Thursday, June 15, 2017

इतनी भी अकेली नहीं होतीं 'अकेली औरतें'


जिम्मेदारियों से घिरी दौड़ती-भागती
खुद गिरती, खुद ही उठती
खुद रोती और खुद अपने आंसू पोछकर मुस्कुराती
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं

उनके आसपास होती हैं
सहकर्मियों की कसी गयीं फब्तियां
मोहल्ले में होने वाली चर्चाओं में उनका जिक्र
बेवक्त, बेवजह पूछे जाने वाले बेहूदा सवाल
और हर वक्त मदद के बहाने
नजदीकी तलाशती निगाहें
अकेली औरतों को
कहाँ अकेला रहने देता है संसार

अकेली औरतों के गले में मंगलसूत्र की जगह
लोगों को लटका नजर आता है 'अवेलेबल' का बोर्ड
उनके आसपास बिछ रहा होता है
अश्लील बातों का जाल

वो लाइन में लगकर खा रही होती हैं धक्के
पंचर स्कूटर को घसीट रही होती हैं खड़ी दोपहर में
मदद को यूँ तो बिछा होता है एक साजिश का संसार
लेकिन वे अपनी खुद्दारी को करती हैं सलाम
और सीखती हैं एक नया सबक हर रोज
होती हैं थोड़ी सी और मजबूत
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं
अकेली औरतें पिच्च से थूक देती हैं
जमाने भर का कसैलापन
ताकि भीतर की मिठास बची रहे
वो बेफिक्र गुनगुनाती हैं
जीती हैं अपने अकेलेपन को
चाहे अकेलापन उनका चुनाव हो या न हो
वो खड़ी होती हैं जिन्दगी के सामने पूरी ताकत से
अकेलेपन का उत्सव मनाती हैं
उनका हँसना और खुश रहना
चुनौती लगता है समाज को
वो हर रोज़ खड़ी करता है नई मुश्किलें उनके लिए

विवाहितायें, विवाहित होने की गौरव गाथाएं
उन्हें सुनाते हुए इतराती हैं बार-बार
लेकिन अनायास उभर आई अपनी अकेलेपन की
पीड़ा छुपाने में नाकामयाब भी होती हैं
अकेली औरतें मुस्कुराकर देखती हैं
पित्रसत्तता की लम्बी उम्र की कामनाओं
में डूबी स्त्रियों के मासूम अहंकार को
अपने अकेलेपन को अपनी शामों को घोलते हुए
वो जीती हैं कुछ मुक्कमल लम्हे
सहेजती हैं अपना कीमती अकेलापन
अकेली औरतें
इतनी भी अकेली नहीं होतीं...

Saturday, June 10, 2017

जन्मदिन मुबारक ज्योति !



भरी दोपहर में न अमिया चुराईं, न गुट्टे या सिकड़ी के खेल खेले, न रस्सी कूदे न साथ में पापड़ बड़ियाँ बनायीं... नोट्स जरूर लिए एक-दूसरे से, इम्तिहान में पास बैठने का फायदा उठाया एक दुसरे से पूछापाछी की, कैसेटों की अदला बदली की, सिनेमा हॉल के दौड़ लगायी, कभी घर में बताकर कभी बिन बताये, पॉकेटमनी के पैसों से हिसाब लगाकर सस्ते शो को तलाशते हुए देखीं तमाम फ़िल्में भी...हज़रतगंज की सड़कों पर अपने मन के कितने कोने खोले, कितने सवालों की गिरहें खोलीं।

बरसों में गिनने बैठूं तो उम्र कम पड़ जाएगी हमारी दोस्ती के साल कितने हुए यह गिनने में क्योंकि हमने लम्हों में बरसों को जिया है, कभी-कभी तो सदियों में भी जिया है. वक़्त का हर रंग हमने साथ देखा है, वक़्त की हर करवट के साक्षी बने हैं.

वो लैंडलाइन के ज़माने में घंटों फोन पर बात करने वाले दिन थे, जब फ़ोन का बिल आने पर हम घरवालों से मुंह चुराते फिराते थे...और कभी किसी को समझा ही नहीं पाये कि दिन भर कॉलेज में साथ रहने के बाद, घंटों फोन पर बात करने के बाद भी आखिर ऐसा क्या बचा रह जाता है कि हमारी टीवीएस चैम्प (मेरी नीली, तुम्हारी ग्रे) एक दूसरे के घर की तरफ भागती थीं...कभी-कभी हम एक दूसरे को क्रॉस भी कर जाते थे. तुम मेरे घर पहुँच जाती थीं और मैं तुम्हारे.

हम अपने भीतर के भटकावों में से निकलने के लिए शहर की सड़कों पर भटकने लगे...कितनी बारिशों ने हमें साथ में भिगोया, फिर धूप और हवा ने ब्लोअर बनकर सुखाया भी. सच कहूँ, मैंने हमेशा तुमसे सीखा ही. इस रिश्ते में मैंने ही हमेशा तुमसे लिया, बहुत कुछ.

सबसे बड़ा था वो भरोसा कि अगर तुमने कुछ कहा तो उस पर दोबारा सोचने की ज़रूरत लगी ही नहीं. हालाँकि पसंद के मामले से लेकर वैचारिक मामलों तक में हमारी दिशाएं हमेशा विपरीत रहीं। हाँ, पिछले कुछ बरसों में हमारे विचारों में कुछ साम्यता बनने सी लगी है फिर भी हमारे स्वभाव के कंट्रास्ट मुसलसल जारी हैं और हमारा उन कंट्रास्ट को जीने का ढंग अब भी वही है...

याद है अभी हाल ही में तुमने कहा था, 'हिसाब-किताब के मामले में तुम पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता...बेकूफ ही हो एकदम...' कितना हंसी थी उस रोज़.

हमें एक-दूसरे को कभी बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि मन का मौसम कैसा है...हमें कभी एक दूसरे को जताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि कितनी ज्यादा वैल्यू है एक-दूसरे की. कभी लम्बी खामोशी में भी पढ़ा तुमने मुझे और कभी खूब बक-बक में भी सुनी मेरी ख़ामोशी...

मुझे याद नहीं तुमने कभी मेरी तारीफ में या मेरे किसी काम (किसी लिखे पढ़े ) की तारीफ में कोई कसीदे कभी काढ़े हों, हमेशा कुछ जो कम था वो बताया....या तुम्हारा यह कहना कि 'कुछ मजा नहीं आया...' या बस 'उन्हू' कहना...कितना सार्थक है वो सब...

जिन्दगी के सबसे काले दिनों में तुम्हारा साथ रौशनी सा रहा, और जिन्दगी के उजले दिनों में काला टीका बनकर रहीं तुम. ‘अच्छा ज्यादा बनो मत’ तुम्हारा कहना हो या मेरा पूछना कि ‘कहीं मुझमें भी अहंकार तो नहीं आ गया, क्योंकि अहंकार न होने का भी अहंकार कितने धीमे से उतरता है नसों में पता नहीं चलता है’ और तब तुम कहती कि ‘जब आएगा तो सबसे पहले मैं ही बताऊंगी...चिंता मत करो...’ कितनी बड़ी आश्वस्ति है इसमें.

तुम 'हाँ 'कह देती हो तो लगता है कुछ ठीक हो ही जायेगा...तुम नहीं जानती कि तुम्हारा होना कितना मायने रखता है मेरी जिन्दगी में...मेरी शादी के वक़्त हर पल तुम्हें ही तलाशती मेरी नज़रें हों या तुम्हारी विदाई के वक़्त निशांत को गुस्से से घूरती नज़रें...सबमें तुम ही तो थीं...

शहर बदले, जिन्दगी बदली, जिन्दगी में नए रिश्ते शामिल हुए...नए हालात बने...कितने उतार, कितने चढ़ाव...लेकिन तुम्हारा साथ...हमेशा ताकत बनकर खड़ा रहा...
आज अपनी बेटियों की दोस्ती को देखती हूँ तो आँखें ख़ुशी से छलक पड़ती हैं...हमारे प्यार को, हमारी दोस्ती को हमारी बेटियों ने सुभीते से संभाला है...दीत्या का मुझे 'मौसी' कहना...पहली बार ‘मौसी’ शब्द को महसूस करना था...तुम कहती थीं वो तुम्हारे बिना किसी के साथ कहीं नहीं जाती और वो बिना झिझक मेरे साथ चल पड़ी थी...याद है बैंगलोर की वो शाम? और मैं कहती थी कि शिवी मेरे बिना किसी पास रुकती नहीं और फिर उसका तुम्हारे घर दो दिन मजे से रुकना, एक दिन और रुक जाने का इसरार करना।

शिवी जब यह कहती है कि अगर ज्योति मौसी का फोन है तो कोई बात नहीं वरना किसी से बात करना अलाउड नहीं है तो कितना सुख होता है. जानती हो, घर आने के बाद जो बेटू का वक़्त होता है न, उसमें सिर्फ नानी और ज्योति मौसी से ही बात करने की परमीशन है मुझे...

जब ज़माने के तमाम रिश्तों की कलई उतर रही हो, तमाम लोग हालात के चलते बदल गए हों एक हमारा रिश्ता ही है जिसकी चमक लगातार बढती जा रही है...

सच जिन्दगी में एक ऐसा दोस्त कितना कीमती होता है जिसके आगे कुछ भी कभी भी कैसे भी कहा जा सके जिसकी सहमती ज़रूरी न हो जिसे कैसा लगेगा यह सुनकर का डर न हो...आज तुम्हारे जन्मदिन पर इससे बेहतर तोहफा मुझे नज़र ही नहीं आता...इन बच्चियों में अपने दोस्ती को रूपांतरित होते देखना....इससे बेहतर क्या होगा...

जानती हूँ तुमको इस तरह कहा जाना पसंद नहीं है फिर भी मैंने कब तुम्हारी हर बात मानी है....नाराज़ न होना, हो भी गयी तो क्या जरा डांट ही लोगी न, एक बार और सही...

जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...हमें साथ साथ बूढा होना है...बच्चों से बहुत सारी डांट खानी है और बहुत सारा साथ में जीना है...लड़ना है...बढ़ना है....जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...बहुत से बहुत ज्यादा प्यार....

Friday, June 2, 2017

यह कोई हीरा नहीं

न न मत मांगो
यह कोई हीरा नहीं
तुम्हारे बाज़ार में
कोई कीमत नहीं इसकी
मेरा गम है ये
मेरी तन्हाई है
मैं अपने गम से जिंदा हूँ...

Thursday, June 1, 2017

आई एम नॉट अ गुड गर्ल....ओके?


अठारह बरस पहले जब शादी के वक़्त विदा हुई थी तो रो-रोकर धरती हिला दी थी...कई महीनों तक उदासी साथ लिए घूमती रही...हालाँकि माँ उसी शहर में थीं जिसमें मैं, यानी लखनऊ ही. फिर भी यह कहना या सुनना ही अजीब लगता था कि 'माँ के घर जा रही हूँ' या 'आई हुई हूँ...' क्योंकि शादी के पहले घर का एक ही अर्थ होता था...माँ का एक ही अर्थ होता था...

माँ से बिछुड़ना हमेशा विदाई की याद दिला देता है...'इत्ती बड़ी हो गयी हो अब भी रोती हो' अब बेटी कहती है...विदाई के वक़्त यही बात मुझसे दस बरस छोटे भाई ने कही थी...लगता है मैं कभी बड़ी नहीं होउंगी...कम से कम माँ को लेकर तो कभी नहीं...


माँ मजबूत हैं, वो रोती नहीं...रोने पर फटकारती हैं, गले नहीं लगातीं...वो मुझे मजबूत बनाना चाहती होंगी...लेकिन मैं रही रुतड ही...आज माँ को फिर से स्टेशन के लिए रवाना करते हुए एक हुडक कलेजे में उभरी जो कई दिनों से भीतर ही भीतर घुमड़ रही थी शायद...

