Thursday, July 12, 2018

यह बारिश नहीं प्रेम है...


उस लड़की को भीगते देख 
मत होना नाराज उस पर 
न भागना उसकी मदद को 
न ताकीद देना उसे 
जल्दी घर पहुँचने की 
बुखार से बचने की 
कि उसने जान-बूझकर 
अपनी छतरियां गुमाई हैं 

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बहुत सारे कामों की लिस्ट जेहन में लिए
तेज़ क़दमों से सड़कें नापते हुए 
जिन्दगी की भागमभाग को सहेज पाने में 
सिरे से नाकाम होते हुए 
झुंझलाते हुए 
जब आप हों कहीं पहुँचने की जल्दी में  

मौसम साफ़ देख न रखा हो छाता ही साथ 
न रेनकोट ही 

कि अचानक आ जाए तेज़ बारिश 
संभलने का मौका न दे रत्ती भर 
तर-बतर कर दे सर से पाँव तक 
किसी दुकान में 
किसी बस स्टैंड में ठहरकर
बारिश से बचा लेने की 
गुंजाईश तक न मिले 

तो समझ लेना 
यह बारिश नहीं प्रेम है...

6 comments:

कही- अनकही said...

सच यह प्रेम ही है बारिश से, बूंदों से और खुद से। जिंदगी ही भागमभाग में बचा ही कंहा पाती है स्त्री खुद से प्रेम करने का वक़्त.... ढूंढती है चंद लम्हे बूंदों की टिप टिप चेहरे पर महसूसने के लिए....
बहुत सुंदर कविता प्रतिभा जी।
सादर
अपर्णा बाजपेयी

संजय भास्‍कर said...

अनोखी शब्दावली कितनी प्यारी है .. मनमोहक

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, समान अधिकार, अनशन, जतिन दास और १३ जुलाई “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रतिभा सक्सेना said...

यही सच है.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-07-2018) को "आमन्त्रण स्वीकार करें" (चर्चा अंक-3033) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बहुत बढ़िया