Sunday, March 13, 2011

उतरती शाम की उदासी और कॉफी



न जाने कितने दिन हुए कमरे में बुहारी हुए. गर्द की पर्तों के बीच बैठने का भी अपना ही मजा है. उसकी भी एक खुशबू है जो अपनी सी लगती है. किताबों का बेतरतीब सा ढेर चारों ओर. अखबार के बिखरे हुए से पन्ने. कॉफी के  खूब सारे मग. कोई यहां, कोई वहां. एक सितार जिसे अपने छुए जाने का न जाने कब से है इंतजार. कुछ फूल सूखे से, बारिश की बूंदें जो सूखने के बाद अपने निशान देकर वापस लौट गई हैं. कुछ मिस कॉल्स हैं, जिन्हें मिस करने का सुकून है. कुछ मैसेज, जिन्हें पढऩे का कोई चाव नहीं.

अधूरी देखी हुई फिल्मों की लंबी लिस्ट. आधी रची हुई कहानियों का जंगल, कविता...ओह वो तो मुझसे सधती ही नहीं. किताबें देखकर खिल उठता था चेहरा कभी. इन दिनों किताबों ने रास्ता देना बंद कर दिया है. एक साथ कई किताबों पर से गुजरते हुए लगता है कहीं नहीं पहुंच रही. लौट आती हूं अपने सम पर. ढूंढती हूं अपना ही कोई सिरा कि वो सधे तो सधे जीवन भी.

छोड़ो, ये सब नहीं होता मुझसे. उतरती शाम की उदासी ही पीते हैं आज कॉफी के साथ. दोनों का स्वाद काफी मिलता जुलता सा है...

उम्र की तमाम
उदासियों को
फेंटकर,
उबालकर देर तक
आंख का पानी
तैयार की थी
बिना शक्कर और दूध वाली
वो जहर सी कड़वी कॉफी
कि शायद इसे पीकर
कम ही लगे
कड़वाहट जमाने की...

Thursday, March 10, 2011

उस जंगल में प्रेम का डेरा


जंगल में घूमना, दरख्तों से बातें करना, जुगनुओं के पीछे भागना लड़की को बेहद पसंद था. अमावस की रातें उसे इसीलिए खूब भाती थीं. इन रातों में उसकी उदासी अपने उत्कर्ष पर होती थी और उदासी को साझा करने के लिए उसके पास पूरा एक जंगल था. 

चांद छुट्टी पर होता था इसलिए जुगनुओं की चांदी हो जाती. वे खुद को चांद समझने लगते. सब के सब हीरो हो जाते. लड़की खुद को चांद समझने वाले जुगनुओं के पीछे दौड़ती. उन्हें पकड़कर अपने जूड़े में टिका लेती. मानो कह रही हो कि समझे बच्चू, आई अक्ल ठिकाने. जुगनुओं को भी यूं लड़की से पकड़ाये जाने में बड़ा मजा आता था. 

जंगल के सारे जुगनुओं से लड़की की दोस्ती हो गई थी. वो उन जुगनुओं में अपना संसार खोजती थी. उनसे बातें करती थी. सारे जंगल में जुगनुओं की दिप दिप और लड़की की खिलखिलाहट गूंजती थी. कभी-कभी उसकी खिलखिलाहट में आद्र्रता शामिल हो जाती, तो कभी शोखी. लड़की रोती नहीं थी. कभी भी नहीं. उसने अपने मन के भीगे कोनों को भी खिलखिलाहटों में समेट दिया था. यह उसके लिए एक मोहक खेल था. जिसमें वो पारंगत हो चुकी थी. 

लड़की जुगनुओं को गाना सिखाती थी. सबको एक साथ बिठाकर जब वो सुर लगाती, तो सारे जुगनुओं की दिप दिप में एक रिद्म शामिल हो जाती. सारे जुगनू लड़की की बात मानते थे. अगर कोई शरारती जुगनू मटरगश्ती करता तो लड़की उसे उठाकर अपने जूड़े में लगा लेती. उसकी शरारत पर जुल्फों की ये कैद जुगनू को भी खूब भाती थी. वो बाकी जुगनुओं को देखकर मुस्कुराता था. लड़की भी मुस्कुराती थी. 