माँ मेरे पास रह सकें इसलिए पापा ने अकेले रहना सीखा वो भी इस उम्र में...परिवार की यही ताकत है...दूर रहकर भी एक दूसरे के साथ खड़े रहने की ताकत. माँ आज लखनऊ गयी हैं पापा के पास...फिर लंदन जाएँगी भाई भाभी के पास....फिर लौट आएँगी मेरे पास....सब कुछ अच्छा है फिर भी माँ के बिना घर अच्छा नहीं लगता...

बिना डांट खाए दिन बीतेगा अब...ये भी कोई बात हुई....ओके ओके, कोई मत समझाओ...आई एम नॉट अ गुड गर्ल....लव यू माँ...

Thursday, May 4, 2017

मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे ...



ये इनायतें गजब की ये बला की मेहरबानी
मेरी खैरियत भी पूछी किसी और की जबानी...

मौसम सुबह से संगत बिठाने में लगा था, इंतजार था कि बस हथेलियों पर रखा था, कभी भी टूटने को तैयार...शाम वादे के मुताबिक अपने साथ लेकर आई थी शुजात खान साहब को...जो राग यमन छिड़ा तो दून की वादियों में कोई नशा तारी होने लगा...'तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे' के साथ ही उन्होंने देहरादून की खूबसूरत शाम चुरा ली और उसे पुरकशिश अंदाज़ में ढाल दिया...'ये इनायतें गजब की ये बला की मेहरबानी,' 'खुसरो दरिया प्रेम का,' 'पिया घर आये' ' छाप तिलक सब छीनी,'' मन कुन्तो,'' वैष्णव जन ते' से होते हुए शुजात साहब हमारी सुध बुध हमसे चुरा चुके थे...आखरी में' रंगी सारी गुलाबी चुनरिया...मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे ' सुनाकर वो देहरादून को अपना दीवाना बना चुके थे...

हम जैसे पहले से उनके दीवानों को उनसे मुलाकात की इक हसरत अभी बाकी थी. हालाँकि पता नहीं होता इन मुलाकातों का कि क्या बात करनी है, क्या कहना है, क्या पूछना बस कि साथ को महसूसना और क्या..अपनी भीगी सी सकुचाई आवाज़ में मैंने कहा, 'शिष्या हूँ सितार की...' बात पूरी होने से पहले वो कहते हैं 'मैं भी शिष्य हूँ सितार का...' चंद लम्हों की मुलाकात थी, मुक्कमल मुलाकात...लौटते वक़्त चाँद हंसकर बोला, 'अब तो खुश हो न?' मैं तबसे अब तक सिर्फ मुस्कुरा रही हूँ...मुसलसल...


Sunday, April 30, 2017

रात है..,चाँद है...इंतजारी है...



पुर नूर बशर कहिये या नूरे खुदा कहिये
अल्फाज़ नहीं मिलते सरकार को क्या कहिये...

दिन सूरज के सात घोड़ों पर सवार होकर उगते हैं इन दिनों. किसी छुट्टी का मुंह देखे जमाना बीता. एक दिन में न जाने कितने दिन उगते हैं कि न खुद का होश न किसी की खबर बस कि भागते जाना, पहुंचना कहीं नहीं...हमेशा की तरह. यूँ कहीं पहुँचने की कोई इच्छा भी नहीं.

किसी सुबह की मुठ्ठियों में कैद बूंदों को जबरन छीन लेती हूँ...चेहरे पर गिरी चंद बूंदों की नमी बीते न जाने कितने सूखे दिनों की आंच को मध्धम करने को काफी थी...मेरे मन के शहर को इस शहर से बेहतर कौन जानता है भला कि राह चलते शहर की हवायें पीठ के दर्द को सहला जाती हैं और गालों पर रखती हैं एक बोसा, बेचैन मन को धीरज धरने को कहती हैं.

धीरज कोई बहुत अच्छी चीज़ भी नहीं कि कब तक धरे कोई धीरज. अचानक एक दोस्त याद आता है जिसे धीरज कहकर चिढाया था कभी...फ़िलहाल..कोई धीरज नहीं है जीवन में...लेकिन मैं जीवन में हूँ, और जीवन मुझ में भी...पेड़ों की ओट से झांकता चाँद अपने खेल खेलने में माहिर है...वो मुझे भटका रहा है...मुझे भटकना भा रहा है...

इस भटकाव में शुजात खान साहब की आवाज़ साथ है...सितार वो बजा रहे हैं जिस्म में तरंगे दौड़ रही हैं मानो...सितार पर बजाये सारे राग याद आते हैं..उँगलियों में मिजराब पहने कितना समय बीत गया...रोज सितार को हसरत से देखती हूँ फिर कलाई में बंधी घडी की भागती सुइयों को देखती हूँ...

घडी की सूइयों की मुताबिक मैं भागती हूँ...सितार भीतर बजता है, शुजात खान साहब का इंतजार भी बजता है..वो दादरा सुनने की ख्वाहिश बढती जाती है जिसे पहली बार सुना था उनकी आवाज में...'रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे...मोहे मारे नजरिया सांवरिया रे...' कोशिश भी की थी सितार पर बजाने की लेकिन वो कोशिश ही थी...कच्ची कोशिश जिसके नाकाम होने में भी सुख रहा..इश्क में नाकाम होकर आप इश्क को बचा लेते हैं ठीक उसी तरह जैसे ज़िन्दगी में नाकाम होकर आप जिन्दगी बचा लेते हैं, मैंने बचा ली है इस दादरा के साथ अपने दिल की लगी भी...

फ़िलहाल...रात है..,चाँद है...शुजात खान साहब की इंतजारी है...

Friday, April 28, 2017

प्यार ही मेरा धर्म है, तुम ही उसके रीति रिवाज़



इंग्लैण्ड के प्यारे रूमानी कवि जॉन कीट्स (1795-1821) ने बहुत छोटी सी ज़िन्दगी जी. लेकिन उस छोटी सी जिंदगी के रंग इतने गाढ़े थे कि उनकी चमक उन रंगों की महक आज तक फ़िज़ाओं में मौजूद है. 23 बरस की उम्र में कीट्स  को पड़ोस में रहने वाली फैनी ब्राऊन से प्यार हो गया. लेकिन ज़िन्दगी कीट्स के हिस्से में इतनी कम आई थी कि प्यार बस प्यार ही रहा, किसी रिश्ते के अंजाम तक नहीं पहुँच सका. ट्यूबरकोलोसिस ने कीट्स की जान ले ली लेकिन उनका प्यार अब भी कायम है... उनकी कविताओं में, उनके खतों में, कुछ इस ख़त में भी...

प्रिय फैनी,

तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. तुम्हें पता है, मैं सब कुछ भूल जाता हूँ सिवाय तुम्हारे। तुम्हारे बिना ज़िन्दगी ठहरने लगती है, मैं तुम्हारे बिना कुछ भी सोच नहीं पाता। तुमने मुझे अपने भीतर समाहित कर लिया है.

मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे मैं तुम्हारे भीतर घुलता जा रहा हूँ. मैं यह सोचकर अचंभित होता हूँ कि किस तरह लोग धर्म के लिए अपनी जान दे देते हैं. यह सोचकर मेरे रोएं खड़े हो जाते हैं कि किस तरह लोग ऐसा कर पाते होंगे. फिर मैं सोचता हूँ कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ शायद लेकिन मेरा धर्म क्या है...

मेरा धर्म है प्यार, मैं प्यार के जान लिए दे सकता हूँ, मैं तुम्हारे लिए जान दे सकता हूँ. प्यार ही मेरा धर्म है और इस धर्म के सारे रीति रिवाज़ सिर्फ तुम हो.

तुम मुझे अपने प्यार की ताक़त से सबसे दूर चुराकर ले जा चुकी हो, जिसका विरोध मैं करना भी नहीं चाहता।

तुम्हारा
कीट्स


Sunday, April 2, 2017

दुःख को विदा



एक स्त्री दुःख को विदा करने जाती है
और देखती रहती है उसे
देर तक दरवाजे पर खड़ी

दुःख भी जाता नहीं एकदम से
ठिठका रहता है ड्योढ़ी पर
ताकता रहता है उसका मुंह
कि शायद रोक ले...

धीरे-धीरे वो अपनी हथेली
उसकी हथेलियों से छुड़ा लेती है
दुःख सर झुकाए देर तक
बैठा रहता है दरवाजे पर

स्त्री के गालों पर बहती नमी
टिमटिमा उठती है
चांद की रौशनी में

इतने बरस के साथी
उदास
डूबे हुए आकंठ स्मृतियों में

भीतर रखा फोन घनघनाता है
वो भारी क़दमों से कमरे में लौटती है
दुःख का हाथ छुड़ाकर
दुःख से कहती है ‘विदा...’

उठाती है फोन
खिल उठता है उसका चेहरा
फोन के स्क्रीन पर 'प्रेम' चमक रहा है
‘मैं जानती थी तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगे’
वो भावुक होकर कहती है

दरवाजे से वापस आकर मुस्कुराता है दुःख...

Thursday, March 30, 2017

हर दस्तक को गौर से सुनना...


दरवाजे पर पड़ती हर दस्तक बताती है
दस्तक देने वाले के भीतर की दुनिया का पता

हौले से दरवाजे पर कोई रखता है हाथ
होते-होते रह जाती है कोई दस्तक अक्सर
दस्तक देने वाले को पता होता है
कि दस्तक हुई नहीं
फिर भी
वो बेआवाज़ दस्तक को सुन लिए जाने के इंतजार में रहता है
पुकार से पहले सुन लिए जाने के सुख के इंतजार में

हथेलियों को आपस में रगड़कर
दरवाजे के खुलने का इंतजार करता आगंतुक
दोबारा दस्तक देने को हाथ बढ़ाता है

दोबारा दरवाजे पर हाथ ज[रखनेसे ठीक पहले रुक जाता है
यह सोचकर कि कहीं सोया न हो दरवाजे के उस पार का संसार

कहीं कोई झगड़े के बाद के अबोले में न हो
कहीं ऐसा न हो कि नींद के बाद का मीठा आलस घेरे हो उसे
कहीं दरवाजे की थाप से मीठा आलस बिखर न जाए

चुपचाप बिना दस्तक दिए वापस लौटने से पहले
दरवाजे को उदास नज़रों से देखता है
इस उदासी में एक राहत भी है
कितनी हिम्मत जुटानी होती है यूँ दरवाजों पे दस्तक देने को

कभी कोई बेधडक दस्तक भी सुनाई दे सकती है दरवाजे पर
जोर-जोर से, दरवाजे पर पड़ती दस्तकें
साधिकार, साभिमान दस्तकें
उनमें हड़बड़ी होती है अंदर आने की
सिर्फ दीवारों और छत के भीतर आने की,

कभी उदास दस्तकें भी सुनना
दरवाजे भीग जाते हैं इन दस्तकों से
ये दरवाजों पर हौले-हौले गिरती हैं
गिरती रहती हैं
मनुहार होती है इन दस्तकों में
बिना मांगी माफियाँ होती हैं
बहुत उदास होती हैं ये दस्तकें

बहुत रूमानी होती हैं कुछ दस्तकें
बस एक बार 'ठक' से बजती हैं दरवाजे पर
उन्हहू दरवाजे पर नहीं, सीधे दिल पर
दरवाजे के उस पार असंख्य फूल खिल उठते हैं
पर दरवाजा खुलता नहीं
दरवाजे के इस पार मिलन के न जाने के कितने पुल बनने लगते हैं
लेकिन दरवाजे पर दस्तक दोबारा नहीं उभरती
दरवाजे के इस पार से उस पार की दुनिया महकने लगती है
दरवाजा खुलता नहीं
मन खिलते रहते हैं
अभिमानिनी दरवाजा 'एक और' दस्तक का इंतजार करता है
अभिमानिनी आगंतुक बिना दोबारा दस्तक दिए
दरवाजे के खुलने का इंतजार करता है
दोनों तरफ एक हलचल भरा मौन उभरता है,
दरवाजा खुलता नहीं
आगंतुक लौट जाने से पहले
दोबारा दस्तक देने को हाथ उठाता है
दस्तक से ठीक पहले खुलता है कोई दरवाजा...
खुलती है कोई दुनिया भी

दरवाजे पे उभरी दस्तकों में कई बार दर्ज होता है 'भय'
हर एक दस्तक दिल में हजार संदेह पैदा करती है
ये दस्तकें असल में
खोले जाने का अनुरोध नहीं हैं, खुली धमकी हैं
दस्तकों का एक पूरा संसार है
हर दस्तक में कुछ चेहरे पैबस्त होते हैं
कुछ एहसास भी
लेकिन बहुत ज़रूरी है उन दस्तकों को सुना जाना जो
रह गयीं दस्तक बनते-बनते
किसी चेहरे में किसी एहसास में ढलते-ढलते
कभी दरवाजों से ज़रूर पूछना
उन अजनबी आहटों का हाल
जो बेआवाज़ लौट गयीं।


Monday, March 27, 2017

एक चम्मच प्यार


प्रेम
उसे मालूम था कि
वो स्त्री है दुनिया की सबसे मजबूत स्त्री
जो है उसके प्रेम में
इसलिए उसने
सारे निर्मम प्रहार किये उस पर ही

एक चम्मच प्यार
क्या फर्क पड़ता है जिन्दगी में
अगर कम हो जाए 
एक चम्मच प्यार
सिवाय इसके कि जिन्दगी
‘जिन्दगी’ नहीं रहती...


