Friday, January 27, 2012

ये रौशनी की खुशबू....


यह उस देश की कहानी है, जहाँ कभी दिन उगता ही नहीं था. धरती के किसी भी कोने में रौशनी का एक कतरा तक न पहुँचता था. उस देश के लोगों को ऐसे ही बिना रौशनी के रहने की आदत हो चली थी. उन्हें अँधेरे में ही साफ़ नजर आता था. सारे काम एकदम ठीक से चलते थे. जब जिसका जी चाहता, वो सो जाता और जब नींद पूरी हो जाती तो उठकर काम पर चल देता. लड़की उसी देश की रहने वाली थी. चूंकि रात और दिन जैसा कुछ था ही नहीं तो लड़की की आँखें हमेशा कुछ न कुछ तलाशती रहती थीं. वो घर के कामकाज निपटाती, फिर खुद को सजाती सवांरती, बरामदे में बैठकर कुछ कढाई करने लगती. अँधेरे में भी उसके सारे धागे चुस्ती से गढ़े गए लगते थे. फिर वो ऊब जाती और जंगल की और चल देती. उसे रस्ते में कई लोग सोते हुए मिलते, कुछ काम की और जाते हुए कुछ लौटते हुए. वो जंगल के हर पेड़, हर बूटे से वाकिफ थी.

उसकी सखियाँ कोई नहीं थीं. जंगल ही उसका सखा था. वो अपने मन की सारी बातें जंगल को बताती थी. उसने हर पेड़ का कुछ नाम रख दिया था. वो जंगल में पहुंचकर पेड़ों के आवाज देकर पुकारती और वो पेड़ अपनी जगह पर खड़े-खड़े ही मुस्कुराने लगता. लहराने लगता. उसकी शाखाएं लड़की की ओर बढ़तीं लेकिन लड़की शरारत से पीछे हट जाती. फिर वो दुसरे पेड़ को आवाज देती और वो पेड़ उसकी आवाज सुनकर बेसब्र हो उठता. फिर वो एक-एक कर जंगल के सारे पेड़ों और लताओं के नाम लेती और पूरा जंगल झूमने लगता. जंगल में रहने वाले पशु पछी भी जंगल के संग झूमने लगते. अपनी काली जिन्दगी का यही हिस्सा लड़की को सबसे ज्यादा पसंद था.

कई दिन हुए लड़की को जंगल आये हुए तो जंगल में हलचल हो उठी. अब जंगल उठकर जा तो सकता नहीं था तो उसने वहीँ से लड़की को आवाजें देना शुरू किया. जंगल के लगातार तेजी से झूमने से तूफ़ान सा आ गया. कुछ पेड़ों ने खुद को ही नुकसान पहुंचा लिया. पूरे शहर में हलचल होने लगी कि किसी बुरी आत्मा का साया है जिसकी वजह से यह तूफ़ान आया है. वैसे तो लोगों को अँधेरे में जीने कि आदत थी लेकिन इस तूफ़ान में जो अफरा-तफरी मची उसकी वजह से अँधेरे में दिखना थोडा कम हो गया और लोग आपस में टकराने लगे.

उधर लड़की तेज़ ज्वर से ग्रस्त थी और एकटक छत को देखे जा रही थी. सोना उसे आता ही नहीं था, तो उसका पलकों को बंद करना या खोलना दोनों का अर्थ एक ही होता था. शहर में उठी हलचल की  आवाजें उसके कानों तक भी पहुंची. लड़की के अशक्त की देह ने उसकी उठने की इच्छा पर लगाम लगा रखी थी. उसने करवट बदली और निगाह अब छत की बजाय दरवाजे पर टिका दीं. कुछ आवाजें उसने अपने कानों के आस पास गूंजती महसूस हुईं. उन आवाजों को हाथ बढाकर पकड़ लिया. उस आवाज का चेहरा उसने झट से पहचान लिया. ये तो जंगल के अन्दर घुसते ही जो मोटा सा सागौन का पेड़ मिलता है,  उसकी आवाज थी. जिसका नाम उसने कनिक रखा था. उसने उस आवाज को अपने पास बिठाया. अँधेरे में उसे कनिक की आवाज का चेहरा साफ़ नजर आ रहा था. उस पर परेशानी का भाव था. लड़की ने अपने तपते हाथ उसके माथे पर रखकर पुछा कि क्या हुआ कनिक, आज बड़े परेशान हो...कनिक रोने लगा. लड़की भी रोने लगी. उन दोनों के रोने के साथ ही बरसात शुरू हो गयी. एक तो तूफ़ान ऊपर से बरसात...शहरवासी व्यथित हो उठे. अँधेरे से उलझते भिड़ते लोग अपने लिए कोई सुरछित कोना तलाशने लगे. लड़की न जाने कबसे रोना चाहती थी...उसका रोना रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. जैसे जैसे वो रोती जा रही थी, बरसात गाढ़ी होती जा रही थी. लोगों को यकीन हो गया कि प्रलय जिसका नाम है यह वही है. लोग ईश्वर को याद करने लगे. 

