिलकुल नहीं है इसका कारण.यह फिल्म रिश्तों के उन पेचोखम को खोलती है जो बेहद बारीक़ हैं और जिन पर समाज अभी भी ठीक से बात नहीं करता. शादी होती है क्योंकि शादी होनी होती है. प्यार वही है जैसा फिल्मों में देखा, किताबो में पढ़ा या दोस्तों से सुना. यह फिल्म इस देखे सुने के पार जाने का प्रयास करती है.

कोई बहुत अच्छा होगा तो उससे प्यार हो ही जायेगा यह भला किस तरह संभव है ठीक उसी तरह जैसे किसी से प्यार न होने का कारण उस व्यक्ति का बुराइयों से भरा होना भी क्यों जरूरी है. दो बहुत अच्छे लोगों में भी सब कुछ अच्छा, ठीक तथाकथित आदर्श होते हुए भी प्रेम का एलिमेंट मिसिंग हो सकता है लेकिन इस मिसिंग होने की समझ न तो व्यक्तियों में है न समाज में. अगर किसी से अलग होना है तो उसकी हजार कमियां सामने रखनी होती हैं और किसी का हाथ थामना हो तो उसकी हजार अच्छाईयां.जबकि मन का बावरा पंछी उस डाल पर जाकर भी बैठ सकता है जिसके फल उसे पसंद न हों. इस फिल्म में किसी को हीरो किसी को विलेन नहीं बनाया गया. शादी के पक्ष में बेमतलब के तर्क नहीं रखे गये. बस नहीं है तो नहीं है प्यार शादी में. कोई जबरदस्ती है क्या कि होना ही चाहिये क्योंकि पति अच्छा कमाता है, गुड लुकिंग है, केयरिंग है या पत्नी सुंदर है, डायनमिक है, इसी चश्मे से लोगों को, रिश्तों के देखने वाले समाज के लिए इस फिल्म को हजम करना आसान नहीं हुआ था.

यह फिल्म संवेदनशील होने वाले उस चश्मे से भी धूल पोछती है जहाँ हम अतिरिक्त केयर करके या ख्याल रखके भी एक अनमना सा बोझ डालते हैं साथी पर और अपने भीतर अनजाना सा सुपिरियटी कॉम्प्लेक्स पाल लेते हैं.

उस वक़्त भी इस फिल्म पर काफी बवाल हुआ था. हमने अख़बार में इस पर लम्बे समय तक परिचर्चा भी चलाई थी. बवाल होता भी क्यों न कि अच्छा घर, नाक नक्शा, खानदान, सैलरी देखकर रिश्ते तय करने वाला समाज जो है यह. और शादी के बाद कितनी भी सडन, घुटन, पीड़ा क्यों न हो भीतर शादी के फ्रेम को चमका कर रखने वाला समाज जो है यह. इस फिल्म ने मेरे लिहाज से इस तरह सोचने, देखने और महसूस करने की स्पेस की बात की थी.2006 में आई करन जौहर की इस फिल्म का संगीत भी अच्छा था.



Saturday, September 8, 2018

सवाल करना बड़ी ज़हमत है जो लोकतंत्र लेकर आता है- नवनीत बेदार

नवनीत बेदार को उनके नजदीकी यहाँ तक कि उनके गुरुजन भी अक्सर ‘बेदार साहब’ के नाम से बुलाते हैं | वो तब से साहब हैं जब वर्तमान वाले चर्चित ‘साहब’, ‘साहब’ नहीं बने थे | शाहजहाँपुर में पैदा हुआ यह शख्स न सिर्फ घनघोर यारबाज़ है बल्कि बेतरह लड़ाकू और पढ़ाकू भी | मुझे याद है जब बिलकुल कड़क कलफ लगे झक्क सुफैद कुर्ता-पायजामा पहने बेदार साहब से मैं पहली बार मिला था | वो जेएनयू का सतलज हॉस्टल था और बेदार साहब की धज जेएनयू के मिजाज़ से मेल नहीं खा रही थी | मैं किसी ‘इंकलाबी’ काम से ही यहाँ आया था | साहब को देख कर इन्कलाब से रिसाव शुरू हो चुका था | मैंने कहा ‘नमस्ते सर!’ और अपना परिचय दिया | साहब उठकर खड़े हुए...मेरी पीठ पर धौल मारी और कहा ‘चलो पहले चाय पीकर आते हैं’ फिर बेतकल्लुफ़ी से कहा ‘यार ये सर-वर मत कहा करो...सीधे नाम लेकर बुलाया करो!’ मैं अब समझ रहा था कि जेएनयू लिबास में नहीं मिजाज़ में बसता है | मैंने उनकी बात आंशिक रूप से मान ली और अब मैं उन्हें ‘नवनीत सर’ कह के बुलाता हूँ |- प्रियंवद अजात 

आप ही बताएं कि अगर ‘ख’ जो ‘क’ से सिर्फ 10 वर्ष छोटा है और ‘क’ की पैदाइश 1940 की है और ‘ख’ की 1950 की और किसी संवाद में ‘क’, ‘ख’ से कहे कि आप अभी बच्चे हैं तो इसे कैसे देखा जाए। जब मैंने इसे लोकतंत्र के संदर्भ में देखा और सवाल किया ‘कि क्या अपने से 10 वर्ष छोटे को बच्चा कहना लोकतांत्रिक है? तो इस पर कोई ‘प’ ‘फ’ ‘ब’, मुझको ही समझाने लगे कि आप अशिष्ट हैं और आप अभद्रता कर रहे हैं। जितनी आपकी उम्र है उतना समय तो क ने लिखते हुए बिताया है... वगैरह वगैरह। लगे हाथों उन्होंने जे. एन. यू को भी कोस लिया कि उस विश्वविद्यालय ने मुझ जैसे हीरे भी निकाले हैं। (यहां ये बताना कम जरूरी नहीं होगा कि ये ‘क’ ‘ख’ और ‘प’ ‘फ’ ‘ब’ सब निरे साहित्यिक जीव हैं और देखने में प्रगतिशील से लगते हैं। क तो कई जगह कोर्स में भी शामिल हैं। ‘ख’ और ‘प’ ‘फ’ ‘ब’ के भी कई उपन्यास और किताबें प्रकाशित हैं।) हमारी एक शिकायत ख से भी है कि उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया।

इस अनुभव से गुजरते हुये मुझे एक वाक्या याद आ गया। जे. एन. यू. के दिनों में एक मित्र के साथ पुरुषोत्तम अग्रवाल जी के यहां बैठा था, हम किसी चर्चा में मशगूल थे कि इसी दौरान एक मित्र ने बीए के विद्यार्थियों को ‘बच्चे’ कह दिया। मुझे याद है मित्र के इस सम्बोधन पर तुरंत पुरुषोत्तम सर ने नाराज़ होते हुए टोका और उसे समझाया कि लोकतंत्र में आप एक मतदाता हो चुके व्यक्ति को किसी भी हालत में बच्चा नहीं कह सकते। इस वाकये के कुछ दिन पहले ही स्कूल आफ सोशल सांइसेज़ में मैंने एक छात्र को अपने प्रोफेसर को नाम से पुकारते देखा था, मुझे उस वक्त एक छात्र का अपने प्रोफेसर का सीधे नाम लेना अजीब लगा। यह शायद इसलिए कि मेरे सामाजीकरण के दौरान मैंने अपने से बड़ों को पुकारते वक्त नाम के साथ जी,सर या भाई कहते ही पाया था। जब पुरुषोत्तम अग्रवाल सर से इस संदर्भ में और बातचीत हुई तो मुझे उस छात्र का अपने प्रोफेसर का नाम लेकर पुकारना भी समझ में आया और मन में लोकतंत्र की समझ भी कुछ मजबूत हुई ।

आज जब क, प फ ब के साथ संवाद की ये घटना घटी तो अपनी लोकतंत्र की समझ पर मेरा भरोसा थोड़ा और बढ़ गया। मुझे लगता है कि किसी को ‘बच्चा’ कहना एक बेहद गैरजिम्मेदाराना और सामंती सोच का परिणाम है। इसमें उम्र की दृष्टि से माने जाने वाले अवयस्क भी शामिल हैं। यहाँ बच्चा कहने के पीछे दो भाव छुपे नज़र आते हैं- एक- आपको अभी समझ नहीं है, आपने अभी दुनिया नहीं देखी है और आपको अभी बहुत कुछ (मुझसे) सीखना है। और ‘मैं’ जो आपको बच्चा कह रहा हूं, बहुत दुनिया देख चुका हूं और मेरे पास आपके सीखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन आप बच्चे हैं इसलिए आप मुझसे सीखने लायक भी नहीं हैं। या ये भी समझा जा सकता है कि आप अभी बहुत छोटे हैं मुझसे बात न करें। मुझे बात करने के लिए बराबर वाले चाहिए।‘ ये सब सामंती मानसिकता के व्यवहार हैं, बच्चे बड़ों के बीच में न बैठें, उनके कहे को सर झुकाकर मान लें, जबानदराज़ी तो बिल्कुन न करें। वरना पछताएंगे। (घर में तो ऐसे मौकों पर तुरंत पूजन भी शुरू हो जाता था।) और किसी बड़े ‘महान’ के विरुद्ध कुछ भी कह देना और सवाल पूछ लेना तो ब्लास्फेमी टाइप कुछ हो जाता है।

मेरी लोकतंत्र की इस समझ को और मजबूती मिली हमारे दूसरे साथी रोहित धनकर से। रोहित ने भी, जो मुझसे लगभग 20 वर्ष बड़े हैं हमेशा नाम से ही बुलाने को प्रेरित किया। लेकिन क्या करें अपनी सामंती परवरिश जो ठहरी कि ‘जी’ लगाए बगैर अपुन रोहित बोल ही नहीं पाए।

हां, तो दिगंतर में रहते हुए मेरी दो तरह की समझ बनी, एक- शिक्षा, जीवन के अनुभवों का ही विस्तार है। उससे अलग कोई अजूबी चीज नहीं है जो मिल गई तो आप विशिष्ट बन जाते हैं। आप अपने अनुभवों में ही कबीर, गांधी और जायसी को नहीं ढा़ल पाए तो पढ़ने-लिखने का कोई फायदा नहीं। दिगंतर में ही रहते समय ये भी समझा कि बच्चा पैदा ही सीखने के लिए होता है और जन्मते से ही सीखना शुरू कर देता है। और इसलिए किसी के अनुभव को कमतर कहना केवल इसलिए जायज़ नहीं हो जाता कि बाई चांस वो आपके बाद पैदा हुआ है। एक नागरिक के तौर पर एक बच्चे के और एक वयस्क के अधिकार बराबर हैं और लोकतंत्र यही सिखाता है। एक और बात, हमारे यहां बचपन और बच्चे को लेकर समझ काफी कच्ची रही है। उनकी छवियां अक्सर बड़ों के मिनिएचर या लघु रूप में देखी जाती रही हैं। बच्चे के अपने वजूद को दरकिनार किया जाता रहा है और माना जाता रहा है कि वह बड़ा होकर ही कुछ बनेगा। यानी अभी वह ‘कुछ नहीं’ के आस-पास ही है। बच्चा भी स्वयं को इसी तरह से देखने का आदी हो जाता है और अपने वर्तमान को तिलांजलि देकर अपने बड़ों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनने के प्रयास में जुट जाता है। हम सब वैसे ही कुछ-कुछ बने हैं और कुछ नहीं बन पाए हैं। हम अपने बड़ों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनने के प्रयास में न तो वो बन पाते हैं जो बड़े हमें बनाना चाहते हैं और न ही अपनी खुदी, अपनी स्वयं की इच्छा को बचा पाते हैं।