विसर्जन 
राख सिर्फ फुंके हुए जिस्म की ही
नहीं बहाई जाती नदियों में

फुंके हुए अरमानों की राख
आंसुओं की खारी नदी में
बहाई जाती है जिन्दगी भर...


Tuesday, March 21, 2017

जीने से भी ज्यादा जियूँगी


सफर फिर पांव में बंधा है. साथ बंधा है अकेलापन भी. सफर से पहले कितना कुछ समेटना होता है. सफर पूरा होने पर कितना कुछ होता है करने को. लेकिन सफर के ठीक बीच में राहत के सिवा कुछ भी नहीं. लोगों का रेला है, रेल है खुद से मेल है. हरी सुरंग के बीच से गुजरते हुए, पहाड़ों पे हाल में गिरी बर्फ की तासीर हथेलियों पे लिए रेगिस्तान की तरफ का रुख किया है. रुख किया है असल में अपनी ओर. न जाने कितना सूखा भर गया है पिछले दिनों. बारिशों की लड़ियों से खेलते हुए भी, चितचोर चैत से लाड़ लड़ाते हुए भी, शायद खुद से लड़ते-लड़ते थकने लगी हूँ. जिंदगी से लड़ते-लड़ते ऊबने लगी हूँ. 

खैर, सफर है, आराम है...साथ कोई नहीं. इसका भी सुख है. कभी-कभी किसी का न होना भी कितना ज़रूरी होता है. वैसे कोई कभी भी कहाँ होता है, होने के तमाम वहम ही तो होते हैं.

सफर मोहक है हमेशा की तरह. खाना है, भूख नहीं, पानी है प्यास नहीं. बर्थ है नींद नहीं। बस छूटते हुए रास्तों को देखने का सुख है. जिंदगी जीने की तलब है. यूँ हारना अच्छा नहीं लगता, थकना अच्छा नहीं लगता. तरकीबें भिड़ाती रहती हूँ. धूमिल की कवितायेँ साथ हैं... दिन के बीतने और रात के करीब आने के बीच हथेलियों में इंद्रधनुष खुलता है. नागेश कुकनूर की फिल्म 'धनक.' कबसे लिये फिर रही हूँ, लेकिन देखने की फुर्सत और इच्छा दोनों का मेल होने के इंतज़ार में हूँ. फिल्म खत्म हो चुकी है... बस इतना कह सकती हूँ कि एक बार फिर नागेश से प्यार हो गया है. पूरी फिल्म सुख में डुबो चुकी है. मैं फ़िल्में देखते हुए खूब रोती हूँ. धनक पूरे वक़्त आँखें भिगोये रखती है. सुख का रुदन, जिंदगी में डूबने का सुख...

नागेश के लिए मन में शृद्धा जागती है. कितनी बारीक नज़र है और कितना सादा सा संवेदनशील दिल. पिछले किसी सफर में नागेश की ही 'लक्ष्मी' देखी थी आज तक सिहरन महसूस होती है और आज ये धनक....मीठी सी मासूम सी फिल्म. शाहरुख़ तुम पर कभी दिल-विल आया नहीं मेरा लेकिन धनक में तुम नहीं होकर भी दिल चुरा ले गए...

हाँ नागेश, जीने से भी ज्यादा जियूँगी मैं, उड़ानों से भी आगे उडूँगी...पक्का प्रॉमिस...

( सफर, इश्क़ शहर से गुलाबी शहर )

Friday, March 17, 2017

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर...


आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो...

- जां निसार अख्तर

Wednesday, March 15, 2017

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र


ढेर सारे भ्रष्टों में किसी एक भ्रष्ट का चुनाव है लोकतंत्र
संविधान नाम की किताब का एक पन्ना है लोकतंत्र

बदलाव का एक सुपरहिट नारा है लोकतंत्र
बेईमान, हत्यारों, बलात्कारियों के आगे हारा है लोकतंत्र

सच्चाई और ईमानदारी की जमानत ज़ब्ती का ऐलान है लोकतंत्र
भीड़ को हांकने का साधा हुआ हुनर है लोकतंत्र

हुल्लड़बाज़ी और हंगामा है लोकतंत्र
जनता का फटा हुआ पाजामा है लोकतंत्र

छुटभैये नेताओं की सहालग है लोकतंत्र
मीडिया के पेट का राशन है लोकतंत्र

सुना तुमने? कहते हैं ईवीएम की कोई कारस्तानी है लोकतंत्र?
वैसे दिमागों को बरगलाने की शैतानी तो है ही लोकतंत्र

उंगली पर लगा एक गाढ़ा नीला निशान है लोकतंत्र
हालात के बद से बदतर होने जाने का प्रमाण है लोकतंत्र

इरोम की हार का शोकगीत है लोकतन्त्र
हत्यारे के चेहरे की कुटिल मुस्कान है लोकतंत्र।

खो चुका है अपने सारे रंग लोकतंत्र
अब तो बस एक बदरंग तस्वीर है लोकतंत्र

वोटर को उंगलियों  पर नचाने का खेल है लोकतंत्र
झूठ की चाशनी चटाने का नाम है लोकतंत्र

सुनो, सम्भल के इसे छूना, इसकी है बडी तेज़ धार
देश ही नहीं रिश्तों पर भी इसने किया है खूब प्रहार।

(अगड़म बगड़म )


Thursday, March 9, 2017

क्यों है एग्जाम का हौव्वा?



इम्तिहान...एग्जाम...परीक्षाएं...सर पर सवार हैं...किसके? विद्यार्थियों के तो नहीं. फिर किसके सर पर सवार हैं? माँ बाप के, टीचर्स के, स्कूलों के, नौकरी देने वालों के? किसके सर पर सवार हैं ये जबकि चिंता तो सबको है कि बच्चे परेशान न हों, समाज बेहतर बने, शिक्षा का मकसद सिर्फ रोजगार की ललक में इकठ्ठा की गयी डिग्री न हो. तो फिर झोल कहाँ हैं? क्यों हमारे बच्चे मार्च आते ही डरने लगते हैं और जून आते ही खुश हो जाते हैं... यह सवाल बराबर खाए जाता है. जैसे और दूसरे तमाम सवाल खाए जाते हैं.

मैं जिस तरह सोचती हूँ उस तरह जीने का प्रयास करते हुए उसे महसूस करने का प्रयास भी करती हूँ. उस महसूसने के आधार पर सोचने को बदला भी है कई बार. कि सोचने और बात करने और जीने के बीच अगर कोई डिस्कनेक्ट है तो कुछ तो गड़बड़ है. तो ऐसा ही मैंने परीक्षा शब्द के साथ करने की कोशिश की. मेरे भीतर जो डर, जो भय 'परीक्षा' शब्द को लेकर बोये जा चुके थे उनका मैं कुछ नहीं कर सकी लेकिन यह प्रयास ज़रुर किया कि यह डर किसी और को न दूं. मैंने अपनी बेटी को कभी भी इस शब्द के घेरे में फंसने नहीं दिया.

जब क्लास के सारे बच्चे, बच्चों के पैरेंट्स घबराये होते थे हैं और मेरी बेटी मजे से खेल रहे होते हैं. एग्जाम को मुंह चिढाना उसे आता है. कल पेपर है इसलिए खेलना और टीवी देखना कभी बंद नहीं हुआ. न ही सोने से पहले हमारा गप्प मारने का सिलसिला. मुझे याद नहीं मैंने कभी भी उसे कहा हो पढाई करने को. बस यह कहा कि 'मजा न आये तो मत पढना, और मजा आने में अगर कोई दिक्कत आये तो ज़रूर बताना.' यह सिलसिला जारी है.

लेकिन समाज घर में सीखे हुए को चुनौती देने को तैयार रहता है. आज वो आठवी क्लास का इम्तिहान देने गयी है वैसे ही जैसे रोज जाती है, न कोई टीका, न दही चीनी न स्पेशल वाला गुड लक कि दिन अच्छा बीते और खूब मजे करो स्कूल में इस कामना के साथ रोज भेजती हूँ आज भी भेजा. लेकिन सवाल इतना भर नहीं है.

अब कुछ सवाल उसके भी हैं. मैंने उसे एग्जाम से डरना नहीं सिखाया लेकिन समाज एग्जाम नाम का डंडा लेकर पीछे पड़ा हुआ है. एक हौव्वा बना है चारों तरफ. बच्चे परेशान हैं, टीचर्स डरा रहे हैं, नाइंथ में आओ तब पता चलेगा...एग्जाम अब उसके अपने क्लास में नहीं होते. अलग से बड़े हाल में होते हैं. साथ में बैठे दोस्त अनजाने चेहरे बन जाते हैं, एग्जाम के दौरान आसपास अपने जाने पहचाने टीचर्स की जगह अनजान खडूस चेहरे टहलते हैं.

मेरा उसे बचपन से यह समझाना कि 'एग्जाम कुछ नहीं होता यह भी रोज के जैसा एक दिन है जिसे एन्जाय करो' धराशाई होने लगता है. वो पूरी हिम्मत से, लगन से मेरी सीख को बचाने की कोशिश करती है लेकिन कभी कभी हारने लगती है. तब मुझसे लडती है, सवाल करती है, 'क्यों इतना इम्तिहान का हौव्वा बना रखा है सब लोगों ने. जो आपने हमें सिखाया है वही तो पूछना चाहते हैं न? कोई नया पूछने में तो दिलचस्पी है नहीं किसी की? तो पूछ लो न आराम से, इतना डराते क्यों हो?' पेपर में सब आता होता है फिर भी काफी देर तो इस 'खतरनाक' माहौल से एडजस्ट करने में लग जाता है. वो उदास हो जाती है. कहती है 'मम्मा मुझे एग्जाम से डर नहीं लगता लेकिन ये एग्क्साम टाइम स्कूल जाने में मजा नहीं आता. '

एक रोज उसने बताया उसके क्लास एक बच्चा एग्जाम हॉल में बेहोश हो गया. वो डर के मारे बेहोश हो गया था. बहुत सारे बच्चों के पेट में दर्द होने लगता है, चक्कर आना, उलझन, घबराहट होना सामान्य बात है. बेटी कहती है, मेरे सारे दोस्त इतने परेशान होते हैं एग्जाम टाइम में कि मुझे भी बुरा लगने लगता है. क्या एग्जाम शब्द का यह हौव्वा दूर नहीं कर सकते आप लोग? मेरी बोलती बंद हो जाती है.

