Thursday, December 7, 2017

समय था सपने भी थे-गीता गैरोला


वो सितम्बर के अन्त की कोई उलझी हुई सी शाम थी। दिन छोटे और रातें बड़ी होने ही तरफ जा रही थी। मौसम में ठण्ड की हल्की सी खुनकी अपने आने का अहसास दिला रही थी। कई बार ऐसे दिन उदास लगते हैं। मुझे पहाड़ों की खुद लगने लगी। खेतों में धान की बाली झूम—झूम के अपनी खुशबू लुटा रही होंगी। झंगोरे—मंडुवे की बाल गबार (पकने) बैठी होंगी। और बस तय किया कि अब तो ऑफिस के, घर के, मन के सारे झंझटों से निकलना ही है और तुरन्त बात कर कमल के साथ बस यूं ही आवारागर्दी की योजना बन गई। सोचा इस बार हर्षिल जायेंगे। वैसे ही कहीं पर पैदल, कहीं जो भी सवारी मिल जाये। इस बार कुछ अच्छा सा एक साथ बैठकर पढ़ने की योजना बनी— उपन्यास, कहानी, कविता। घर में कोई था नहीं जिसे कोई सफाई देती। ऑफिस के लोगाें को कहा छुट्टी लेनी है, मन ऊब रहा है। कमल देहरादून ही था और बस हम दोनों ने तय किया कि 8 बजे उत्तरकाशी रोडवेज वाली बस में मिलेंगे। मैंने अपने पिट्ठू में कुछ खाने—पीने का सामान साथ रख लिया।
ये दिन कमल के लिए मुश्किल दिन होते थे। बदलते मौसम में ट्टदमा’ उसे बहुत परेशान करता था। अब उसे दमे की रोकथाम के लिए स्टेराइड लेने जरूरी हो गये थे। मैंने अपने सामान के साथ कामायनी, नवीन जोशी की लिखी दावानल और अज्ञेय की नदी की हीप भी रख ली। दावानल नवीन जोशी ने चिपको आन्दोलन के बारे में लिखी है और मुझे इस उपन्यास ने बहुत प्रभावित किया था। रोडवेज स्टैण्ड में हमें बस के बदले शेयर टैक्सी मिल गई। चलो जल्दी उत्तरकाशी पहुँच जायेंगे ये सोचकर हमने टैक्सी में सीट घेर ली। हालांकि कमल को इस तरह ठुंस कर टैक्सी में बैठना पसन्द नहीं आता। और एक बात— उसके पास पत्रकार होने के नाते रोडवेज की बस में प्रQी सफर करने का पास हमेशा रहता था। फिर भी मेरा मन रखने को कमल टैक्सी में चलने को तैयार हो गया। टैक्सी सीट भरते ही चल दी। महिला होने के नाते मुझे खिड़की वाली सीट पर कब्जा करने का मौका मिल गया। इस बात से कमल को बहुत चिड़ लगती थी, कहता था तू हमेशा अपना औरतपना दिखा देती है, वैसे समानता की बात करेगी।

सबसे खुशी की बात तो ये थी कि टैक्सी मसूरी होते हुए जाती है, तो रास्ता खुशनुमा हरा—भरा दिखने वाला था। मैंने कमल की बात अनसुनी कर दी और खिड़की के बाहर देखने लगी। बरसात के बाद सारा आलम धुला—धुला, खिला—खिला गहरी हरियाली से भरा था। असामन में बादलों के चट्ठबच्चे अठखेलियाँ कर रहे थे। सूरज पूरी ताब से दमक रहा था। हवा में सितम्बर की खुनकी तैर रही थी। टैक्सी सुवाखोली पार करती रौंतू की बेली होते हुए अलमस पार करने लगी थी। यहाँ पर जंगलों का घनापन खत्म हो जाता है। बरसात के बाद पहाड़ों पर हरियाली बरकरार है पर पेड़ बहुत कम हैं। अलमस के बाद मौर्याणा के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है और बांज—बुरांश के जंगल शुरू हो जाते हैं। मैंने जोर से सांस भरी। खेत