यहाँ एक और बात ध्यान देने की है कि आमतौर पर यह भ्रम है कि सीखने की प्रक्रिया में बड़ा ही छोटे को सिखा सकता है। क्योंकि छोटा तो अपरिहार्य रूप से बड़े से ज्यादा जान ही नहीं सकता, अत: उसके पास अपने से बड़ों को सिखाने के लिए कुछ हो ये संभव ही नहीं। ऐसे में एक बात और निकलती है कि सिखाई जाने वाली चीज़, जिस पर बड़े का ही अधिकार है, वह कुछ स्थायी किस्म की है और एक परम्परा से उसके पास आई है और थाती के तौर पर उसे अपनी अगली पीढ़ी को आगे देकर जाना है। यानि ज्ञान स्थायी है, परिवर्तनशील नहीं। और परिणामस्वरूप जो थाती के रूप में परम्परा से होकर आया है वही सही है और उसके अतिरिक्त सब कुछ गलत है और अस्वीकार्य है। ( शायद पीढ़ियों के बीच का गतिरोध ‘जनरेशन गैप’ इसी में जन्म लेता है)

दूसरी बात, सवाल करना एक और बड़ी ज़हमत है जो लोकतंत्र लेकर आता है। इसीलिए किसी सामंती समाज में सवाल करना अच्छा नहीं माना जाता। यदि आप अपने से बड़े से सवाल करते हैं या उनकी बात को टोकते हैं तो उसे जबान लड़ाना, बदजुबानी करना, अभद्रता और अशिष्टता कहा जाएगा। और अगर कहीं ये सवाल किसी ऐसे स्थापित व्यक्ति से हों तो समझो कि ब्लास्फेमी हो गई। कुछ लोग धर्म-ध्वजा लेकर आपके पीछे पड़ जांएगे और आपसे आपके शिजरे के साथ आपकी जड़ें खोद-खोदकर समूलोच्छेद करने को उतारू हो जाएंगे। ज़रा सोचिए ऐसा क्यूँ होता है? दरअसल, हमें स्कूल में भी सवाल करना नहीं बल्कि उत्तर देना सिखाया जाता रहा है और जो सवाल पूछे भी जाते रहे हैं वो सवाल भी बेहद कमज़र्फ किस्म के होते हैं, मानो सवाल केवल इसलिए पूछे जा रहे हैं कि अमुक परीक्षा में पास होना है। ज़ाहिर है कि जब सवाल पूछना सिखाया ही नहीं गया तो सवाल का पूछा जाना अशिष्टता और अभद्रता तो लगेगी ही। एक छात्र के रूप में हमें जो शिक्षक ने बता दिया बस वही अंतिम सत्य है, उसके न दांए देखने की जरूरत है और न बांए देखने की।

सवाल करना दरअसल परम्परा के प्रति एक अस्वीकार को दर्शाता है। इसका कारण भी शायद वह परम्परागत ज्ञान और उसका स्वरूप ही रहा हो जिसमें कतिपय कथनों के लिए कोई तर्क आवश्यक नहीं माना गया। जो कह दिया गया उसे मान लया गया। जब कभी हितों में टकराव हुआ और उसके लिए तर्क खोजे गये या उस पर सवाल पूछे गए, तो उसे वचन के प्रति विद्रेाह माना गया और उसे दबाने के प्रयास किए गए। इसके कई उदाहरण आपको साहित्य से लेकर धर्म-परम्पराओं में देखने को मिल जाएंगे।

अक्सर बड़ों के अगम्भीर व्यवहार को बचपना और मूर्खतापूर्ण व्यवहार को बचकाना कह कर खिल्ली उड़ाने के पीछे भी आप बच्चे के प्रति व्यस्क की हिकारत देख सकते हैं। यानि फिर वही भाव कि बच्चे तो गम्भीर और ज्ञान की बात करने वाले हो ही नहीं सकते। बच्चों के गीत और प्रार्थनाएं भी कुछ इसी तरह से पेश किए जाते हैं कि ‘ हम सब बच्चे हैं नादान’…… , स्वयं को मूढ़मति के रूप में स्थापित करते हुए ऊपर वाले से ज्ञान मांगा जाता है। हमारी परम्परा में नादानी और बच्चे एक दूसरे के पर्याय से लगते हैं।

ऐसे परिवेश में एक बार फिर से समझने की जरूरत है कि बच्चे को लोकतंत्र के जानिब से देखा जाए, परम्परागत नज़रिए को ताक पे रखते हुए।

पुन: बाद में चर्चा के अंत में ‘क’ ने स्वीकार किया कि ‘बच्चे हो’ जैसा मुहावरा अपना अर्थ खो चुका है।

नवनीत बेदार को मैंने हमेशा एक बेहद सरल, सादा और स्पष्ट इन्सान के तौर पर पाया है. बजरिये देवयानी मैंने नवनीत में एक दोस्त को पाया. नवनीत के साथ बैठना, बात करना इतना सहज होता है कि लगता है दुनिया में ऐसे लोगों की कितनी जरूरत है जिनके साथ आप इस कदर सहज हो सकें कि स्त्री पुरुष का भेद मिट जाए.  ऐसे ही एक मित्र हैं प्रियंवद. नवनीत के बारे में ठीक से बात कर पाने के लिए मुझे प्रियंवद ही याद आये. नवनीत का लिखा पहली बार 'प्रतिभा की दुनिया' में आया है लेकिन यह सिलसिला बनेगा इस उम्मीद से-- प्रतिभा 

Wednesday, August 29, 2018

खेल


यह एक खेल है इन दिनों
काफी लोकप्रिय होता खेल
हालाँकि नहीं हुई है अभी इस खेल की इंट्री
ओलम्पिक, एशियाड में

जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय का भेदभाव मिटाकर
सब इस खेल में शामिल हैं
न न, कैंडी क्रश या फॉर्म हाउस नहीं
इस खेल में इंटरनेट की दुनिया में
न शामिल लोग भी शामिल हैं
गरीब से गरीब भी
अमीर से अमीर भी

रोजगार नहीं?
कोई गम नहीं
घर में रोटी नहीं?
कोई बात नहीं
बच्चियों का बलात्कार?
ओह, दुःख हुआ
गाँव बह गये?
बुरा हुआ, कुदरत का कहर
केरल की बाढ़?
उफ्फ्फ...हम कर भी क्या सकते हैं
किसानों की आत्महत्या?
भई, इतना भी तूल मत दो इन घटनाओं को
कवियों और लेखकों की गिरफ्तारी?
उन्हह, वो इसी लायक हैं.

यही है वो खेल
एक हाथ का दर्द कम करने को
दूसरे हाथ में ज्यादा चोट देना
बुखार की शिकायत करने पर
कैंसर की बात छेड़ देना
एकता की बात करते करते
अलगाव के बीज बोना
धर्म और जातीय विभेद से लड़ने की तक़रीर पढ़ते-पढ़ते
और गहरी करते जाना खाई
संवेदना का जाप करते हुए
नफरत के हथियार पैने करते जाना
हिंसा और नफरत के इस खेल में
स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर, हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, शूद्र
शामिल करना सबको

यह सबको एक-दूसरे के प्रति नफरत से भर देने का खेल है

खिलाडियों की भीड़ है, भीड़ का उफान है
भीड़ का उत्साह देखिये इस खेल को खेलते वक्त
एक भी मौका चूक न जाए इसलिए वीडियो रिकॉर्डिंग मुस्तैदी से
फारवर्ड का अचूक अस्त्र और उत्साह बढ़ाता है खेल के प्रति

कुछ सड़क पर उतरकर खेल रहे हैं
कुछ न्यूज़ रूम में बैठकर
कुछ चौराहों पर,
कुछ चाय की गुमटियों पर
कुछ कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए खेल रहे हैं
कुछ दांत भींचते हुए खेल रहे हैं स्मार्ट फोन के स्क्रीन पर
फेसबुक पर भी हैं बहुत से खिलाड़ी

जो इस खेल में शामिल नहीं हैं
उनकी चुप्पी शामिल है इसमें

जो मुखर होकर इस खेल के विरोध में हैं
वो या तो गायब हो जाते हैं अचानक जादू से
या 'अपनी मौत का जिम्मेदार खूद हूँ'
की चिट्ठी लिखकर झूल जाते हैं फंदे पर
या घर के भीतर कोई अदृश्य जादूगर आकर
कर जाता है उनकी हत्या
बिना कोई सुराग छोड़े

इस खेल के नियम ऐसे हैं कि हत्यारों के खिलाफ
नहीं मिलते कोई सुबूत
और लेखकों, कवियों, छात्रों,
और इस खेल में न शामिल हुए लोगों के खिलाफ
सुबूतों का ढेर मिल जाता है

कुछ भी हो हिंसा और नफरत के इस खेल ने
समूचे देश को एक सूत्र में बाँध रखा है.

Friday, August 24, 2018

साथ


जब मैं जीने की बात करती हूँ
तब असल में मैं
बात करती हूँ, अपने जीने की ही
मेरी जीने की बात करना
क्यों लगता है तुम्हें
मेरा तुम्हारे विरुद्ध होना

जब मैं हंसती हूँ खुलकर, खिलखिला कर
तब तुमसे कोई बैर नहीं होता मेरा
न मेरी हंसी होती है तुम्हें चुनौती देने के लिए
सदियों की उदासी से
मुक्त होने की ख्वाहिश भर है यह हंसी
मेरी यह हंसी क्यों लगती है तुम्हें
तुम्हारे विरोध में उठा कोई स्वर

जब मैं चलती हूँ तेज़ क़दमों से
तुमसे आगे निकलने की कोई होड़ नहीं होती
तुम्हारे साथ होने के सुख से
भरने की इच्छा होती है मन में
पीछे चलते हुए नहीं पाया मैंने साथ का सुख
शायद नहीं पाया तुमने भी

सांसों में 'जीवन' पाना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ ही, तुम्हारे बिना नहीं
मेरे जीने की इच्छा से तुम डर क्यों जाते हो भला ?



Wednesday, August 1, 2018

बाइक राइडर गजेन्द्र रौतेला के कुछ रोमांचक एहसास

गजेन्द्र रौतेला पेशे से शिक्षक हैं मन से विद्यार्थी. मैंने उन्हें एक बेहद क्रिएटिव ऊर्जा से लबरेज और संवेदनशील युवा के रूप में जाना है. कक्षा में वे बेहतरीन प्यारे दोस्त जैसे शिक्षक होते हैं, कैमरा उठा लेते हैं तो न सिर्फ खूबसूरत नजारों को कैद करते हैं कैमरे में बल्कि खबरों का, सामजिक सरोकारों का आईना बन जाते हैं. माउंटेनिंग, बाइकिंग, ट्रेकिंग, उनके पक्के दोस्त सरीखे हैं. केदारनाथ आपदा का समय हो या हाल ही में साम्प्रदायिकता की चपेट में अगस्त्यमुनि को झुलसने से बचाने की कवायद, गजेन्द्र सबसे पहले हाजिर होते हैं. उनकी जो बात इन सबसे परे उन्हें खास बनाती है वो है उनकी सादादिली. वो अपने किसी भी काम का जिक्र सुनकर गहरे संकोच में धंस जाते हैं. गजेन्द्र ने अपना एक यात्रा संस्मरण 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए देकर 'प्रतिभा की दुनिया' का मान बढाया है.- प्रतिभा


पढ़ने लिखने की संस्कृति के बहाने बाईक राइड वाया अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग (9:45 AM)-गैरसैंण-भिकियासैंण-रामनगर-काशीपुर-APF संस्थान दिनेशपुर उधमसिंहनगर 7:30 PM

दिनांक: 21 जून 2018
कभी-कभी खुद से बातें करते हुए अपने आस-पास की चीजों को महसूस करते हुए बाइक राइड करना एक अलग एहसास देता है। गुजरते वक़्त हर जगह की सरसराती कहीं गर्म, कहीं ठंडी हवा उस जगह के एहसास को भीतर तक महसूस करा लेती है।लगभग दो दशक बाद फिर से अगस्त्यमुनि से दिनेशपुर(रुद्रपुर) तक बाइक से गुजरने का मौका मिला ।बहुत सी चीजों में बदलाव भी देखा तो राज्य बनने के बाद भी बहुत कुछ यथावत भी।लगभग 350 किमी की इस बाइक राइड में गैरसैंण को राजधानी बनने की आस लगाए भी देखा तो बंजर होते खेत और खंडहर होते घर भी। बहुत कुछ झकझोर भी गया तो कुछ उम्मीदें बढाते प्रयोग भी। रामगंगा के किनारे बसा गणाई चौखुटिया के आस पास के रुपाई होते सेरे (खेत) आज भी यही बता रहे हैं कि जहाँ स्वाभाविक रूप से संसाधन उपलब्ध हैं वहाँ लोगों ने इनका भरपूर उपयोग भी किया है। वहीं दूसरी तरफ देवभूमि कहे जाने वाले राज्य में प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर वृद्ध केदार भगवान भी वैसे ही उपेक्षित हैं जैसे हमारे समाज में भी वृद्धजन उपेक्षित हैं यह अद्भुत साम्य है जहाँ इंसान और भगवान में कोई फर्क नहीं दिखता।