कनिक लड़की को इस कदर रोते देख और भी बेचैन हो गया. उसने अपनी आँखें पोंछी और लड़की के कंधे पर हाथ रख दिया. 'क्या हुआ...तुम क्यों रो रही हो?'
लड़की ने रोते हुए ही जवाब दिया, 'मुझे नहीं पता कि मैं क्यों रो रही हूँ लेकिन रोने में मुझे सुख मिल रहा है...जैसे सदियों से रुकी नदी को रास्ता मिल गया हो.'
'तुम जंगल क्यों नहीं आई इत्ते दिनों से?'  कनिक ने पुछा...यह सवाल सुनकर लडकी का रोना रुका. उसने कनिक कि ओर देखते हुए कहा, 'मुझे ज्वर है..मै हिल भी नहीं सकती. पर मुझे तुम लोगों कि याद आती थी...सच्ची...'  जवाब देकर लड़की फिर से रोने लगी.
'तुम रोना बंद करो,' कनिक ने कहा. 'तुम्हें पता है शहर का क्या हाल है...'
'नहीं,' लड़की ने आंसू पोंछते हुआ  पूछा.
'तुम्हारे न आने से हम सब के सब परेशान हो गए. जंगल के सारे पेड़ जब परेशान हों तो तूफ़ान तो आना ही था. और अब तो बरसात भी शुरू हो गयी है. बेचारे शहर वाले...' कनिक उठने को हुआ...तो लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया. 'कनिक ये आंधी तूफ़ान रोकना होगा. मुझे ले चलो अपने साथ. मैं तुम्हारे साथ चलूंगी तो तूफ़ान रुकेगा.' लड़की ने आंसू पोंछे और बरसात जरा थम सी गयी.

लड़की कनिक का हाथ पकड़कर जंगल कि ओर भागी...घुप्प अँधेरे वाले उस शहर में चाँद कि भी रौशनी नहीं थी उस रोज. लड़की जंगल के ठीक बीच में पहुंचकर घुटनों के बल बैठ गयी. कनिक से हाथ छुड़ाकर उसने ऊपर हाथ उठा दिए...वो फिर से रोने को हुई कि जंगल के सारे पेड़ों ने एक साथ उसे अपने घेरे में ले लिया. वो सब लड़की को ठीक देखना चाहते थे. जंगल की जड़ी बूटियों ने उसका ज्वर तो उतर दिया लेकिन उसका उदास मन अब भी वैसा ही था. उसने जंगल के सबसे बूढ़े पेड़ से पुछा, 'दादा ये जिन्दगी अच्छी क्यों नहीं लगती? इस शहर में इतना अँधेरा क्यों है...मेरा मन हंसने को क्यों नहीं होता?'  बूढ़े पेड़ के माथे पर सलवटें आयीं. उसने थोडा रूककर कहा, 'बेटा पहले इस धरती पर खूब रौशनी हुआ करती थी. इस शहर के लोग खूब खुश रहा करते थे. तीज त्यौहार मनाया करते थे. ढोल, ताशे बजते थे. नाच गाना होता था....' कहते- कहते बूढा पेड़ अचानक रुक गया...'
'फिर क्या हुआ?'  लड़की ने  पूछा .
 'जानती हो इस धरती पर अँधेरा क्यों हुआ. इस धरती पर. शहर के हुक्काम को एक लड़की से प्यार हो गया. लेकिन लड़की तो किसी और को चाहती थी. उसने हुक्काम के प्यार को ठुकराकर अपने प्रेमी का हाथ थाम लिया. वो इस धरती पर रौशनी का आखिरी रोज था. हुक्काम ने इस शहर के सारे प्रेमियों के क़त्ल का फरमान  सुनाया. उसके बाद इस धरती पर कभी सूरज नहीं उगा, धरती पर कभी कोई फूल नहीं खिला, लोग हँसना भूल गए और....और इस धरती पर हमेशा के लिए अँधेरा छा गया...'
लड़की बूढ़े बरगद से यह सब सुनकर उदास हो गयी....उसने रोना बंद कर दिया.
'इस धरती पर ये जो अँधेरा है न दादा, ये मेरे मन का अँधेरा है...लेकिन अब ये नहीं रहेगा. अब इस धरती पर रौशनी का उदय होगा. किसी हुक्मरान के डर से यह धरती रौशनी से विहीन नहीं होगी, प्यार के फूलों से महरूम नहीं होगी..'
'तो क्या होगा? जंगल ने एक सुर में  पूछा. बस, थोडा सा इंतजार करो...' ऐसा कहकर लड़की वापस लौट गयी.
जंगल अपने ही भीतर उजाले उगने की उम्मीद से थोडा रोमांचित हुआ.