अनाजों के पकने की महक से गहमहा रहे थे। मौर्याणा से चढ़ाई खत्म और उतराई शुरू होते ही टिहरी झील दिखाई दी। ओह ये झील मुझे कितनी डरावनी लगती है। इसने कितने गाँव कितने खेत निगल लिए और आज भी लगातार गाँव खेतों को निगल रही है। मेरी आँखें भर आई और मैंने झील की तरफ से मुँह फेर लिया। टिहरी झील के प्रति मेरी भावनाओं को कमल अच्छी तरह समझता है। उसने धीरे से मेरा हाथ दबा कर मुझे ये बताया कि वो समझ रहा है। चिन्याली सौड़ के अधिकांश खेत मकानों की भेंट चढ़ गये और पूरा सौड़ (मैदान) जिसमें एक समय उड़द की दाल की इतनी फसल होती थी कि चिन्याली उड़द की दाल की मण्डी समझा जाता था, एयरपोर्ट की भेंट चढ़ गया। फिर भी सड़कों के दोनों तरफ खेत धान, झंगोरों से लहलहा रहे थे। 

हम सवा दो बजे के लगभग उत्तरकाशी पहुँच गये थे। वरुणावत पर्वत की लैण्ड स्लाइड होने के बाद उत्तरकाशी का मिजाज बहुत धूल भरा हो गया है। जरा सी भी बारिश हो जाने पर पूरा बाजार कीचड़ भरा हो जाता है। गनीमत हुई कि तब बारिश नहीं हुई। यहाँ पता चला कि भटवाड़ी से आगे जाने का रास्ता टूटा हुआ है पर वहाँ पर काम चल रहा है, शायद खुल गया हो। हमने तय किया जहाँ तक जाया जा सकता है जायेंगे। खाना खाने को लेकर हर बार कमल और मेरे बीच तनाव हो जाता था। वो केवल पीली दाल और रोटी खाना पसन्द करता था और मैं ककड़ी, दही की माँग भी कर देती थी या स्थानीय सब्जियों की भी। कमल का कहना था दाल फिर भी सही रहती है बाकी चीजों का कोई ठिकाना नहीं होता कि कैसे बनी है। ख्ौर, जब तक साथ रहेंगे तब तक ये झगड़ा चलने वाला था। यहाँ से भी हमने शेयर टैक्सी ले ली और 3 बजे करीब चल पड़े। कमल बोला आज तो शायद रास्ते में ही रुकना पड़ेगा। देखा जायेगा वाले मूड में मैंने सिर हिला दिया।
पहाड़ी लोग सफर में अक्सर उल्टी करते हैं। सो टैक्सी चलते ही दो महिलाएँ और बच्चे शुरू हो गये। टैक्सी गंगोरी होते हुए गणेशपुर का पुल पार करने लगी। मुझे 1991 के भूकम्प के बाद का बुरी तरह टूटा पुल याद आ गया। रास्ते में खेत फसलों से भरे लहलहा रहे थे। नदी पार कई गाड—गदेरे, झरने अपनी पूरी आन से झाग उंडेलते बह रहे थे। हम नैटाला हिना पार कर मनेरी पहुँच गये। डिडसारी गाँव देख कर मुझे फिर भूकम्प वाली स्थिति याद आई। मैंने कमल को याद दिलाया—याद है बेलक वाली ट्रैकिंग में हमें डिडसारी की महिलाएँ मिली थी। कमल का चेहरा यादों से मुस्कराने लगा। सैंज— लाता पार करते हुए मल्ला भड़वाली पहुँच गये। सूरज अपना रोज का रास्ता पार कर अपने घर जाने को तैयार था। धूप का पीलापन मध्यम हो रहा था। हल्की लालिमा लिए धूप धीरे—धीरे ढल रही थी। भटवाड़ी में हमें पता चला कि अभी रास्ता साफ नहीं हुआ। कमल टैक्सी ड्राइवर के पास जा कर बोला कि यार दोस्त जब तक रास्ता साफ होता है हम पैदल आगे निकल जाते हैं, जब तुम आगे मिलोगे तो हम फिर तुम्हारी गाड़ी में बैठ जायेंगे। टैक्सी को भुक्की तक ही जाना था। टैक्सी वाले को किराया