Wednesday, February 11, 2015

वादा कोई, कहीं नहीं था सचमुच ...


तुम्हारी खामोशियों में ज़ब्त
तमाम वादों की शिकन
दर्ज है तुम्हारे माथे पे सदियों से

दर्ज है लकीरों से खाली पड़ी हथेलियों पे
तुम्हारे अनकिये वादों की
गुमसुम जुम्बिश

तुम्हारे दूर जाते क़दमों की आहटों में
दर्ज है थकन
लौट के न आने की

हर रोज शाम के साथ उतरती है
एक उधड़े हुए वादे की याद
चाय की प्याली में
घुल जाती है, चुपचाप

सप्तपदी के वचनों से मुक्त रात
अपने दोनों घुटनों में सर डाले
समेटती है वादियों में गूंजती
तमाम उदासियाँ

तुम्हारी खामोशियों से
जिंदगी में भर उठा है सन्नाटे का शोर

वादा कोई, कहीं नहीं था सचमुच
बस एक बोझ था, तन्हाई का

टूट्ने के लिए
वादा किया जाना ज़रूरी नहीं...

(सुना है आज प्रॉमिस डे है )



सुनो अरविन्द!



इस जीत के जश्न से कान हटाओ जरा और सुनो कि ये जीत क्या कह रही है? यह जीत किसकी जीत है. और ये हार किसकी है आखिर? अरविन्द केजरीवाल या आम आदमी की जीत और मोदी या भाजपा की हार के रूप में इसे देखना इस जनादेश को बहुत कम करके आंकना होगा। ये जीत अब तक लोगों को वर्गों में, जातियों में, धर्म की संवेदना में बांटकर, उकसाकर, उन्हें मौजूं मुददों से भटकाकर वोटो से अपनी झोली भरने वाली सारी राजनैतिंक पार्टियों के खिलाफ है. ये जीत नेताओं की जोड़-तोड़  की राजनीति और अपनी असफलता को कभी दूसरी पार्टियों के सहयोग न मिलने, कभी जनता पर पूर्ण बहुमत न होने के आरोपों का मुहतोड़ जवाब है.

जाति-धरम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों की आड़ में अब कोई पार्टी खुद को ढँक नहीं पाएगी. इस मतदान के सुर को सभी राजनैतिक पार्टियों को ठीक से सुनने की ज़रुरत है. सबसे ज्यादा आम आदमी पार्टी को. वाम को भी समझना होगा कि सिर्फ विचारधाराओं की खेती करने से बात नहीं बनेगी.  यूँ भी आम की बात ही तो वाम है.... तो अगर पार्टी के टैग पर न जाएँ समाज के अंतिम आदमी का हाथ पकड़कर चलने के विचार पर जाएँ तो वाम की  खुशबू आती मिलेगी।

लेकिन ध्यान रखना होगा कि जो जनता इतने बड़े आवेग से आपके साथ खड़ी है,  वो कल आपके खिलाफ भी जा सकती है. यह व्यक्ति के मोह और पार्टी के प्रति बरसों की वफादारी वाला जनादेश नहीं है. यह जनादेश एक सन्देश है कि लो कितना बहुमत चाहिए, अब काम करके दिखाओ. दिल्ली के वोटर ने पूरे देश के वोटर को भी सन्देश दिया है कि  मुद्दों पर वोट दो, मुद्दे जो जिंदगी की राह आसान करें न की हमें आपस में बांटें और नेताओं की झोलिया पहले वोट से फिर नोट से भरे. 

जनतंत्र की बुनियाद यही है. असल जनतंत्र की ताक़त दिल्ली ने पहचानी है. ज़ाहिर है, ये जीत सारे वर्ग, समूहों, धर्मों, जातियों के लोगो ने मिलकर रची है. अरविन्द ने हारकर भी भारतीय राजनीति में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत कर ही दी थी. किस तरह एक नेता भी आम आदमी ही होता है , उससे भी गलतियां हो सकती हैं और जिन्हे स्वीकार करने में कोई अहंकार आड़े नहीं आता. आरोप-प्रत्यारोप, इसकी टोपी उसके सर वाली राजनीति से इतर आत्मवलोकन, स्व-सुधार की ओर बढ़ने की राजनीति जनता की पसंद बनी. बिजली, पानी, महंगाई, सफाई, रोजगार जैसे मुद्दे तमाम महंगे चुनावी प्रचार और हमला बोल राजनीति से आगे निकल गये. 