लड़की लौटी तो उसके चेहरे पर मुस्कान थी. उसका आँचल हवा में लहरा रहा था. सारा जंगल उसे विस्मय से देख रहा था. लड़की ने मुस्कुराकर लड़के की कलाई थाम ली. उसने जंगल की उपस्थिति में अपने प्रेम को आलिंगन में लिया और धरती पर रौशनी का आह्वान किया. लड़के ने लड़की के माथे पर लाल टीका लगाया और ठीक उसी वक़्त जंगल के  घुप्प अँधेरे को चीरते हुए एक रौशनी की किरण दाखिल हुई. सूरज ने इस धरती पर पांव रखा...जंगल, नदी, पहाड़, सड़कें सब के सब रौशनी से नहा उठे...लड़की के अवसाद का अँधेरा छटा और प्रेम की रौशनी उसके चेहरे पर खेलने लगी....

पूरी धरती पीले फूलों से लहलहा उठी...

Thursday, January 26, 2012

एक शाम टांग दी है वॉर्डरोब में...


दूर उफक पर सूरज डूब रहा था. हम न जाने किस बात पर उलझे थे कि सूरज हमारी नजरों के सामने गोमती में उतरकर सो गया और हम जान ही नहीं पाये. जब हम अपने-अपने 'सम' पर लौटे तो रात अपना आंचल पसार चुकी थी और चांद आसमान पर मुस्तैद था.

दरअसल, इन दिनों एक नई दोस्ती हाथ लगी है. एक शख्स जो एकदम कंट्रास्ट है मुझसे. जिसका सब्जेक्ट ही वो है जिस पर मेरा यकीन नहीं. यानी ज्योतिष, ईश्वर, नियति, नियंता, ग्रहों की गणना. चूंकि वो युवा है और उसने इस विषय को धार्मिक नजर से नहीं, एक जिज्ञासु की तरह पढ़ा है और वो यह भी जानता है कि मेरी इन चीजों पर आस्था नहीं तो वह अपनी बात विज्ञान के बरअक्स रखता है. मैं उसे ध्यान से सुनती हूं और एक छोटी सी हंसी से उसकी सारी मेहनत पर पानी फेर देती हूं. वो निराश नहीं होता. अगली बार उसकी झोली में नये तरीके होते हैं, अपनी बात को रखने के. और मेरे पास भी.

हमारे लंबे-लंबे वक्तव्य अक्सर कट-छंटकर वहीं छूट जाते हैं, जहां हम बात कर रहे होते हैं. सारे कहे सुने को झाड़कर हम अपनी-अपनी राहों पर चल देते हैं. उसे लगता है कि मैं जानबूझकर उसकी बातों को काटती हूं, इसमें मुझे सुख मिलता है. उसके ऐसा कहने के पहले तक तो नहीं लेकिन बाद में मुझे जरूर मजा आने लगा. वो कहता है कि हम इस वक्त मिलेंगे यह नियति ने पहले ही तय कर रखा होगा. मैं कहती हूं कि तुम्हारी नियति मेरी गुलाम है. ये सूरज, चांद सितारे इन्हें मैं हथेलियों पर लिये घूमती हूं. सारे मौसम मेरा कहा मानते हैं. सुबहों का वक्त बदलकर मैं आधी रात को कर सकती हूं और तेज दोपहरों को घनी रात बना सकती हूं. वो इसे मेरा अहंकार कहता है. मैं इसे अपना होना कहती हूं. 

मेरा भाग्य में विश्वास नहीं, कर्म में है. और मैं जानती हूं कि बिना फल की इच्छा के कर्म करने का ज्ञान देने वाली 'गीता' को दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ी जानी वाली किताब भले ही माना गया हो लेकिन बिना फल की इच्छा के काम करने वाले लोग मुझे तो नहीं मिले. जो मिले, उन्होंने गीता नहीं पढ़ी थी. तो मेरा और मेरे इस नये दोस्त का झगड़ा चलता रहता है. संभवत: उसे भी इस झगड़े में कोई सुख मिलने लगा हो. कुछ भी हो हम जब कह रहे होते हैं, उस बीच कम से कम हमारा सहना जरा कम हो जाता है. हम जीवन के तमाम बोझिल सवालों को दरकिनार कर उनसे मुक्त होने का सुख तो महसूस करते ही हैं. विषयांतर होने का भी अपना अलग ही मजा है कि काफी दूर निकल जाने के बाद हम यह भी भूल जाते हैं कि आखिर हम चले कहां से थे और क्यों चले थे भला. बस चंद कदमों के साथ चलने की कुछ आहटें, कंधों पर उतरती शामें, दूर क्षितिज के पार कहीं कुछ ढू़ढती सी निगाहें यही याद रह जाता है. मुस्कुराती हूं अपना ओवरकोट उतारते हुए कि इसी के साथ एक शाम भी उतारकर टांग दी है वार्डरोब में.

