Monday, April 4, 2016

ओ री जिन्दगी



ओ री जिन्दगी
कर ले तू कितनी ही चालबाजियां
उलटबासिया
कलाबाजियां
खेल ले चाहे कितने ही खेल
आजमा ले कितना ही हौसला
खड़ी कर ले मुश्किलों की कितनी ही बाड
दिन के शफ्फाक उजालों में घोल के देख ले
निराशाओं के कितने ही अँधेरे
हारेंगे नहीं हम
किसी कीमत पे नहीं
कि तुझसे अपनी मोहब्बत जीकर निभाएंगे
गिले-शिकवे करने को भी
जीना तो जरूरी है न ?


3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2016) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी" (चर्चा अंक-2304) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

kuldeep thakur said...

आपने लिखा...
कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 06/04/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
अंक 264 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

रश्मि शर्मा said...

कि तुझसे अपनी मोहब्बत जीकर निभाएंगे
गिले-शिकवे करने को भी...बहुत ही प्रेरक कवि‍ता