Monday, December 10, 2012

डल झील- जैसे महबूब को जी भर के देखना


9 नवंबर

सूरज की हथेली पर मानो किसी ने बर्फ का ढेला रख दिया हो. ठंडी सी गर्माहट थी उसके आने में. हमारे यहां आने के मकसद को बस अंतिम अंजाम मिलना बाकी था. काम बेहतर हो जाए तो उस संतुष्टि के साथ महसूस करने की क्षमता बढ़ जाती है. नौ नवम्बर का दिन दस तारीख के कार्यक्रम की तैयारियों को अंजाम देने के लिए था. सारा दिन कालेज, यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाने के बाद...हजरत बल और फिर...डल झील.

इतने दिन से हम डल झील के करीब थे लेकिन आज यहां जाना हुआ. सच ही है जो करीब होता है अक्सर उसी के पास हम सबसे देर में जा पाते हैं.

पानी से मुझे कितनी मोहब्बत है यह माधवी जानती है. नदी, पोखर, समंदर, झील देखते ही पहला ख्याल आता है कूद जाऊं? तैरना जानबूझकर नहीं सीखा। हाँ, पार जाना ज़रूर सीखा है. मेरे दोस्तों को अब पता है मेरा पागलपन सो पहले से हजार नसीहतें हाथ थामे थीं. कुछ पूरे समय हाथ थामे बैठी भी रहीं, कुछ फोन पे टिमटिमाती रहीं।मैंने झील के ठीक मध्य में कहवा पीने के बाद खुद को खुद से विलग किया. नजर की आखिरी हद तक पानी ही पानी और चारों ओर खूबसूरत पहाडि़यां. रास्ता रोकती पहाडि़यां नहीं, रास्ता देती हुई. हमारा नाविक हमें बता रहा था कि कहां किस फिल्म की शूटिंग हुई, कहां की क्या खासियत है. समूची डल किसी दुल्हन सी सजी थी. झील के बीच में कोई नाव आपकी नाव के करीब आ लगेगी और आपको शापिंग कराने ले जायेगी. चाय भी पिला देगी. ये पानी में तैरता एक शहर है. बाजार पानी में. खेत पानी में. जिंदगी में, पानी में. पांव रखने को जमीन तलाशने पर नाव ही मिलेगी...अरे हां, वही शिकारा...हाउसबोट कुछ भी कह लो यार. शापिंग में मेरी दिलचस्पी कभी रही ही नहीं लेकिन सामान बेचने वालों को गौर से देखती हूं. हमारा नाविक डल झील की खासियत बता रहा था...दूर कहीं सूरज झील के भीतर उतरने को बेताब था.

 ऐसी खूबसूरतें शामें जिंदगी में कम ही आती हैं. ये लम्हे चुपके से स्मतियों में दर्ज होते जा रहे थे. कैमरे की क्लिक में समेटते हुए झील के पानी को छूने का जी चाहा...'इसकी गहराई कितनी होगी?' अनायास पूछ बैठी थी. 'तुम्हारे मन से कम...' किसी ने हंस के कहा...तो फिर डूबने से क्या फायदा...डूबना कैंसिल...हम सब हंस दिये.
दो-ढाई घंटे का वो सफर कहने को बीत चुका था लेकिन सच तो यह है कि बीतता कुछ भी नहीं.
लैया चना खाते हुए झील को आंख भर देखना जैसे महबूब को जी भर के देखना...