लड़की को जुगनुओं से खुद को सजाना अच्छा लगता था. वो जुगनुओं को पकड़-पकड़कर उनसे खुद को सजाया करती थी. काली अंधेरी रात में जंगल में दिप दिप करती हुई एक लड़की घूमती थी. वो अदुभुत न$जारा होता था. हवाओं का संगीत और जुगनुओं से दमकती लड़की. खुदा भी इस नजारे को देखने के लिए अमावस की रातों का बेसब्री से इंतजार करता था. लड़की जुगनुओं से सजी होती थी. वो कुछ गुनगुनाती थी. उसके सुरों की लौ के साथ जुगनुओं की दिप दिप की रिद्म भी मिलती थी. 
वो अमावस की ऐसी ही एक रात थी. 

उस रोज लड़की जुगनुओं के पीछे नहीं भागी. उसने दरख्तों से कोई बात नहीं की. उसने हवाओं से उसे अपने संग उड़ा ले चलने का इसरार भी नहीं किया. फूलों की तरफ पलटकर देखा भी नहीं. उसकी आंखों में जुगनुओं का अब कोई चाव नहीं था. जंगल उदास हो गया. इतने सालों से जंगल और लड़की इस कदर इकसार हो चले थे कि दोनों का वजूद एक-दूसरे में शामिल हो गया था. जुगनुओं के पीछे लड़की नहीं भाग रही थी, सो वे चुपचाप जहां-तहां बैठकर लड़की का चेहरा तकने लगे. हवाओं ने लड़की की देह को सहलाया लेकिन वहां कोई जुंबिश नहीं थी. दरख्तों ने झुककर उसके चेहरे को करीब से देखा, वहां गाढ़ी उदासी थी. अमावस की काली रात से भी गहरी उदासी. 

सारे मौसम लड़की को ताक रहे थे. अगर लड़की यूं उदास रही तो मौसमों के वजूद का क्या होगा. कौन अपने माथे पर बसंत सजायेगा. कौन पलाश को अपने आंचल में भरेगा. कैसे जंगल में प्रेम का संगीत गंूजेगा. सबकी आंखों में ढेरों सवाल थे. लड़की हर सवाल से बेखबर थी. उसकी आंखों में प्रेम के जुगनू चमक रहे थे...उसका चेहरा उदास था. खुदा लड़की के सजदे में था. 

Tuesday, March 8, 2011

साहिर लुधियानवी के जन्मदिन पर


आज मेरे महबूब शायर साहिर लुधियानवी का जन्मदिन है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी. जबरन चुरायी गयी फुर्सत के चंद लम्हों में साहिर को पढ़ते हुए खुद को महसूस किया... 


आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग  है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें.

Saturday, March 5, 2011

कमरे में कोई ऐश ट्रे भी नहीं...



वो उतरती शाम का धुंधलका था
शायद गोधूलि की बेला

बैलों की गले में बंधी घंटियों की रिद्म
उनके लौटते हुए सुस्त कदम और
दिन भर की थकान उतारने को आतुर सूरज
कितने बेफिक्र से तुम लेटे हुए
उतरती शाम की खामोशी को
पी रहे थे
जी रहे थे.

तुम शाम देख रहे थे
मैं तुम्हें...
तुम्हारी सिगरेट के मुहाने पर
राख जमा हो चुकी थी.
कभी भी झड़ सकती थी वो
बैलों की घंटियों की आवाज से भी
हवाओं में व्याप्त सुर लहरियों से भी
मैं उस राख को एकटक देख रही थी

तुम बेफिक्र थे इससे कि
वो जो राख है सिगरेट के मुहाने पर
असल में मैं ही हूं
तुम्हारे प्यार की आग में जली-बुझी सी

कमरे में कोई ऐश ट्रे भी नहीं...

(अमृता और मरीना की याद में)

Friday, March 4, 2011


रात दर्जिन थी कोई
सीती थी दिन के पैरहन
के फटे हिस्से...

वो जाने कैसा लम्हा था
धागे उलझ गए सारे
सुईयां भी गिरकर खो गईं.

दिन का लिबास
उधड़ा ही रहेगा अब...