Wednesday, February 8, 2012

ख्वाहिशो की कुछ ना कहो...


तेरे होने पर सूरज गुलाम था मेरा
रास्ते मेरा कहा मानते थे

चाँद बिछा रहता था राहों में
और मैं दुबक जाती थी बहारों के आँचल में
कभी धूप में भीग जाती थी
कभी बूँदें सुखा भी देती थीं,

बसंत मोहताज नहीं था कैलेण्डर का
जेठ की तपती दोपहरों में भी
धूल के बगूले उड़ाते हुए
घनघोर तपिश के बीच
वो आ धमकता था
कभी सर्दियों में आग तापने बैठ जाता था
मेरे एकदम करीब सटकर

पेड़ों पर कभी भी खिल उठते थे पलाश
और खेतों में कभी भी लहरा उठती थी सरसों

तुम थे तो ठहर ही जाते थे पल
और भागता फिरता था मन
मुस्कुरा उठता था धरती का ज़र्रा-ज़र्रा
और खिल उठती थीं कलियाँ
बिना बोये गए बीजों में ही कहीं

मौसम किसी पाजेब से बंध जाते थे पैरों में
और पैर थिरकते फिरते थे जहाँ-तहां
कैसी दीवानगी थी फिर भी
लोग मुझे दीवाना नहीं कहते थे
बस मुस्कुरा दिया करते थे

और अब तुम नहीं हो तो
कुछ भी नहीं होता, सच
बच्चे मुंह लटकाए जाते हैं स्कूल
लौट आते हैं वैसे ही

शाम को गायें लौटती हैं ज़रूर वापस
लेकिन नहीं बजती कहीं बांसुरी
शाम उदासी लिए आती है
और समन्दर की सत्ताईसवीं लहर में
छुप जाती है कहीं

मृत्यु नहीं आती आह्वान करने पर भी
और जीवन दूर कहीं जा खड़ा हुआ है
मंदिरों से गायब हो गए हैं भगवान
खाली पड़े हैं चर्च
सजदे में झुके सर
अचानक इतने भारी हो गए कि उठते ही नहीं

न जाने कौन सी नदी आँखों में उतर आई है
जिसे कोई समन्दर नसीब होता ही नहीं
तुम्हारे जिस्म की खुशबू नहीं है कहीं
फिर हवा क्या उडाये फिरती है भला
क्या मालूम

लौट आओगे एक रोज तुम
जैसे लौटे थे बुध्ध
जैसे लौट आये थे लछमन
जैसे रख दिए थे सम्राट अशोक ने
हथियार
वैसे ही तुम भी रख दोगे अपने विरह को दूर कहीं

लेकिन उन पलों का क्या होगा
जो निगल रहे हैं हर सांस को

कैसे बदलेगा यशोधरा और उर्मिला का अतीत
कैसे नर्मदा अपने होने पर अभिमान करेगी
तुम्हारा आना कैसे दे पायेगा उन पलों का हिसाब
जिन्हें ना जीवन में जगह मिली
न मृत्यु में

सूरज अब भी कहा मानने को बेताब है
लेकिन क्या करूं कि कुछ कहने का
जी नहीं करता
मौसम अब भी तकते हैं टुकुर-टुकुर
लेकिन उनकी खिलखिलाहटों से
अब नहीं सजता जीवन

एक झलक देख लूं तो जी जाऊं
पलक में झांप लूं सारे ख्वाब
रोक लूं जीवन का पहिया और लौटा लाऊँ
वो सोने से दिन और चांदी सी रातें

हाँ, मैं कर सकती हूँ ये भी
लेकिन विसाल- ए- आरज़ू तुम्हें भी तो हो
तुम्हारे सीने में भी तो हो एक बेचैन दिल
जीवन किसी सजायाफ्ता मुजरिम सा लगे
और बेकल हों तुम्हारी भी बाहें
इक उदास जंगल को अपनी आगोश में लेने को

मेरी ख्वाहिशो की अब कुछ ना कहो
कि अब ख्वाब उतरते ही नहीं नींद के गाँव
पाश की कविता का पन्ना खुला रहता है हरदम
फिर भी नहीं बचा पाती हूँ सपनों का मर जाना
क्या तुम्हारी जेब में कोई उम्मीद बाकी है
क्या तुम्हें यकीन है कि
जिन्दगी से बढ़कर कुछ भी नहीं
और ये भी कि जिन्दगी बस तुम्हारे होने से है

क्या सचमुच तुम्हें इस धरती की कोई फ़िक्र नहीं
नहीं फ़िक्र मौसमों की आवारगी की
नहीं समझते कि क्यों हो रही हैं
बेमौसम बरसातें
और क्यों पूर्णमशियाँ होने लगी है
अमावास से भी काली

कि ढाई अछर कितने खाली-खाली से हो गए हैं
लाल गुलाबों में खुशबू नहीं बची
नदियों में कोई आकुलता नहीं
पहाड़ ऊंघते से रहते हैं
समंदर चुप की चादर में सिमटा भर है

कोई अब रास्तों को नहीं रौंदता
कोई नहीं बैठता नदियों के किनारे
कहीं से नहीं उठता धुंआ और
नहीं आती रोटी के पकने की खुशबू

तुम कौन हो आखिर कि जिसके जाने से
इस कायनात ने सांस लेना बंद कर दिया
क्या तुम खुदा हो या प्रेमी कोई...

16 comments:

वन्दना said...

खुदा कह दो या प्रेमी सार तो सिर्फ़ प्रेम मे ही है प्रतिभा जी और जहाँ प्रेम नही वहाँ के हालात का जीवन्त चित्रण सा कर दिया कहीं कहीं तो लगा जैसे मुझे ही गढ दिया।

Dr.Nidhi Tandon said...