Tuesday, December 4, 2012

खामोशी की संगत पर कुदरत का राग


8 नवंबर

अनंतनाग के रास्ते केसर के खेतों से होकर गुजरते थे. जिस समय केसर फूलती होगी यहां नीले रंग की फूलों की कैसी कतारें सजती होंगी हम बस सोच ही पा रहे थे. क्यारियों की तरह कटे हुए केसर के खेत. तो यहीं से उठती है वो खुशबू जो सारी दुनिया का चक्कर लगाते हुए राजस्थान के 'केसरिया बालम' पर जाकर ठहरती है. अखरोट, सेब के बागान और केसर के खेत देखते हुए डेढ़ घंटे का रास्ता मानो मिनटों में कट गया. आज के लिए विशेष संगीत चुना गया था. बीती रात हीर सुनते हुए हमारी आंखें भीगी थीं आज के लिए हमने अपने मन की उदासियों को हीर के बहाने रेशमा आपा की आवाज को सौंप दिया था. हालांकि अनंतनाग के रास्ते में नुसरत साब की आवाज के साये में बैठे रहे...रास्तों से खेलते रहे. कशमीर यूनिवर्सिटी का एक कैम्पस ये भी है...सुंदर, विशाल.
आनन-फानन हमारी ढेर सारे लोगों से मुलाकात हुई. बात हुई. काम के अच्छे ढंग से निपट जाने के उत्साह लबरेज हम वापस लौटे तो रास्ते और भी खिले-खिले से लगे. एक जगह ठहरे। पूरे अनंतनाग को एक दृश्य के रूप में आखों में समेटा और रुख किया पहलगाम की ओर.
पता नहीं पहलगाम को टूरिज्म के नक़्शे में किन चीजों के लिए दर्ज किया गया है लेकिन मुझे इन रास्तों पर चलते हुए जो महसूस हुआ उसे कह पाना, लिख पाना नितांत असंभव है. मेरी यात्राओं में कभी धार्मिक वजह शामिल नहीं होती वरना लोग यही कहते कि वो पहलगाम जहाँ से शिव जी ने पार्वती जी के साथ एकांतवास को अमरनाथ की गुफाओं में प्रस्थान करने से पहले अपने प्रिय नंदी का त्याग किया वहां जाना सुखद तो लगना ही था. मैंने किसी मंदिर का विचरण नहीं किया. अगर धर्म इतनी बड़ी वजह है शांति की तो सचमुच समूची कुदरत से बड़ा मंदिर कोई नहीं. रास्ते हमारी आत्मा की अशांति को खुरचते रहे. रास्ते भर झेलम कंधे सहलाती रही...सारे रास्ते हम अपने भीतर डूबते रहे, उतराते रहे...क्या ऐसे ही वक्त में सुनने के लिए रेशमा आपा ने अपनी आवाज में गाया होगा मेरे हमजोलियां कुछ यहां, कुछ वहां....
तां उम्र काबिज रहेंगी इस सफर की स्मतियां. वक्त कम ही सही लेकिन जिंदगी को मांजने को काफी था...झेलम तीरे घंटों बैठने का ख्वाब अब ख्वाब नहीं था....दूर तक पसरा गहन सन्नाटा, खामोश चिनार, बिना आवाज किये बहती जाती झेलम...हाथ बढाओ तो गले लगाने को आतुर. जाने क्या था यहां के जर्रे-जर्रे में कि कब से बंधी पड़ी मन की गिरहें अचानक खुलने को व्याकुल...मानो सब झेलम में बह जाना चाहती हों...चिनारों के साये से लिपट जाना चाहती हों. सचमुच यात्राओं से बड़ा कोई सुख नहीं, प्रकति से बड़ा कोई गुरू नहीं और संगीत से बडा कोई मरहम नहीं.
चिनारों के जंगलों पर चढते हुए सांस फूलने को हो आई. कायदा तो यही था कि मुझे भी रनदीप के साथ झेलम के किनारों पर निकल जाना चाहिए लेकिन मैंने जुबेर और प्रदीप जी का हाथ थामा और चढ़ाई पर पांव रख दिया. पहंुची तो लगा कि अच्छा किया. जैसे एक के बाद एक जादुई करिशमे छुपे हों यहां. पलक झपकते ही सीन चेंज और आप अवाक...ये तो पहले वाले से भी सुंदर...न...न...कोई कम्पैरिजन नहीं. सामने खड़ा हिमालय...बर्फ से ढंका हुआ. इतना करीब....दूर तक फैला बर्फ का मैदान और चमकते पहाड़. मंत्रमुग्ध करता दृश्य. खामोशी की संगत पर कुदरत का यह राग दिल के हर कोने में पसर गया था. हमें अपनी सुध ही नहीं थी. इतनी भी नहीं कि इन लम्हों को कैमरे में कैद भी करना है. इस सुंदर राग में खुद को पैबस्त करके तस्वीरें खिंचवाना या खींचना जैसे राग को तोड़ना हो...बस कि आंखों में भर लें सारे दश्य. आज वो सारे बोर्ड याद आये जो मंदिरों में लगे होते हैं कि तस्वीरें खींचना मना है. दरअसल, जब आप किसी दृश्य में विलीन होते हैं तो तस्वीर खींचने का ख्याल ही कहां होता है. यह विलीन होना ही तो महत्वपूर्ण है. फिर भी चलते-चलते कुछ तस्वीरें जुबेर ने खींची जरूर. हालांकि तस्वीर में उस खूबसूरत मंजर का एक प्रतिशत भी नहीं आ सकता. दुनिया का कोई फोटोग्राफर नहीं उतार सकता उन धड़कते हुए लम्हों को अपने कैमरे में...
न चाहते हुए भी आखिर लौटना ही था. लौटना ही होता है हर सफर से...ओह...यानी कोई कहीं नहीं जाता. जाना या आना सिर्फ वहम है...भ्रम है. क्योंकि लौट ही आता है हर कोई सफर से...जीवन के सफर से भी तो...डूबते हुए सूरज का पीछा करते हुए झेलम को निहारते हुए दिल इतना भारी था जैसे प्रेमी से आखिरी मुलाकात का मौका हो...
कशमीर यात्रा का यह ऐसा दिन था, ऐसा पड़ाव जिसका असर तां-उम्र रहेगा. सारी रात झेलम आंखों में लहराती रही. बाहर पेड़ो से चिनार के पत्ते झर रहे थे और भीतर मन...तो क्या ये कुछ नया उगने की आहट थी...इस सवाल का जवाब सिर्फ वक्त के पास है यही सोचकर लिहाफ में बची-खुची रात समेट दी.
जारी...
(जनसत्ता में प्रकाशित )

