Monday, August 19, 2019

महबूब की एक झलक जीने का सामान


जिस पुकार पर गोवा आई थी उसे ठीक से सुन लिया था, गुन लिया था. एक मुक्कमल शाम के बाद प्यारी सी सुबह को जी लेने के बाद अब सिर्फ इन हवाओं के हवाले करना बाकी था. मन गिलहरी हुआ जाता था. हर सडक पर भागने को व्याकुल, हर कोने में खड़े होकर गहरी सांस लेने को बेताब, बीच सडक पर खड़े होकर चिल्लाकर कहने को बेकरार कि आई लव माइसेल्फ़. ये सेल्फ न बहुत खूबसूरत होता है. इसी गोवा में अंजना, बाघा और वागातोर बीच ने मुझे खुद से मिलवाया था. लहरों ने थपकी देकर सुलाया था, कहा था खुद से प्यार करो. और आज मैं खुद के प्रेम में हूँ. यह प्रेम सेल्फ अप्रिसिएशन सेल्फ से अटैचमेंट तो हो लेकिन सेल्फ ऑब्सेशन न हो इसका ख्याल रखना होता है जिसका जिम्मा भी कुछ दोस्तों को ही दे रखा है. जैसे ही गडबड करूँ अनजाने ही सही वो थप्पड़ लगाकर सुधार लें. 

कल से जो समन्दर झलक दिखा रहा था, अब उसके करीब जाने का समय आ चुका था. इस दफे भीतर भी सुख का समन्दर था और बाहर भी. यह जो भीतर का सुख था ‘यह कोई उफान तो नहीं था,’ खुद से पूछती हूँ. आवाज आती है ‘नहीं यह अपने होने का सुख है मात्र.’ जिन्दगी का बड़ा हिस्सा दूसरों को महसूस करते हुए, समझते हुए बिताने के बाद यह खुद को महसूस करना सच में सुंदर था. बिना जिया हुआ बचपन हमेशा हाथ थामे चलता है. जिन्दगी के किसी भी मोड पर अपने जिए जाने की इच्छा लिए. शायद आज उसी बचपन को जिए जाने का समय था. मुझे नहीं पता मैं क्या होने लगी थी. मैं रूई से भी हल्का महसूस कर रही थी. कहीं भी जाने को, कुछ भी करने को, कैसे भी चलने को, कैसे भी बात करने को आज़ाद. यहाँ कोई मुझे जज नहीं कर रहा था. अजय जी साथ थे लेकिन उनका होना इस आज़ादी को बढ़ा ही रहा था. वो जज नहीं करते, दखल भी नहीं देते, टोकते भी नहीं. उनकी अपनी दुनिया है वो उसमें रहते हैं. साथ होते हैं लेकिन साथ होने के भाव से मुक्त भी करते हैं. यह बिलकुल नया अनुभव था कि ऐसे भी हुआ जाता है क्या? सडक के किनारे खड़े होकर आइसक्रीम खाना हो, अनजाने लोगों से समन्दर किनारे तस्वीर खिंचवाना हो या नंगे पाँव गार्डन में भागते फिरना. कितना आसान है अपने जीवन को अपने लिए महसूस करना लेकिन कितना मुश्किल बना दिया गया है इसे. इसी उछलकूद के दौरान मन हुआ कि ओमकार से बात की जानी चाहिए. उसका नम्बर शुभा जी ने दिया था. उससे मिलना था लेकिन उसकी फ्लाईट थी इसलिए वो सुबह जल्दी ही निकल चुका था. मैंने उसे फोन लगाकर जैसे ही कहा मैं प्रतिभा कटियार बोल रही हूँ वो इतना खुश हुआ कि क्या कहूँ. उसने कुछ भी कहने की बजाय ‘ओ अच्छी लड़कियो’ गुनगुनाना शुरू कर दिया. अब हम दोनों हंस रहे थे. मैं उससे कह रही थी तुमने बहुत अच्छे से गया उसे और वो मुझसे कह रहा था कि मैंने बहुत अच्छा लिखा. जो भी हो पणजी की हवाओं में हमारी हंसी घुल रही थी, संतुष्टि से भरी हुई हंसी. संतुष्टि कि हम दोनों मिलकर एक सन्देश को ठीक से दूर तक ले जा पाए. 

अब हमे कारमोना जाना था. जहाँ हमने दो दिन रहने के लिए बुकिंग की थी. पंजिम से 4 घंटे की दूरी पर है यह. हमने तय किया कि हम लंच करने के बाद ही निकलेंगे. क्योंकि पहुँचते हुए शाम हो ही जानी थी. मेरा मन था कि सूरज डूबने से पहले मैं समन्दर के पास पहुँच सकूँ. रास्ते भर मैं पिछली गोवा यात्रा और इस गोवा यात्रा के दरमियाँ डोलती रही. जिन्दगी के सफर के बारे में सोचती रही. उन जगहों के बारे में भी जहाँ मैं और माधवी एक्टिवा दौड़ाया करते थे. जिन्दगी पर भरोसा करना चाहिए. यह सीख मुझे जीकर मिली है. इधर हमारी कैब रुकी, उधर मैं समन्दर की तरफ भागी. कहाँ सामान है, कहाँ दस्तखत करने है, किसे आईडी देनी है मुझे कोई मतलब नहीं था. सब जिम्मेदारी एक जिम्मेदार दोस्त के हवाले थी और इतनी सी देर में यह समझ में आ चुका था कि अपनी इस हरकत के लिए मुझे कोई डांट नहीं पड़ने वाली थी. इतना सहज साथ कम ही मिलता है जो आपको मुक्त तो करता ही है इस बात का कोई बोझ आपको नहीं देता. वो साथ तो होता है लेकिन बिना आपके स्पेस में जरा भी हस्तक्षेप किये. 

आखिर कारमोना का खूबसूरत जालोर बीच सामने था, डूबता सूरज था, मैं थी और था समन्दर. विस्मित, अवाक, मंत्रमुग्ध. इन दुर्लभ पलों के लिए कितना इंतजार किया है. ओह समन्दर...मेरे पाँव आगे बढ़ते ही जा रहे थे और समन्दर करीब आता ही जा रहा था. देर तक लहरों ने मुझे सहलाया, मेरे बीते तमाम जख्मों पर मरहम रखा. मेरे भीतर की नदी सामने के समन्दर में विलीन होने को व्याकुल होने को थी कि फोन की घंटी बजी. मुझे वापस लौटना था. मैंने समन्दर के कान में कहा, कल से हर वक्त तुम्हारे साथ ही हूँ.’ उसने हंसकर विदा किया.

जारी...

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-08-2019) को "जानवर जैसा बनाती है सुरा" (चर्चा अंक- 3434) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अजय कुमार झा said...

वाह हम भी पढ़ते हुए समुंदर की लहरों की तरह बढ़ते चले गए ।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हर एक पल को अमर बनाते हैं चित्र - विश्व फोटोग्राफी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...