देकर हम दोनों ने अपने पिट्ठू लादे और चल पड़े। कमल बोला इस बार जूते ठीक हैं न, मैं बस मुस्करा दी। ठण्डी हवा के झोकों के साथ पैदल चलने में बहुत मजा आ रहा था। हम बातें करते—करते उस जगह पहुँच गये जहाँ पर सड़क टूटी थी। गाड़ियों की लम्बी लाइन दोनों तरफ लगी थी। हमने सोचा जब तक हमारी टैक्सी वाला यहाँ तक आयेगा हम आगे निकल जायेंगे। हमने लगभग चार किलोमीटर का रास्ता पार कर लिया था। हालांकि मौसम में ठण्ड बढ़ रही थी पर हमें चलने से पसीना आने लगा। दूर गदेरों में सांझ उतरने लगी थी। पौन पंछी शोर मचाते अपने घरों की तरफ लौट रहे थे। तभी टैक्सी वाला आ गया, हमारी सीटें खाली ही थी। हम बैठ गये। ये तो तय था कि आज की रात हमें भुक्की में गुजारनी होगी।
भुक्की पहुँचते अंधेरा हो गया। वहाँ पर उस समय बिजली भी नहीं आ रही थी। हमने सबसे किनारे वाले छोटे से ढाबे में अपने पिट्ठू उतारे और चाय की फरमाइश लगा दी। ढाबे वाला प्रौढ़ सा व्यक्ति था (अब मुझे उसका नाम याद नहीं है) वो बड़े से चूल्हे में दो मोटे—मोटे लकड़ी के तने जलाकर अपने खाने की तैयारी कर रहा था। अब यहाँ पर बारी कमल की थी, अब तक कमल ढाबे वाले भ्ौया से चाय के साथ खाने की जुगत भी लगा चुका था। मैंने चारों तरफ मोमबत्ती की रोशनी में नजर घुमाई। ढाबे के अन्दर एक चारपाई और बिस्तर भी पड़ा था। यहाँ बिजली कब से नहीं आई? तीन दिन हो गये साब! उत्तराखण्ड बनने के ग्यारह साल बाद भी गंगोत्तरी जाने वाली मुख्य सड़क में दी जाने वाली सुविधाओं के ये हाल हैं। देख के निराशा होती है। गरमा—गरम चाय पीने के बाद कमल ने बातें बना कर अपने रहने का इन्तजाम भी वहीं कर दिया। ढाबे वाला बोला बिस्तर तो है नहीं साब, आप होटल में चले जाओ। कमल ने उसे आश्वस्त किया कि हमें बिस्तर की जरूरत नहीं, हमारे पास अपने स्लीपिंग बैग हैं। हम जब भी ऐसी यात्राओं पर होते होटल में रुकने को महत्व नहीं देते थे। स्थानीय लोगों के साथ मिलना—जुलना उनसे बातें करना, उनकी बातें सुनना यही हमारी यात्राओं का मूल था। ढाबे में रहने की बात सुन कर कमल को लगा कहीं मेरा पारा हाई तो नहीं हो रहा है। उसने मेरी तरफ देखा और सब सामान्य स्थिति देखते हुए अपनी आदत के अनुसार जोश में आकर दाहिनी हथेली पर बांयी हथेली को जोर से मारते हुए बोला डन— और उस दिन हम उसी ढाबे वाले के यहाँ जमीन पर बिछी चटाई के ऊपर अपने स्लीपिंग बैग तान कर सो गये। 

थकान और ठण्डा मौसम होने के कारण करीब सुबह सात बजे मेरी नींद खुली। हमें दूर जाना होता तो जोशी जी पाँच बजे से ही तिकतिकाने लगते पर हमें बस थोड़ी ही दूर जाना था। इसलिए सात बजे तक सोने के लिए माफी मिल गयी। ढाबे वाले भाई ने चाय बनाई और कमल ने अपना मनपसन्द फैन भी मांग लिया। करीब आठ बजे हम पिट्ठू उठा ही रहे थे कि एक 14—15 साल की लड़की के साथ एक प्रौढ़ व्यक्ति जिसकी आयु लगभग 35—40 साल तक रही होगी, ढाबे में चाय पीने आये। लड़की दुबली पतली सी साड़ी, कुर्ती और वास्केट