इस जनादेश में छुपी जनता की आवाज को सुनना होगा कि वो क्या चाहती है. आम आदमी पार्टी शायद इसे सुन पा रही है इसीलिए अरविन्द कहते हैं कि उन्हें डर भी लग रहा है. ये डर ही उन्हें सही रस्ते पे बनाये रखेगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए. क्योंकि जनता जब जाग जाती है तो वो अपने मतदान से आपको मौका देती है लेकिन याद रहे वो ये मौका इसी आक्रामकता के साथ छीन भी सकती है.

मोदी को भी जनता ने यही सोचकर चुना कि  खाली बोलो नहीं, ज़रा काम करो. बहुमत चाहिए? लो हमसे लो और अब चुपचाप काम करो. काम नहीं तो वोट नही. केंद्र और दिल्ली की सरकारों को बहुमत ही  नहीं जनता की चेतावनी भी मिली है, जो इसे नहीं समझेगा उसे इसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना होगा। ये जनता से सबक लेने वाली राजनीति का दौर है… 

जीत अपने साथ जिम्मेदारी लेकर आती है.… जश्न पार्टी कार्यकर्ताओं का हक़ है लेकिन पार्टी के नेताओं के लिए यह जश्न का नहीं अपने कंधे चौड़े करने और जनता के द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को ठीक से निभा पाने की ओर कदम बढ़ने का वक़्त है.... 

ये भावुक वोटर का प्यार नहीं है अरविन्द ये एक जागरूक वोटर की जिम्मेदारी है तुम्हारे कन्धों पर....

Tuesday, January 27, 2015

जीवन कहीं खारिज न कर दे...


तकरीबन महीने भर बाद स्कूल खुले हैं। सरकारी स्कूल। शिक्षकों के लटके हुए चेहरे, टालमटोल, नये सिरे से बहानों की खोजबीन, छुट्टियां और बढ़ जाने के चमत्कारी संदेश का इंतजार कितना कुछ बयान करता है। एक तरफ बेहतर शिक्षा को लेकर तमाम पड़ताल, कवायद, प्रशिक्षण आदि की बात हो रही है, चिंताएं सामने आ रही हैं, दूसरी ओर शिक्षकों का अपने काम को लेकर यह रवैया।

क्यों इन शिक्षकों के भीतर उत्साह नहीं स्कूलों के खुलने का? क्यों मन में आतुरता नहीं अपने बच्चों से मिलने की, उनके सर पर हाथ फिराने की, उनके घर-परिवार के बारे में जानने की? क्यों उकताहट नहीं इत्ती लंबी छुट्टियों से? क्यों मन में उत्साह  नहीं अपने काम से वापस जुड़ पाने का। ये सवाल मुझे बहुत बेचैन करते हैं। शायद मेरे हिस्से भी ऐसे ही उकताये हुए शिक्षक आये होंगे इसीलिए बहुत छोटी उम्र में जब कुछ भी समझ नहीं बनी थी ये तय कर लिया था मन में चुपचाप कि शिक्षक नहीं बनूंगी. हालांकि आगे चलकर जब 'मास कम्युनिकेशन' के छात्रों के साथ पढ़ाने के बहाने रू-ब-रू होने का मौका मिला तो मेरी बचपन की वो राय एकदम बदल गई।

पिछले कुछ बरसों से सरकारी स्कूलों से जुड़ने का, उन्हें देखने, समझने, महसूस करने का मौका मिल रहा है। ऐसा लगता है सामने नन्ही-नन्ही कोरी हथेलियां हैं, ढेर सारी चमक लिए हुए आंखें...उन हथेलियों में लकीरें खींचनी हैं, उन आंखों में सपने बोने हैं...जिस प्यार से बच्चे अपने शिक्षक को देखते हैं, जिस तरह उन पर भरोसा करते हैं वो असाधारण होता है। जीवन को सार्थकता मिलने के अवसर सामने होते हैं...जिंदगी भर को किसी के दिल में बस जाने के अवसर...सीखना सिखाना तो बाद की बात है पहली शुरुआत तो रिश्ता बनने से होती है। उत्तराखंड में कुछ ऐसे शिक्षकों से मिली हूं जिन्होंने अपने बच्चों से बढ़कर अपने स्कूल के बच्चों को प्यार दिया। अपने काम से उन्हें प्यार है...स्कूल आने-जाने के वक्त का हिसाब किताब सब औंधे मुंह पड़े होते हैं...शिक्षक मस्त मगन बच्चों के साथ खेल रहे होते हैं...सीख रहे होते हैं, सिखा रहे होते हैं। छुट्टी होने पर भी न बच्चे घर जाना चाहते हैं न शिक्षक। अपने वेतन का कुछ हिस्सा बच्चों के ऊपर खर्च करना उन्हें खाने की थाली से पहला कौर भोग के तौर पर चढ़ाने जैसा लगता है। किसी को लगता है कि हमारे काम के एवज में बच्चों की मुस्कुराहटें, उनके माता पिता का हम पर हुआ विश्वास सब कुछ दे देता है सरकारी वेतन तो हमें बोनस में मिलता है। उन्हें न किसी तरह की ड्यूटी लगने से शिकायत है, न काम की अधिकता से बस एक ही चिंता कि हमारे बच्चे कैसे प्राइवेट स्कूलों से भी अच्छी शिक्षा पा लें। रोज पढ़ाने के नये ढंग ढूंढना, उनके मिड डे मील को और स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाने की चिंता।