Tuesday, January 24, 2012

चांदनी कहां नहीं होगी...


मैं प्राग में नहीं हूं. न आइसलैंड की यात्रा पर. न ही मेरे साथ थोर्गियर जैसा कोई मित्र है, जो सामान्य यात्राओं को अपनी उपस्थिति से उम्मीद से ज्यादा खूबसूरत बना दे. लेकिन मैं हूं वहीं कहीं. निर्मल वर्मा के ठीक करीब, उन्हें देखते हुए, उनके मौन को सुनते हुए, उन्हें पढ़ते हुए. वो कह रहे हैं, 'मैं आइसलैंड जा रहा हूं किन्तु सोच रहा हूं बराबर प्राग के बारे में ही. टॉलस्टॉय का कथन याद आता है, 'वार एण्ड पीस' की कुछ पंक्तियां...जब हम किसी सुदूर यात्रा पर जाते हैं, तो आधी यात्रा पर पीछे छूटे हुए शहर की स्मृतियां मंडराती हैं, केवल आधा फासला पार करने के बाद ही हम उस शहर के बारे में सोच पाते हैं, जहां हम जा रहे हैं.

किन्तु ऐसे लम्हे भी होते हैं, जब हम बहुत थक जाते हैं, स्मृतियों से भी...और तब खाली आंखों से बीच का गुजरता हुआ रास्ता ही देखना भला लगता है...शायद क्योंकि बीच का रास्ता हमेशा बीच में ही बना रहता है...स्मृतिहीन और दायित्व की पीड़ा से अलग.'

'स्मृतिहीन और दायित्व की पीड़ा से अलग...' जैसे ही इस पंक्ति को पढ़ चुकी होती हूं कि एयरहोस्टेस पूछती है, ' डू यू नीड एनीथिंग मैम...?' मैं उसकी ड्यूटी पर मुस्तैद मुस्कुराहट का जवाब दिली मुस्कुराहट से देती हूं यह कहते हुए कि ' नो, आई डोंट नीड एनीथिंग, थैंक्स.' ऐसा कहते वक्त मेरे कान मुझे सुन रहे होते हैं और दिमाग झट से व्यंगात्मक सा सवाल करता है, 'रियली, यू डोंट नीड एनीथिंग...?' खुद पर हंसती हूं. मेरे हाथ में है 'चीड़ों पर चांदनी' और मैं स्मृतिविहीन होने और दायित्व की पीड़ा से मुक्ति के बीच कहीं उलझी हूं. एक शहर जो पीछे छूट गया है, एक शहर जो आगे आने वाला है. एक जीवन जो पीछे छूट गया है, एक जीवन जो आगे आने वाला है. यानी मैं ठीक उस जगह पर हूं, जहां स्मृतियां धुंधली और दायित्व का कोई दबाव नहीं. क्या सचमुच ऐसा है...

जीवन का कौन सा ऐसा पल था, जब स्मृतियों ने अपनी गिरफ्त से जरा भी ढीला छोड़ा हो. वो पल जब हम उन्हें जी रहे थे, तब भी तो पता था कि यह अतीत के खाते में दर्ज होगा और स्मृति बनकर डोलता रहेगा हमेशा आसपास. कितने खुशकिस्मत हैं वो लोग, जो स्मृतियों से पल भर को भी मुक्त हो पाते हैं और दायित्व की पीड़ा से भी. उम्र के रास्ते के ठीक बीच में खड़े होकर पीछे देखने के लोभ से कहां मुक्त हो पा रही हूं. न जाने कितने अनमोल लम्हों से भरा अतीत बाहें पसारे हमें पुकारता रहता है. वो अनमोल पल चाहे अवसाद से भरे हों या सुख के स्वाद से लबरेज रहे हों, वो छूटना नहीं चाहते. उन्हीं पलों में से एक पल किसी तिलिस्म सा खुलता है.

