![]() |
| फोटो- अतुल हुंडू |
Saturday, January 8, 2011
Wednesday, January 5, 2011
चाँद मद्धम है आस्माँ चुप है
![]() |
नींद की गोद में जहाँ चुप है
दूर वादी में दूधिया बादल,
झुक के परबत को प्यार करते हैं
दिल में नाकाम हसरतें लेकर,
हम तेरा इंतज़ार करते हैं
इन बहारों के साए में आ जा,
फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे
ज़िन्दगी तेरे ना-मुरादों पर,
कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे
रोज़ की तरह आज भी तारे,
सुबह की गर्द में न खो जाएँ
आ तेरे गम़ में जागती आँखें,
आ तेरे गम़ में जागती आँखें,
कम से कम एक रात सो जाएँ
चाँद मद्धम है आस्माँ चुप है
नींद की गोद में जहाँ चुप है...
चाँद मद्धम है आस्माँ चुप है
नींद की गोद में जहाँ चुप है...
- साहिर लुधियानवी
Friday, December 31, 2010
रात में वर्षा- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
मेरी साँसों पर मेघ उतरने लगे हैं,
आकाश पलकों पर झुक आया है,
क्षितिज मेरी भुजाओं में टकराता है,
आज रात वर्षा होगी।
कहाँ हो तुम?
मैंने शीशे का एक बहुत बड़ा एक्वेरियम
बादलों के ऊपर आकाश में बनाया है,
जिसमें रंग-बिरंगी असंख्य मछलियाँ डाल दी हैं,
सारा सागर भर दिया है।
आज रात वह एक्वेरियम टूटेगा-
बौछारे की एक-एक बूँद के साथ
रंगीन मछलियाँ गिरेंगी।
कहाँ हो तुम?
मैं तुम्हें बूँदों पर उड़ती
धारों पर चढ़ती-उतरती
झकोरों में दौड़ती, हाँफती,
उन असंख्य रंगीन मछलियों को
दिखाना चाहता हूँ
जिन्हें मैंने अपने रोम-रोम की पुलक
से आकार दिया है।
आकाश पलकों पर झुक आया है,
क्षितिज मेरी भुजाओं में टकराता है,
आज रात वर्षा होगी।
कहाँ हो तुम?
मैंने शीशे का एक बहुत बड़ा एक्वेरियम
बादलों के ऊपर आकाश में बनाया है,
जिसमें रंग-बिरंगी असंख्य मछलियाँ डाल दी हैं,
सारा सागर भर दिया है।
आज रात वह एक्वेरियम टूटेगा-
बौछारे की एक-एक बूँद के साथ
रंगीन मछलियाँ गिरेंगी।
कहाँ हो तुम?
मैं तुम्हें बूँदों पर उड़ती
धारों पर चढ़ती-उतरती
झकोरों में दौड़ती, हाँफती,
उन असंख्य रंगीन मछलियों को
दिखाना चाहता हूँ
जिन्हें मैंने अपने रोम-रोम की पुलक
से आकार दिया है।
Thursday, December 30, 2010
कितना अच्छा होता है- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं ।
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं ।
शब्दों की खोज शुरु होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं ।
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं ।
हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है ।
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है ।
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना ।
दूसरे को पा लेना ।
हम जीते जी मसरूफ़ रहे...
दाल धोकर कुकर में चढ़ा ही रही थी कि फोन की रिंगटोन बज उठी... फोन उठाया तो उधर से शहरयार जी की आवा$ज थी. तुम्हें कभी फुर्सत नहीं मिलेगी? आवाज में वही पुराना उलाहना और मेरी खुद से मुंह चुराती मेरी आवाज. दो मिनट का वक्त है तुम्हारे पास? उनकी आवाज से नाराजगी छलक रही थी. मैंने कुकर का ढक्कन लगाया, गैस धीमी की और फोन पर ध्यान लगाया. जी बताइये, मैं नज्म पढ़ रहा था फैज की. क्या तो कमाल का शायर था. तुमने पहले भी सुनी होगी लेकिन फिर से सुनो इसे-
वो लोग बहुत ख़ुश$िकस्मत थे
जो इश्$क को काम समझते थे
या काम से आशि$की करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया.
जो इश्$क को काम समझते थे
या काम से आशि$की करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया.
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आखिऱ तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया...
मैंने कहा, इसे सुना तो पहले भी कई बार था लेकिन आपकी आवाज और अंदाज में सुनना अच्छा लगा. वो बोले, मैं तो बहुत बुरा पढ़ता हूं. उतना ही बुरा जितना बुरा फैज पढ़ते थे. एक बार किसी ने फैज से कहा था कि काश आप जितना अच्छा लिखते हैं, उतना अच्छा पढ़ते भी. तो फैज ने जवाब दिया, सब काम हम ही करें क्या? अच्छा लिखें भी हम, अच्छा पढ़ें भी हम? सब लोग हंस दिये. मैं भी फैज का यही तर्क लोगों को देता हूं.
दो शायरों की स्मृतियां दो मिनट की छोटी सी कॉल में सिमट आई थीं. शहरयार की जानिब से फैज साहब की ये नज्म एक बार फिर सबके हवाले....
Subscribe to:
Posts (Atom)