भतरौजखान के आस-पास का इलाका राज्य बनने अट्ठारह वर्षों के बाद भी पानी के संकट से जूझ रहा है।महिलाएं और बच्चे अपनी दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा पानी की जद्दोजहद में लगा दे रहे हैं। पूरे रास्ते भर छोटे-बड़े डिब्बों के साथ बच्चे और महिलाएं पानी के लिए भटकते हुए दिख जाते हैं। जबकि भतरौजखान के आस-पास का पूरा इलाका गढ़वाल क्षेत्र के लगभग धनौल्टी जैसा ही है । यदि इसको भी एक टूरिस्ट प्लेस के रूप में विकसित किया जाता तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी विकसित होते। भतरौजखान और मोहान के बीच का क्षेत्र कुछ छिटपुट बदलाव के बावजूद आज भी वैसा ही दिखता है जैसा राज्य बनने से पहले था। हाँ, कुछेक निजी पर्यटन व्यवसायियों द्वारा स्थापित कुछ अभिनव प्रयोग जरूर दिखाई दे जाते हैं।लेकिन दूसरी तरफ कभी उत्पादक रहे खेत और खंडहर होते घर हमारी आधुनिक जीवनशैली तथा पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी को बयां करती है। कभी अन्न उत्पन्न कर रहे इन बंजर खेतों में आज डिजिटल इंडिया के मोबाइल टावर उग आए हैं।यह नए उभरते भारत की एक बानगी भर है।यह भी सोचनीय है कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य की जो सांस्कृतिक पहचान स्थापित होनी चाहिए थी अफसोस है उसमें आज भी हम बहुत पीछे हैं। अब देखना यह है कि इन खोखली हो चुकी जड़ों के सहारे ये दरख़्त कब तक बची -खुची मिट्टी के सहारे अपना अस्तित्व बचाये रख सकते हैं यह एक बड़ा प्रश्न है।


दिनांक : 26 जून 2018

स्थान : दिनेशपुर(रुद्रपुर) 5:30 AM-हल्द्वानी-भीमताल-भवाली-गरमपानी-भुजान-रिची-बिनसर महादेव(अल्मोड़ा)-भिकियासैंण-गैरसैंण-रुद्रप्रयाग-अगस्त्यमुनि (9PM)
दूरी लगभग 350 KM

अक्सर हम लोग किसी भी यात्रा की विशेष रूप से तैयारी और खास योजना बनाकर निकलते हैं । लेकिन कई बार इस तरह की योजनाबद्ध तरीके से की गई यात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण नए रास्तों की तलाश और नई जगहों को देखने की चाह में की गई आवारगी भरी यात्रा ज्यादा प्रभावी और यादगार हो जाती हैं।वैसे ही रही इस बार की मेरी 700 किमी की अकेले की बाइक राइड। एपीएफ के सौजन्य से 25 जून को सम्पन्न हुई 'पढ़ने लिखने की संस्कृति' के समागम के पश्चात 26 जून की सुबह 5:30 पर दिनेशपुर से वाया हल्द्वानी,भीमताल,भवाली पहुंचा तो डेढ़ दशक पुरानी यादें ताजा हो गई।

जिस सलडी में उस वक़्त गिने चुने कुछ ही कच्चे ढाबे थे वहां आज खूब सारे पक्के ढाबे दिखाई दे गए और चहल-पहल भी। भीमताल में कम होता पानी और चारों तरफ बड़े-बड़े होटलों की संख्या बढ़ते जाना मन में चिंता भी बढ़ा गई। भवाली का मेरा आशियाना जोशी जी की पीली कोठी भी कुछ उदास सी दिखी ज्यादातर बच्चे रोजगार के लिए बाहर ही हैं शायद इसलिए । कुछ देश में तो कुछ विदेशों में।यही हमारे पहाड़ की नियति है । चाहे वो गाँव हो या कोई कस्बा पलायन की मार सभी जगह है लेकिन इसका प्रभाव अलग-अलग दिखता है । जहां एक तरफ कस्बे वाले एक निश्चित अवधि में आते-जाते रहते हैं वहीं दूसरी तरफ सुदूर गाँव से गए वाशिंदे को अक्सर शहर निगल जाते हैं। भवाली के बाद गरमपानी में दुकानें तो बढ़ी हैं लेकिन जिस पानी के धारे के कारण गरमपानी को जाना जाता था वो धारा भी अब हमारी चेतना और संवेदनाओं की तरह लगभग नदारद ही है। जो धारा पहले सार्वजनिक था अब उसमें जितना भी पानी शेष बचा है पाइपों में कैद होकर व्यक्तिगत हो गया है।डर लगता है कि यह व्यक्तिगत होने का सुख किसी दिन खुद से बातें करने के लिए खुद की अनुमति ही न माँगने लगे ।भयावह होगा वह दिन तो।सोचिएगा जरूर।खैरना होते हुए रानीखेत का परम्परागत रास्ता चुनने के बजाय मैंने भुजान होते हुए भिकियासैंण पहुंचने का विकल्प चुना।अक्सर नए रास्ते आपको नए किस्म की चुनौती और एक नई दृष्टि भी देते हैं । भुजान से तीपोला सेरा,तुनाकोट सेरा,बगवान और विशालकोट गाँव होते हुए रिची पहुंचा।भुजान से कुजगड़ नाले के साथ-साथ चलते यह देखकर सुखद एहसास हुआ कि उस बीस -पच्चीस किलोमीटर के क्षेत्र में कुजगड़ के दोनों ओर सब्जी उत्पादन का शानदार काम हो रहा है। और उससे भी बड़ी बात यह कि वो भी सिर्फ स्थानीय लोगों के द्वारा।नेपाली मूल या अन्य कोई भी नहीं। मेरे लिए ये जानकारी किसी आश्चर्य से कम नहीं थी।अक्सर इस तरह की सब्जी उत्पादन का कार्य अधिकांशतः हमारे यहां नेपाली मूल के नागरिक ही करते हैं।तिपोला सेरा में सब्जी उत्पादक लाल सिंह जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि-"हमारे क्षेत्र में बाहरी मजदूर कोई मिलता ही नहीं है इसलिए सारा काम खुद ही करना पड़ता है। बीज-खाद आदि खैरना-गरमपानी से या फिर हल्द्वानी से ही लाते हैं और बेचते भी वहीं हैं।सरकार द्वारा न तो बेचने के लिए कोई सुविधा दी गई है और न ही खाद-बीज की ही।सब कुछ स्वयं ही व्यवस्था करनी पड़ती है । यहां तक कि नहरों की मरम्मत तक भी हमें ही करनी पड़ती है।सरकार की गिनती में ये कोई काम थोड़े ही न हुआ ।" लेकिन ये देखकर मैं भी हैरान था कि बिना पानी वाले उखड़ के खेतों में भी स्थानीय लोग उखड़ के अनुकूल सब्जी उत्पादन कर रहे थे। सलाम है ऐसी जीवट जिजीविषा के लोगों के लिए।मेरे लिए तो यह दृश्य एक तरह से आंखें खोलने वाला ही था।

उसके बाद विशालकोट के आस-पास किसी नवयुवक द्वारा लिफ्ट माँगे जाने पर कुछ दूरी के लिए एक नया साथी मिल गया।पूछने पर पता चला कि इस बार दसवीं पास कर ग्यारवहीँ में गया है और नाम है रोहित मिश्रा।वह राजकीय इंटर कॉलेज पन्तस्थली में है और अपने ममाकोट आया हुआ था और गाड़ी न मिलने के कारण परेशान था और जाना था बिनसर महादेव में चल रही पूजा और मेले में। रिची तक साथ आने के बाद मेरा भी मन हुआ कि क्यूँ न साथी का साथ पूरा निभाया जाए तो हम भी चल दिए साथ बिनसर महादेव के रास्ते पर अपने नौजवान दोस्त रोहित मिश्रा के साथ 8 किलोमीटर दूर बिनसर महादेव। बिनसर महादेव पहुंचते ही समझ आया कि वास्तव में यह कितना बड़ा मेला है।दो घण्टे मेले की रौनक देखने के बाद रिची में खाना खाने के बाद दस-बारह किलोमीटर चला हूँगा तो पिछली रात की अधूरी नींद जोर मारने लगी।सड़क किनारे दाहिने तरफ एक सुनसान सा वीरान पड़ा मंदिर एक सुकून भरी नींद के लिए सबसे बढ़िया विकल्प मिल गया तो वहीं एक-डेढ़ घण्टे की मीठी नींद सो लिए।ट्रक के तेज हॉर्न ने नींद में खलल डाली तो मन ही मन शब्दों से पवित्र कर दिया उसको भी । आखिर मंदिर का प्रभाव जो हुआ ठैरा।सुस्ताते हुए भिकियासैंण होते हुए गैरसैंण-कर्णप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए रात 9 बजे लगभग 350 किमी की बाइक राइड के बाद अगस्त्यमुनि घर पहुंचे।

इस दौरान यह समझ भी आया कि चाहे कुमाऊं हो या गढ़वाल क्षेत्र महिलाओं की घास-लकड़ी-पानी की दिक्कतें एक सी ही हैं।राज्य को बनाने में जिस मातृ शक्ति ने सबसे ज्यादा संघर्ष और यातना झेली राज्य बनने के 18 वर्षों बाद भी उन की मूलभूत समस्याएं जस की तस हैं।आदिबद्री के आस-पास किसी नवयुवती को घास की कंडी पीठ पर लादे बारिश की रुमझुम में सरपट स्कूटी में भागते देखा तो लगा कि आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल ऐसे भी हो सकता है।लेकिन जिनके पास सीमित साधन हैं या फिर उम्रदराज ईजा-आमा हैं उनका क्या ? तो खयाल आया कि क्या 108 जैसी इमरजेंसी सेवा की तरह ही कोई घसियारी एक्सप्रेस जैसी कॉल 10.......जैसी सेवा शुरू नहीं की जा सकती ? अक्सर देखा जाता है कि सड़कों पर हमारी माँ-बहनें जंगल से घास-लकड़ी लाने के बाद थकी -हारी सड़कों पर किसी ट्रक-गाड़ी का इंतज़ार करते हुए घण्टों भूखे-प्यासे गुजार देती हैं।उसके बाद भी यदि कोई रहमदिल ड्राइवर हो तो गाड़ी रोक लेता है अन्यथा फिर सड़क की दूरी भी फिर पैदल ही नापना शुरू।ज्यादा नहीं तो कम से कम पहाड़ की रीढ़ कही जाने वाली इन माँ-बहनों के लिए सरकार का महिला एवं बाल कल्याण विभाग या फिर बहुत सारी निष्क्रिय पड़ी सहकारी समितियों के द्वारा इनके कार्यबोझ को कम करने की कोई कोशिश तो की ही जा सकती है।और यह काम कोई असम्भव जैसा भी नहीं क्योंकि अक्सर महिलाएं वक़्त चाहे कोई भी हो समूह में ही जाती हैं घास-लकड़ी लेने के लिए जंगल।जब इनके द्वारा लाये गए घास से पल रहे जानवरों के दूध के कलेक्शन और बिक्री के लिए दुग्ध समितियां और गाड़ी हो सकती हैं तो इनके कार्यबोझ को कम करने के लिए 'घसियारी गाड़ी' क्यों नहीं हो सकती।सरकार बहादुर थोड़ा गौर जरूर कीजिए।और अगर आपके बस की बात न हो तो नाक पर हाथ रखकर जनता पर सेस लगाइए हमें खुशी होगी इसके लिए सेस देने पर।लेकिन करिये जरूर।
मेरा नई पीढ़ी के आवारा-घुमक्कड़ों से भी आग्रह है कि जहाँ तक सम्भव हो वे भी निकलें कभी कभार यूँ ही पहाड़ी रास्तों से अपने राज्य को जानने समझने और महसूस करने के लिए।पहाड़ के कठिन रास्ते होने के पूर्वाग्रहों से बाहर निकलिए और खोजिए-बनाइये अपने राज्य के नव निर्माण के नए रास्ते।तोड़ डालिए उन अवरोधों को जो आपके रास्ते की अड़चन बनें।तभी उत्तराखंड बनने की यात्रा भी सफल होगी ।अन्यथा हमारी आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी कि आखिर हमने अपनी जिम्मेदारी क्यों कर नहीं निभाई।