मेरे हाथों में किताब खुली है, वो पन्ना भी जहां निर्मल जी ने स्मृतिविहीन दायित्व की पीड़ा से मुक्ति की बात बजरिये वार एण्ड पीस लिखी है. वो लम्हा अचानक कई बरस पहले ले जाता है. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ की खुली हुई छत. देश भर के साहित्यकारों का जमावड़ा और अपने प्रिय लेखकों को करीब से देखने की दीवानगी लिए हम जैसे कुछ छात्र. (सन मुझे याद नहीं हां, इतना जरूर याद है कि राजेन्द्र यादव की कहानी 'हासिल' काफी चर्चा में थी उस समय.) अचानक मेरी चेतना के गुरू (जिन्होंने मुझे जीवन को देखने और समझने की आंख दी) मुझे निर्मल वर्मा के सामने ला खड़ा करते हैं. 'ये प्रतिभा है. असीम संभावनाओं से भरी प्रतिभा. अच्छी कहानियां लिखती है.' इतना सुनना था कि मैं रो पड़ी और मैंने गुस्से में घूरकर अपने गुरूजी की ओर देखा था. मुझसे हमेशा यही कहते रहे कि अभी तुम लिखने की प्रक्रिया में जाने को तैयार हो रही हो. कभी कोई प्रशंसा नहीं की और आज निर्मल वर्मा जैसी शख्सियत से मेरा यूं तार्रूफ कराया. यह मुझे नागवार था. मैं शर्मिन्दगी से भर उठी. मैंने भरी हुई आंखों से निर्मल जी की ओर देखा और कहा, ' नहीं मैं लिखती नहीं, बस पढ़ती हूं.' मैं पैर के अंगूठे से पत्थर की जमीन को कुरेदने की नाकाम कोशिश करते हुए सर झुका लेती हूं. कुछ भी नहीं कह पाती कि मैं आपकी कहानियों से किस कदर प्रभावित हूं...आपसे मिलना कितना दुर्लभ अनुभव है...कितना अच्छा महसूस कर रही हूं...मैं सचमुच ऐसा कुछ भी नहीं कह पाती. लेकिन एक संवेदनशील लेखक अव्यक्त को पकड़ पाने में हमेशा माहिर होता है. उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया मिलाने के लिए. कितना मुलायम हाथ था उनका. 'अगर तुम्हारे गुरू ने तुममें संभावना देखी हैं, तो उन पर यकीन करो. खुद पर न सही.' ऐसा कहते हुए उन्होंने वही हाथ, जो थोड़ी देर पहले मेरे हाथ में था, सर पर रख दिया.

फिर वो दोनों देर तक बात करते रहे. चाय पीते रहे और मैं उस तिकड़ी का हिस्सा बनी रही. वो कितना छोटा सा लम्हा था लेकिन कितना वजन था उसमें. मानो देर तक रियाज में गल्तियां करते जाने के बाद अचानक सही सुर पकड़ में आ गया हो. वो लम्हा स्मृति के उस हिस्से में अब तक वैसे ही सांस ले रहा है.

नहीं, मैं प्राग नहीं जा रही थी लेकिन कहीं तो जा ही रही थी और सफर के ठीक बीच में स्मृति का यह टुकड़ा मेरे करीब आकर बैठ गया. सचमुच इस पल न कोई दायित्वबोध न अतीत की कोई और परछांई बस 'मैं और निर्मल...' हवाई जहाज की खिड़की से बाहर देखती हूं तो चांदनी जहाज के पंखों पर बसेरा बनाये हुए है. सोचती हूं कि जब भी चीड़ों पर चांदनी बरसती होगी, ठीक उसी वक्त वो हमारे कंधों पर, छत पर, शहर पर, पेड़ों पर भी तो बरसती होगी. दिल चाहा कि सारे चीड़ों की चांदनी को झाड़कर अपने आंचल में समेट लूं. तभी निगाह उस बंद किताब पर पड़ी है, जिसे स्मृति यात्रा पर निकलते हुए बंद कर दिया था. 'चीड़ों पर चांदनी' - निर्मल वर्मा

Thursday, January 19, 2012

कागज पर कोई शब्द नहीं थे...



मैंने अब दरवाजों की ओर देखना छोड़ दिया है. वहां से कोई उम्मीद नहीं आती. खिडकियों को भी गहरे नीले रंग के पर्दों के भीतर छुपा दिया है. हालाँकि परदे के हिलने पर खिड़की के पार घनी  फूलों की बेल के बीच छुपम छुपाई खेलते चिड़िया और उसके बच्चों पर नजर जाती हैं. दीवार पर घंटों नजर गडाए रह सकती हूँ. सामने वाली दीवार को एकदम खाली छोड़ा हुआ है. ताकि स्म्रतियों के प्रोजेक्टर पर जब अतीत की रील घूमे तो दीवार पर टंगी किसी चीज़ से टकराए नहीं. मौसम पूरी अराजकता के साथ कमरे में अपना अस्तित्व जमाये हुए है. जैसे कह रहा हो मुझे निकालो तो जानूं.