मुझे उन पैरेट्स के चेहरे आते हैं जो बच्चों के कम नम्बर आने पर बुझ जाते हैं और बहुत अच्छे नम्बर लाने के लिए टीचर्स से कहते हैं 'आप मारिये इसे जितना चाहे लेकिन नम्बर कम नहीं आने चाहिये.' जिनके लिए बच्चे का रिपोर्ट कार्ड उनका स्टेट्स सिम्बल है. वो पैरेंट्स भी याद आते हैं जिन्हें बच्चों को स्कूल भेजने का मतलब अच्छे नम्बर से पास होकर ही पता है.

इस अच्छे नम्बर के संसार पर बहुत सवाल हैं? रिपोर्ट कार्ड में अच्छे नम्बर जमा करने के चक्कर में जिन्दगी के रिपोर्ट कार्ड से नम्बर लगातार कम किये जा रहे हैं...यह तो ठीक नहीं है न? हमारे बच्चे परेशान हैं उन्हें इस नम्बर रेस से मुक्त तो करो.

Wednesday, March 8, 2017

सहिराना जादू और रंग अपने होने के...


'तुम्हारी हथेलियों में क्या है?' लड़की ने अपनी नजरें नई कोंपले वाले पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर टिकाते हुए पूछा.
लड़के ने मुस्कुरा कर कहा, 'रंग'
लड़की ने मुस्कुराकर कहा, 'दिखाओ...'
लड़के ने हथेलियां आगे कर दीं...सुर्ख लाल रंग से भरी हथेलियां।
'क्या ये रंग पक्का है?' लड़की ने पूछा
लड़के ने उसके गाल पर अपनी उंगली से लाल लकीर खींचते हुए कहा, 'एकदम पक्का.'
लड़की मुस्कुराई. सांझ ने अपनी चादर में उन दोनों को समेट लिया।

चैत दरवाजे पर था और फागुन अपनी पोटली बांध रहा था। एक मौसम के आने और दूसरे मौसम के आने के बीच का जो समय होता है जिसमें जिंदगी के राग रहते हैं उसी मौसम में जब स्त्रियां जिदंगी के पक्के रंग ढूंढ रही थीं रंग जो जेहन को नई तरबियत से नई समझ से रंगें, जो रूहे सुखन बनें।

जाते फागुन ने चैत की हथेलियों पर आम की बौर रखीं, गेंहूं की बालियां रखीं, सरसों की लहक रखी, मिट्टी की महक रखी, जिंदगी जीने की शिद्दत रखी, मुश्किलों से लड़ने का हौसला रखा और कान में हौले से कहा, 'इस धरती का कोना-कोना प्यार से रंग देना।'

चैत बस दो कदम की दूरी पर था, उसने अपनी हथेलियों में फागुन की दी सारी नियामतों को सहेजते हुए मुस्कुराकर कहा, 'फिक्र न करो दोस्त, मैं ऐसा ही करूंगा' और ऐसा कहते हुए उसने धरती की तमाम स्त्रियों की ओर देखा। धरती के कोने-कोने को प्रेम के रंग में रंगने का काम स्त्रियों के सिवा कौन कर सकता है भला। इतनी सदियों से इस रंग को सहेजने का बीड़ा तो स्त्रियों ने ही उठाया है। आज दो-दो विश्वयुद्ध का सामना कर चुकी इस दुनिया में अगर अब तक प्रेम पर यकीन कायम है तो स्त्रियों के ही कारण। विध्वंसक समय और समाज में भी लोग उम्मीदों पर भरोसा करना चाहते हैं तो स्त्रियों के ही कारण।

मौसम हों, त्योहार हो या कोई और दिवस सब स्त्रियों ने अपने कंधों पर उठा रखे हैं। लेकिन एक बात बिगड़ गई इस सबमें कि स्त्रियां प्रेम सहेजते-सहेजते, धरती को प्रेम के रंग में रंगने की कोशिश करते-करते खुद को बिसराने लगीं। भूलने लगीं कि जिंदगी का हर रंग कच्चा है, हर राग अधूरा अगर वो खुद की कीमत पर सहेजा गया हो। घर, परिवार, समाज की उम्मीदों का बीड़ा उन्हें थमाकर कहीं उनके रंगों को धुंधला तो नहीं कर दिया गया।

स्त्रियों ने अब अपने लिए रंग तलाशने शुरू किये। पक्के रंग। उन्होंने सूरज से कभी न छूटने वाला सिंदूरी रंग लिया, खेतों से लिया मन को हर्षाने वाला हरा...गेहूं की बालियों सा सुनहरा रंग उन्होंने कानों में पहना और सूरजुखी सा पीला अपने गालों पर रंगा...एक एक कर उसके आंचल में आकर सजने लगे जीवन के सारे रंग...

स्त्रियों की टोली जब टेसू के रंग लिए नदी किनारे पर पहुंचीं तो नदियों ने इठलाकर अपनी हथेली आगे कर दी। टेसू के रंग नदियों में घुलने लगे...रंग धरती पर दौड़ने लगे...स्त्री विमर्श के शोर गुल से अनजान टेसू के रंगों से रंगी हथेलियों वाली स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा...'स्वाभिमान...!'

फागुन ने मुस्कुराकर कहा, चलो देर से सही यह रंग तुम्हें मिल तो गया...स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा, 'हां, हमने यह रंग जिंदगी सहेजते-सहेजते कहीं संभालकर रख दिया था. जैसे घर संभालते-संभालते रख देती हैं तमाम जरूरी चीजें खूब संभालकर। और संभालकर रखी हुई चीजें अक्सर नहीं मिलतीं। फिर अचानक कुछ और ढूढते वक्त कुछ और मिल जाता है जैसे आज फागुन की रंगत ढूँढ़ते ढूंढते, जिंदगी को झाड़ते पोछते वक्त आज यह रंग मिल गया है। अब जो मिल गया है ये रंग तो इस रंग को खोने नहीं देंगे। इस रंग में कितनी प्यारी खुशबू है न?' स्त्रियों ने मुस्कुराकर कहा। बसंत और फागुन दोनों उनके चेहरे पर आई चमक को देख रहे थे। तमाम रंगों में सजी संवरी हंसती खिलखिलाती स्त्रियां यूं तो हमेशा ही लुभाती हैं, उन पर हर रंग निखरता है, वो हर रंग में खिलती हैं लेकिन यह रंग जिसने आज की स्त्रियों का हाथ थामा है उसकी चमक ही अलग है। इक जरा सा खुद का हाथ थामते ही, इक जरा सा खुद को महसूसते ही कैसे सारे रंग जीवन के निखरने लगे...

'तुम्हें यह रंग मिला कहां,' बसंत ने पलकें झपकाकर पूछा, स्त्री ने कहा, 'आज मेरे महबूब शायर साहिर का जन्मदिन है। मैं जब उनकी नज्मों के करीब गई तो वहीं से यह रंग मिला. उनकी नज्में पलटते-पलटते सारे रंग फीके पड़ने लगे कि मोहब्बत के रंग गाढ़े होने लगे, गाढ़े होने लगे अना के रंग, मज़लूमों के, इंसानियत के ह.क में खड़े होने की इच्छा के पक्के रंग, गुरबत से, अन्याय से लड़ने की हिम्मत के रंग. कच्ची उम्मीदों के रंगों से दिल बेजार था बहुत तो किनारा किया झूठे वादों और कच्ची उम्मीदों के रंगों से...अब यूं ही बाजार में बिकने वाले रंगों से न खेलेंगे हम होली न मनायेंगे कोई स्त्री दिवस...कि रंग अपने होने के, खुशबू अपने अस्तित्व की और जेहन में घुलती साहिर की नज्.मों का जादू...'

लड़का अगले रोज फिर आया था उसके पास...इस बार उसकी हथेलियों में लाल, पीले, हरे, नीले रंग नहीं थे...उसके हाथों में थे गालिब, फैज., कैफी, मज़ाज, और साहिर के नगमे...लड़की की आंखों की चमक बढ़ गई थीं...फागुन की महक भी...उसने साहिर की नज्.म को चूमते हुए कहा, जन्मदिन मुबारक मेरे महबूब शायर...!

धरती पर अब नदियां नहीं रंग बह रहे थे, पेड़ों की शाखों पर अब फूलों में राग खिल रहे थे...इस रंग में रंगने से धरती की कोई स्त्री कोई पुरुष बच न जाये ध्यान रखना..

http://epaper.dailynews360.com/1129301/khushboo/08-03-2017#page/1/1

Wednesday, March 1, 2017

पलाश के फूल दिल्ली और मौन में रिल्के...



मौसम वही है जाती हुई सर्दियों का...पलाश आसमान से लेकर ज़मीन तक छाये हुए हैं. इनको देखकर मन चिहुंक उठता है. जाने कैसा रिश्ता है इनसे। जिस तरह ये ऊंची-ऊंची टहनियों पर खिलकर मुस्कुराते हैं उतनी ही शिद्दत से सड़क पे बिछने के बाद मुस्कुराते हैं .. धरती हो या आसमान रंगत एक सी मुस्कुराहट एक सी... बेपरवाह, बेख़ौफ़। मैं इनके इश्क़ में हमेशा सुधबुध खो बैठती हूँ । रास्तों से भटक जाती हूँ, इनके चटख रंग जैसे हाथ पकड़कर किसी और ही दुनिया में ले जाते हैं, वही दुनिया जहाँ शायद मैं हमेशा से जाना चाहती हूँ...

दिल्ली पहुँचते ही पहली मुलाकात पलाशों से ही हुई दूसरी वरयाम सिंह जी से. वरयाम जी अब दूसरे नहीं लगते।उनसे जब भी मिलती हूँ जिस कदर लाड़ से वो मुझे, मेरे सपनों को, मेरी गलतियों को सहेजते हैं उनसे बहुत अपनापा हो गया है. उन्हें देख लगता है कि 'असल में बड़ा होना क्या होता है'.

वो मुझे पलाशों के साथ छोड़कर हँसते हुए चले जाते हैं, ये कहकर 'आना आराम से, मैं हूँ.' वो मुझे समझते हैं. इस दुनिया में कितने कम लोग किसी को समझते हैं.

झरते हुए पलाशों के बीच खड़े होकर लगता है मानो किसी ख्वाब की खिड़की खुल गई हो..मैं उस खिड़की से कूदकर भागी हूँ,  ख्वाबों के जंगलों में. ख्वाब भी तो बड़े आड़े-टेढ़े हैं... फूलों से ढंकी धरती के ख्वाब, नफरतों के साए से भी दूर जिन्दगी की मोहब्बत में डूबे लोगों की दुनिया का ख्वाब.

मेरे आसपास से लोग आ-जा रहे हैं. अजनबी लोग भी जाने-पहचाने लग रहे हैं, जाने-पहचाने भी अजनबी से. बूढ़े बाबा बड़े जतन से चाय बना रहे हैं... अदरक इलायची की खुशबू हवाओं में घुल रही है... मैं पलाश के जंगल में गुम हूँ चाय की खुशबू में कैद...मेरे दोनों हाथ जितने पलाश बटोर सकते थे, बटोर चुके हैं... पलाश बटोरते समय सोचती हूँ, 'काश कुछ और फूल बटोर पाती'. आखिर पलाशों से एकदम पट चुकी धरती पर बैठ गयी हूँ...'खुश हो?' कोरों से बहती बदली पूछती हूँ. चुप रहती हूँ....