Sunday, July 29, 2018

असफल प्रेमिकाएं- असीमा भट्ट




वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हब्बा की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी - ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती है उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’ कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं दिन, महीने और तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते - कमली है तू
और वो खुद पर ज़ोर ज़ोर से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा था
क्या करती, ठीक से दिखा ही नहीं
असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली घबरा जाती हैं, रोती हैं तकिये
में मुंह रख कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती होगी उनके प्रेमी के कानों में
वो अच्छा हो, वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ
असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या तो पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर
वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली कलाई
किसी से न बर्दाश्त हुआ सदमा और रुक गयी दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे प्यार का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने लगे - प्यार का कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं - एक झलक देखना चाहती हूँ
छूना चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी मजबूत बाहों में पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते - ‘क्या बचपना है, यह सब बकवास है.’
ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं - खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं - यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस नहस करके रख दी उनकी जिंदगी
तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं और तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो प्रेमिकाएँ हैं
प्रेतात्माएं नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब तक वो करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार ...
https://www.youtube.com/watch?v=LhzBPGTydSs

Thursday, July 19, 2018

आपके साथ बीडी पीना तो रह ही गया नीरज जी


(एक पुराना लेख जो उनके जन्मदिन पर लिखा था.)



'आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी’ - नीरज

एक- एक नन्ही सी लड़की चुपचाप अपनी फ्रॉक के किनारी पर लगी फ्रिल को कुतरा करती थी. वो खामोश रहती थी. उसके कोई दोस्त नहीं थे. स्कूल में अपने हम उम्र बच्चों के बीच भी वो अकेली ही थी. क्लास में बैठकर क्लास के बाहर ताका करती और घंटी बजने का इंतजार करती. घन्टी बजते ही सब बच्चे खेल के मैदान की ओर दौड़ जाते और वो धीमे क़दमों से मैदान के किसी कोने में अकेले टिफिन खाती और अकेली घूमती रहती. वो टीचर्स की फेवरेट नहीं थी. घर में उससे यह पूछने वाला कोई नहीं था कि ड्रेस चेंज की या नहीं, खाना खाया या नहीं. ऐसे में भला ये कौन पूछता कि स्कूल में दिन कैसा रहा? क्योंकि उसके माँ बाप जीवन के दूसरे संघर्षों में उलझे थे. उस कक्षा एक में पढ़ने वाली नन्ही लड़की का अकेलापन भांप लिया एक शिक्षक ने जिनका नाम था गोपी सर. गोपी सर भी शायद स्कूल में, या हो सकता है जीवन में ही उस नन्ही बच्ची की तरह अकेले थे. उन्होंने स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए उस नन्ही बच्ची के तरह अकेले और उपेक्षित रह गए बच्चों की ओर हाथ बढ़ाया. ये वो बच्चे थे जिन्हें स्कूल के किसी कार्यक्रम में जगह नहीं मिलती थी, ये सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनते और ताली बजाते. गोपी सर ने उन सारे छूट गए उपेक्षित बच्चों का हाथ थामा और उनके लिए एक कार्यक्रम की योजना बनाई. कार्यक्रम तैयार हुआ ‘कवि सम्मेलन का’. कक्षा एक में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को सुंदर-सुंदर कविताओं की कुछ छोटी-छोटी लाइने दी गयीं. उन्हें बाकायदा ड्रेसअप किया गया. अब वो बच्चे भी उत्साहित थे. उन बच्चों ने पहली बार मंच पर उन कवियों की कवितायेँ पढ़ीं जिनका शायद नाम भी नहीं सुना था. जिन्हें कविता होती क्या है यह भी पता नहीं था. ये 32 बरस पुरानी बात है. वो ‘इंडियन आइडियल’ और ‘सुपर डांसर’ जैसे कार्यक्रमों का समय नहीं था. उन बच्चों के जीवन में यह छोटी सी प्रतिभागिता बहुत महत्वपूर्ण थी. गोपी सर ने उस रोज न सिर्फ उन बच्चों का हाथ थामा था बल्कि उनकी जिन्दगी में हमेशा के लिए कविता का एक बीज बो दिया था. वो नन्ही सी लड़की मैं थी. उस रात मैंने जिस कवि की कविता पढ़ी थी उनका नाम है गोपालदास नीरज. यह मेरे जीवन में कविता की पहली आहट थी. वो लाइनें टूटी फूटी सी ही याद रहीं, ‘कोई कैसे जिए अब चमन के लिए, शूल भी तो नहीं हैं चुभन के लिए’.

दो- जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तब पापा टेपरिकॉर्डर लाये थे. घर में बेलटेक का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी था, फिलिप्स का रेडियो भी था जिसका इस्तेमाल ‘बीबीसी की ख़बरें’ या ‘बिनाका गीतमाला’ और ‘हवा महल’ सुनने के लिए होता था, कभी-कभी ‘फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम’ भी. कब कौन सा कार्यक्रम रेडियो पर सुना जायेगा यह तय करने का हक बच्चों का नहीं होता था. ऐसे में टेप रिकॉर्डर आना सुखद घटना थी. चूंकि टेप रिकॉर्डर पापा लाये थे तो जाहिर है अपनी ही पसंद की चार कैसेट भी लाये थे. महीनों वो चार कैसेट ही मेरी खुराक बने रहे. उन चारों कैसेटों में से जिनमें एक थी ‘लता के सुपरहिट गीत’, दूसरी थी ‘मेरा नाम जोकर’, तीसरी थी ‘मुकेश के गीत’ और चौथी थी ‘नई उमर की नई फसल.’ मैंने पहली बार इस फिल्म का नाम सुना था. धीरे धीरे यह कैसेट मेरी फेवरेट हो गयी. ‘कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’ तो मुझे अच्छा लगता ही था इस कैसेट का एक और गीत मुझे बेहद पसंद था, आज भी बहुत पसंद है ‘आज की रात बहुत शोख बहुत नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, अब तो तेरे ही यहाँ आने का ये मौसम है, अब तबियत न ख्यालों से बहल पाएगी...’ इस तरह कोई कैसेट जो मेरी प्रिय कैसेट के रूप में और कोई कवि या गीतकार मेरी फेवरेट लिस्ट में पहली बार शामिल हुआ वो थे गोपालदास नीरज.

पत्रकारिता के दिनों की मेरे सबसे गाढ़ी कमाई यही है कि इस दौरान ढेर सारे प्यारे लोगों से मुलाकातें हुईं, उनसे स्नेह हासिल हुआ, दुलार मिला. इसी गाढ़ी कमाई में शामिल है गोपालदास नीरज का नाम भी.

अब तक मैं उन्हें काफी पढ़ चुकी थी. उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. अख़बारों में जिस तरह की अफरा-तफरी के माहौल में काम होता है उसमें महसूस करने की स्पेस बहुत कम होती है. उनका इंटरव्यू लेना एक असाइनमेंट भर था. यह उन दिनों की बात है जब मेरी नयी-नयी शादी हुई थी और जैसा कि नयी शादी के बाद का तमाशा होता है पार्टीबाजी, सोशलाइज़िंग वगैरह तो उसका दबाव भी था. तो मुझे ऑफिस से रात नौ बजे निकलकर इंटरव्यू लेना था और साढ़े नौ बजे साड़ी पहनकर किसी पार्टी में जाना था (तब तक ‘न’ कहना सीखा नहीं था).

बहरहाल, जल्दी-जल्दी में इंटरव्यू हुआ और अच्छा हुआ. अगले दिन हिंदुस्तान अख़बार में ‘नीरज खड़े प्रेम के गाँव’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ. मैंने साड़ी लपेटकर, लिपस्टिक पोतकर पार्टी भी अटेंड की लेकिन मन उखड़ा ही रहा. मुझे लगा मैं मिली ही नहीं नीरज जी से, इसे क्या मुलाकात कहते हैं, इसे क्या बात होना कहते हैं. स्टोरी भले ही सफल रही हो लेकिन मन खिन्न ही रहा लम्बे समय तक. हालाँकि इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी सुनाई थी, बहुत मन से.

खैर, वक़्त ने न्याय किया. इसके बाद मेरी नीरज जी से कई मुलाकातें हुईं. कुछ अख़बारों में दर्ज हुईं कुछ नहीं भी क्योंकि अब तक मेरी उनसे दोस्ती हो चुकी थी. वो शहर में होते तो हम जरूर मिलते. ढेर सारी बातें करते. मैं उन्हें सुनती ज्यादा, सवाल कम करती. पूछकर जानना मुझे सूचनात्मक ही लगता है, महसूसने की आंच में पकते हुए यात्रा करना असल में जानने की ओर जानना लगा हमेशा सो कोशिश भर यही किया, और असाइनमेंट के बोनस में खूबसूरत दोस्तियाँ और स्नेह हासिल किया.

एक शाम जब वो मंच पर थे तो मुशायरे की स्तरहीनता से मेरा मन बहुत उदास हुआ था. उस शाम नीरज जी ने याद किये थे वो तमाम मुशायरे जब मंच पर साहिर, शैलेन्द्र, कैफ़ी वगैरह हुआ करते थे. वो उन सोने सी दमकती रातों का जिक्र करते हुए बहुत खुश थे, उनकी आँखों में चमक थी. उन्होंने गीतों की यात्रा पर बात की. किसी बात के अर्थ किस तरह खुलते हैं, गीत किस तरह दार्शनिक यात्रा तय करते हैं और सुनने वालों को न सिर्फ सुकून देते हैं बल्कि उनका परिमार्जन भी करते हैं, एक अलग यात्रा पर ले जाते हैं यह लिखने वालों और सुनने वालों दोनों को समझने की जरूरत है. साहिर और शैलेन्द्र को वो काफी याद करते.

मैंने उनसे एक मुलाकात में जिक्र किया अपने बचपन वाले कवि सम्मेलन का और उनकी उस कविता भी जो मुझे ठीक से याद भी नहीं रही...वो हंस दिए थे उस बचकाने से किस्से पर. उन्हें भी कविता याद नहीं थी. वो हमेशा खूब पढ़ने को कहते, जिन्दगी जीने को कहते. उनकी कविताओं को उनके कमरे में चाय पीते हुए सुनना किसी ख़्वाब को जी लेने जैसा होता था...उनका कविता पढ़ने का ढंग मुझे बहुत म्यूजिकल लगता. हालाँकि उनकी आवाज कांपने लगी थी. लखनऊ में चारबाग के पास के एक होटल में उनसे अब तक की आखिरी मुलाकात हुई थी, उस रोज उन्हें चलने में काफी दिक्कत हो रही थी. मेरा मन बहुत उदास था. आयोजकों ने उनके सम्मान के साथ इन्साफ नहीं किया था. उनके रहने की व्यवस्था बहुत सामान्य थी. जबकि उसी कार्यक्रम के लिए आये प्रसून जोशी सरीखे लोगों के लिए दिव्य व्यवस्था थी.