रोज अंजुरी भर शब्द सिरहाने जमा हो जाते हैं. मैं उन्हें इकठ्ठा करना नहीं चाहती क्योंकि शब्दों पर मेरी कोई ख़ास आस्था नहीं है. मुझे यकीन है कि भाषा के निर्माण के पहले भी संवाद होते रहे होंगे और बेहतर रहे होंगे. अब तो यूँ लगता है कि शब्दों पर काई सी जम गयी है. वो फिसल जाते हैं. शब्द चालाक हो गए हैं, उन्होंने अपने कई अर्थ गढ़ लिए हैं. उन कई अर्थों में बचाव के पेच भी हैं. कभी कभी दिल चाहता है कि सारे शब्दों की कोई पोटली बनाऊं और गोमती में विसर्जित कर आऊं. लेकिन जब मैं उन्हें पकड़ने चलती हूँ कमबख्त भाग जाते हैं...मै मुंह फुलाकर लिहाफ में सिमट जाती हूँ तो सब के सब आस पास मंडराते हैं. मैंने भी ठान लिया है नहीं उलझना है शब्दों के चक्रव्यह में मुझे भाव का संसार रचना है. रोने के लिए रोना नहीं लिखना ना हंसने के लिए हँसना. न क्रांति के लिए क्रांति ना प्रेम के लिए प्रेम....

मुझे रचना है सब कुछ नए सिरे से नयी भाषा में. लगातार इस्तेमाल होते होते सारे शब्द पुराने पड़ चुके हैं अपना असल अर्थ खो चुके हैं. लेकिन मैं जिस भाव की भाषा में लिखूंगी उसे कोई पढ़ पायेगा क्या. क्या किसी के सीने में उडेला जा सकेगा भावनायों का समन्दर बिना कुछ कहे और लौटाया जा सकेगा जाते हुए क़दमों को वापस. क्या बिना कहे बीने जा सकेंगे वो सारे भाव जो शब्दों को चुनते वक़्त फिसलकर गिर पड़े थे...पूरी धरती भावों से भर गयी थी और किताबों में रह गए थे महज शब्द...

चिड़िया के बच्चे बारिश की ओट में कूद फांद मचा रहे हैं... सामने पड़े कागज पर कोई शब्द नहीं थे...लेकिन वो कागज मुस्कुरा रहा था. उस कागज का हवाई जहाज बनाकर चिड़िया के बच्चों की तरफ उछालती हूँ. सब के सब डाल से उड़ जाते हैं...कागज का जहाज अब भी वहीँ अटका है...मुस्कुरा रहा है...

Sunday, January 15, 2012

तुम्हें आगे बढ़कर मिलूंगी...



कल हम दोनों ने एक पुल जलाया था 
और दरिया के किनारों की तरह नसीब बांटे थे 
बदन झटके 
तो एक बदन की वीरानी इस पार थी 
और एक बदन की वीरानी उस किनारे 

फिर ऋतुओं ने जो भी फूल दिए
तो तुमने  भी वो बदन से तोड़ लिए 
और मैंने भी वो ऋतुओं को लौटा दिए 
और झडे हुए पत्तों की तरह 
कितने ही बरस हमने पानी में बहा दिए 

बरस बीत गए par पानी नहीं सूखे 
और बहते पानियों में से 
परछाइयाँ तो देखीं पर मुंह नहीं देखे 

और इससे पहले 
की कुछ दूरी पर खड़े हम मिट जाएँ 
चलो बे पत्ते से बदन पर पानी बिछाएं 
तुम अपने बदन पर पैर रखना 
और आधे दरिया को पार कर आना 
मैं अपने बदन पर पैर रखूंगी
तुम्हें आगे बढ़कर मिलूंगी... 
- अमृता प्रीतम 

Sunday, January 8, 2012

जाने क्या चाहे मन बावरा...


सुबहों का कोई ठिकाना नहीं कि वे कब आ धमकें. कभी तो आधी रात को दरवाजे पर दस्तक देती हैं और कभी दिन के दूसरे पहर भी ऊंघती सी आसमान के किसी कोने में दुबकी रहती हैं. मैंने भी अब सुबहों का इंतजार करना बंद कर दिया है. यूं मैंने किसी भी चीज का इंतजार करना बंद कर दिया है सिवाय उस पल के जिसमें सांस है, बीत जाने के. या कि इंतजार को इबादत का नाम देकर खुद को भरमाया हुआ है.

