Wednesday, May 9, 2018

बेटी के नाम खत


ओ लाडली,

कोई ताकीद नहीं है यह 
बस एक बात है 
इसे सुनो सिर्फ बात की तरफ 
मानने के लिए नहीं, सोचने के लिए 

जो लोग डरायें तुम्हें 
उनसे डरना नहीं, 
भिड़ने को तैयार रहना 
ताकत जुटाना 
मजबूती से लड़ना और जीतना 
लेकिन बचाए रखना एक कोना संवाद का भी
कोमलता का भी 
हो सकता है उनके भीतर कोई दोस्त मिल जाए 
वो भय जो तुम्हें दिखा रहे थे 
उनका ही कोई भय निकले वो 
और अब तक हिंसक दिखने वाले 
दिखने लगें निरीह और मासूम 

जो विनम्रता और स्नेह से आते हों पेश 
उनसे मिलना मुस्कराकर 
करना बात मधुरता से 
भरोसा करना उन पर 
उनके कहे का रखना मान भी 
कहना अपना मन भी 
लेकिन बचाकर रखना एक संशय का कोना भी 
कि न जाने विनम्रता की परत
कब उतर जाए 
और स्नेह का कटोरा फूटा निकले 
उनके कोमल स्पर्श में कांटे उगते महसूस होने लगें 
खुद को महफूज रखने के लिए 
जरूरी है बचाए जाने 
थोड़े संशय और बहुत सारा भरोसा 

#बेटियां 



4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (11-05-2018) को "वर्णों की यायावरी" (चर्चा अंक-2967) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anonymous said...

Have you ever considered writing an e-book or guest authoring on other sites?
I have a blog based on the same information you discuss
and would love to have you share some stories/information. I know my readers would enjoy your work.
If you're even remotely interested, feel free to shoot me an email.

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत जरूरी है। सुन्दर।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...