हम बुजुर्गों के सम्मान का भाषण देना जानते हैं, उनके नाम उनकी शोहरत को कैश कराना भी जानते हैं लेकिन उनके साथ इन्साफ नहीं करते. सचमुच मेरा मन बहुत उखड़ा था, वो शायद मेरा मन पढ़ चुके थे. बीड़ी पी चुकने के बाद उन्होंने मेरा मन हल्का करने को कहा ‘एक फोटो तो खिंचवा लो हमारे साथ.’ मैंने छलक आये अपने आंसुओं को सहेजते हुए कहा था, ‘अरे आपसे तो मिलना होता ही रहता है, अभी आप आराम करिए, फोटो फिर कभी खिंचवा लेंगे.’ वो हंस दिए थे...’क्या पता अगली बार हो ही नहीं’. मेरी आंसुओं को सहेजने की सारी मेहनत वो बेकार कर चुके थे...तस्वीर खींची जा चुकी थी...मन की उदासी कायम ही रही...आज उनका जन्मदिन है...उन्हें बहुत बहुत याद करते हुए उनके स्वास्थ्य लाभ की दुआ कर रही हूँ. दुआ कर रही हूँ कि सेल्फियों और फेसबुक के लाइक्स की भीड़ में बदलता यह समाज, तमाम सामाजिक खांचों में बंटा समाज, हिंसा और आत्ममुग्धता से तृप्त होता समाज, नकली संवेदनाओं का नया मार्केट बनता यह समाज अपनी इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों को सहेजना सीख सके...काश!

प्यारे नीरज जी, आप जल्दी से ठीक हो जाइए, आपसे मिलना है जल्दी ही फिर से और सुननी हैं बहुत सी कवितायेँ...इस बार आपकी बीड़ी भी पियूंगी...पक्का. लव यू ऑलवेज, हैपी बर्थडे!


Saturday, July 14, 2018

आइये चलें विदेश बिना पासपोर्ट वीजा

हेम पन्त रचनात्मक ऊर्जा से भरे उन युवाओं में से हैं जो अपने हर लम्हे को भरपूर जीने में और उस जिए से समाज को जोड़ने में यकीन करते हैं. पेशे से इंजीनियर हेम क्रिएटिव उत्तराखंड मंच से शुरुआत से जुड़े हैं. उन्होंने पढ़ने लिखने की संस्कृति के विकास के लिए एक सृजन पुस्तकालय बनाया है. वो 'क' से कविता से जुड़े हैं. थियेटर करते हैं. घुम्म्क्कड़ी, संगीत, साहित्य पढ़ने में खूब रूचि रखते हैं और हर काम में कुछ नया करने को बेताब रहते हैं. पिछले दिनों वो नेपाल यात्रा पर गए तो उन्होंने 'प्रतिभा की दुनिया' के लिए कुछ संस्मरण लिखे।आइये पढ़ते हैं उनके संस्मरण- प्रतिभा 

नेपाल का एक दृश्य 
एक दृश्य जहाँ हम ठहरे गये 

प्राकृतिक विविधता और हर तरह के पर्यटक के अनुसार मनोरंजन साधनों के कारण नेपाल फिर से तेजी के साथ घुमक्कड़ों की पसन्द बनता जा रहा है। सीमा पार करने की सुगम सुविधाओं के कारण भारत से हर साल भारी संख्या में लोग नेपाल घूमने जाते हैं। लम्बे समय तक राजनैतिक अस्थिरता के बाद अब उथल-पुथल रुक गई है, संविधान का निर्माण हो चुका है और अब नेपाल के लोगों को उम्मीद है कि देश में तेजी से विकास होगा।

पिछले दिनों साथी सुनील सोनी के साथ उनकी कार से नेपाल के दो राज्यों में घूमने का मौका मिला। रविवार दिन में लगभग 4 बजे रुद्रपुर से निकलने के बाद हम दोनों लोग बनबसा (गड्डाचौकी) बोर्डर से होते हुए उसी शाम 7 बजे महेन्द्रनगर पहुंचे। अब रुद्रपुर से बनबसा तक सड़क की स्थिति बहुत अच्छी है। नेपाल की सीमा में प्रवेश करने के बाद कार का शुल्क (लगभग 300 भारतीय रुपये प्रतिदिन) देकर आसानी से रोड परमिट बन जाता है। हम लोगों का रात का विश्राम धनगढ़ी में था। महेन्द्रनगर से धनगढ़ी तक शुक्लाफांटा नेशनल पार्क के बीच से गुजरते हुए बहुत ही सुगम सड़क है। नेपाल में हर जगह सड़कों का काम बहुत तेजी से हो रहा है।

रात लगभग 9.30 बजे हम लोग धनगढ़ी शहर पहुंचे जहाँ हमारे मेजबान श्री केदार भट्ट जी हमारा बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। मूल रूप से पिथौरागढ़ के निवासी श्री केदार भट्ट धनगढ़ी शहर के प्रतिष्ठित शिक्षक हैं। लगभग 40 साल से नेपाल में रहते हुए उन्होंने शहर में विज्ञान शिक्षक के रूप में बहुत नाम कमाया है, अभी भी धनगढ़ी में कई स्कूलों के साथ जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। श्रीमती भट्ट भी योग प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रही हैं।

नेपाल में संविधान निर्माण के बाद 7 राज्यों का निर्माण किया गया है और अब वहां भारत की तरह ही त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। धनगढ़ी शहर को राज्य-7 की राजधानी बनाया गया है। यह एक तेजी से उभरता हुआ शहर है। शहर के आसपास ही भारतीय मूल के लोगों द्वारा संचालित कृषि आधारित औद्योगिक प्रतिष्ठान भी हैं। सड़कों के चौड़ीकरण का काम चल रहा है और बाजार-दुकानों में आधुनिकता की झलक दिखाई देने लगी है। एक अच्छी बात ये भी है कि नेपाल में अधिकांश दुकानें महिलाओं द्वारा चलाई जाती हैं। धनगढ़ी में कई उच्चस्तरीय पेशेवर शैक्षिक संस्थान भी हैं। यहां नॉर्वे की सहायता से स्थापित चेरिटेबल 'गेटा नेत्र अस्पताल' में आधुनिक मशीनों की मदद से सस्ती चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। इस अस्पताल में यूपी-बिहार की तरफ से भी लोग आंखों के ऑपरेशन करवाने आते हैं। दिनभर धनगढ़ी घूमने के बाद अगले दिन हमने नेपालगंज जाने का विचार बनाया।

अगली सुबह 6 बजे हम दोनों लोग कार से नेपालगंज शहर की तरफ निकले जो धनगढ़ी से लगभग 200 किमी दूर है। इस रास्ते पर लगभग 20 साल पहले भारत ले सहयोग से 22 पुलों का निर्माण किया गया है। सड़क बहुत ही अच्छी है। एक पहाड़ी श्रृंखला अधिकांश रास्ते में सड़क के समानांतर चलती है। सड़क के किनारे हरियाली भरे खेत, छोटे कस्बे और ग्रामीण जीवन के खूबसूरत नजारे दिखते हैं। जगह जगह धान की रोपाई लगाते हुए नेपाल के लोग पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर और खुशहाल नजर आते हैं। बीच रास्ते में 'घोड़ा-घोड़ी ताल' नामक एक सरोवर है जहां खूब कमल के फूल खिलते हैं। आगे जाकर चिसापानी नामक स्थान पर 'करनाली नदी' के ऊपर जापान के सहयोग से एक भव्य पुल बना हुआ है। इस पुल को पार करते ही 'बर्दिया नेशनल पार्क' का इलाका शुरू हो जाता है।

नेपाल में सभी संरक्षित वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना के हाथों में है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरती हुई शानदार सड़क पर भी सेना लगातार गश्त करती है। इस सड़क से गुजरते हुए कहीं भी रुकने की मनाही है। गाड़ी से प्लास्टिक या अन्य गन्दगी फेंकने पर भारी जुर्माना लगता है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' के बीच से गुजरने वाले East-West National Highway पर वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए एक अनूठा तरीका है। 'बर्दिया नेशनल पार्क' में प्रवेश करते ही वनचौकी पर रुककर वाहन का टाइम कार्ड बनता है। एक चौकी से दूसरी चौकी की दूरी के बीच 40किमी/घण्टा की स्पीड से दूरी तय करनी होती है। 13किमी दूरी के लिए लगभग 20-22 मिनट तय है। रास्ते मे कहीं भी गाड़ी रोकने की अनुमति नहीं है। जल्दी पहुंचने का मतलब है कि आपने गाड़ी तेजी से चलाई है और देरी से पहुंचने का मतलब आप रास्ते में कहीं रुके थे। दोनों स्थितियों में जुर्माना हो सकता है। जंगल से बाहर निकलते समय सेना द्वारा गाड़ी की एक बार फिर से अच्छी तरह जांच की जाती है। गाड़ी से जंगली जानवर को चोट पहुंचाने पर 6 महीने की सजा और एक लाख नेपाली रुपये जुर्माना।

नेपाल में ज्यादातर लोग बस-मैटाडोर से सफर करते हैं। रोड पर ट्रैफिक बहुत ज्यादा नहीं है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि 200% कस्टम ड्यूटी के कारण कार और बाइक बहुत महंगी हैं। भारत में जो कार ₹5 लाख की है वो नेपाल में ₹15 लाख में आएगी (लगभग 23-24 लाख नेपाली रुपये) बड़े और मध्यम स्तर के शहरों के बीच Air Connectivity भी बहुत अच्छी है। सड़कों की स्थिति ठीकठाक है और भारतीय गाड़ियों के लिए बहुत सुगमता है। हमारे साथी मुकेश पांडे और उमेश पुजारी पिछले साल इसी रास्ते बाइक पर पूरा नेपाल लांघते हुए भूटान तक गए थे।

भारत के लोगों के साथ नेपाल के निवासी बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। भाषा सम्बन्धी कोई खास समस्या भी नहीं होती। अकेले घूमने के शौकीन लोगों के लिए नेपाल में कई सुविधाएं उपलब्ध हैं और पारिवारिक भ्रमण के लिए भी नेपाल एक सुरक्षित स्थान है।

तो अगर आप दुनिया घूमने का शौक का शौक रखते हैं तो नेेेपाल से शुरुआत कीजिए, बिना पासपोर्ट और वीजा

‘नहीं, कभी नहीं’ के उस पार



इन दिनों वॉन गॉग साथ रहते हैं. सुबह की चाय हम साथ पीते हैं, शाम को हम एक साथ देखते हैं थके हुए सूरज का घर जाना और आसमान पर रंगों का खेल. रात हम बारिशों की धुन सुनते हैं. हम साथ होते हैं लेकिन खामोश रहते हैं.

मुझे यूँ चुप होकर साथ रहने वाले दोस्त अच्छे लगते हैं. रात भर बारिश हुई. गॉग और मैं इस बारिश की बाबत खामोश रहे. वो इस वक़्त प्रेम पर अटके हुए हैं, शायद मैं भी. ‘इस वक़्त’ के बारे में सोचकर ‘किस वक़्त नहीं’ मुस्कुरा रहा है.

यूँ प्रेम पर अटके होने का अर्थ है, उदासी के निकट होना. उदासी बरस जाए तो राहत हो, शायद इसीलिए मुझे बरसना पसंद है, गॉग को रंग बनकर बिखरना. हम दोनों एक दीवार के इस पार हैं जिसे उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार का नाम दिया है. वो बोल रहा है, मैं चुप हूँ. प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार चाइना वॉल से भी बड़ी और मजबूत लगती है. लेकिन दीवार के इस पार खड़ा प्रेम, हमेशा उस पार के ‘नहीं, कभी नहीं’ के आगे सजदे में रहता है. पीसा की मीनार ने क्या पता इन प्रेमियों से झुककर रहना सीखा हो.

वॉन गॉग थियो को लिखी अपनी चिठ्ठियों में लिखते हैं, ‘‘तुम बतलाओ कि क्या तुम्हें यह विस्मित नहीं करता कि कोई प्रेम इतना गंभीर और भाव-प्रवण हो सकता है कि कैसे भी बर्फीले ‘नहीं, कभी नहीं’ के बावजूद निष्कम्प जलता रहे? मुझे तो लगता है कि यह अत्यंत ही स्वाभाविक और सामान्य है.’’

