Wednesday, July 1, 2015

जब बारिशें आएं तो...



जब बारिशें आएं तो रेनकोट और छतरियों को पर धकेल देना, तमाम नसीहतों को दीवार की खूँटी पे टांग देना, निकल पड़ना बारिश के संग बरसे फूलों से भरी सड़क की ओर. घने बनास के जंगल टोकरियों में भरे भरे बादल लिए खड़े मिलेंगे, उन बादलों की नाक पर ऊँगली रखकर पूछना ज़रूर कि , 'आप कैसे हैं जनाब?' उनके जवाब के इंतज़ार में ठिठकना मत कि कुछ सवाल जवाब के लिए होते भी नहीं, शरारत भर होते हैं बस. कोई नदी मिलेगी राह में उफनाती, गले लगाने को बेताब, उतार लेना उस नदी को अपने भीतर, उसके भीतर उतरने की तुम्हें न चाह होगी न ज़रुरत। 

कोई आवाज़ मिलेगी भीगी सी, प्यार में डूबी, और कहना कुछ भी बेकार है जानां कि तब रुकने से रोक न सकोगे तुम खुद को. और अपनी इस भूल के बदले जीवन भर आसमान से बरसती बूँदें तुम्हें जलाएंगी। ये ही तुम्हारे इश्क़ का ईनाम होगा। 

हर बूँद के सीने में आंच होती है और हर लौ के सीने में नमी....

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (03-07-2015) के चर्चा मंच पर भी होगी!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-07-2015) को "जब बारिश आए तो..." (चर्चा अंक- 2025) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

सु-मन (Suman Kapoor) said...

वाह ..खूबसूरत

मन के - मनके said...

भीगी-भीगी सी--बात---भीगेगें जरूर--गर बारिश आए तो?