पहने थी। उसके गले में लटका तिमणियां (तीन साने के गोलों की लाल दानों वाली माला) बता रहा था कि उसका ब्याह हो गया। मेरा उस बच्ची को देखकर पता नहीं क्यों दिल भर आया। मैंने पिट्ठू जमीन पर रख दिया और गौर से उसे देखने लगी। तभी मेरा दिल बड़ी जोर से धड़का अरे ये बच्ची तो कम से कम चार पाँच महीने की गर्भावस्था में लग रही है। मुझे यकीन नहीं हुआ और मैंने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। उसके साथ वाला व्यक्ति कुछ काम से ऊपर बाजार की तरफ चला गया था। मुझे लगा उससे बात करने का ये अच्छा मौका है। यहाँ आ बेटा बैठ जा, कितने बरस की है तू? दिदी 15 बरस की— मैंने उसके पेट की तरफ इशारा किया ब्याह कब हुआ तेरा— दिदी तीन बरस हो गये। ओह तो 12 बरस में लड़की का सत्यानाश कर दिया था उसके माँ—बाप ने। मेरा दिल गुस्से और नाराजी से भर गया। अब कितने महीने हंै? चार पूरे होते हैं दिदी। ये तो मेरा दूसरा बच्चा है। पिछले साल एक बच्चा हो के मर गया। ओह हम तो अपनी 14—15 साल की बच्ची को माहवारी में पैड तक लगा कर देते हैं और एक ये बच्ची है 15 बरस की उम्र में दूसरे बच्चे की माँ बनने वाली है। साथ में तेरे पिताजी हैं क्या, मैंने सोचा आज उस आदमी का दिमाग जरा ठीक करती हूँ। नहीं दिदी वो मेरा आदमी है— हे माँ मैं जोर से बोली कैसा मरा तेरे बाप का, ये क्या किया उसने। दिदी हम बहुत गरीब हंै। मेरा बाबा भी क्या करता। वो धीरे से मेरे पास सरकी और हाथ की आड़ बनाकर कान में बोली— मैंने तो देखना भाग जाना है, रहना थोड़ी है मैंने इसके लिए। जब ये बच्चा हो जायेगा न तब इसे छोड़ कर भाग जाना है मुझे। कहाँ जायेगी! मैंने डर कर पूछा— जाऊंगी न देश। एक लड़का है वो मुझसे ब्याह करेगा। ओह अभी सपने देखने शुरू ही किये हैं इसने। तभी वो बोली मेरे आदमी ने दो ब्याह किये थे पर बच्चे नहीं हुए। तब मुझसे ब्याह किया। बहुत गन्दा है ये, बहुत परेशान करता है। मैंने रहना ही नहीं है इसके लिए। उसने अपने नन्हे सपनों को विश्वास से मुझे शेयर किया। तभी वो आदमी आता दिखा। मैंने उसका नाम पूछा— सुमली और वो अपने सपनों की पोटली मुझे थमा कर बस में बैठकर चल दी।
मैंने कमल से पूरी बात कही, वो भी द्रवित हो गया। मैं सोचती रही— कहाँ जायेगी ये भाग कर। कौन देगा इसका साथ। कहीं किसी ने बेच दी तो? और मेरी सांस अटकने लगी। इतनी प्यारी बच्ची, इतनी छोटी— ये है हमारे देश में औरतों की वास्तविक जगह कि बच्चा पैदा करने के लिए एक प्रौढ़ 12 साल की बच्ची को खरीद लेता है और अपनी गरीबी को दो—चार महीने दूर करने के लिए एक बाप 12 साल की बच्ची को बच्चे पैदा करने के लिए बेच देता है। कहाँ है हमारे महिला विकास के दावे। हम लगातार उस बच्ची और उसकी परिस्थितियाँ, उसके सपनों की बातें करते रहे और उसके भविष्य के लिए डरते भी रहे। हम हर्षिल पहुँच गये थे पर मेरा मन बहुत उदास था। हमने सोचा था दो दिन हम केवल कुछ लिखेंगे उसको एक दूसरे को पढ़ायेंगे, सुधारेंगे। किसी उपन्यास पर गहन बात विमर्श करेंगे और एक नई मानसिक ऊर्जा लेकर लौटेंगे। पर सुमली की स्थिति देख कर उदासी छा गई।