यह स्वाभाविक और सामान्य होना सबके हिस्से नहीं आता, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रेम सबके हिस्से नहीं आता. तो इस प्रेममय उदासी के अपने जीवन में आने के प्रति आभारी होना चाहिए हमें. लेकिन हम तो शिकायत से भर उठते हैं.

गॉग कहता है, ‘’प्रेम इतना सुदृढ़, सच्चा और सकारात्मक भाव है कि इसमें अपनी भावनाएं वापस लेना उतना ही असम्भव है जितना अपने प्राण ले लेना.’ मेरा जीवन और मेरा प्रेम दोनों एक हैं. मेरे लिए फ़िलहाल यह ‘नहीं, कभी नहीं’ बर्फ की एक सिल्ली है, जिसे मैं अपने सीने के ताप से पिघलाने में जुटा हूँ.’

गॉग की तरह शायद बहुत सारे प्रेमी अपने सीने के ताप से ‘नहीं, कभी नहीं’ की बर्फ की सिल्ली को पिघलाने की कोशिश में होंगे. शायद न भी हों. गॉग ने अपने रंगों और लकीरों को जीवन से लिया है. उसने जिन रंगों का प्रयोग किया वो दुकान से लिए भले ही गए होंगे लेकिन उन्हें जीवन के, महसूसने के पानी में घोलकर उसने रचा वो अद्भुत है. उसने बिना जिए एक लकीर भी नहीं खींची, यूँ ही सांसों को आने-जाने का क्रम होने से बचाकर रखा, जिया उसने शायद तभी उसने ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार के आगे ‘वही और दूसरी कोई नहीं’ की लकीर खींच दी. उसने थियो को लिखा, ‘मैं इसे कमजोरी न मानकर ताकत मानता हूँ. वह मेरा एकमात्र आधार है जिससे मैं हटना नहीं चाहता.’

‘नहीं, कभी नहीं’ का विलोमार्थी क्या होता होगा. गॉग ने इस विलोमार्थी को ‘वही, और कोई नहीं’ से गढ़ा. उसने भाई को लिखा कि, ‘अगर तुम्हें कभी प्रेम में ‘नहीं, कभी नहीं’ सुनने को मिले तो उसे चुपचाप स्वीकार मत करना.’

तो चुपचाप न स्वीकार करने का क्या अर्थ है आखिर, युद्ध करना, किससे, ‘नहीं कभी नहीं’ से या ‘वही और कोई नहीं’ से. अक्सर लोगों को इन दोनों के ही आगे घुटने टेकते पाया है. आज जो ‘वही, और कोई नहीं’ है कल वह ‘कोई और’ किस तरह हो जाता होगा मालूम नहीं. कभी-कभी लगता है, ‘नहीं, कभी नहीं’ की दीवार से टकराना हमारे भीतर का कोई ईगो तो नहीं. तब तक उससे टकराना जब तक वो टूट न जाए. एक बार जो वो टूट गया तब? इसके आगे एक गहन शांति है. इस ‘नहीं, कभी नहीं’ का होना असल में हमारे होने को बचाए हुए है. यही उम्मीद है. गॉग कहते हैं कि, ‘’हम हमेशा यह बतलाने की स्थिति में नहीं होते कि वह क्या है जिसने हमें ढांप रखा है, बंदी बना रखा है. जो हमें दफन किये देता है, हालाँकि हम उन चट्टानों, उन दरवाजों, उन दीवारों को बखूबी महसूस करते हैं. क्या यह सब हमारी कल्पना या फंतासी है? मुझे नहीं लगता और मैं पूछता हूँ, हे ईश्वर! यह कितनी देर चलेगा, क्या आजीवन ऐसा ही कोहरा बना रहेगा? तुम जानते हो इस कारावास से मुक्ति कहाँ है? केवल एक सच्चे और गहरे प्रेम में.’’

सच्चा और गहरा प्रेम. क्या इसके अलावा भी कोई प्रेम होता है. प्रेम है तो उससे बड़ा सच कोई नहीं और उसकी गहराई आपको उदास सागर में डुबो देगी. ऐसे ही आता है प्रेम, सब ध्वस्त करते हुए. यही निर्माण की प्रक्रिया है. बिना प्रेम में पड़े हुए लोगों को कभी मालूम नहीं होता कि उन्हें प्रेम नहीं हुआ है, उन्हें उम्र भर मालूम नहीं होता इसलिए वो उदासी को प्रेम नहीं पढ़ पाते और प्रेमियों को ‘दुखी आत्मा’ कहते हैं. जबकि असल में वो सुखी आत्माएं ही हैं.

गॉग लिखते हैं, ‘’इस प्रेम की शुरुआत से जैसे यूँ लग रहा था कि इसमें मुझे खुद को पूरा झोंक देना है. बिना आगा पीछा सोचे, यूँ कूद पड़ने में ही थोड़ी उम्मीद है. पर फिर मैं थोड़ी या अधिक उम्मीद के बारे में क्यों सोचूं. प्रेम करते वक्त क्या मुझे यह सब फालतू बातें याद रखनी चाहिए. हरगिज नहीं. हम प्रेम करते हैं क्योंकि हम प्रेम करते हैं. बस. कल्पना करो कि एक स्त्री क्या सोचेगी यदि उसे पता चले कि सामने वाला उससे प्रेम निवेदन तो कर रहा है किन्तु एक हिचक के साथ. क्या तब उसका उत्तर ’नहीं, कभी नहीं’ से अधिक कठोर न होगा? ओह थियो, छोड़ो. कुछ और बात करते हैं. प्रेम तो सिर्फ प्रेम है, उसके आगे पीछे कुछ नहीं. उसमें डूबा हमारा मन एकदम साफ़ चमकीला और खुला होता है, न भावनाएं छुपाई जाती हैं न आग बुझाई जाती है. केवल एक सहज स्वीकार- खुदा का शुक्र है यह मोहब्बत है!”

ह्म्म्म खुदा का शुक्र है कि मोहब्बत है. खुदा का शुक्र है कि है ‘नहीं, कभी नहीं’ भी. क्या हमने प्रेम में पड़े हुए लोगों के साथ पेश आना सीखा है. क्या हमने मनुष्य के तौर पर किसी दूसरे मनुष्य के साथ पेश आना भी सीखा है? हम लोगों के सुखों को दुखों में बदल देने में माहिर लोग हैं शायद इसीलिए प्रेमी अपना एकांत गढ़ लेते हैं. दुःख का एकांत. जहाँ प्रेम, उदासी, ईश्वर, सब साथ रहते हैं. गॉग का यह कहना विभोर करता है कि, ‘’तुम मुझे इस ‘नहीं, कभी नहीं’ पर बधाई दो.’’

हम सांत्वना देते हैं इश्क में दुःख को जीते व्यक्ति को, हम उसे बधाई नहीं देते, गॉग सिखाता है हमें कि प्रेम में डूबे व्यक्ति से किस तरह पेश आना चाहिए. क्योंकर सोचना विचारना, क्या हो जाएगा उससे. कि प्रेम तो मृत्यु की तरह अनपेक्षित है. आपका बस तो उस पर चलना है नहीं तो आने दो उसे यूँ ही अपने बहाव में. सुनो ध्यान से कि ‘’जब भी प्रेम में पड़ो- बिना किसी हिचक के उसके साथ बह जाना. या फिर यूँ कहें कि जब तुम प्रेम में पड़ोगे तो तुम्हारी सारी हिचकिचाहट अपने आप ही दूर हो जाएगी. इसके अलावा जब तुम प्रेम करोगे तुम पहले से ही अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त तो नहीं होओगे पर बावजूद इसके मुस्कुराओगे.’

‘’कुछ भी हमें जीवन के यथार्थ के उतना करीब नहीं ले जाता, जितना सच्चा प्रेम. सच मानो, प्रेम के छोटे-छोटे दुःख भी मूल्यवान हैं.’’ इसलिए किसी की सिसकियों पर आंसुओं में डूबे चेहरे पर कभी तरस मत खाओ उसे प्रेम से देखो और उसके सुख को महसूस करो.

एक जन्म माँ बाप देते हैं, दूसरा जन्म देता है प्रेम. कि जीवन के अर्थ बदलने लगते हैं समूची सृष्टि को प्रेम और सद्भाव से भर देने की इच्छा प्रेम ही तो है. कि ‘’जबसे मैंने प्रेम के असली स्वरूप को जाना है, मेरे काम में सच्चाई बढ़ी है.’’

यह सच्चाई सिर्फ काम में नहीं जीवन में भी बढ़ी है शायद, इसे बढ़ना ही है और...और..और... बस कि प्रेम पर भरोसा रखना!

(पढ़ते हुए वॉन गॉग के खत, भाई थियो के नाम)

पुस्तक- मुझ पर भरोसा रखना
अनुवाद- राजुला शाह
प्रकाशक- सीज़नग्रे

https://www.prabhatkhabar.com/news/novelty/diary-of-a-writer-pratibha-katiyaar/1182628.html

Thursday, July 12, 2018

यह बारिश नहीं प्रेम है...


उस लड़की को भीगते देख 
मत होना नाराज उस पर 
न भागना उसकी मदद को 
न ताकीद देना उसे 
जल्दी घर पहुँचने की 
बुखार से बचने की 
कि उसने जान-बूझकर 
अपनी छतरियां गुमाई हैं 

------------

बहुत सारे कामों की लिस्ट जेहन में लिए
तेज़ क़दमों से सड़कें नापते हुए 
जिन्दगी की भागमभाग को सहेज पाने में 
सिरे से नाकाम होते हुए 
झुंझलाते हुए 
जब आप हों कहीं पहुँचने की जल्दी में  

मौसम साफ़ देख न रखा हो छाता ही साथ 
न रेनकोट ही 

कि अचानक आ जाए तेज़ बारिश 
संभलने का मौका न दे रत्ती भर 
तर-बतर कर दे सर से पाँव तक 
किसी दुकान में 
किसी बस स्टैंड में ठहरकर
बारिश से बचा लेने की 
गुंजाईश तक न मिले 

तो समझ लेना 
यह बारिश नहीं प्रेम है...

Wednesday, July 11, 2018

ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...



एक पुराना ख़्वाब था, कच्चा सा ख़्वाब कि किसी रोज किसी पहाड़ी गांव में बारिश की धुन बरसेगी रात भर, बूँदें लोरियां सुनाएंगी और मैं सारी रात बूंदों की आवाज ओढकर चैन से सोऊँगी. शायद उस चैन की नींद की तलाश में नींदे भी खूब भटक रही थीं. आपको पता हो न हो आपके ख़्वाबों को जिन्दगी के रास्तों का पता मालूम होता है शायद. जिस वक़्त मैं अपने सपनों पर खुद ही हंस रही होती थी वो सपने हकीकत में ढलने की तैयारी में थे. बारिशों के गाँव में रहती हूँ इन दिनों. सिरहाने बूंदों का राग बजता है, सुबहें धुली-धुली और खिली खिली सी हैं...ये जो बरसे हैं रात भर तेरी याद के बादल हैं, मेरे ख़्वाब के बादल हैं...ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है

जिंदगी से दोस्ती कराई थी तुमने माधवी. गोवा का वो समंदर, डूबते सूरज के पीछे भागना, समंदर की लहरों को एक साथ उठते और गिरते देखना, सब याद है. देर रात तक बेवजह हँसते जाना, सुनना कहानियां एक दूसरे से, तुम्हारा मुझे अगरबत्ती जलाना सिखाना सब खिला हुआ है। मैं हमेशा तुम्हें अपने पास महसूस करती हूँ माधवी, जोर की झप्पी और हैप्पी बर्थडे। देख न, जुलाई में कितने सारे प्यारे लोगों का जन्मदिन होता है न? एक तुम, एक मैं और बाकी बहुत सारे लोग... 

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है- प्रतिभा 

1.

यात्रा से पहले

यात्रा और आत्महत्या से पहले
जहां तक हो सके
सब साफ़ छोड़ना चाहिए
दर्ज है
यात्रा की किसी किताब में

आत्महत्या कायर करता है
यात्रा साहसी का काम है
और साफ़ है सब-कुछ
पहले ही

एक अनंत यात्रा से पहले
एक और यात्रा
एक लंबी यात्रा से पहले
एक छोटी यात्रा

मन कब का गया
श्यामदेश की यात्रा पर
देह सामान बटोर रही है।

2.

