Thursday, November 9, 2017

फांस


तुम्हारी याद किसी फांस सी धंस गयी थी
टीसती रहती थी लगातार
टप टप टप...टपकता रहता था कोई दर्द

निकालने की कोशिश में
उसे और भीतर धंसा देती थी
दर्द की लहक बढ़ जाती थी

यह दर्द आदत बन चुका था
इस दर्द से मुक्ति की लगातार कोशिश
असल में फांस को भीतर धकेलने की कोशिश
दर्द को जिन्दा रखने की कोशिश थी
खुद को भी

एक रोज फांस को निकालने के बहाने जब
स्मृतियों की महीन सुई से उसके संग खेल रही थी
वो फांस निकल ही गयी एकदम से

धीरे-धीरे खत्म हो गया दर्द
जीवन भी...

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (11-11-2017) को "रोज बस लिखने चला" (चर्चा अंक 2785) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'