मुझे याद आया कि 16 जनवरी 1986 को मैं और कमल पहले भी हर्षिल आये थे। उस बार हम एस.पी.एफ. (स्पेशल पुलिस फोर्स) के मेहमान बने थे और विल्सन हाउस में रहे थे। मेरे पिताजी पी.ए.सी. में ही पोस्टेड थे इसलिए मैं एस.पी.एफ. के कैम्पस में गई और उनकी वी.आई.पी. मेहमान बनी थी। अब विल्सन हाउस जल गया है। दो बड़ी—बड़ी चट्टानें वैसे ही शान से खड़ी थी जैसे तब विल्सन हाउस के पास खड़ी थी। विल्सन ब्रिटिश आर्मी का भगोड़ा सिपाही था। वो हर्षिल आया और उसने पहली बार टिहरी के राजा से लीज पर देवदार के जंगलों का सौदा किया। भागीरथी में स्लीपर बहाकर उसने हजारों देवदार के पेड़ ब्रिटिश राज्य को बेचे। उसने हर्षिल गाँव की ही एक महिला लाली से शादी की। जंगल से हजारों की संख्या में मोनाल पक्षी मारे और उनके रंग—बिरंगें परों का अंग्रेजों को व्यापार कर अमीर बन गया। मोनाल के परों को अंग्रेज महिलाएँ अपने हैट में लगाया करती थी। विल्सन ने मसूरी में भी एक घर बनाया। हर्षिल में सेव के बगीचों की शुरूवात भी विल्सन ने ही की थी। स्थानीय लोग उसे हूल साब कह कर बुलाते थे। उसी विल्सन के देवदार की लकड़ी से बने आलीशान घर में हम 1986 में रह चुके थे। और ठीक 25 साल बाद मैं और कमल फिर हर्षिल में थे। तब हर्षिल छोटा सा हुआ करता था। अब काफी फैलाव हो गया है। यहाँ भी हमने एक छोटे से ढाबे जैसे होटल में अपने रहने का इन्तजाम किया और बसन्ती दीदी से जो हर्षिल में ही रहती है मिलने चल दिए। पता चला बसन्ती दीदी अभी घर पर नहीं है।
बसन्ती दीदी से मेरी पहचान उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान हुई थी। दीदी यहाँ की बहुत सक्रिय महिला हैं। वो गाँव की महिलाओं के संगठन की अध्यक्ष थी। उनके घर पर न मिलने के कारण हम बागोरी गाँव की तरफ चल दिये। यहाँ पर ठण्डा मौसम था। सेव की फसल टूट गई थी। हर्षिल बाजार में अधिकांश हरे सेबों की पैकिंग चल रही थी। यहाँ की मुख्य फसल राजमा से खेत लदे हुए थे। चौलाई की लाल—लाल बालें हरीतिमा के साथ गजब का मेल बना रही थी। तभी मेरेे कटे हुए बालों को देख कर एक लड़का हमसे आकर बातें करने लगा। मैडम जानती हंै यहाँ राम तेरी गंगा मैली की शूटिंग हुई थी। चलिए आपको उस लोकेशन पर ले जाता हूँ जिस झरने में मन्दाकिनी नहाई थी। मैंने मुस्करा कर मना कर दिया पर कमल तो चीज ही कुछ और है। उस लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला यार दोस्त जब मन्दाकिनी यहाँ आई थी तब तो तू पैदा भी नहीं हुआ होगा और हम यहीं के हंै दोस्त, परदेशी नहीं हैं। लड़का झेंप गया और बोला ठीक है भाई साहब फिर आप यहाँ क्या करने आये। दोस्त हम दोनों आवारा हैं और आवारागर्दी करने आये हैं। हमने छोटा सा लकड़ी का पुल पार कर बागोरी गाँव में प्रवेश किया। वहाँ पर लगे झण्डे बता रहे थे कि ये बुद्धिस्टों का गाँव है। यहाँ पर जाड़ लोग निवास करते हैं। 1962 से पूर्व इनके चीन और तिब्बत से व्यापारिक सम्बंध थे। ये अपनी लद्दू बकरियों पर सामान लाद कर व्यापार करते थे परन्तु अब कुछ नौकरी पेशा हैं, कुछ ऊन का काम करते हैं।