Monday, December 3, 2012

धूप का उबटन और भागते दिन...


7 नवंबर

हथेलियों पर सूरज को उगाने का अपना मजा है. बीता दिन इतना दौड़ भाग भरा रहा कि सिरहाने ढेर सारी स्म्रतियों के साथ एक कुंटल थकान भी छोड़ गया. थकान के समंदर में गोता लगाते हुए यह सुकून भी था कि सूरज हथेलियों में है. जब हम चाहेंगे तब सुबह होगी. सारी रात मुट्ठियों में सूरज लिये हम सोते रहे और उठे तो माथे पर धूप का उबटन लगा था. गुनगुनी धूप हौले-हौले पलकों को सहला रही थी. सामने कबूतरों की मटरगशती चल रही थी. शहरों को जानने के लिए टूरिस्ट की तरह जाने की बजाय एक इनसाइडर की तरह जाना हमेशा से भला लगता रहा है. हम टूरिस्ट नहीं थे. हम यहां एक रिश्ता बनाने आये थे. लोगों से मिलने. कुछ लेने नहीं, देने भी नहीं बस कि एक जैसी सोच के लोगों का कारवां बनाने. आज कई कालेजों में लोगों से मुलाकात हुई, टीचर्स से, छात्रों से भी. सबसे ज्यादा हैरत उन्हें यह जानकर होती कि क्या कोई बिना किसी काम के सिर्फ एक काम का हिस्सा होने के नाते मिलने आ सकता है...इतनी दूर...

तहजीब, सलीका, मिठास बेहिसाब. लोग ऐसे मोहब्बत भरे कि गले लग के रो लीजिये जी भर के. हम भागते थे सारा दिन और दिन की हमसे होड़ होती थी. वो और तेजी से सरकता. जब हम थक हार के पांव पसार के बैठते...भूख को महसूस करते तब तक षाम कंधे से कंधा मिलाकर बैठ जाती...अरे...शाम कहां...शाम को छूकर निकलती हुई सी रात. दिन यहीं ठहरता था आकर. गहरी तनहाई और लंबी फुरसत.

यहां सिर्फ एक ही कमी खली अपने वेजिटेरियन होने की. हालांकि ये कमी हर जगह चुभती ही है. खासकर तब, जब बाकी लोग नान वैजेटिरयन हों. सारे दिन की भूख पर नानवेज की खुशबू काबिज होती और भूख आमतौर पर गायब ही हो जाती. दिन के कुछ फल, बिस्किट दाल और सब्जी के बीच भूख से दो-दो हाथ करना. हालांकि सारा दिन प्रदीप जी हमारे खाने का ख्याल रखते. इतना कि कभी-कभी हैरत भी होती और खुद पर गुस्सा भी आता. क्यों इतना साॅफेस्टिकेशन है खाने को लेकर. ये नहीं...वो नहीं...यहां नहीं...वहां नहीं...