कमरा हमेशा फूलों से महकता रहता है. इतने फूल, इतने फूल कि कमरा ही गार्डन हो चला है. कल कुछ खुशनुमा से गमलों को कमरे में सजाया गया. दोस्तों की आमद का सिलसिला बारिश की किसी लड़ी की तरह कायम है. सबके हाथ में मेरे लिए कुछ फूल जरूर होते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फूल ही हैं जो मुझे खुश करते हैं. कोई मेरे बारे में बात नहीं करता. सब किसी ख्याल की बात करते हैं. किसी किताब के किसी हर्फ की, किसी संगीत के टुकड़े की, मौसम की, राजनीति की. पर मैं समझती हूं कि ये मेरे बारे में बात न करना ही दरअसल मेरा ख्याल रखने की कोशिश की जा रही है. जानना कितना बुरा होता है कई बार कि हम हर बात की तह तक पहुंच जाते हैं और बातों का चार्म कम कर देते हैं. भले ही बातों का चार्म कम होता हो लेकिन इस बात की तसल्ली बढ़ती ही जाती है कि सबकी जड़ में मेरा ही ख्याल है.

मुरझाये फूलों को हटाते हुए एक दोस्त (मेरा स्टूडेंट मैं उन्हें दोस्त ही कहती हूं) पूछता है आपने क्या हाल कर लिया है अपना. ख्याल क्यों नहीं रखतीं. मैं हंस देती हूं. देर तक मेरी हंसी कमरे में रखे हर फूल से टकराती है फिर उसके कंधे पर जा बैठती है. वो नाराज होकर कहता है, वैसे मैम, इसमें हंसने वाली क्या बात थी? उसके पूछने में थोड़ी सी डांट का भी रंग है. मैं उसका चेहरा देखती हूं. अगर आपके छोटे कभी स्नेहवश आपको डांटें तो बड़ा अच्छा लगता है. मैं इस अच्छे लगने को अंजुरी में भरकर पीने लगती हूं. वो मेरे जवाब के इंतजार में है. बताइये, आप अपना ख्याल क्यों नहीं रखतीं? मैं शब्द तलाशती हूं जवाब की भरपाई करने के लिए.
'मैं खुद ही अपना ख्याल क्यों रखूं भई? सबका ख्याल मैं रखती हूं, कोई तो मेरा भी ख्याल रखे..'
'तो हम हैं ना रखने के लिए.'
तो रखो ना...मैं उसका चेहरा देखकर हंस देती हूं. बड़ी बेचारगी सी है उस पर.

कुछ लोग सिरहाने कुछ किताबें छोड़ जाते हैं. कल उन्हीं में से एक दक्षिण अफ्रीका की कहानियों का संग्रह उठाया. लेटे-लेटे एक कहानी 'भूत' पढ़ रही थी. जिसमें बच्चा जंगल में अपने दोस्तों के साथ जाता है और खो जाता है. घर वाले समझते हैं कि वो मर गया है. रोना धोना, अंतिम क्रियाएं सब हो जाती हैं. फिर एक दिन बच्चा लौट आता है और सब उसे जिंदा मानने से इनकार करते हैं. उसे भूत-भूत कहकर भगाने की कोशिश करते हैं. बच्चे को भूत समझने वालों में उसकी मां भी है...कहानी के अंत में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं वहां उलझ जाती हूं कि कैसे खुद को साबित करना कठिन होता है कि 'हां, ये मैं हूं.' और जब कोई नहीं मानता तो ख्याल आता है कि 'मैं क्यों हूं?'

माधुरी रोज सुबह मेरे कमरे को बुहारती है. मैं उन सारे ख्यालों को समेटने लगती हूं कि जो हर वक्त मेरे आसपास रहे. लेकिन माधुरी हुनरमंद है. मुझे बातों में उलझाकर वो मेरे सारे ख्याल भी बुहार ले जाती है. बस एक मृत्यु का ख्याल उसकी झाड़ू की जद में जाने क्यों नहीं आता. वो क्यों मेरे कंधों पर चढ़ा रहता है. मुझसे क्यों शास्त्रार्थ करना चाहता है जबकि मैंने कबसे लोगों से बहस करना बंद कर दिया है. अभी-अभी इनबॉक्स में कोई सुंदर सा गीत दाखिल हुआ. कितने सारे दोस्त हैं देश के कोने-कोने में. हर कोई मेरी मुस्कुराहट के लिए जतन कर रहा है. यही तो मेरी कमाई है, मन ही मन सोचती हूं...गाना बज रहा है जाने क्या चाहे मन बावरा....