जाड़ों के दिनों में इस गाँव के अधिकांश लोग डुण्डा चले जाते हैं। इधर के सालों में इस गाँव के अधिकांश परिवार डुण्डा में ही बस गये हैं। या तो उन्होंने गाँव छोड़ दिया है या कभी—कभी बागोरी आते हैं। हम चलते—चलते गाँव के ऊपर एक समतल जगह में बैठ गये। कमल अपनी ट्रैकिंग वाली पानी की बोतल में पानी भर लाया। हमने बाजार से खरीदे सेव खाये। इसी बीच मैंने नवीन जोशी का लिखा उपन्यास दावानल निकाल लिया और कमल से बोली आज इस पर बात करेंगे। सबसे पहले कमल ने मोबाइल निकाल कर नेटवर्क देखा और तुरन्त नवीन जोशी को फोन लगाया। उन्हें बताया कि दावानल की बहुत बड़ी फैन मेरे पास बैठी है और आज हम दोनों इस पर विस्तृत बात करने वाले हैं। वास्तव में दावानल की स्थानीयता, चिपको आन्दोलन से जुड़े मेरे स्नेही परिचित पात्रों ने मुझे उपन्यास से सबसे अधिक आत्मीय बनाया। मैंने उपन्यास के कुछ अंश पढ़ कर सुनाये। दावानल की शुरूवात रतन सिंह रीठा गाड़ी द्वारा गाये एक लोक गीत भंवर उड़ाला बलि से होती है और उपन्यास का अन्त भी इसी गीत से होता है।

इस तरह प्रारम्भ और अन्त ने मेरे अन्तरमन को छू लिया था। हमने इस बात पर बहुत बहस की कि चिपको आन्दोलन कैसे विश्व राजनीति का हिस्सा बन कर केवल पर्यावरण का आन्दोलन बन कर रह गया। आन्दोलन की आत्मा में स्थानीय लोगों की स्थानीय संसाधनों पर निर्भर आजीविका का जो सवाल था वो बड़े—बड़े प्रश्नों के पीछे खो गया। उसके बाद जल—जंगल—जमीन से जुड़े हर आन्दोलन जिसमें स्थानीय लोगों की आवाज शामिल होती है वो ग्लोबलाइजेशन के पीछे खोते जा रहे हैं। ये हमारी चिन्ता का विषय था। कमल और मैं इसमें क्या कर सकते थे। ये हमने तय किया कि हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए जीने लायक स्थितियों को बनाने के लिए हर संघर्ष में साथ रहेंगे। उसके बाद मैंने कामायनी के दो सर्ग पढ़ कर सुनाये और कमल सुनता रहा। उसे दुख हुआ कि उसने अब तक कामायनी को गम्भीरता से क्यों नहीं पढ़ा। कमल ने कामायनी को अपनी लोकगाथाओं से जोड़ने की कोशिश की और गरूड़—गरूड़ी की लोक कथा सुनाई। हम कामायनी और गरूड़—गरूड़ी की कथा के जल—प्लावन का जोड़ बनाते रहे। इतिहास में मानव जन्म को ढूंढते रहे और सूरज ने कहा अब बस अपने ठिकाने लौट जाओ। एक बेहतर समाज में जीने लायक परिस्थितियाँ बनाने के सपने ले कर।

जारी...

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

निरन्तरता है पर कहीं पर दुख: भी होता है अभी भी। हम कहाँ पर हैं आज भी।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-12-2017) को "महँगा आलू-प्याज" (चर्चा अंक-2812) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'