Friday, September 14, 2018

बारिश का बोसा और सितम्बर


चुपके से दबे पाँव आता है सितम्बर
पीठ से पीठ टिका कर बैठ जाता है
झरनों का संगीत सुनाता है
ओढाता है
बदलते मौसम की नर्म चादर
उंगलियों में सजाता है हरी दूब से बनी मुंदरी
और मंद-मंद मुस्कुराता है मूँद कर आँखें

दूर जाती खाली सड़क पर रख देता है इंतजार
पीले फूलों में आस भर देता है
तेज़ कर देता है खिलखिलाहटों की लय
बिखेरता है धरती पर मोहब्बत के बीज
उदास ख़बरों की उदासी पोंछता है
बंधाता है ढाढस

बारिश का बोसा देता है सितम्बर
पलकों पर रखता है सुकून की नींद के फाहे
सांसों की मध्धम आंच पर सेंकता है सीली ख्वाहिशें
मोहब्बत पर यकीन की लौ तेज़ करते हुए
धीमे से मुस्कुराता है सितम्बर

जिन्दगी को जिन्दगी बनाता है सितम्बर

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर। हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-09-2018) को "हिन्दी की बिन्दी" (चर्चा अंक-3096) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

सुन्दर रचना