दूसरी तरफ स्कूल जाने के नाम पर बहाने बनाने वाले शिक्षक। महंगी गाडि़यों से स्कूलों में जाकर, उतरकर, हाजिरी की औपचारिकता, कम स्कूल जाना पड़े इसकी सेटिंग, सिफारिश, बच्चों से की दूरी बनाकर रखना, उनके प्रति स्वभाव में हिकारत, स्कूल के मिड-डे मील से पैसा बचा पाने की जुगत, काम की अधिकता, ड्यूटी लग जाने की चिडचिड़ाहट....मामला साफ है। जिन्हें अपने काम से प्यार नहीं...उनमें ही उकताहट होगी। जिन्हें काम से प्यार होगा वो अभावों में भी खुश रहेंगे।

दुनिया में शिक्षक होने से बड़ा वरदान कोई नहीं। दुनिया-जहां की समस्याएं बच्चों की निश्छल मुस्कुराहटें दूर कर देती हैं। तमाम योग, साधनाएं सब व्यर्थ हैं बस कि आप किसी मासूम को दिल से गले लगाइये, उसकी आंखों में आपके लिए जो प्यार जागेगा, जो भरोसा जागेगा उसमें जीवन की सार्थकता होगी...लेकिन ऐसा होगा तब जब हम उस सार्थकता के योग्य होंगे। हमारी अयोग्यता के चलते ही जीवन हमें खारिज कर देता है....हम सिर्फ सांसों में बचते हैं, जीवन में नहीं। नौकरी एक बोझ, काम सरदर्द बनने लगता है और नतीजा सब गड़बड़।

बस एक बात जे़हन में आती है कि ये सारे उकताये हुए, शिकायतों से भरे शिक्षक क्या एक बार नहीं सोचते कि जब उनके पास यह नौकरी नहीं थी तो वे कितने बेसब्र थे इसे पाने के लिए। मैं यह नहीं कहती कि शिक्षकों की समस्याओं पर बात नहीं होनी चाहिए, यह भी नहीं कि उन्हें किसी देवता की तरह देखा जाए। मैं तो सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर शिक्षकों के जीवन के आसपास मंडराते सुख और सार्थकता के उस भाव की बात करना चाहती हूं, जिसे अक्सर वे उपेक्षित कर रहे होते हैं।

Friday, January 23, 2015

हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही



तुमको हम दिल में बसा लेंगे, तुम आओ तो सही
सारी दुनिया से छुपा लेंगे, तुम आओ तो सही

एक वादा करो अब हमसे ना बिछड़ोगे कभी
नाज़ हम सारे उठा लेंगे, तुम आओ तो सही

बेवफा भी हो, सितमगर भी, जफापेशा भी
हम ख़ुदा तुमको बना लेंगे, तुम आओ तो सही

राह तारीक है और दूर है मंजि़ल लेकिन
दर्द की शम्में जला लेंगे, तुम आओ तो सही...

- मुमताज़ मिर्जा

Thursday, January 22, 2015

घर उगने का इंतजार



रोज सुबह
उगता है एक घर
सूरज के साथ,
कभी टहनियों पर
जा टिकता है,
कभी रास्तों पर साथ चलता है
कभी किसी मोड़ पर
छूट ही जाता है बस.

कभी किसी आंख में
बस जाता है
तो कभी किसी आवाज में ही
बना लेता है ठिकाना
कभी तो श्मशान के
किनारे धूनी सी रमा लेता है
घर, जहां मिलता है
वजूद को विस्तार ,
जहां हर सपने को
मिलता है निखार
जहां दु:ख की वीणा को
सुख के राग से
झंकृत किया जाता है
जहां पहुंचकर
जिस्म को अलगनी पर
टांगकर
रूह को कैसे भी विचरने को
आजाद छोड़ दिया जाता है,
ईंट, पत्थरों से घिरी दीवारों में
लौटकर रोज
आवाजों के वीतराग
में डुबो देती हूं खामोशियां
और अगली सुबह
सूरज के साथ
घर के उगने का
इंत$जार होता है.