(आज समाज और जनसत्ता (२४ जनवरी) में प्रकाशित. )

Friday, January 6, 2012

लकीरें अपने स्वभाव से चलती हैं


अजय गर्ग से मेरा पहला परिचय उनके एक सशक्त लेख के ज़रिये हुआ था. बाद में उनके पत्रकार होने का पता चला. इसी बीच मधुर भंडारकर ने 'जेल' के लिए 'दाता सुन ले...' लिखवाकर उनके शब्दों को लता जी की आवाज में पिरो दिया. गीतकार और पत्रकार होने के बीच लड़ते हुए अजय ने एक दिन जिन्दगी की लगाम अपने हाथ में ली, हिंदुस्तान की शानदार नौकरी को सलाम नमस्ते कह दिया और निकल पड़े इस धरती की सुन्दरता को समेटने. कलम और कैमरे के साथ ने उन्हें खूबसूरत ट्रैवलर बना दिया...लेकिन इन सबसे परे वो साफ़ दृष्टि और नेक नीयत वाले ज़हीन इन्सान हैं...उनकी इस कविता पर अपने अधिकार की मुहर लगते हुए इसे अपने लिए रख रही हूँ.-  प्रतिभा  

लकीरें
अपने स्वभाव से चलती हैं

हमेशा नहीं होतीं लकीरें
समानांतर एक-दूसरे के
कि चलती रहें एक साथ
अनंत तक अनादि तक

तिर्यक भी नहीं होती हर रेखा
कि दूसरी को बस
निकल जाए स्पर्श करते हुए

यह भी  ज़रूरी  नहीं
साथ चलती दो लकीरें
कभी-न-कभी निकलेंगी
एक-दूसरे को काटते हुए

किसी आयत या वर्ग का
विकर्ण भी नहीं होतीं सब लकीरें
कि उल्टे-सीधे, आगे-पीछे चलते
एक ही बिंदु पर मिलें हर बार

ऐसा भी बहुधा नहीं होता
कि एक-दूसरे से सटकर चलें ही 
तो लगे
दो नहीं एक ही लकीर है वहां

वक्र चाल ही चलती हैं
अधिकतर लकीरें
एक-दूसरे में मिलती प्रतीत होती हैं
और झट से निकल जाती हैं
एक-दूसरे से दूर
कोई नया मोड़ लेकर

लकीरें कभी नहीं बदलतीं अपना स्वभाव

रिश्तों को लकीरें समझकर चलो तो
आधे दुःख निरर्थक हो जाते हैं

- अजय गर्ग 
(http://ajaythetraveller.blogspot.com/)

Wednesday, January 4, 2012

मुझे मेरे शब्दों में मत ढूंढना



मुझे मेरे शब्दों में मत ढूंढना
न ढूंढना मेरे शब्दों को उनके अर्थ में
मत ढूंढना मुझे विन्यास में
न कला की लंबी यात्राओं में
न किताबों में दर्ज इबारतों में.

मुझे मेरे होने में मत ढूंढना
मत ढूंढना मेरे नाम में
न ही मेरे चेहरे में
न कविताओं में, न कहानियों में
न रूदन में, न खिलखिलाहटों में

मत ढूंढना मुझे इतिहास की पगडंडियों में
न ख्याल में, न बंदिश में, न ध्रुपद में
न ढूंढना मुझे आग में, न पानी में
न किसी किस्सा-ए-राजा रानी में,

मुझे ढूंढना तलाशना होगा खुद को
छूना होगा अपनी ही रूह को
मांजना होगा अपना ही व्यक्तित्व,
बेदम होती आशाओं पर
रखना होगा उम्मीद का मरहम
उगानी होगी खिलखिलाहटों की फसल ,

तमाम वाद, विवाद से परे
लिखे-पढ़े से बहुत दूर
कहे सुने को छोड़कर किसी निर्जन स्थल पर
किसी रोज मुझे ढूंढना अपने ही भीतर
मुझे मेरे शब्दों में मत ढूंढना...

Tuesday, January 3, 2012

बचा रहता है इंतजार...


सब कुछ खत्म होने के बाद भी
बची रहती है धूप के भीतर की नमी
पत्थरों के भीतर की हरारत
रेत के भीतर
उग ही आता है कोई समंदर
आग की आंखों में
छलक उठते हैं दो आंसू
बंजर धरती पर उगती हैं उम्मीदें
सब कुछ खत्म होने के बाद भी
बचा रहता है इंतजार...

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मेरी हथेली पर एक सूर्य रखा था
उँगलियों पर तारों का था ठिकाना
हथेली के ठीक आखिरी कोने पर
चाँद ने जमाया था डेरा,
अपनी हथेली पर जमा करके
समूचा आसमान
निकल पड़ी हूँ धरती की तलाश में
किसी कैलेण्डर के किसी कोने में
नहीं टंका है धरती से आसमान का मिलन
बस हथेली को उलटकर
आसमान गिराने भर की देर है
न जाने किसने थामा है मेरी हथेलियों को...
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