आज जुबेर से मिली. जुबेर सोनमर्ग का रहने वाला है. उसने हमें ज्वाइन कर लिया है आफिशियली भी, पर्सनली भी. भोली सी सूरत वाला भला सा वो लड़का बता रहा था कि कल रात सोनमर्ग में बर्फ गिरी है...उसके कहने भर की देर थी हमने हथेलियों पर बर्फ झरती देखी...शीशे के पार का मौसम झांककर हमें देख रहा था. दोस्ती तो अब हो ही चली थी.
.......................
सारे दिन उत्साह हमारे सर पर नाचता रहता. शाम की थकान में वो भी अपना हिस्सा मांगता...रातें खिलखिलाते हुए आतीं और देर तक पास में बैठी रहतीं.
प्रदीप जी ने आज हीर सुनाई. मद्धिम रोशनी के बीच रेशमा आपा की आवाज घुल रही थी. हम कितने ज्यादा खामोश थे. कोई किसी के एकांत में दस्तक नहीं दे रहा था. साथ होते हुए भी तन्हा हुआ जा सकता है बशर्ते कि जिसके साथ आप हैं उसे तनहाई की हिफाजत करने का हुनर आता हो. आंखों का पता नहीं पर अंदर से हम सब भीगे से थे.
देर रात गये ख्याल आया कि कल सूरज हमारी मुट्ठियों में नहीं होगा...हमें उसके पीछे भागना है. सुबह अनंतनाग और पहलगाम के लिए निकलना जो था. बड़े बेमन से हमने अपने-अपने कमरों का रुख किया...हालांकि नींद ने ज्यादा नखरे नहीं दिखाये...

जारी...

Tuesday, November 27, 2012

जिंदगी की सलाखें बड़ी मजबूत हैं


5 नवंबर
दिन को पकड़ने को हाथ बढ़ाया तो शाम के आंचल का कोना ही हाथ लगा. वो भी जल्दी ही सरक गया...सर्द गहराती रातों को आने की बड़ी जल्दी रहती है... बड़े से विंडो ग्लास के बाहर मौसम कैसा ठहरा सा था. इत्मीनान से शाख पर रखे पत्ते मानो कोहरे की खुशबू में नहाने को बेताब हों...सिरहाने रखे चिनार के पत्तों पर नमी सी रखी है हालांकि कमरे में ओस का कोई कतरा भी नहीं.

6 नवंबर
जब हम जागे तो मुट्ठियों में सुबह छुपी हुई थी. बारामूला और गुलमर्ग...मुझे क्या याद रहा. रास्ते...रास्ते...रास्ते...पथिकों को रास्तों से प्यार न होगा तो किससे होगा. एक बार फिर खुद को रास्तों के हवाले करना. गुलमर्ग रास्ते भर पुकारता रहा 'आ जाओ... ' इतने खूबसूरत रास्ते कि इन्हीं रास्तों में रह जाने को दिल चाहे. न भूख न प्यास...ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते बर्फ से ढंकी पहाडि़यां और करीब आती जाती, खामोश जंगलों के बीच से गुजरते हुए हम सब कितने खामोश थे. हम सब...एक से धरातल पर. सबको पता है कि खामोशी के राग की तासीर कैसी होती है. मैं किसी ईश्वर को नहीं जानती लेकिन कुदरत के करीब जाते हुए महसूस कर पाती हूं उन आंसुओं की नमी को जो प्रार्थना या दुआ के वक्त ढुलक आते होंगे...' मुझे मुझसे मुक्त करो...' ऐसे ही बुदबुदा उठे थे होंठ...शायद यही मेरी प्रार्थना का ढंग है...गुलमर्ग की दिल लुभाने वाली खूबसूरती को देखते हुए अचानक सिहरन सी हुई. कोई आवाज कानों से टकराई...'अभी रिहाई का वक्त नहीं आया.' किसने कहे होंगे ये शब्द ...दूर-दूर तक तो कोई नहीं था. हां, सामने बर्फ से ढंकी चोटी के ठीक उपर चमकता सूरज पल भर को छुप गया था...सिर्फ पल भर को. जिंदगी की सलाखें बड़ी मजबूत हैं.
जारी...