पाश की कविता का पन्ना खुला रहता है हरदम
फिर भी नहीं बचा पाती हूँ सपनों का मर जाना.....बहुत सुन्दर.

प्रवीण पाण्डेय said...

सब सूना सूना सा लागे,
जब मन तुम बिन इत उत भागे,

पद्म सिंह said...

सूरज अब भी कहा मानने को बेताब है
लेकिन क्या करूं कि कुछ कहने का
जी नहीं करता
मौसम अब भी तकते हैं टुकुर-टुकुर
लेकिन उनकी खिलखिलाहटों से
अब नहीं सजता जीवन
... अभिव्यक्ति का ऐसा अंधड़... उड़ाए लिए जाता है... मै ठगा सा देखता हूँ अपना सब कुछ लुटता हुआ ।

RITU said...

सुन्दर..गहराई से शब्दों को गढ़ा है
kalamdaan.blogspot.in

Tulika Sharma said...

लेकिन विसाल- ए- आरज़ू तुम्हें भी तो हो
तुम्हारे सीने में भी तो हो एक बेचैन दिल
जीवन किसी सजायाफ्ता मुजरिम सा लगे
और बेकल हों तुम्हारी भी बाहें
इक उदास जंगल को अपनी आगोश में लेने को

निःशब्द हूँ .....भीतर कुछ दरका हुआ सा है ....महसूस होने लगा

Rajesh Kumari said...

मौसम किसी पाजेब से बंध जाते थे पैरों में
और पैर थिरकते फिरते थे जहाँ-तहां
कैसी दीवानगी थी फिर भी
लोग मुझे दीवाना नहीं कहते थे
बस मुस्कुरा दिया करते थे
bahut pasand aai ye panktiyan.prem me madmata jeevan fir bichoh ka dard bahut sundar chitran kiya hai....vaah

jyoti nishant said...

kya haun kuchh kahne layak bacha hi nahi.....itni lambi dastane virah,dastane prem.....

Anand Dwivedi said...

सच में प्रतिभा जी
"बसंत मोहताज नहीं था कैलेण्डर का"
और
'पेड़ों पर कभी भी खिल उठते थे पलाश
और खेतों में कभी भी लहरा उठती थी सरसों '
.....
'लोग मुझे दीवाना नहीं कहते थे
बस मुस्कुरा दिया करते थे'
.....
'न जाने कौन सी नदी आँखों में उतर आई है
जिसे कोई समन्दर नसीब होता ही नहीं'
.....
'एक झलक देख लूं तो जी जाऊं '
....
'कि ढाई अछर कितने खाली-खाली से हो गए हैं
लाल गुलाबों में खुशबू नहीं बची'
.....
"तुम कौन हो आखिर कि जिसके जाने से
इस कायनात ने सांस लेना बंद कर दिया
क्या तुम खुदा हो या प्रेमी कोई..."
...
आप भी रुला लो प्रतिभा जी जितना मन करे रुला लो ..पता नहीं कैसे आपको एक एक बात पता चला जाती है ..कौन कह आता है आपके कण में चुके से ये सब ...जरूर ये उसी हवा की कारस्तानी होगी !

anju(anu) choudhary said...

अपूर्व भाव लिए सम्पूर्ण कविता के भाव ...

dr.mahendrag said...

Dhaie akshar kitne khali khali se ho gaye hai,
Lal gulabon mae koe khushboo nahi bachi,
Nadiyo mai koe aakulta nahi,
Pahad unghte se rahte hai
Samandar chup ki chadar me simta hai
BAHUT KHOOBSURATI SE AAPNE VIRAH KI GHADYON KO BAYAN KAR DIYA.SWUNDAR ATI SUNDAR

बाबुषा said...

Let's go for a long drive ! Come !

मौलि said...

चुपके से कुछ कह देना, हाथ हिला कर चल देना, बस धीरे से मुस्‍का देना या चुप रहना कुछ मत कहना. हम सुन लेते हैं सारे नग्‍मे, सांझे कर लेते हैं सारे जज्‍बात महज तुम्‍हारे होने को सब कुछ समझा यही है ना प्‍यार

***Punam*** said...

मैंने पहले भी कहा है....
"आपको पढ़ने के बाद हमेशा ही कहीं खो देना पड़ता है खुद को कुछ देर के लिए...!"


शुरू से आखिर तक शब्दों के साथ-साथ मन दौड़ रहा था...
न जाने कितने झंझावात झेल गयी इतनी ही देर में ....
तारीफ करूँ.....?
नहीं......!!
इसमें तारीफ के काबिल कुछ भी नहीं है...
ये महसूस करने लायक है.....
शब्दों के साथ खो जाने लायक है....
खुद को कुछ देर जी जाने लायक है....
और सच कहूँ तो......
जीने लायक भी कुछ नहीं है....!!

dr.mahendrag said...

Saqchmuch prem me hone wali sabhi baten aapne to esme likh di hai.
EK ACHHI KAVITA
PAR AAAJ TO MOBILE NE PREMPATRON KI HATYA HI KAR DI HAI.ANYATHA WOH PREMPATRON KO LIKHNE KA MOOD AUR MIJAJ TATHA PHIR USE MILNE WALE KI UTSUKTA AB AEWAL BATE HI REH GAYEE HAI
AB TO MEGHDOOT BHI EK BITI BISRI HUE KAHANI LAGNE LAGA HAI AAJ KI PEEDHI KO.
AAPKO ES KAVITA KE LIYA BAHUT BADHAIE

Pallavi said...

गहरे विचारों वाली बहुत ही खूबसूरत भावनामयी अभिव्यक्ति....