बाबा आवाज़ लगाते हैं, 'बिटिया चाय पी लो आकर'
मैं उनको देख मुस्कुराती हूँ. मुझे उनकी आवाज धरती की सबसे प्यारी आवाज़ लगती है मानो वो चाय पीने को नहीं जी लेने को कह रहे हों.  मैं जितने पलाश समेट सकती हूँ सब समेटकर बाबा के पास चाय पीने पहुँचती हूँ. मैं अपनी ख्वाब की दुनिया में  इस जगह का 'पलाश कॉर्नर' रखना चाहती हूँ,  दुनिया के नक़्शे में यह 'मंडी हाउस' है. साहित्य अकादमी का गलियारा गुलज़ार है. कोई कोना मैं भी तलाशती हूँ... जहाँ मैं अपने पलाश भी संभाले रह सकूँ।

रूस का एक संसार खोलती हूँ. बोरिस पास्तेर्नाक डूबकर रिल्के की कवितायेँ पढ़ रहे हैं... मारीना रिल्के को ख़त लिख रही है...रिल्के मौन में हैं... पुश्किन की कविता 'टू द सी' वहीं है आसपास।

पलाश अब भी मुस्कुरा रहे हैं... दिन बीत चुका है, ओहो...'चुका' नहीं है, बीता है. बीतकर चुपचाप बैठा है पास में.
बीते हुए दिन का हाथ पकड़कर मुस्कुराती शाम में प्रवेश करती हूँ. हम दोनों दौड़ते फिरते हैं... झर चुकी शाखों पर नन्ही कोपलों का जादू फैल चुका है... हम उस जादू के साये में भागते फिरते हैं यूँ ही, बेवजह, शाम कब रात हुई, रात कब आधी रात पता नहीं, इतना पता है कि पलाश अब भी हाथ में खिले हुए हैं, उन्हें सिरहाने रखकर नींद की ओर देखती हूँ. बीता हुआ दिन पास आ बैठता है, कहता है, 'बीत जाने के बाद भी इतना बचा हुआ था मैं? मालूम नहीं था...' उसकी आँखों में चमक है, मेरी आँखों में नींद।

(२५ फ़रवरी  २०१७ , दिल्ली )

Monday, February 27, 2017

पलाश से भरी धरती भी उदास हो सकती है



पलाश से भरी धरती भी उदास हो सकती है
तारों भरा आसमान भी हो सकता है गुमसुम

मुस्कुराहटों के मौसम के संग भी
आ सकती हैं निराश बारिशें
तमाम सभ्यताओं के बारे में जान लेने के बाद भी
बची रह सकती है असभ्यता
रास्ता मिलना 
जिंदगी में भटक जाने का भरम भी हो सकता है
हिदायतें हमारे जिए हुए डर हो सकते हैं
और क्रोध हमारी असमर्थता
दिल का टूटना 
पत्थरदिल दुनिया में दिल के बचे रहने की मुनादी भी हो सकती है
और दर्द का होना हो सकता है
जीवन में बची हुई आस्था का होना
प्रार्थनाएं खोई हुई उम्मीदों के लिए भटकना भी हो सकता है
और तुम्हारा न होना तुम्हारा होना भी हो सकता है.

(शाम की चाय के संग अगड़म बगड़म )

Tuesday, February 21, 2017

भटकने का सुख मामूली नहीं होता...



कभी तो लगता है बरसों से कोई लम्हा नहीं मिला और कभी यूँ भी होता है कि एक लम्हे में हज़ार लम्हे उग आते हैं. कभी तो लगता है एक मोड़ पर ही कबसे रुकी हुई हूँ, आगे कोई राह ही नहीं है और कभी यूँ भी होता है कि एक साथ हजार राहें खुलती नज़र आती हैं. सारे लम्हों को तोड़ लेने का जी चाहता है, निचोड़ के पी जाने को जी चाहता है. हर राह पर भागते जाना को जी चाहता है. मैं लम्हों की नज़र उतारती हूँ, राहों को जी भर निहारती हूँ.
एक-एक लम्हे को शिद्दत से जीती हूँ. राहों पर भागती फिरती हूँ. कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं है बस कि राहों पर भटक जाना चाहती हूँ. भटकने का सुख मामूली नहीं होता. कलाई पर बंधा वक़्त हैरत से मेरा मुंह देखता है, सोचता होगा शायद कि 'इस लड़की को अपने मुताबिक क्यों चला नहीं पाता. . . '

नींदे किसी गठरी में कैद हैं कि नींदों की कीमत पर जाग मिली है, दोस्तों का साथ मिला है, प्यार मिला है... सुबह पर मेरा कोई अख्तियार नहीं, रात पर है...

अनि की खिलखिलाहटों को जोर से थामे हुए हूँ, उसके साथ शरारतें करते हुए मानो अपने बचपन के किसी खाली हिस्से को जी रही होती हूँ. देर रात ऊँघती सड़कों पर झरती ओस की चादर लपेटे देवयानी के साथ घंटों टहलते हुए वक़्त का पता ही नहीं चलता। हम शब्द-शब्द झर रहे होते हैं...कहे सुने से पार कोई ख़ामोशी हर वक़्त हमें थामे होती है... चाँद इस कहन को सुन पाने की कोशिश में नाकाम होकर मुंह बनाता है... मैं उसकी बेचारगी पर हंसती हूँ...

बहुत कुछ सीखने को था इन लम्हों में, दिल हारने के लम्हे थे, बहुत सारा प्यार जीतने के... अनुभवों का एक नया संसार भी था...

सब साथ लेकर लौटते हुए छूटते हुए जयपुर के आसमान के रंग देखती हूँ... कानों में अनि का शहद से मीठा 'मासी...मासी...' का स्वर गूंजता है....तभी एक दोस्त का गुस्से में फोन आता है, ' हो कहाँ इत्ते दिनों से कि एक कॉल भी नहीं उठा सकती' मैं सोचती हूँ कि कहूँ, ' पता नहीं कहाँ हूँ.... लेकिन खुश हूँ ' दोस्त का गुस्सा देखकर सिर्फ हंस देती हूँ... शहर पर शहर छूटते जा रहे हैं. मन विगत और आगत के बीच अटका हुआ है कहीं. 

नींदों को बड़ी शिकायत है मुझसे इन दिनों कि वक़्त कम दे पाती हूँ उन्हें आजकल...

(जयपुर डायरी)

Thursday, February 9, 2017

कि तुम मेरी कोई नहीं...


जब मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूँ

मैं उठकर पानी पीता हूँ
खिड़की से दिखने वाली सड़क को
देर तक देखता रहता हूँ
सड़क, यूँ लगातार घूरे जाने से उकताकर करवट लेती है
और मैं आसमान देखने लगता हूँ
खाली आसमान
उस खाली आसमान में
मैं गले में रुकी अपनी पुकार लिखना चाहता हूँ
तुम्हारा नाम...

गले की नसों से रगड़ते हुए तुम्हारा नाम
शायद छलनी हो रहा था
कि मुझे तुम्हारा सीत्कार सुनाई देता है
मैं फिर से पानी पीता हूँ तुम्हारे नाम को
गले की पकड़ से आज़ाद करता हूँ...

मैं तुम्हें छूना चाहता हूँ
तुम्हारे दुपट्टे की किनारी पर लटकते घुन्घरुओं को
हथेलियों पे रखना चाहता हूँ
तुम्हारी पलकों पर अपने ख्वाब रखना चाहता हूँ
लेकिन मैं तुम्हें छुए बगैर लौट आता हूँ
क्योंकि मैं तुम्हें छूने की अपनी इक्षा को
सहेजना चाहता हूँ

तुम्हारी आवाज़ को सुनने की खातिर
मैं जंगलों में भटकता हूँ
बारिशों से मनुहार करता हूँ
घुघूती, बुलबुल और मैना से कहता हूँ
वो सुनें तुम्हारी आवाज़
और मुझे सुनाएँ
कि मैं एक फोन भी कर सकता था
लेकिन मैं उस आवाज़ की तपिश को
किस तरह अपने कानों में सहेज सकूँगा
सोचकर फोन हाथ में घुमाता रहता हूँ
चाय पीता हूँ और
तुम्हारे साथ के बारे में सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ प्रिये कि एक रोज
चांदनी रात में जब तुम
अपनी कलाई में टिक टिक करती सुइयों को अनसुना करके
अपने 'अकेलेपन' से उलझ रही होगी
एक ख्याल बनकर मैं तुम्हारी तन्हाई को तोड़ दूंगा
तुम्हारा समूचा अकेलापन तुमसे छीन लूँगा
और तुम्हारे साथ हम दोनों के होने का जश्न मनाऊंगा

लेकिन उसके बाद के छूटे वीराने को सोचकर
सहम जाता हूँ
रोक लेता हूँ उस ख्याल को
जो तुम्हारे अकेलेपन में सेंध लगाने को व्याकुल है
कि अपना अकेलापन तुमने हिम्मत से कमाया है

मैं लौटना चाहता हूँ तुम्हारे ख्याल की दुनिया से दूर
कि करने को बहुत काम हैं
कई महीनों के बिल पड़े हैं जमा करने को
गाड़ी की सर्विसिंग
कितनी अनदेखी फ़िल्में, दोस्तों की पेंडिंग कॉल्स
जवाब के इंतजार में पड़ी मेल्स
घरवालों के उलाहने
कि लौटते क़दमों को तेज़ी से बढाता हूँ
खुद से कहता हूँ
कि मैं तुम्हारा कोई नहीं और तुम मेरी कोई नहीं,

तभी अंदर एक नदी फूटती है...
बाहर फूलों का मौसम खिलखिलाता है
मैं इस नदी को बचाऊंगा
धरती पर फूलों के मौसम को बचाऊंगा...

Wednesday, February 8, 2017

निदा फ़ाज़ली: एक टुकड़ा याद


कोई खिड़की से झांककर कहता है, 'गाड़ी आराम से चलाना, आहिस्ता.’

मैं मुस्कुराकर देखती हूँ. वो निदा फ़ाज़ली से आखिरी मुलाकात का आखिरी लम्हा था. उनकी मुझसे कही गयी आखिरी बात. मेरी उनसे यह मुलाक़ात पिछली हुई तमाम मुलाकातों से अलग थी. उस रोज़ मैं उनसे अखबार के नुमाइंदे के तौर पर मिलने नहीं जा रही थी. न ज़ेहन में सवालों के फ्रेम उभर रहे थे, न वक़्त पर कॉपी फ़ाइल करने का, सबसे अच्छी कॉपी फ़ाइल करने का कोई दबाव था.

उन्होंने शहर पहुँचते ही फ़ोन पर अपने आने की इत्तिला दी थी. ये पिछली मुलाकातों की कमाई थी कि वो आते तो फोन ज़रूर करते थे. इस बार कोई एक्सक्लुसिव इंटरव्यू की कोई योजना अख़बार के पास नहीं थी, इसलिए उनसे मिलने का कोई असाइनमेंट भी नहीं था. शाम का वक़्त अख़बार की दुनिया में मरने की फुर्सत भी न होने जैसा ही होता है. ऐसे में वक़्त चुराना ख़ासा मुश्किल काम था. लेकिन उनके साथ एक कप चाय पीने का लालच बड़ा था. सो जल्दी जल्दी काम समेटा और स्कूटर उठाया. मौसम में हलकी सी खुशबू दाखिल हो चुकी थी. रास्ते भर, पिछली तमाम मुलाकातें जेहन में चलती रहीं. जाने क्यों उस रोज उनकी आवाज में कुछ नमी, कुछ बेचैनी सी थी. हालांकि पिछली कुछ मुलाकातों में वो मुझे बेचैन से ही मिलते रहे थे. जैसे कुछ तलाश रहे हों, जैसे सबसे नाराज़ हों, जैसे कुछ न कर पाने की उलझन में घिरे हों...लेकिन इस बार की आवाज़ में बेचैनी कुछ ज्यादा ही थी.

इसी जेहनी उथल-पुथल के बीच आखिर पहुँच ही गई उनके पास. हमेशा की तरह उन्होंने गंभीर मुस्कान के साथ स्वागत किया. ‘इस वक़्त परेशान किया तुमको?’ उन्होंने कहा.

‘अरे नहीं, तो. मेरी खुशकिस्मती है यह तो.’ मैंने कहा ज़रूर लेकिन शायद उन्होंने सुना नहीं.

‘जानता हूँ अखबार का कारोबार.’ उन्होंने कहा और बिना पूछे चाय मंगवा ली. वो अब तक मेरे चाय के चस्के से वाकिफ हो चुके थे. हम सादा सी बातचीत में मसरूफ हो गए. वो मेरी उनसे हुई तमाम मुलाकातों में से सबसे लम्बी मुलाकात थी. न कोई कागज़, न कलम, न सवाल कोई न जवाब. बस कुछ बात होती रही. बीच-बीच में वो मुझे खूब पढ़ने की ताकीद करना न भूलते.

