Friday, November 10, 2017

उम्र चौदह की होने को है...


ख़्वाहिश के भीतर खुद को देखती हूँ, उसकी उम्र को जीती हूँ. उसके स्कूल के दिन, दोस्तों की बातें, टिफिन की चोरियां, धौल धप्पे, अबे तबे, मस्तियाँ, शरारतें सब. वो स्कूल जाते समय साइकल के पैडल पर पैर मारती है तो महसूस करती हूँ पंख उगते हुए. स्कूल से लौटते ही किस मूड में दरवाजा खोलेगी इसका इंतजार करती हूँ. दरवाज़ा जिस मूड में खुलता है उसमें स्कूल में दिन कैसा बीता की पूरी दास्ताँ छुपी होती है...'क्या मम्मा इट वाज़ सो बोरिंग टुडे...' 'ओ वाव आज तो मजा ही आ गया...' 'कितना एक्साइटिंग दिन था. ' 'आज तो बस पनिशमेंट मिलते मिलते रह ही गयी...' 'पता है आज कैसे जुगाड़ करके अपनी दोस्त को मैम से डांट खाने से बचाया...' 'आयूष तो कल पिटेगा पक्का, बोलो टिफिन ऐसे गायब किया जैसे कभी था ही नहीं'...'

'मम्मा आज क्या हुआ पता है, सिमरन मैम आई थीं स्कूल, सिमरन मैम. हम लोग क्लास से भागकर पहुँच गए उनसे मिलने, पता है बाकी टीचर्स को सिमरन मैम से ईर्ष्या होती होगी, पूरे स्कूल के बच्चे उनके फैन हैं. वो टीचर्स की शाहरुख़ खान हैं' कहते कहते उसकी आवाज नम होने लगती है. सिमरन मैम पिछले साल क्लास टीचर थीं, मैं भी उनकी फैन हो गयी थी. सारे बच्चों के लिए किस तरह प्रोटेक्टिव थीं, पैरेंट्स से भी उनके बच्चों के लिए लड़ जाती थीं...और जिस दिन सिमरन मैम ने स्कूल छोड़ा उस दिन बल्कि कई हफ़्तों तक घर के कोनों में सिसकियाँ सुनाई देती थीं.

कार्निवाल की तैयारी, स्पोर्ट्स डे की तैयारी, पीटीएम का डर सब जीती हूँ. एक रोज मैंने उसे पूछा, तुम्हें तो डांट पड़ती नहीं तो तुम क्यों डरती हो पीटीएम से तो हंसकर बोली, 'हाँ मैं भी ऐसा सोचती हूँ कि मैं क्यों डरती हूँ फिर सोचा जब सब डरते हैं तो थोड़ा मैं भी डर ही लेती हूँ हा हा हा...' बताओ भला क्या लॉजिक है...इस उम्र में लॉजिक कहाँ चलते हैं. यह उम्र ख़्वाबों के आकार लेने की उम्र है. उसे छूती हूँ तो मानो आसमान छू लिया हो.

अभी वो मुझसे किसी बात पर नाराज है...मैं उसकी पसंद का पास्ता बना रही हूँ वो मुस्कुरा रही है. बुरी तरह से लूडो में हराने को वो फिर से तैयार है...गोटियाँ लगाई जा रही हैं...घर में चौदह बरस की दो लड़कियां रहती हैं इन दिनों...

(किशोरी बेटी की माँ की डायरी )

3 comments:

अनुपमा पाठक said...

उम्र के हर पड़ाव पर यह दोस्ती बनी रहनी है!
इस शाश्वत साथ को ढेरों शुभकामनाएं एवं स्नेह!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-11-2017) को
"सच कहने में कहाँ भलाई" (चर्चा अंक 2786)
पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर