Saturday, March 14, 2009

अंजुरी भर मरीना

किसी के विचार तो पसंद हो सकते हैं पर उसके नाखूनों का आकर सहन नहीं भी हो सकता है। उसके स्पर्श का प्रतुत्तर तो दिया जा सकता है पर उसके मूल्यवान भावों का नहीं। ये अलग-अलग छेत्र हैं। आत्मा आत्मा से प्रेम करती है, होंठ होंठ से लेकिन अगर आप इन्हें मिलाने लगेंगे, मिलाने का प्रयास करेंगे तो आप सुखी नहीं रहेंगे....मरीना
एक बार डॉक्टर नामवर सिंह ने बेहद भावुक होते हुए कहा था जिसने पिछले जन्मों में खूब सारे पुण्य किए होते हैं वही कविता लिख सकता है। मरीना को पढ़ते हुए हर बार यही लगता है की उसका जन्म सिर्फ़ कवितायें लिखने के लिए ही हुआ था। उनके हिस्से में जितनी यातनाएं आयीं दरअसल वे यात्रायें थीं उनकी कविताओं तक पहुँचने की। एक दिन नंदिनी के ब्लॉग पर पढ़ा था की उसे लगता है की पिछले जनम में वो ही मरीना थी। ऐसा ही कुछ मुझे भी लगता है हमेशा से, बस मैं कह नहीं पायी। उसके हर शब्द को धड़कते हुए महसूस किया है मैंने अपने भीतर। लेकिन हमारे पुण्य जरा कम थे सो हम मरीना नहीं हो पाये, प्रतिभा होकर रह गए। भटक गए इस दुनिया के रेले में/ मेले में। लेकिन कहीं कुछ था जो हमरे गुनाहों से बड़ा था। मरीना न हो पाने के गुनाहों से बड़ा तभी तो मरीना अपनी रचनाओं समेत हमारे भीतर प्रवेश कर गयीं। अनजाने देश की, अनजानी सी वो औरत हमरे भीतर धड़कने लगी, साँस लेने लगी। उनका जीवन अपना जीवन लगने लगा। एक-एक शब्द जैसे मैं ही तो हूँ। कभी-कभी किसी से मिलना, बात करना ख़ुद से मिलना होता है। अपनी ही आवाज में ख़ुद को पुकारना, अपने आपको सुनना। मरीना से मिलना हमेशा ऐसा ही होता है। हाँ, एक जगह हारती हूँ। कभी-कभी जब जरा सी तकलीफ से आँख भर आती है, जब दुनिया जीने नहीं देती अपनी तरह से। फ़िर लौटती हूँ मरीना के पास। सीखती हूँ दुखों को सहेजना, उन्हें अपनी शक्ति बनाना। उनसे वाबस्ता होते हुए अपनी तलाश करना। जिंदगी ऐसे ही तो जी जाती है। दुःख दरअसल सबसे बड़ी पूँजी है। ये वो समन्दर है जो अपने भीतर ढेर सारे हीरे, मोटी , शंख, सीप समेटकर लाता है। इस समन्दर में गहरे उतरने का हुनर, अपने दुःख की हिफाजत करने का हुनर, आंसू नही, शब्दों में ढलने का हुनर मरीना से बेहतर कौन जानता है भला। दर्द का मीठा सा अहसास मरीना के शब्द संसार में बिखरा पड़ा है। बुखार में तपती नन्ही आल्या (उनकी बिटिया ) के सिरहाने बैठकर निराशा, गरीबी, असुरक्षा से घिरी मरीना ही कवितायें लिख सकती थी... ऐसा लगता है मरीना के दर्द को बूँद-बूँद पिया है मैंने...जिया है मैंने...
आज एक मित्र ने फ़ोन पर मरीना का जिक्र करके उन्हें मेरे भीतर फ़िर से जगा दिया। भावुक, शोख, चंचल, जिद्दी, समझदार, नादाँ प्यारी सी मरीना। मरीना एक अहसास है जो न जाने कितने ही दिलों में धड़क रहा है...

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