उस रोज़ उन्होंने समकालीन हिंदी और उर्दू कविता पर काफी बात की थी. उन्हें चिंता होती थी कि आजकल के लोग पढ़ते नहीं, लिटरेचर की गहराई में नहीं उतरते. पढने वालों में एक हड़बड़ी सी रहती है, लिखने वालों में और भी ज्यादा. इससे पोयट्री को बहुत नुकसान हो रहा है. विदेशी कवियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अफ़्रीकी कविताओं का खासकर जिक्र किया था. देश के ताजा हालात से बहुत दुखी थे वो कि हर शब्द, हर बात धर्म के चश्मे से क्यों देखी जाती है और क्यों साम्प्रदायिकता के खांचे में जड़ दी जाती है. न कोई टोपी में सुरक्षित है, न भगवा दुपट्टे में, फिर भी सब आपस में भिड़ रहे हैं.

वो पहले भी कई बार कह चुके थे कि यह कितनी अजीब बात है कि मुझे क्या सुनाना है यह इस बात से तय होता है कि शहर कौन सा है, देश कौन सा है और सामने पगड़ी वाले बैठे हैं या टोपी वाले. इस बात का जितना दुःख एक शायर को होता है उसे कोई समझ नहीं सकता. एक अजीब सा सतही दौर है, पॉपुलर चीज़ सुनना चाहते हैं लोग. शायरी का काम पॉपुलर कल्चर का पेट भरना नहीं है. लेकिन कौन समझाए.

उस पूरी मुलाकात में वे काफी उदास थे, चिंतित थे. वो सरहदों के दर्द को खूब महसूस करते थे. उनका कहना था कि लिटरेचर की कोई सरहद नहीं होती. लिटरेचर सारी सरहदों को तोड़ सकता है. तमाम भाषाओँ के पार जा सकता है. इसलिए हमें देश, भाषा की सीमाओं से पार जाकर पढना चाहिए, दुनिया को समझना चाहिए, महसूस करना चाहिए, सीखना चाहिए, प्यार करना चाहिए.

जाने कैसी उदासी तारी थी उस रोज कि तीन कप चाय और दुनियाभर की बातों के दरम्यान मौजूद ही रही. जैसे उनका दिल बहुत भरा हुआ हो. मुशायरों के स्तर में आई कमी से भी कुछ उदासी थी.. पुराने बीते मुशायरों की, उनके दोस्तों की यादें ज़ेहन में ताज़ा थीं...

जगजीत सिंह की इस दुनिया से रवानगी के कुछ ही रोज बाद की इस मुलाकात में उनके अज़ीज़ जगजीत सिंह की जुदाई का ग़म भी शामिल रहा. उन्होंने कहा, ‘‘पक्का यार चला गया. उसी ने मेरी ग़ज़लों को लोगों तक पहुँचाया, पॉपुलर बनाया.’’ जगजीत सिंह भी उन्हें अपनी हर मुलाकात में निदा साहब को इसी तरह याद किया करते थे.

मैं निदा साहब की बात सुनते हुए जगजीत सिंह को भी याद करते हुए मुस्कुराई थी. दोनों की यादों में दोनों को यूँ आपस में घुलते देखना सुखद जो था. तक़रीबन ढाई घंटे की वो मुलाकात जो अख़बार में कहीं दर्ज नहीं हुई. ये पहले से तय था कि ये निजी बातचीत है. वो निजी ही रही. अनौपचारिक...

मुझे आपको याद करना हमेशा अच्छा लगता था निदा साहब लेकिन सिर्फ आपका ‘याद’ बनकर रह जाना ये तो तय न था. अभी जगजीत सिंह की याद, उनकी वो बेतकल्लुफ हंसी, उनके वो जल्द आने का वादा ही आँखों में नमी बनकर तारी था कि आपके जाने की खबर...

आज बरस हुआ आपको गए, लेकिन यकीन अब भी नहीं आता कि अब कभी मुलाकात नहीं होगी आपसे. कैसे दोस्त निकले न आप भी कि दोस्त जगजीत के जन्मदिन पर उनसे मिलने ही चल दिए...८ फरवरी...

यूँ आपकी याद का मौसम तो कभी मुरझाता नहीं, फिर भी जाने क्यों आज ये स्मृति की डाल पर कुछ ज्यादा ही फूल खिले हैं...नहीं, उदासी के नहीं...आपसे प्यार के...हर लम्हे की याद के...आपसे मिली हर हर ताकीद की याद के फूल...

ये कुछ अपने लिखे में से अक्सर वो दोहराया करते थे...

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

लफ़्ज़ों से जुदा हो गए लफ़्ज़ों के मआनी
ख़तरे के निशानात अभी दूर हैं लेकिन

सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन

बूढ़ा पीपल घाट का, बतियाए दिन-रात
जो भी गुज़रे पास से, सिर पे रख दे हाथ

सीधा सादा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान

अंदर मूरत पर चढ़े , घी, पूरी ,मिष्ठान
मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर मांगे दान

बरखा सब को दान दे, जिसकी जितनी प्यास
मोती सीये सीप में, माटी में घास

जीवन के दिन रैन का, कैसे लगे हिसाब
दीमक के घर बैठ कर, लेखक लिखे किताब

ईसा, अल्लाह, ईश्वर, सारे मंतर सीख
जाने कब किस नाम से मिले ज्यादा भीख

स्टेशन पर ख़त्म की भारत तेरी खोज
नेहरू ने लिखा नहीं कुली के सर का बोझ...
(तस्वीर दूसरी मुलाकात की है, इस मुलाकात की हर बात सिर्फ जेहन में है )

Monday, February 6, 2017

मैं तुम से प्यार करता हूँ...



- नाज़िम हिकमत 

घुटनों के बल बैठा 
मैं निहार रहा हूँ धरती,
घास,
कीट-पतंग,
नीले फूलों से लदी छोटी टहनियाँ.
तुम बसन्त की धरती हो, मेरी प्रिया,
मैं तुम्हें निहार रहा हूँ।

पीठ के बल लेटा
मैं देख रहा हूँ आकाश,
पेड़ की डालियाँ,
उड़ान भरते सारस,
एक जागृत सपना.
तुम बसन्त के आकाश की तरह हो, मेरी प्रिया,
मैं तुम्हें देख रहा हूँ।

रात में जलाता हूँ अलाव
छूता हूँ आग,
पानी,
पोशाक,
चाँदी.
तुम सितारों के नीचे जलती आग जैसी हो,
मैं तुम्हें छू रहा हूँ।

मैं काम करता हूँ जनता के बीच
प्यार करता हूँ जनता से,
कार्रवाई से,
विचार से,
संघर्ष से.
तुम एक शख़्सियत हो मेरे संघर्ष में,
मैं तुम से प्यार करता हूँ।

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : दिगम्बर)

Friday, January 27, 2017

जब नहीं आए थे तुम...


- अली सरदार जाफरी

जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थे
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत

तुम नहीं आए अभी, फिर भी तो तुम आए हो
रात के सीने में महताब के खंज़र की तरह
सुब्‍हो के हाथ में ख़ुर्शीद के सागर की तरह

तुम नहीं आओगे जब, ​फिर भी तो तुम आओगे
ज़ुल्‍फ़ दर ज़ुल्‍फ़ ​बिखर जाएगा, ​फिर रात का रंग
शब–ए–तन्‍हाई में भी लुत्‍फ़–ए–मुलाक़ात का रंग

आओ आने की करें बात, कि तुम आए हो
अब तुम आए हो तो मैं कौन सी शै नज़र करूँ
के मेरे पास सिवा मेहर–ओ–वफ़ा कुछ भी नहीं

एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं


Thursday, January 26, 2017

कहानी 'सेल्फी'



- प्रतिभा कटियार 

बाहर शदीद बारिश हो रही थी लेकिन मिटटी की खुशबू गायब थी...कन्नू की नींद भी. कन्नू की नींद बड़ी पक्की सहेली थी उसकी. बिस्तर पर पड़ते ही पक्की गुइयाँ की तरह लिपट जाया करती थी. लेकिन इधर कुछ दिनों से उसकी पक्की सहेली से कुछ खटपट हो गयी है...जब नींद नहीं होती तो इंटरनेट होता है...बेवजह की नेट सर्फिंग...और नींद का इंतजार...

कुछ महीनों से यह सिलसिला शुरू हुआ. उस दिन से जब उसने एक रोज खामखयाली में शायद महीनों बाद फेसबुक पे लॉगिन किया था और लॉगइन करते ही उसे नोटिफिकेशन मिला ‘राजेश लाइक्स सुमिता बनर्जी’स पिक’. कन्नू की दिलचस्पी बढ़ी. सुमिता बनर्जी की वॉल लॉक थी लेकिन उसकी हर प्रोफाइल पिक और कवर फोटो पर राजेश के लाइक्स दर्ज थे. कहीं-कहीं कमेन्ट भी.

सुमिता का नाम कन्नू ने राजेश के मुह से कई बार सुना था. कुछ बरस पहले राजेश की बातों में सुमिता का जिक्र आया था. वो उसकी नयी बॉस नियुक्त होकर पूना से आई थी. जब जिक्र आया था तो भरपूर आया था. अक्सर ही राजेश बात-बात में सुमिता की तारीफ किया करता. कई बार कन्नू उसे छेडती भी, 'क्या बात है कोई चक्कर तो नहीं है सुमिता जी से?' जिसे राजेश हंसकर टाल देता, ये कहकर कि 'हाय, काश हो पाता'.

कन्नू को ये सब सुनने में मजा आ रहा था. वो राजेश को छेडती, ‘पहली बार अपने पति के मुह से किसी औरत का नाम सुन रही हूँ, कसम से मजा आ रहा है. मैं तो सोचती थी मेरी जिन्दगी में ये वाली फीलिंग मिसिंग ही रहेगी.’ उन दिनों सुमिता का जिक्र घर में काफी होने लगा था और उसको लेकर कन्नू राजेश को खूब छेडती थी.

कन्नू और राजेश दोनों ही हंस देते. दोनों के रिश्ते का खुलापन दोनों को एक-दूसरे के प्रति आश्वस्त रखता था. कन्नू हमेशा कहती, कभी भी कुछ गड़बड़ हुई न तो घबराना मत, लेकिन मुझे बता देना, पत्नी समझकर नहीं, दोस्त समझकर. राजेश भी कन्नू को यही कहता. दोनों की अंडरस्टैंडिंग मजे की थी. कहने को दोनों पति-पत्नी थे लेकिन दोस्तों की तरह ही रहते थे. लड़ते झगड़ते, प्यार करते...जिन्दगी साथ जीते, देश दुनिया के मसायल पे बात करते. राजेश कन्नू पे इस कदर फ़िदा रहता था कि कन्नू खुद को अभिमानिनी महसूस करने लगती. कभी लाड से डपट भी देती, ‘शादी के इत्ते बरस बाद भी कोई बेवकूफ ही अपनी बीवी का इस कदर दीवाना होता होगा.. जाओ यार, दुनिया में और भी औरतें है, थोडा फ्लर्ट श्लरट करो, मेरा ईगो भी सैटीस्फाईड होने दो....क्या हर वक़्त मेरे ही पीछे लगे रहते हो...’ राजेश ये सुनकर उसके और करीब आ जाता और कहता, ‘तुम्हारे सिवा कुछ नज़र ही नहीं आता. ‘

मेहुल के पैदा होने के बाद राजेश कन्नू और मेहुल दोनों के प्यार और देखभाल में व्यस्त हो गया. जिन्दगी मजे में चल रही थी. इसी बीच कन्नू का ट्रांसफर दूसरी ब्रांच में हो गया....ये दूसरी ब्रांच घर से काफी दूर थी इसलिए जिन्दगी की गति और बढ़ गयी अब. कन्नू को और सुबह निकलना पड़ता, राजेश को मेहुल का टिफिन बनाना होता, घर के बाकी काम निपटाने पड़ते....

