Wednesday, July 11, 2018

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है

जिंदगी से दोस्ती कराई थी तुमने माधवी. गोवा का वो समंदर, डूबते सूरज के पीछे भागना, समंदर की लहरों को एक साथ उठते और गिरते देखना, सब याद है. देर रात तक बेवजह हँसते जाना, सुनना कहानियां एक दूसरे से, तुम्हारा मुझे अगरबत्ती जलाना सिखाना सब खिला हुआ है। मैं हमेशा तुम्हें अपने पास महसूस करती हूँ माधवी, जोर की झप्पी और हैप्पी बर्थडे। देख न, जुलाई में कितने सारे प्यारे लोगों का जन्मदिन होता है न? एक तुम, एक मैं और बाकी बहुत सारे लोग... 

तुम्हारी हंसी मेरे मन में हमेशा चमकती रहती है- प्रतिभा 

1.

यात्रा से पहले

यात्रा और आत्महत्या से पहले
जहां तक हो सके
सब साफ़ छोड़ना चाहिए
दर्ज है
यात्रा की किसी किताब में

आत्महत्या कायर करता है
यात्रा साहसी का काम है
और साफ़ है सब-कुछ
पहले ही

एक अनंत यात्रा से पहले
एक और यात्रा
एक लंबी यात्रा से पहले
एक छोटी यात्रा

मन कब का गया
श्यामदेश की यात्रा पर
देह सामान बटोर रही है।

2.

यात्रा से लौटकर
यात्रा से लौटती हूं
तो कई दिनों तक घर
अस्त-व्यस्त रहता है

एक-एक कर अटैची से
बाहर आता है सामान
वही पुरानी जगह
ले लेने के लिए
कुछ सुखद स्मृतियां
और
सघन अनुभव भी
निकलते हैं

सामान सहेजती
सोचती हूं हर बार यही
यात्राएं कैसे परिष्कृत कर देती हैं
मनुष्य को भीतर से
निर्रथक व नगण्य
लगने लगता है बहुत कुछ
दृष्टि बदल देता है
जीवन के प्रति नया कोण

एक यात्रा से लौट
मैं दूसरी यात्रा पर
निकल जाना चाहती हूं।

3.

पर घर न छूटे
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
न कोई पर्वत छूटे
न जंगल
न दरिया
न पठार
न बियाबान छूटे
न सागर
न रेत
न तलछट
न कोई दर्रा छूटे
न कंदरा
न घाटी
न आकाश
न उत्तर छूटे
न दक्षिण
न पूरब
न पश्चिम
न रंगीनी छूटे
न वीरानगी
न आनगी छूटे
न रवानगी
अनगिन लालसाएं
अनगिन यात्राओं की
कि धरती का
कोई छोर न छूटे
पर घर न छूटे
यह संभव कहां!

4.
हर सुबह देखती हूं
हर रोज़
बेकल रात को
बुनती हूं
इक नया सपना

कुछ सपने सदाबहार हैं
तितली कोई पकड़कर
बंद करना हौले से मुट्ठी
या उड़ते जाना अविराम
मीलों ऊपर, दिशाहीन

हर सुबह देखती हूं
हथेली पर बिखरे
तितलियों के वो
रंग अनगिन
और
रंग देती हूं तुम्हें
हर सुबह देखती हूं
हथेली पर ठहरा वो
आकाश अनन्त
और
भर लेती हूं उड़ान
लिए साथ तुम्हें।

5.
स्मृतियों में पहाड़
धौलाधार की पहाड़ियों पर
बर्फ़ झरी है बरसों बाद
और कई सौ मील दूर
स्मृतियों में
पहाड़ जीवंत हो उठे हैं
कहीं भी जाओ
पीछा नहीं छोड़ते पहाड़
संग चलते हैं
जीवन भर
वही हिम
वही उजास
वही उल्लास
स्मृतियों में उदात्त पहाड़
स्मृतियों में धवल चांदनी
स्मृतियों में निरभ्र शांति
मैं संतृप्त रहने की चेष्टा में हूं
स्मृतियों का शोर जारी है।

1 comment:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12.07.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3030 में दिया जाएगा

हार्दिक धन्यवाद