Monday, March 4, 2019

बिना तुम्हारी मर्जी


बहुत चुपके से
बैठ जाता है वो
एकदम करीब आकर

पूछता नहीं तुम्हारी रज़ा
न देखता है उम्र
न समय, न हालात

वो जानता है कि तुम्हें
नहीं था उसका इंतज़ार न
बल्कि चिढ़ते ही थे तुम
उसके जिक्र से

फिर भी वो तुम्हारे काँधे से लगकर
एकदम सटकर बैठ जाता है
सामने डूबता सूरज
उगने लगता है तुम्हारे भीतर
कि तुम्हारी पूरी दुनिया बदलने लगती है

डरी सहमी आँखों में साहस तैरने लगता है
उदासी बाँधने लगती है पोटली
लौट आती हैं तमाम
अधूरी ख़्वाहिशें

तुम्हारी 'हाँ' या 'न' की परवाह किये बगैर
वो आता है और
चला जाता है तुम्हें साथ लेकर

हाँ, बिलकुल इसी तरह आता है प्रेम
और ठीक इसी तरह आती है मृत्यु।





5 comments:

Nitish Tiwary said...

सुंदर और भावपूर्ण रचना के लिए आपको बधाई।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
iwillrocknow.com

Kamini Sinha said...

हाँ, बिलकुल इसी तरह आता है प्रेम
और ठीक इसी तरह आती है मृत्यु।
सत्य ,मृत्यु और प्रेम कब दबे पाँव आता है पता ही नहीं चलता ,बहुत खूब.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (06-03-2019) को "आँगन को खुशबू से महकाया है" (चर्चा अंक-3266) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Bhaskardhindi said...

Very nice post Keep It Up good Work

संजय भास्‍कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।