Thursday, February 9, 2017

कि तुम मेरी कोई नहीं...


जब मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूँ

मैं उठकर पानी पीता हूँ
खिड़की से दिखने वाली सड़क को
देर तक देखता रहता हूँ
सड़क, यूँ लगातार घूरे जाने से उकताकर करवट लेती है
और मैं आसमान देखने लगता हूँ
खाली आसमान
उस खाली आसमान में
मैं गले में रुकी अपनी पुकार लिखना चाहता हूँ
तुम्हारा नाम...

गले की नसों से रगड़ते हुए तुम्हारा नाम
शायद छलनी हो रहा था
कि मुझे तुम्हारा सीत्कार सुनाई देता है
मैं फिर से पानी पीता हूँ तुम्हारे नाम को
गले की पकड़ से आज़ाद करता हूँ...

मैं तुम्हें छूना चाहता हूँ
तुम्हारे दुपट्टे की किनारी पर लटकते घुन्घरुओं को
हथेलियों पे रखना चाहता हूँ
तुम्हारी पलकों पर अपने ख्वाब रखना चाहता हूँ
लेकिन मैं तुम्हें छुए बगैर लौट आता हूँ
क्योंकि मैं तुम्हें छूने की अपनी इक्षा को
सहेजना चाहता हूँ

तुम्हारी आवाज़ को सुनने की खातिर
मैं जंगलों में भटकता हूँ
बारिशों से मनुहार करता हूँ
घुघूती, बुलबुल और मैना से कहता हूँ
वो सुनें तुम्हारी आवाज़
और मुझे सुनाएँ
कि मैं एक फोन भी कर सकता था
लेकिन मैं उस आवाज़ की तपिश को
किस तरह अपने कानों में सहेज सकूँगा
सोचकर फोन हाथ में घुमाता रहता हूँ
चाय पीता हूँ और
तुम्हारे साथ के बारे में सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ प्रिये कि एक रोज
चांदनी रात में जब तुम
अपनी कलाई में टिक टिक करती सुइयों को अनसुना करके
अपने 'अकेलेपन' से उलझ रही होगी
एक ख्याल बनकर मैं तुम्हारी तन्हाई को तोड़ दूंगा
तुम्हारा समूचा अकेलापन तुमसे छीन लूँगा
और तुम्हारे साथ हम दोनों के होने का जश्न मनाऊंगा

लेकिन उसके बाद के छूटे वीराने को सोचकर
सहम जाता हूँ
रोक लेता हूँ उस ख्याल को
जो तुम्हारे अकेलेपन में सेंध लगाने को व्याकुल है
कि अपना अकेलापन तुमने हिम्मत से कमाया है

मैं लौटना चाहता हूँ तुम्हारे ख्याल की दुनिया से दूर
कि करने को बहुत काम हैं
कई महीनों के बिल पड़े हैं जमा करने को
गाड़ी की सर्विसिंग
कितनी अनदेखी फ़िल्में, दोस्तों की पेंडिंग कॉल्स
जवाब के इंतजार में पड़ी मेल्स
घरवालों के उलाहने
कि लौटते क़दमों को तेज़ी से बढाता हूँ
खुद से कहता हूँ
कि मैं तुम्हारा कोई नहीं और तुम मेरी कोई नहीं,

तभी अंदर एक नदी फूटती है...
बाहर फूलों का मौसम खिलखिलाता है
मैं इस नदी को बचाऊंगा
धरती पर फूलों के मौसम को बचाऊंगा...

5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-02-2017) को
"हँसते हुए पलों को रक्खो सँभाल कर" (चर्चा अंक-2592)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "तीन सवाल - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kavita Rawat said...

तभी अंदर एक नदी फूटती है...
बाहर फूलों का मौसम खिलखिलाता है
मैं इस नदी को बचाऊंगा
धरती पर फूलों के मौसम को बचाऊंगा...

..सच है प्रकृति से तारतम्य बिठा दिया तो दुनिया भूल जीने का सलीका सीख लेता है इंसान ..

बहुत सुन्दर ...

Onkar said...

बहुत सुन्दर

Onkar said...

बहुत सुन्दर