Wednesday, July 11, 2018

ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...



एक पुराना ख़्वाब था, कच्चा सा ख़्वाब कि किसी रोज किसी पहाड़ी गांव में बारिश की धुन बरसेगी रात भर, बूँदें लोरियां सुनाएंगी और मैं सारी रात बूंदों की आवाज ओढकर चैन से सोऊँगी. शायद उस चैन की नींद की तलाश में नींदे भी खूब भटक रही थीं. आपको पता हो न हो आपके ख़्वाबों को जिन्दगी के रास्तों का पता मालूम होता है शायद. जिस वक़्त मैं अपने सपनों पर खुद ही हंस रही होती थी वो सपने हकीकत में ढलने की तैयारी में थे. बारिशों के गाँव में रहती हूँ इन दिनों. सिरहाने बूंदों का राग बजता है, सुबहें धुली-धुली और खिली खिली सी हैं...ये जो बरसे हैं रात भर तेरी याद के बादल हैं, मेरे ख़्वाब के बादल हैं...ये जो ठहरी हैं हथेलियों पर बूँदें ये तुम हो...

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

ख्वाबों के बादल और बारिश चैन की। सुन्दर।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13-07-2018) को "लोग हो रहे मस्त" (चर्चा अंक-3031) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'