यात्रा से लौटकर
यात्रा से लौटती हूं
तो कई दिनों तक घर
अस्त-व्यस्त रहता है

एक-एक कर अटैची से
बाहर आता है सामान
वही पुरानी जगह
ले लेने के लिए
कुछ सुखद स्मृतियां
और
सघन अनुभव भी
निकलते हैं

सामान सहेजती
सोचती हूं हर बार यही
यात्राएं कैसे परिष्कृत कर देती हैं
मनुष्य को भीतर से
निर्रथक व नगण्य
लगने लगता है बहुत कुछ
दृष्टि बदल देता है
जीवन के प्रति नया कोण

एक यात्रा से लौट
मैं दूसरी यात्रा पर
निकल जाना चाहती हूं।

3.

पर घर न छूटे
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
न कोई पर्वत छूटे
न जंगल
न दरिया
न पठार
न बियाबान छूटे
न सागर
न रेत
न तलछट
न कोई दर्रा छूटे
न कंदरा
न घाटी
न आकाश
न उत्तर छूटे
न दक्षिण
न पूरब
न पश्चिम
न रंगीनी छूटे
न वीरानगी
न आनगी छूटे
न रवानगी
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
कि धरती का
कोई छोर न छूटे
पर घर न छूटे
यह संभव कहां!

4.
हर सुबह देखती हूं
हर रोज़
बेकल रात को
बुनती हूं
इक नया सपना

कुछ सपने सदाबहार हैं
तितली कोई पकड़कर
बंद करना हौले से मुट्ठी
या उड़ते जाना अविराम
मीलों ऊपर, दिशाहीन

हर सुबह देखती हूं
हथेली पर बिखरे
तितलियों के वो
रंग अनगिन
और
रंग देती हूं तुम्हें
हर सुबह देखती हूं
हथेली पर ठहरा वो
आकाश अनन्त
और
भर लेती हूं उड़ान
लिए साथ तुम्हें।

5.
स्मृतियों में पहाड़
धौलाधार की पहाड़ियों पर
बर्फ़ झरी है बरसों बाद
और कई सौ मील दूर
स्मृतियों में
पहाड़ जीवंत हो उठे हैं
कहीं भी जाओ
पीछा नहीं छोड़ते पहाड़
संग चलते हैं
जीवन भर
वही हिम
वही उजास
वही उल्लास
स्मृतियों में उदात्त पहाड़
स्मृतियों में धवल चांदनी
स्मृतियों में निरभ्र शांति
मैं संतृप्त रहने की चेष्टा में हूं
स्मृतियों का शोर जारी है।

Monday, July 9, 2018

यही तो है मौसम


जिन्दगी की तमाम आपाधापियों के बीच कोई दोस्त किसी दूर के शहर में होकर भी आपके जीवन की नमी को सहेज देता है, उम्मीद को टूटने से बचा लेता है. इन बॉक्स में कुछ इस तरह खिलती हैं उम्मीदें बिना किसी संवाद के. हमें अभी होना सीखना है कि किसी की जिन्दगी में कैसे हुआ जाता है, कैसे रहा जाता है और किस तरह जिंदगी को मानीखेज बनाया जाता है...

बादलों का नाम न हो,
अम्बर के गाँवों में 
जलता हो जँगल 
खुद अपनी छाँव में 
यही तो है मौसम 

तुम और हम 
बादलों के नग़में गुनगुनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं
मुश्किल है जीना 
उम्मीद के बिना 
थोड़े से सपने सजाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं 

रास्ता अकेला हो, 
हर तरफ़ अंधेरा हो 
रात भी हो घात की, 
दिन भी लुटेरा हो 
यही तो है मौसम 
आओ तुम और हम 
हम दर्द को बाँसुरी बनाएं 
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं...
(फिल्म थोड़ा सा रूमानी हो जायें)

https://www.youtube.com/watch?v=_C6WzQkKbys

Saturday, July 7, 2018

कितना सुख है मिलकर सीखने में


जैसा हम सोचते हैं, योजना बनाते हैं वैसा हमेशा कहाँ होता है. इसी तर्ज पर 6 जुलाई की सुबह की शुरुआत हुई. ठीक साढ़े नौ बजे प्राथमिक विद्यालय करनपुर पहुंची और पहुँचते ही एहसास हुआ कि जिस उद्देश्य से आई हूँ वह तो संभव नहीं क्योंकि आभा भटनागर मैम छुट्टी पर थीं और गीता कौशिक मैडम एक ही कक्षा में सभी क्लास के बच्चों को बिठाकर कुछ काम कर रही थीं. जिस वक़्त मैं वहां पहुंची गीता जी कुछ अभिभावकों से बात कर रही थीं. इस बीच मैंने बच्चों से बातचीत शुरू की. शुरुआत का सिरा था गर्मी की छुट्टियों वाला.
‘गर्मी की छुट्टियाँ कैसी रहीं?’ सवाल के साथ सभी बच्चे एक सुर में बंध गए.
‘बहुत अच्छी.’ बच्चों ने उत्साह से जवाब दिया.
‘छुट्टियों में क्या-क्या किया?’
‘घूमने गए, खेले, पढाई की.’
‘कहाँ-कहाँ घूमने गए?’
‘हरिद्वार, ऋषिकेश, मसूरी, नानी के घर, सहस्त्रधारा’.
‘अच्छा, घूमने गए तो क्या-क्या देखा?’
‘डोरिमान देखा पार्क में, नदी देखी, जंगल देखे, सड़क देखी, खूब मजे किये.’
‘नानी-दादी के घर क्या-क्या किया?’
‘हलवा खाया, पूड़ी खाई, मिठाई खाई.’ कुछ बच्चों ने जोड़ा ‘डांट भी खाई.’ जिसके बाद सारे बच्चे हंस दिए.
अब तक गीता मैम वापस आ गयी थीं. वो भी अब बातचीत में शामिल हो गयीं.
‘अच्छा कितने बच्चों ने छुट्टियों में खाना बनाया?’
करीब आधे बच्चों ने हाथ उठाया. जिन्होंने नहीं उठाया वो उम्र में बहुत छोटे थे. हाथ उठाने वाले बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे. रोहित ने बताया कि उसने हलवा बनाया, मीट बनाया. प्रियंका ने बताया उसने कढ़ी बनानी सीखी. और भी बच्चों ने इसमें चीजें जोड़ीं.
‘अच्छा रोहित ने हलवा बनाया. सूजी का हलवा. कितने लोगों को हलवा पसंद है?’
‘हमको’ पूरी कक्षा के हाथ उठ गये.
‘अरे वाह, अच्छा यह बताओ कि हलवा कितनी चीज़ों से बनता है?’
‘गाजर से, सूजी से, लौकी से’
‘आलू का हलवा, शकरकंद का हलवा किसने खाया है?’
किसी का हाथ नहीं उठा.
अच्छा गीता मैडम से पूछो उनको आता है क्या आलू और शकरकंद का हलवा बनाना.
बच्चों ने पूछा तो मैडम ने कहा कि ‘हाँ मुझे बनाना आता है और यह बहुत स्वादिष्ट होता है.’ बच्चों ने मैडम से आलू का हलवा बनाने की विधि पूछी जिसे मैडम ने ख़ुशी से विस्तार से बताया. विधि में ड्राई फ्रूट आने पर बच्चों ने उसके बारे में अलग से पूछा.
इसके बाद कौन सा फल, कौन सी सब्जी कहाँ होती है इसे पर फटाफट सवाल जवाब वाला खेल हुआ.
भुट्टा, सिंघाड़ा, जामुन, आम, चुकन्दर, आड़ू, बैंगन, भिन्डी, राजमा, लोबिया, आदि कहाँ पैदा होते हैं. पानी में, जड़ में या पेड़ पर. इस जल्दी-जल्दी बताना था. बच्चों में बताने का उत्साह भी खूबी था. इस जल्दबाजी में कभी कढ़ी पेड़ पर लग गयी और कभी हलवा जमीन में उग गया. इसके बाद जो मजेदार दृश्य बना वह देखने लायक था. सब पेट पकडकर हंस रहे थे. इस पूरे संवाद में गीता मैडम को बड़ा अच्छा लग रहा था. उनकी नजर उन बच्चों पर थी जो अक्सर चुप रहते हैं. वो चुप अब भी थे लेकिन उनके चेहरे बोल रहे थे. इसके बाद बातचीत का रुख थोड़ा बदला.
‘बड़े होकर कौन क्या क्या बनना चाहता है?’
प्रतिमा, दिव्यांशु, कोमल, मोहन ने डाक्टर बनने की इच्छा जताई, कुछ बच्चों ने पुलिस बनने की इच्छा जताई, कुछ ने किसान बनने की, कुछ ने कहा वो हवाई जहाज चलाएंगे.
कक्षा में काफी जोश आ चुका था. बच्चे बहुत खुश थे और अपने भविष्य के सपनों के बारे में बात कर रहे थे. कक्षा दो में पढने वाले दिव्यांशु को बार-बार बोलने का मन हो रहा था लेकिन अपनी बारी आने पर वो शरमा जा रहा था. हमने एक छोटी सी स्किट आनन-फानन में की. प्रियंक से कहा कि दिव्यांशु डाक्टर है तुम जाओ मरीज बनकर. एक बच्चा (नाम याद नहीं) प्रियंक के साथ गया.
प्रियल- डाक्टर साहब डाक्टर साहब बहुत तेज बुखार है.
शर्माते हुए अंगूठा मुंह में डालता है
प्रियल(प्रियल कक्षा 4 के हैं)- अरे डाक्टर साहब शरमाओ नहीं मेरा इलाज करो.
दिव्यांशु और शरमाने लगता है. कक्षा के बाकी बच्चों को बहुत मजा आ रहा है.
प्रियल- दवाई दे दो डाक्टर साब लेकिन सुई मत लगाना.
यह बात डाक्टर दिव्यांशु को जंच गयी. वो प्रियंक को सुई लगाने का अभिनय करने लगा. प्रियंक भागा, दिव्यांशु पीछे-पीछे भागा. गीता मैडम समेत सभी बच्चों की हंसी रुक ही नहीं रही थी.
एक छोटा सा ब्रेक बच्चों को देना चाहा कि बातचीत करते हुए काफी देर हो चुकी थी लेकिन बच्चों को कोई ब्रेक नहीं चाहिए था.
अब बात शुरू की सपनों की. कौन-कौन सपने देखता है, तुम्हारा क्या सपना है? बड़े होकर पुलिस या डाक्टर बनने वाले सपने में और सोते हुए जंगल में खो जाने वाले सपने में क्या फर्क होता है. सारे बच्चे अपने सपनों के बारे में बताने को बेचैन हो उठे जिसे घर से लिखकर लाने और मैडम को देने की बात तय हुई. सब बच्चे अपने सपनों के बारे में लिखेंगे यह तय हुआ. इसके बाद उनके सामने एक नया सवाल आया.
‘यह जो तुम्हारे सपने हैं, ये तुम्हें किसने बताये?’
‘यह तो हमने खुद सोचा.’ बच्चों ने कहा.
‘ओह. यह सोचना क्या होता है? यह कैसे होता है?’
सोचना मतलब कुछ सोचना. नन्हे आदि ने कहा. मतलब अपने आप से कुछ सोचना, कुछ ऐसा जो किसी ने हमें बताया न हो, कुछ ऐसा जो हमको करने का मन हो. नन्ही कोमल ने कहा, जैसे सोचना कि शाम को खाने में क्या मिलेगा. अब बात बढ़ने लगी थी. सोचना कि स्कूल से जाकर क्या-क्या करेंगे, बड़े होकर क्या बनेंगे. अब सोचने पर खूब बात होने लगी.
‘अब सोचते-सोचते थक गए न हम, चलो कुछ और करें.’ जैसे ही मैंने यह कहा, बच्चे खुश हो गए. बाल लेखन कैम्प के दौरान धोरण स्कूल की शिक्षिका अंजलि गुप्ता ने एक बार एक कविता कराई थी वो मुझे बहुत पसंद आई थी. यह कविता कक्षा 2 की गणित की (एनसीईआरटी) पुस्तक में है भी. मैंने सोचा था आज यही कविता बच्चों के साथ करते हुए इस पर बात करेंगे. इत्तिफाक था कि आज ही सुबह गीता मैम ने यह कविता बच्चों को सिखाई थी. अब बारी बच्चों की थी मुझसे कविता करवाने की. बच्चे कविता बोल रहे थे और मुझे एक्शन करने थे.
धीरे-धीरे मेरे साथ एक्शन में और बच्चे भी शामिल होते गए. कविता कुछ इस तरह थी
एक बुढिया ने बोया दाना
गाजर का था पौध लगाना
गाजर हाथोंहाथ बढ़ी
खूब बढ़ी भई खूब बढ़ी...
कविता लम्बी है और भाषाई सौन्दर्य के साथ गणित की अवधारणाओं से भी जुडती है. लेकिन अभी हम सिर्फ कविता का आनंद ले रहे थे. गाजर को खेत से उखाड़ने में एक-एक कर लोगों का जुटते जाना कविता का आकर्षण था और अंत में गाजर का उखड़ना, उसको धोना और हलवा बनाना बच्चों को आनंदित कर रहा था. वैसे भी आज हलवे की बात काफी हो भी चुकी थी. कविता खत्म हुई.
‘किसको-किसको स्वाद आया हलवे का?’
खूब हाथ उठे.
‘किसको किसको स्वाद आया?’ इस पर थोड़े कम लेकिन कुछ उठे. जो हाथ उठे उन्होंने कहा, ‘मैडम जी खूब मीठा है हलवा.’
अपनी कल्पना के संसार में कैसे हम कुछ भी पा सकते हैं, कुछ भी महसूस कर सकते हैं यही बात अब उनके सामने थी. इस पर बात करते हुए बच्चों से कहा चलो कल्पना का एक खेल खेलते हैं. सब लोग अपनी आँखें बंद करते हैं. एकदम चुपचाप. सोचो कि हम गाजर के खेत में हैं. बच्चे बोले ‘हाँ, मैडम जी हरे-हरे खेत में. चारों ओर हरा ही हरा.’ नन्ही मुस्कान आधी आँख खोलकर दूसरों को देखने की कोशिश कर रही थी. बाकी बच्चे खेत में थे. ‘हवा चल रही है. धीरे-धीरे.’ मैंने कहा. बच्चों ने जोड़ा. ‘गाजर की पत्तियां हिल रही हैं.’ अभिनव ने हाथ को लहराकर पत्तियों के हिलने का संकेत दिया.
‘हवा अब तेज़ चलने लगी है,’ मैंने कहा. बच्चों ने आगे जोड़ा, ‘अब गाजर की पत्तियां जोर-जोर से हिल रही हैं...ठंडी हवा है मैडम जी.’
‘चिड़िया उड़ रही हैं मैडम जी.’ गीता मैडम यह सब देखते हुए मुस्कुरा रही थीं.
‘चलो अब आँखें खोलते हैं.’ गाजर का खेत कैसा था?
‘बहुत मजा आया मैडम जी. अगली बार हलवाई की दुकान में ले जाना वहां गाजर का हलवा भी मिल जाएगा.’ वैभव ने मुस्कुरा कर कहा.
‘कविता कैसी लगी?’
‘बहुत अच्छी’
‘खेत की सैर कैसी थी?’
‘बहुत मजेदार.’
‘अच्छा बताओ कविता या कहानी कैसे बनती होगी?’ मेरे मन में इस बातचीत का अंत बच्चों के द्वारा बनाई एक कविता से ही कराने की योजना थी.
बच्चों ने सोचना शुरू किया. गीता मैडम ने जोड़ा कि वो कविता कहानी बनवाती हैं बच्चों से. कुछ शब्द देकर उनसे कविता या कहानी बनाने को कहती हैं. कुछ बच्चे बहुत अच्छी कवितायेँ कहानियां बनाते हैं. लेकिन सब नहीं बना पाते. मैं उनकी बात को ध्यान से सुनते हुए बच्चों से बातचीत भी करती जा रही थी. बच्चों ने जवाब देना शुरू किया.
‘कविता या कहानी शब्द से बनती है’
‘वाक्य से बनती है.’
‘कलम से बनती है’
‘किसी बात से बनती है’
‘मैडम जो शब्द देती हैं उससे बनती है’
‘और अगर मैडम कोई शब्द न दें तो?’
‘तो कैसे बनेगी कविता, नहीं बनेगी’ बच्चों ने कहा.
एक बच्चे ने कहा, ‘बनेगी तब भी क्योंकि तब हम सोचकर बनायेंगे.’ यही मेरा केंद्र बिंदु था कि कहानी या कविता सोचने से बनती है.
मैंने कहा आज हम सब मिलकर अपनी खुद की कविता बनायेंगे. बच्चों ने कहा कविता नहीं, कहानी. कविता तो आज हो गयी. घडी की सुई का इशारा था कि वक़्त ज्यादा नहीं है. 30 बच्चों के साथ कहानी बनने में वक़्त लगेगा लेकिन आखिर मुझे बच्चों की इच्छा के अनुरूप कहानी की ओर ही मुड़ना पड़ा.
यह कहानी सबकी कहानी होगी. इस कहानी में वो होगा जो हम चाहेंगे. वैसे होगा जैसे हम चाहेंगे. बच्चे यह सुनकर काफी खुश हुए. उनके चेहरों की चमक लगातार बढती जा रही थी. अब बारी थी सबको अपने अपने किरदारों के बारे में सोचना की. किसकी कहानी में कौन होगा, एक किरदार के बारे में सोचना था. राजा रानी, हाथी, शेर, मोर, जंगल, खरगोश, किसान, राजकुमारी, चुड़ैल, डायनासोर, कौआ और बहुत सारे किरदार उस क्लास में अब दाखिल हो चुके थे. अब मौसम आने लगे थे, कहीं हवा चलने लगी, तो कहीं बारिश होने लगी. बच्चों की कल्पना के घोड़े भागते ही जा रहे थे. घडी बता रही थी कि छुट्टी होने का वक़्त करीब है और कहानी अभी शुरू भी नहीं हुई बनना.
आखिर मोहित ने कहानी शुरू की. जिसे एक-एक करके बच्चे बढ़ाते गए और कहानी में अपने किरदारों को, अपनी कल्पनाओं को जोड़ते गए. आइये कहानी की ओर चलते हैं... 

