Friday, September 1, 2017

ताप, बारिश, इश्क शहर


देह पर से ताप यूँ गुजर रहा है
जिस तरह तुम्हारी याद गुजरती है
उनींदी आँखों की कोरों से
टप्प से टपक जाने से ठीक पहले

कानों में बारिशें किसी राग सी घुल रही हैं
मध्धम मध्धम
हरारत भरी आँखों में शरारत घुल रही है
बारिश के आगे फैलाई हथेलियों पर
गिरती हैं हल्की गर्म सी बूँदें
जैसा बारिश ने लिया हो हथेलियों का बोसा

बारिश में भीगे रास्ता भटककर मुंडेर पर आ बैठे पंक्षी
कनखियों से देखते हैं बारिश को भी मुझे भी
कि उनको अपने स्पर्श की गर्माहट देना चाहती हूँ
वो भी शायद करीब आने को आकुल हैं

देह पर से ताप यूँ ही नहीं गुजर रहा है
गुजर रहा है बहुत कुछ संग संग...

6 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, स्व॰ हबीब तनवीर साहब और ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-09-2017) को "वक़्त के साथ दौड़ता..वक़्त" (चर्चा अंक 2716) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बहुत सुन्दर कविता

ARUN SATHI said...

खूब

Tejkumar Suman said...

अति सुन्दर भाव।

Anonymous said...

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Kudos!