Thursday, November 22, 2012

जिंदगी की शराब में अवसाद के टुकड़े


4 नवंबर 2012

हमने देखी है चिनारों से पिघलती हुई बर्फ
उनके शाने से ढलते हुए आंचल की तरह...

एक साथी ने ये पंक्तियां पकड़ा दी थीं निकलते वक्त. यहां तक हथेलियों में बंद ये पंक्तियां अब खुलकर घुल गई थीं फिजाओं में. चिनारों की खुशबू उसके रंग, रूप से पहले पहुंच रही थी. मन के मौसम का भी अजब हाल है कि कोई भी सुकून देने वाली बात, जगह, लोग मिलते ही बरसने को बेताब होने लगता है. भीतर न जाने कितना बड़ा कुंआ है, इसे न जाने कितना दुःख चाहिए न जाने कितना सुख न जाने कितना प्यार ये भरता ही नहीं...जब भी इसमें एक टुकड़ा सुख फेंको बदले में अवसाद की प्रतिध्वनि उभरती है..औटम ...क्यों कश्मीर ने मुझे इसी सीजन में पुकारा...बड़ा बेजा सवाल था. भला मेरे लिए इससे बेहतर और कौन सा सीजन हो सकता था...झरते हुए पत्तों के बीच से निकलते हुए महसूस करती हूं अपना झरना भी. दुःख से बड़ा रोमैंन्टिसिज्म कोई नहीं. ये हौले-हौले हमारी रगों में दाखिल होता है और नशे की तरह हम इसके आदी हो जाते हैं. जिंदगी की शराब में अवसाद के कुछ टुकड़े जिंदगी का स्वाद बढ़ा देते हैं.

कश्मीर रेजिडेन्सी के कमरा नंबर 301 में सामान पटकने के बाद खिड़की के बाहर झरती शाम को देखना आईना देखना सा लगा. फिर लाल चौक की सनडे मार्केट का रुख किया. बाहर निकलते ही जो पहला चिनार का पेड़ मिला हम उसी से लिपट गये. प्रदीप जी आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में कुछ पूछताछ करने गये, तब तक रनदीप ने चिनार के पत्तों पर धावा बोल दिया. उसकी याद कोई का तार चिनारों से जुड़ा था. मैंने उसे वादा किया कि उसकी ढेर सारी सुंदर तस्वीरें खींचूंगी चिनारों के साथ...
लाल चौक की सनडे मार्केट घूमते हुए न जाने कहां निकल गये हम. भटके हुए मुसाफिर की तरह सड़कों का आनंद उठाते हुए. छोटे-छोटे अलाव जल चुके थे. बाजारों में बहुत सी नई चीजें थीं जिनके बारे में जानने की दिलचस्पी थी. रनदीप का कैमरा चल रहा था और मेरा दिमाग... ये वही लाल चौक था जिसे कभी खौफ के साये में न्यूज़ चैंनलों ने दिखाया था।

कभी किसी ने कहा था कि भीतर की दुनिया के सवालों के जवाब बाहर की दुनिया में तलाशना एक गलत खोज है...सोचती हूं भीतर की दुनिया के सवाल गर्भ में तो न रोपे गये होंगे. फिर ये प्रक्रिया गलत कैसे हुई.

जबरन थमा दी गई मुस्कुराहटें हमेशा खाली नहीं जातीं. अपने साथियों को स्नेह से देखती हूं शुकराना नहीं कर पाती उनके होने का...उनके इतने अच्छे होने का.

कोहरे की खुशबू को जेबों में भरने के बाद हम अपने-अपने कमरों में लौट तो आये लेकिन ठहर नहीं पाये. ये समूह का सफर था तो साथ ही रहना भला लगा. प्रदीप जी के संगीत के खजाने में इतने अनमोल नगीने थे कि घड़ी के कांटों का ख्याल ही नहीं रहा...न खाने की सुध...न सोने की.

फिर भी सुबह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी और कश्मीर यूनिवर्सिटी के लोगों से तय मुलाकात पर समय से पहुंचने की जिम्मेदारी लिए नींद की दरगाह पे सजदा किया...
जारी...