Saturday, December 2, 2017

शेमलेस गर्ल्स



दरवाजा कुछ ज्यादा ही झटके से खुला था. यह बेटू के स्कूल से लौटने का समय था. झटके से दरवाजा खुलने का अर्थ होता है दिन मजेदार बीता। समथिंग एक्ससाइटिंग। उसका चेहरा देख मुस्कराती हूँ कि कानों को पता था कि इनमें कौन से शब्द गिरने वाले हैं. 'मम्मा, इट वाज़ सो एक्ससाइटिंग'. जूते निकालकर फेंके जाने लगते हैं. स्कूल बैग सोफे पर धप्प्प से गिर पड़ता है और उसकी बकबकिया एक्सप्रेस शुरू।

'आज पता क्या हुआ मम्मा, लाइब्रेरी पीरियड था और पढ़ने का बिलकुल मन नहीं था. तो हम सब दोस्त लाइब्रेरी में अपनी स्पेशल आवाजों वाला खेल खेलने लगे. खुसुर-पुसुर स्टाइल में। तुमको तो पता ही है हमारे सात लोगों के गैंग का. खरगोश, बिल्ली, सांप, मछली, चिड़िया, कुत्ता और सुअर की आवाजें. आवाजों के बारे में बताते हुए वो तरह तरह के मुंह बनाकर आवाजें बनाती भी जा रही थी. मेरा पेट हँसते हँसते फटने को था. 'सर को पता चल गयी हमारी शैतानी का। उन्होंने हम सबको लाइब्रेरी के बाहर निकाल दिया. हम कुछ देर बाहर खड़े रहे, सोचते रहे कि अब क्या किया जाए क्योंकि पनिशमेंट को ऐसे वेस्ट तो नहीं कर सकते न? आखिर हम सब बास्केट बॉल खेलने चले गए.'

'अरे वाह, ये तो सच में एक्साइटिंग था' उसके लिए खाना गर्म करते हुए मैंने कहा.

'असली मजा तो अभी आना बाकी है मम्मा। हम लोग धुंआधार खेल रहे थे तभी लाइब्रेरी वाले सर वहां से गुजरे, उन्हें लगा होगा हम पनिशमेंट में बाहर खड़े होंगे, लेकिन जब उन्होंने हमें खेलते देखा तो उनका मुंह ही उतर गया. गुस्से में बोले 'शेमलेस गर्ल्स' और झल्ला के चले गए. उनका वो शेमलेस गर्ल्स कहना अहा, सारा चार्म उसी का था.' वो खुश होकर बता रही थी.

'तुम लोग अपने टीचर्स को कितना तंग करते हो?' मैंने खाना निकालते हुए कहा.

'वो लोग भी कम तंग नहीं करते हमें। अगर हम मुंह बनाये खड़े होते तो उनका ईगो सैटिस्फाइड हो जाता। हम तो खेल रहे थे तो उनकी खल गयी. अब इसमें हम क्या कर सकते हैं. अब तुम ज्यादा ज्ञान मत दो. खाने में आज क्या है?'

मेरे कान में सुअर और सांप वाली आवाजें तैर रही हैं. और उसके चेहरे पर तैरता चार्म भी. पनिशमेंट को रिवार्ड बनाने लेने वाले इन बच्चों के साथ काश मैं भी पढ़ी होती.

हमारे ज़माने में तो क्लास में खड़ा भी कर दिया तो सारा दिन इंसल्टिंग फील होता रहता था. और इस चक्कर में जुटे रहते थे सब काम वक़्त पर निपटाने में. एक रोज मैंने उससे पूछा, 'जब तुमको पनिशमेंट मिलती है तो बुरा नहीं लगता?' उसने बेहद लापरवाही से कहा, 'नहीं, बुरा किस बात का लगना, सबको ही मिलती है पनिशमेंट तो. सब तो दोस्त हैं. आज मेरी बारी तो कल किसी और की. जिसको पनिशमेंट मिलती है बाकी बच्चे उसे लंच में स्पेशल कुछ खिलाते हैं.'

'कोई चिढ़ाता नहीं 'मैंने पूछा।

उसने चश्मे से बड़ी बड़ी आँखों से घूरते हुए कहा,' चिढ़ाता है? किसी को पिटना है क्या?'
उसने आगे जोड़ा, 'जब टीचर बिना गलती के डांटती हैं तब बुरा लगता है, और जब पढाई में लापरवाही होती है खुद से तो डांट न भी पड़े तो भी बुरा लगता है. शैतानी करना तो हम बच्चों का हक़ है न. चाइल्ड राइट उसके लिए पनिशमेंट मिलना तो अच्छी बात है न ?' हंस पड़ी थी वो कहते हुए.

उसका मछली की आवाज़ निकालता मुंह और आवाजें सारा दिन मुस्कुराहटों का सबब बनी रहीं. और उसका वो 'शेमलेस गर्ल्स' पर खिलखिलाना भी.

(किशोरी होती माँ की डायरी)


4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बढ़िया

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-12-2017) को "शुभ प्रभात" (चर्चा अंक-2807) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

kuldeep thakur said...

दिनांक 05/12/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...

Meena Sharma said...

इन किशोरी बच्चियों के साथ मेरा दिन का आधा वक्त गुजरता है, स्कूल और जूनियर कॉलेज की लड़कियाँ अब टीचर्स से डरती नहीं। बिंदास कह देती हैं - मैम इस कुर्ते के नीचे पटियाला सलवार पहनते आप तो ज्यादा अच्छी लगतीं...या फिर मैम आप खुले बाल ही रखिए...कभी कभी लगता है मस्का लगा रही हैं पर जब डाँटती हूँ तो संजीदगी से सुन भी लेती हैं और मेरा मुँह बोर्ड की तरफ घुमाते ही वो उनकी खीखी !!!मैं नकली गुस्से से घूर कर देखती हूँ एक बार...और क्लास से बाहर निकलकर मुस्कुरा देती हूँ...