इस स्मार्टफोन के ज़माने में भी कन्नू के पास न मेल चेक करने की फुर्सत होती न फेसबुक देख पाने की. एक दिन स्कूल में स्टाफ रूम में फेसबुक अफेयर की गॉसिप के बीच उसने अपना फेसबुक लॉगइन किया. काफी दिनों बाद फेसबुक लॉगइन किया तो नोटिफिकेशन से उसे फिर से सुमिता याद आई. राजेश तो मुझे हर बात बताता है सोचते सोचते कन्नू घर पहुँच गयी.

घर आई, चाय चढ़ाकर नहाने चली गयी...लौटी तो चाय मुस्कुरा रही थी...दोपहर का यह वक़्त उसे बहुत दिनों बाद मिला था. चाय पीते-पीते सोचा कि कैसी हो जाती है जिन्दगी. सब कुछ है भी और कुछ नहीं भी है. और जो नहीं है उसे महसूस कर पाने का वक़्त भी नहीं. उसके मन में वो नोटिफिकेशन कहीं अटका हुआ था ‘राजेश लाइक्स सुमिता बनर्जी'स पिक.’ राजेश ने कभी बताया नहीं कि सुमिता से टच में है. फिर खुद पर ही हंसी आई. फेसबुक भी कोई संसार है, और ये भी कोई बताने वाली बात है कि फेसबुक पे कौन-कौन टच में है.

शाम को राजेश थोडी देर से आया था, मेहुल अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में गया था...कन्नू ने थोडा रोमेंटिक होते हुए बाहें बढा दीं, राजेश अचकचा गया...’अरे...’वो पीछे हट गया. ‘क्या हुआ’ कन्नू ने सहमकर पूछा. ‘कुछ नहीं यार, थका हूँ बहुत, नहाकर आता हूँ ‘

‘ठीक है नहा लो फिर थोडा घूम के आते हैं...कित्ते दिन हो गए न?’

राजेश बिना कुछ जवाब दिए नहाने चला गया. कन्नू तैयार होने लगी...चाय का पानी भी उसने चढ़ा दिया. राजेश नहाकर आया और लैपटॉप खोलकर कुछ काम करने लगा...कन्नू चाय लेकर आई तो उसे काम करते देख उदास हो गयी...’हम घूमने जाने वाले थे न? ‘

‘आज नहीं...बिलकुल मन नहीं....थका हूँ बहुत...’राजेश ने चाय लेते हुए कहा.

‘कित्ते दिन हो गए हमें कहीं गए. कैसे मशीन से जीते जा रहे है हम...चलो न राजेश....बस बाइक से एक चक्कर.’

‘प्लीज़ कन्नू....एकदम मन नहीं....तुम तो समझती हो न. तुम्हारा तो अक्सर ही मन नहीं होता था, थकी होती थी...तुमसे बेहतर कौन समझेगा.’ कन्नू खामोश हो गयी...टीवी चैनल पलटने लगी...इस तरह खाली बैठकर टीवी देखना भी उसे लक्सरी सा महसूस हुआ...टीवी पर वही हत्या, बलात्कार, राजनीति, हाहाकार....घरेलू चैनलों पर वही सास बहू, इसका चक्कर उससे, उसका चक्कर उससे या फूहड़ गानों पर अधखुले जिस्म. टीवी बंद कर उसने फिर से मोबाईल ऑन किया. फेसबुक नोटिफिकेशन में फिर वही ‘राजेश लाइक्स सुमिता बनर्जी'स पिक.’ उसने सोचा वही सुबह वाला बासी नोटिफिकेशन होग. आगे बढ़ गयी. तभी एक और नोटिफिकेशन आ गया, ‘राजेश लाइक्स सुमिता मुखर्जी'स स्टेटस.’

खाना खाते वक़्त कन्नू ने राजेश को छेड़ा, ‘आजकल सुमिता जी के क्या हाल हैं? कैसी हैं वो?’
राजेश ने कौर तोड़ते हुए जवाब दिया, ‘ठीक ही होंगी...क्यों?’
‘नहीं, ऐसे ही पूछा.’
‘तुमने कभी बताया नहीं कि वो दिखती भी स्मार्ट हैं? ‘
कन्नू ने बात जारी रखी
‘इतने ध्यान से देखा नहीं...’ राजेश ने जवाब दिया.
‘प्रोफाइल पिक ध्यान से देखे बिना ही लाइक कर देते हो?’
कन्नू अपने भीतर की अनजान उलझन को सहेज नहीं ही पायी

‘ओह ? तो तुम मेरी जासूसी कर रही हो?’ राजेश एकदम से भडक गया.
‘जासूसी? कैसी बात कर रहे हो....इसकी ज़रूरत क्यों होगी भला.’
‘वही तो?’ राजेश झल्लाया
‘आज यूँ ही स्कूल में बात हो रही थी फेसबुक की. प्रिंसिपल थी नहीं तो गपशप चल रही थी. तभी मैंने महीनो बाद लॉगइन किया. तुम जानते हो मैं नहीं जाती फेसबुक तेस्बुक पे. टाइम ही नहीं है यार. और करना भी क्या है वहां जाकर. जब दिन में लॉगिन किया तभी नोटिफिकेशन आया कि तुमने उनका स्टेटस लाइक किया है और अभी देखा तो पिक्चर लाइक की है.’ कन्नू ने साफ़-साफ़ बता दी सारी बात.

राजेश शांत होते हुए बोला, ‘वो दुनिया तुम्हारी जैसी भली औरतों के लिए है भी नहीं...मत जाया करो वहां...’
‘ये कैसी बात है राजेश? यानि जो औरतें फेसबुक पे हैं वो भली नहीं हैं? ‘
‘अरे यार, मुद्दा मत बनाओ...बात मुंह से निकली नहीं कि तुम मुददा बनाने के लिए लपक लेती हो बस. मैं तो बस कह रहा था...वो अजीब जंगल है...किसी का कुछ पता नहीं...किस तस्वीर के पीछे कौन है...किसके शब्द कितने नकली हैं. हम अपनी दुनिया में खुश हैं न? तुम इस सब झंझट से दूर ही रहो..’ .राजेश ने स्थिति को सँभालते हुए कहा.
‘तो उस जंगल में तुम क्या कर रहे हो?’
‘मैं तो स्त्री नहीं हूँ न? मुझे उस तरह के खतरे कम उठाने पड़ते हैं जैसे औरतों को उठाने पड़ते हैं. कितनी ही बराबरी की बात कर लें लेकिन हम मर्दों के भीतर स्त्री देह को लेकर जो लोलुपता है उसे नहीं बदल पाए हैं हम. पुरुषों की तस्वीरें क्या वो खुद ही खुले पड़े रहें किसी को फर्क नहीं पड़ता लेकिन औरतें...उनके पीछे लपक पड़ते हैं लोग... एक लड़की प्रोफाइल पिक बदले तो लाइक्स बरसने लगते हैं. ये सब अजीब सा लगता है मुझे तो. किसी औरत की तस्वीर क्यों सरे बाज़ार रखी हो, क्यों उसे कई सौ लोग लाइक करें...वाह वाह करें....ये मुझे पसंद नहीं...तुमको मैं वहां देख ही नहीं सकता.’ राजेश ने भी बिना लाग-लपेट के अपनी बात रख दी.
‘तुम मेरी जान हो....’ कहकर राजेश ने कन्नू का मूड बदलने की कोशिश की.
‘वो पता नहीं, लेकिन ये मामला महज़ फेसबुक का तो नहीं है. ये तो पूरी दुनिया का है. घर के भीतर तक औरतों के लिए सांस लेना आसान नहीं. मिसेज सक्सेना रोज़ बताती हैं कि किस तरह संयुक्त परिवार के नाम पर मर्दों से भरे घर में हर वक़्त पल्ला समेटने की मजबूरी में कितना कुछ झेलना पड़ता है. बराबर के जवान देवर, जेठ, ससुर....हर वक़्त स्कैन करती नजरे....इनसे मुक्ति कहाँ...फेसबुक का कंट्रोल तो फिर भी कुछ हद तक अपने हाथ में है...है न?’ कन्नू को राजेश की बात से वाकई दिक्कत हो रही थी.
‘पता नहीं...बस मुझे पसंद नहीं वो बाज़ार...’ राजेश झुंझला गया था.
‘अगर इतना ही बुरा लगता है तो तुम खुद क्यों लाइक करते फिरते हो औरतों की तस्वीरें....बोलो?’ कन्नू अब अड़ चुकी थी.
‘क्योंकि वो औरतें मेरे घर की नहीं हैं...वो चाहती हैं कि लोग उन्हें पसंद करें इसलिए करते हैं लोग. मैं भी करता हूँ.’
‘ये गलत है. ये तो मौकापरस्ती हुई.’
‘अच्छा बाबा, अब नही करूँगा. ओके ?’ राजेश ने समझैतापरक मुद्रा अख्तियार की.
‘अच्छा हो कि जो हम सोचते हैं, वो ही करते भी हों...’ कन्नू ने उलाहने में कहा और उठकर चल दी.

कन्नू के जेहन में सुमिता वाली बात अटकी हुई थी. जो आदमी सुमिता की इतनी बात करता था, वो अब उसका जिक्र तक नहीं करता. जबकि फेसबुक पर दोनों टच में हैं.

सुबह हुई और जिन्दगी की गाड़ी फिर झटपट दौड़ने लगी. अब कन्नू कभी-कभार फेसबुक के चक्कर मारने लगी थी हालाँकि अब उसको राजेश की कोई हलचल वहां नहीं मिलती. काफी दिन हो जाते तो सुमिता की वॉल भी देख आती. वहां भी कोई हलचल नहीं, कोई अपडेट नहीं मिलती. कन्नू सोचती, ये क्या हो गया है उसे, क्या वो ईर्ष्यालु और शक्की होती जा रही है. फिर इस ख्याल को झटक देती.

इधर फेसबुक से उसकी यारियां बढ़ने लगी थीं. चलते-फिरते लॉग इन करती और अल्लम-गल्लम सामने आने लगता. उसे खीझ भी होती कि किस तरह संवेदनशील मुद्दों का मखौल उड़ रहा है. सबको अपनी दिखाने की पड़ी है. हर कोई चीख रहा है कि मैं कितना बड़ा तुर्रम खां हूँ. एक रोज उसने सोनाली से हंसी-हंसी में कहा भी था, ‘ऐसा लगता है कोई चारागाह है फेसबुक. सब मेमने हैं, मैं मैं करते रहते हैं.’ ‘लेकिन ये मेमने मासूम नहीं शातिर हैं.’ सोनाली ने उसे दुरुस्त किया. ‘और इस शातिरपन में विनम्रता की एक तख्ती भी खुद ही अपने गले में टांग लेते हैं कि भाई, हमें तो कोई लेना-देना ही नहीं इस सबसे...हम तो निर्विकार हैं इन सबसे. लेकिन पांच मिनट तक अगर उनकी प्रोफाइल पिक पर एक भी लाइक न आये तो डिप्रेशन का अटैक पड जाये...और किसी के समाजवादी चिन्तन पर अगर विमर्श का ढेर न लग गया तो बंदा धमकी भरे अंदाज में कहता है कि ये दुनिया रहने लायक नहीं रह गयी...सो अलविदा....अब इस अलविदा वाले स्टेटस को कितने लाइक मिले कितने कमेंट ये देखे बिना छोड़ें कैसे, और उनके बिना भी ये दुनिया मस्त चल रही है ये सहें कैसे सो वापसी फिर से...कि हरी बत्तियों और भाषाई चाशनी में सारा समाज यहीं तो सुधर रहा है, सारे राजनैतिक प्रपंच यहीं, सारे चुनाव यही, सारी संवेदनाओं का बाज़ार यहीं...’ सोनाली ने फेसबुक का पूरा विश्लेष्ण कर डाला जिसे सुनते हुए कन्नू मुस्कुराती रही.

