Saturday, April 30, 2016

तेज धूप में घनी छांव सा स्कूल


रास्तों की धूप तब धूप नहीं रहती, जब रास्तों के उस पार कोई सुंदर संसार आपके इंतजार में हो। तेज धूप में भीगते हुए जब हम लौट रहे थे, तब मन में यही ख्याल था। वापसी के कदमों मंे संतुष्टि थी, आंखों में आश्वस्ति और ढेर सारा उत्साह। हम वापस लौट रहे थे देहरादून के रायपुर ब्लाॅक के केशरवाला संकुल के राजकीय प्राथमिक विद्यालय शिरेकी से।

शिरेकी तक पहुंचने का रास्ता किसी ख्वाब सा खुलता है। दोनों तरफ ऊंची पहाडि़यां पेड़ बीच में एक मुस्कुराता सा रास्ता। शिरेकी एक छोटा सा स्कूल है। एक कमरे वाला। हालांकि जिस बिल्डिंग में स्कूल है वहां दो कमरे हैं जिनमें से एक में आंगनबाड़ी चलती है। एक कमरे वाले उस स्कूल में हम पहुंचते हैं जहां कक्षा एक से पांच तक के 13 बच्चे बैठते हैं। इस स्कूल में 13 बच्चे हैं और एक शिक्षिका उर्मिला जी। उनके साथ ही एक शिक्षा मित्र हैं शीला कैन्तुरा।
एक सामान्य से सरकारी स्कूल की एक सामान्य सी कक्षा दिखती है। बच्चे अपनी पढ़ाई में मगन और शिक्षिकाएं उनके साथ घुली-मिली। शिक्षिकाओं की खाली कुर्सी मुझे अच्छी लगती है कि हम उन्हें ढूंढे कि वो कहां हैं और वो बच्चों के किसी झुंड में से निकलकर कहें, हम यहां हैं।
बच्चे कहानियां सुनाने मंे मगन थे, कक्षा 4 का हरमन तो खुद की लिखी कहानी सुना रहा था। हमने उससे पूछा कि तुमने कहानी कैसे लिखी, कैसे मन किया तो उसने बताया कि मैंने तो बहुत सारी कहानियां लिखी हैं, बस मेरे मन में आती हैं कहानियां मैं उनको लिख लेता हूं। इतने छोटे से बच्चे की यह बात दिल को छू गई। शिक्षिकाएं रचनात्मकताओं के पीछे खड़ी हैं लेकिन नज़र आने में संकोच होता है उन्हें। कक्षा 4 की किरन अंग्रेजी में सुंदर सी हैण्ड राइटिंग में खूब सारे वाक्य लिखकर लाती है। उन वाक्यों से खेलते-खेलते वो किरन लव्स टू ईट कढ़ी चावल से लेकर आॅरेन्ज, राजमा चावल, मैंगो, वाटर मिलन, चाॅकलेट, चकोतरा तक की यात्रा तय कर लेती है। हर वाक्य के साथ उसका अंग्रेजी के शब्दों का संसार खुलता जाता है, उसकी पसंद की खाने की चीजों का भी। उसका अंग्रेजी का उच्चारण दिल लुभाता है। कोई शिक्षिका उसके इस जानने का श्रेय नहीं लेना चाहतीं। “ये बच्चे खुद बहुत अच्छे हैं...“ उर्मिला मैम धीरे से कहती हैं और अंजली की काॅपी में कुछ लिखने लगती हैं।
हमारे साथ गई सीआरसीसी मंजू नेगी बच्चों को ढेर सारी कहानियां सुनाते हुए मानो खुद ही बचपन के किसी हिस्से में चली गई थीं। कहानियों को पढ़ लेना काफी नहीं, उनका आनंद लेना बच्चों के लिए पहली जरूरत है यह बात वो जानती हैं। हाव-भाव के साथ कहानियां सुनाते हुए बिल्ली का जिक्र आने पर बिल्ली बन जाने का अभिनय और चूहे का जिक्र आने पर चूहे का अभिनय करते हुए पूरी कहानी का संसार वहां खुलता है। बस कि कहानी के अंत में पूछे जाने वाले सवाल थोड़ा बेमजा से लगते हैं।
शिरेकी एक छोटा सा गांव है। शीला मैडम बताती हैं कि आसपास कोई भी बच्चा आउट आॅफ स्कूल नहीं है। यहां बच्चे ही इतने हैं। जितने हैं सब स्कूल आते हैं और रोज आते हैं। रोज स्कूल आना स्कूल में मन लगने के कारण ही संभव होता होगा शायद। मंजू नेगी बताती हैं कि हमारी कोशिश होती है कि बच्चों को स्कूल आना इतना अच्छा लगे कि वो रोज स्कूल आयें।
इस स्कूल की शिक्षिकाओं के पास संसाधनों की कमी को लेकर कोई शिकायत नहीं मिलती बस कुछ जिज्ञासाएं हैं कि कैसे वो अपने बच्चों को और बेहतर ढंग से पढ़ा सकें। बच्चों का आत्मविश्वास शिक्षक की ही तो पूंजी है, उन्हें लाड़-दुलार से रखना, उनमें आत्मविश्वास से भर देना पढ़ाने से पहले की प्रक्रिया है जिसे ये शिक्षिकाएं अपनी तरह से करने का प्रयास कर रही हैं, चुपचाप। उन्हें नहीं पता कि उनकी कोशिशों के रंग कितने चटख हैं कि बच्चे भरपूर आत्मविश्वास के साथ कहते हैं मैं बड़े होकर इंजीनियर बनूंगा, कोई कहती है मैं तो डाॅक्टर बनूंगी और किसी के इरादे पुलिस इंस्पेक्टर बनने के हैं।
एक तरफ हजारों लाखों लोग शिक्षा जगत की चुनौतियों में उलझे हुए हैं दूसरी ओर कोई सीआरसीसी कुछ शिक्षक खामोशी से किसी संगतराश की तरह बच्चों का व्यक्तित्व गढ़ने में लगे हैं. ऐसे स्कूलों को देखकर सरकारी स्कूलों से उठ रहे लोगांे के भरोसे को सहेज लेने को जी चाहता है।

1 comment:

Kavita Rawat said...

प्रेरक प्रस्तुति
बचपन की यादें ताज़ी हो गयी। समर्पित शिक्षक ही बच्चों को सही दिखलाते हैं। .काश सभी ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर पाते