Wednesday, December 31, 2014

आ रे …



फिर एक कैलेण्डर उतर गया. हर बरस की तरह इस बार फिर उम्मीदों के बीज टटोलती हूँ. नए बरस की जमीन पर उन बीजों को बोने की तैयारी  फिर से. कभी-कभी सोचती हूँ कि उम्मीद भी अफीम की तरह है. हम उसे ढूंढने के बहाने और ठिकाने ढूंढते रहते हैं. गहन से गहन दुःख में भी तलाशते रहते हैं उम्मीद की कोई वजह कई बार बेवजह ही. ऐसी ही वजहें तलाशते वक़्त हम हर आने वाले लम्हे के कोमल कन्धों पर बीते लम्हों का भार रख देते हैं. कि जो हो न सका अब तक वो अब आने वाले लम्हों में होगा. मैं नए कैलेण्डर को किसी मासूम शिशु की तरह देखती हूँ. उस पर कोई बोझ नहीं डालना चाहती। उसे दुलरा लेना चाहती हूँ. कि वो बेख़ौफ़ आये, मुस्कुराये और गुनगुनाये।

आ  रे …

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (02-01-2015) को "ईस्वीय सन् 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा-1846) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नव वर्ष-2015 आपके जीवन में
ढेर सारी खुशियों के लेकर आये
इसी कामना के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

संजय भास्‍कर said...

आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ .....!!

कविता रावत said...

सुन्दर प्रस्तुति
आपको भी नए साल 2015 की बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएं!

दिगम्बर नासवा said...

उम्मीद एक अफीम है .. बहुत खूब ..
नव अर्श की मंगल कामनाएं ...

Unknown said...

बहुत सुन्दर रचना। आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।