'एक राजा और रानी थे, जो अपने बड़े से महल में आराम से रहते थे. उनकी एक छोटी सी प्यारी सी बेटी थी. एक दिन राजा रानी महल में झूले में बैठे थे, खूब ठंडी हवा चल रही थी. वहीँ पास में उनकी बेटी यानि राजकुमारी खिलौनों से खेल रही थी. पास में एक प्यारा सा मोर नाच रहा था और राजकुमारी उसे देखकर खुश हो रही थी. तभी वहां एक शेर आ गया. राजकुमारी शेर को देखकर और भी खुश हो गयी. उसने शेर से दोस्ती कर ली. लेकिन जैसे ही वहां से खरगोश गुजरा राजकुमारी खरगोश के पीछे भागने लगी. मोर और शेर राजकुमारी को खेलते देखकर खुश हो रहे थे. तभी महल में एक किसान आया. किसान बहुत थका हुआ था, वो एक बड़ा सा जंगल पार करके राजा से मिलने आया था. राजा ने किसान से कहा तुम अभी आराम करो अभी हम राजकुमारी के लिए खिलौने लेने मॉल जा रहे हैं. राजकुमारी बहुत दिन से नए खिलौने मांग रही है, लौटकर आकर मैं तुम्हारी बात सुनूंगा. इधर राजा राजकुमारी के लिए खिलौने लेने गया, तभी वहां महल में एक चुड़ैल आ गयी और वो राजकुमारी को अपने साथ लेकर चली गयी. लेकिन यह अच्छी चुड़ैल थी. उस चुड़ैल के कोई दोस्त नही थे इसलिए वो राजकुमारी को अपना दोस्त बनाना चाहती थी, इसलिए उसे अपने घर ले आई थी. चुड़ैल ने राजकुमारी को खिलौने दिए, नयी ड्रेस दी और उसे मैगी बनाकर खिलाई. चुड़ैल ने उसे खोये की बर्फी भी खिलाई. उधर राजा रानी जब महल में लौटे और राजकुमारी को नहीं देखा तो बहुत रोये. तब किसान ने कहा, महाराज, आप रोयें नहीं मैं राजकुमारी को ढूंढकर लाऊँगा. किसान राजकुमारी को ढूँढने निकला तो एक कौआ किसान के साथ हो लिया. उसने देखा था चुड़ैल को राजकुमारी को ले जाते हुए. कौए की मदद से किसान चुड़ैल के घर पहुँच गया. उसने देखा राजकुमारी तो चुड़ैल के पास खूब खुश है. किसान ने चुड़ैल से कहा, राजकुमारी के मम्मी पापा बहुत रो रहे हैं, हमें राजकुमारी को वापस महल ले जाना चाहिए. चुड़ैल ने कहा कि ठीक है, लेकिन मैं भी राजकुमारी के साथ चलूंगी. ये मेरी बेस्ट फ्रेंड है. किसान मान गया. एक झाडू पर सबसे आगे चुड़ैल बैठी फिर राजकुमारी और सबसे पीछे किसान. झाड़ू उड़ते हुए महल में पहुंची. राजा रानी राजकुमारी को देखकर बहुत खुश हुए. शेर, मोर, हाथी, खरगोश भी बहुत खुश हुए. राजा ने चुडैल को थैंक यू कहा और उसे महल में ही रहने को कहा. और किसान को बहुत सारा ईनाम दिया.'

कहानी पूरी हो चुकी थी, इसके बनने में सारे बच्चे शामिल थे, वो बच्चे भी जो शर्मीले थे, चुप रहते थे. उन्हें साथ लेकर, उनकी कल्पना को बाहर निकालने में उनकी थोड़ी मदद की और वो कान में आकर बता गये कहानी की बढ़त को. इस कहानी की हर लाइन में बच्चे के मन की दुनिया छुपी नज़र आ रही थी मुझे, चाहे वो खिलौने हों, खोये की बर्फी या मैगी या झाड़ू पर बैठकर उड़ने का सुख. सबने अपनी कहानी पर अपने लिए तालियाँ बजाईं. छुट्टी का वक़्त हो गया था लेकिन बच्चे क्लास से जाने को तैयार नहीं थे. वो कहानी के बारे में बात करना चाहते थे. सबको उस कहानी में अपना हिस्सा अपना किरदार सबसे अच्छा लग रहा था. प्रमोद ने पीठ पर बस्ता चढाते हुए कहा, ‘देखा मेरे किसान ने बचा लिया न राजकुमारी को.’ तभी मुस्कान ने शरमाते हुए कहा, ‘और मेरी चुड़ैल कितनी अच्छी थी’. दिव्यांशु ने कहा, ‘और मेरा मोर भी तो सुंदर था.’ तभी आदि ने कहा ‘मेरा डायनासोर तो आया ही नहीं...’ अरे हाँ, डायनासोर तो रह ही गया, हम सबने सोचा. चक्कर में पड गए कि इस कहानी में डायनासोर कहाँ और कैसे फिट होगा. तभी कोमल ने कहा, ’राजा और रानी डायनासोर वाला खिलौना लेने ही तो मॉल गये थे.’ और इस तरह कोमल ने समस्या सुलझा दी.

कहानी बन चुकी थी, छुट्टी हो चुकी थी, लेकिन कहानी बच्चों के साथ ही घर जा रही थी. गीता मैम खुश थीं कि कई बच्चों ने पहली बार कहानी बनने में अपनी भूमिका निभाई.

मैंने बच्चों से विदा ली तो उन्होंने जल्दी फिर से आने का वादा करने को कहा. ‘पक्का प्रॉमिस मैम, जल्दी आओगी न’ मुस्कान ने कहा. मैंने कहा ‘हाँ’. मेरी वापसी के कदमों में सुख था कि कितना कुछ सीख सकी हूँ आज.