कन्नू को कुछ ही दिनों में इस संसार का सारा सच समझ आ गया था लेकिन साथ ही यह भी कि उसे यहाँ कुछ अच्छे दोस्त भी मिलने लगे और कुछ पुराने बिछड़े हुए दोस्त भी. वैभव भी उसे कॉलेज टाइम के बाद १५ बरस बाद फेसबुक पे मिला. ‘कितना मुटा गया है तू....’ कन्नू ने छूटते ही उसे मैसेज भेजा था.

एक रोज एक कवि महोदय का इनबॉक्स मैसेज चमका, ‘आप बहत खूबसूरत हैं मैम.’ कन्नू का जी किया एक चमाट धरे कान के नीचे. सच ही कहता है राजेश कि ये दुनिया है ही नहीं भली औरतों की.

‘भली औरतें.’ ये शब्द हालाँकि अटका हुआ था कहीं. उसकी बहुत सी दोस्त हैं फेसबुक पे और वो जानती है कि वो कैसी हैं. ये भले बुरे की सीमायें भी खूब तय की हैं समाज ने. उसका मन कसैला हो उठा.

भला होना जो पहले से तय है, उसकी सलीब ढोते-ढोते बूढ़े होते जाना...खुद को लगातार इग्नोर करते हुए. गोल-गोल घूमते जाना. बेवजह.

उसके मन में तमाम बेचैनियाँ बढ़ने लगी थीं. अपने दायरों के बाहर जाने की उलझन थी. राजेश से बात करने का वक़्त ही नहीं होता था. अक्सर दोनों में घर गृहस्थी की बात के अलावा बात हुए महीनों बीत जाते. हालाँकि फेसबुक पर उसका जाना काफी बढ़ने लगा... बीच-बीच में वो सुमिता की प्रोफाइल देखना नहीं भूलती.

एक रोज़ डिनर के वक्त कन्नू ने मुसुकुराकर कहा, ‘सुनो मैं भी अब भली औरत नहीं रही. मुझे बधाई दो.’
‘मतलब?’
‘मतलब फेसबुक पे मजा आने लगा है...मुझे भी.’
‘हाँ, देख रहा हूँ.’ राजेश ने कहा.
‘मतलब देख रहे हैं आप चुप्पे चुप्पे. लेकिन आप तो हमको नहीं दीखते...’
‘मैं बिजी रहता हूँ यार, कभी-कभार गया तो देखता हूँ तुम्हारी सक्रियता.’
‘बहुत बुरा भी नहीं है वैसे, कितने सारे नए लोग मिलते हैं, और काफी कुछ नया देखने सुनने को भी...’
‘देख रहा हूँ तेज़ी से राय बदल रही है तुम्हारी.’ राजेश ने कहा
‘जीवन में जब कुछ न बदल रहा हो तो राय बदल लेने में भी कोई बुराई नहीं है न?’ कन्नू मुस्कुराई...
इधर उसकी वैभव से बातचीत बढ़ने लगी थी. एक रोज जब वैभव ने भावुकता में उसे प्यार जैसा कुछ कहा तो कन्नू सकपका गयी. लॉगाउट तो हो गयी लेकिन सिहरन सी होती रही कई दिनों तक. शादी के १४ बरस हो गए. इस तरह की सिहरन उसके भीतर अब भी बाकी है, उसे पता नहीं था. कॉलेज के ज़माने के वो कमसिन दिन याद आ गए जब कोई निगाह भर देख भी लेता था तो महीनों नींद नहीं आती थी.

वैभव के उस इज़हार की अजीब बात यह हुई कि कन्नू को बुरा नहीं लगा. वो असहज ज़रूर हुई लेकिन गुस्सा आया हो, चिढ हुई हो ऐसा भी नहीं था.
कुछ दिन वो फेसबुक पर जाने से बचती रही लेकिन जल्दी ही सिलसिला फिर शुरू हो गया.
कन्नू और वैभव में बातचीत भी होने लगी. उसे वैभव से बात करना अच्छा भी लगता था लेकिन साथ ही कन्नू के भीतर कोई अपराधबोध भी घिरने लगा. शायद उसी अपराधबोध के चलते अब वो राजेश को ज्यादा वक़्त देना चाहती. उसका ख्याल रखती, उसकी पसंद-नापसंद का और ज्यादा ख्याल रखने लगी. घर में होने वाली रोजमर्रा की तकरार में कमी आने लगी थी.

वो दिन में चार बार खुद को बताती कि बात ही तो कर रही है, और तो कुछ नहीं है. वैभव को भी बता दिया है उसने कि वो अपनी शादी से खूब खुश है इसलिए ज्यादा इधर-उधर की सोचने की ज़रूरत नहीं. अपने भीतर के असमंजस से लड़ने के लिए वो राजेश की और अपनी तस्वीर भी वॉल पे चिपका देती जिसे सबसे पहले लाइक करने वाला वैभव ही होता. वैभव भी अपनी पत्नी के साथ वाली तस्वीरें चिपकाता. दोनों एक-दुसरे की हैपी फैमली वाली तस्वीरें लाइक करते और घंटों चैट करते.

वजह का ठीक-ठीक पता नहीं था, फिर भी कन्नू जिन्दगी में कुछ तो बदलाव महसूस कर रही थी. उसके तैयार होने में थोड़ी और नफासत आने लगी थी, स्टाफ रूम में होने वाले हंसी-मजाक में उसकी भी मुस्कुराहटें शामिल होने लगी थीं. मेहुल को पड़ने वाली डांट में कुछ कमी आई थी.

एक रोज राजेश ने उसे बताया कि उसे हफ्ते भर के लिए बड़ोदा जाना है, मीटिंग के सिलसिले में. कन्नू ने फटाफट उसकी तैयारी कर दी.
राजेश चला गया. जाने क्यों इस बार राजेश का जाना कन्नू को बुरा नहीं लगा. काम निपटाकर इत्मीनान से लॉगइन हुई. वैभव का मैसेज उसका इंतजार कर रहा था.
‘कहाँ हो, कबसे इंतजार कर रहा हूँ.’ कनु मैसेज देखते ही मुस्कुरा दी.
‘क्यों कोई काम नहीं है क्या?’ कन्नू ने मैसेज टाइप किया.
स्माइली आ गयी तुरंत.
‘राजेश गया?’ वैभव ने पूछा.
‘हाँ.’ कन्नू ने जवाब दिया....
‘आज तो हम आपको नहीं छोड़ेंगे. आपकी सेवा में हाज़िर...’ वैभव शरारत के मूड में था.
‘अच्छा जी...’ कन्नू ने भी स्माइली भेज दी.
देर रात तक दोनों बातें करते रहे....बारिश होती रही...मिट्टी महकती रही.

सुबह कन्नू ने छुट्टी का मैसेज डाला और मेहुल को स्कूल भेजकर फिर से बिस्तर में सिमट गयी. दिन में उसने बड़े दिन बाद फरीदा खानम को सुना...’आज जाने की जिद न करो...’
इसी इसरार के साथ वैभव ने रात उसे छोड़ा था.
कोई नशा सा महसूस हो रहा था कन्नू को.
वो लगातार सोचती जा रही थी कि इतने बरसों में क्या था जो कम था उसकी जिन्दगी में. राजेश ने उसे कम प्यार तो नही किया. फिर ये क्या हो रहा है उसे. क्यों वैभव की बातें उसे बुरी नहीं लगतीं. क्यों अचानक बारिशें सिर्फ धरती पर नहीं बरस रहीं, उसके मन में यह भाव भी आता कि राजेश के प्रति गलत तो नहीं ये.

पर गलत क्यों होगा...? क्या पति-पत्नी होने का अर्थ एक दुसरे की भावनाओं पर कब्ज़ा करना है. अगर ऐसा है तो मेरे भीतर ये भाव आने ही नहीं चाहिए. इस तरह की भावनाएं सिर्फ राजेश के लिए ही होनी चाहिए. ये वैभव कहाँ से आ गया? क्यों वैभव की बातें उसके भीतर एक पुलक, एक थिरकन जगाती हैं.

‘शाम को साथ में काफी पियें?’ दो सवालों के बीच से निकलकर कनु का मन निकलकर कॉफ़ी टेबल पर खिलखिलाने लगा.
लगातार गृहस्थी में दौड़ते-भागते कन्नू के भीतर की नदी सूखने लगी थी...राजेश का निरंतर मिलता प्रेम भी उसकी नमी को लौटा नहीं पा रहा था...और अब बेवजह ये नदी कलकल बहे जा रही थी...

उस रोज जब कन्नू वैभव के साथ फिल्म देखकर निकल रही थी और अपने पोर-पोर में वैभव के शरारती स्पर्श की थिरकन को छुपाने की कोशिश कर रही थी कि उसकी नजर उसी हॉल के कोने में बैठे जोड़े पर पड़ी...राजेश और सुमिता...

राजेश के कंधे पर सुमिता का सर था और और सुमिता की पीठ पर राजेश का हाथ...वो चुपचाप घर आ गयी...चेंज करके किचन में गयी...तभी राजेश भी आ गया...यार कुछ अच्छा सा खिलाओ आज...बड़ी भूख़ लगी है...राजेश की आवाज़ में चहक थी...कन्नू की आंखें बरसना नहीं ही रोक पायीं और हमेशा की तरह वाशरूम की पनाह काम आई...

फेसबुक सामने खुला था...राजेश अच्छा सा खाकर सो चुका था...’थैंक्स फॉर सच अ स्वीट ईवनिंग डार्लिंग. लव यू’ वैभव का मैसेज पड़े-पड़े मुरझा चुका था...बाहर बारिश हो रही थी लेकिन मिटटी की खुशबू गायब थी...

(निकट के दिसम्बर १६ के अंक में प्रकाशित )

Thursday, January 12, 2017

सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है...


तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकान्त नहीं
न बाहर, न भीतर।

हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
सम्भावनाओं से घिरे हैं,
हर दिवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएँ अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

Sunday, January 1, 2017

अकेलेपन में खिलना और महकना...


नदी की बीच धार में उसने धीरे-धीरे अपनी मुठ्ठी खोल दी थी...मेहँदी के साथ-साथ उसने अपने हाथों की सारी लकीरें भी बहा दी थीं. मेहँदी का रंग नदी में घुलने लगा, नदी का पानी ललछौवां हो गया, हिनाई खुशबू नदी की धार के साथ बहने लगी. उसने अपनी पलकों को मूंदा और चेहरा आसमान की ओर किया. उसके भीतर की नदी बंद पलकों से छलकने लगी. उसने अपनी दोनों बाहें पसारीं...आसमान उसकी बाहों में सिमटने लगा...नदी की धार के ठीक बीच में उसने आसमान को गले लगाया...होंठ बुदबुदाये...सुख...

छप्प की आवाज़ आई...वो आँखें मूंदे-मूंदे ही मुस्कुराई...जानती थी सूरज ने नदी में छलांग लगाई है. वो दिन भर ड्यूटी करके थक गया जो गया था. पेड़ों पर बैठे परिंदे पंख फड़फड़ाकर उड़ गए...लड़की अपने अकेलेपन में डूबने उतराने लगी.

अकेलापन...एकांत नहीं अकेलापन. लड़की ने अकेलापन कमाया था. जिन्दगी के साथ जूझते हुए, बिना हारे, लड़ते हुए...कभी-कभी हारकर भी. अकेलापन उसे मिला नहीं था, उसकी झोली में आ नहीं गिरा था, उसने इसे खुद कमाया था...और आज वो इस अकेलपन के सुख में आकंठ डूबी है, तृप्त है.

कैसी अजीब सी बात है न, कि सारे ज़माने में लोग अकेलेपन से जूझ रहे हैं, रो रहे हैं, तड़प रहे हैं, अकेलेपन से लड़ने के तमाम उपाय कर रहे हैं ऐसे में कोई है जो इसी अकेलपन के सुख को जी रहा है, उसकी पूरी सम्पूर्णता के साथ. क्या यह संभव है, ये कैसे संभव है भला? यही प्रश्न मुश्किल है. हालाँकि इतना मुश्किल भी नहीं.

है क्या ये अकेलापन-
अकेलापन है क्या आखिर? कब और कैसे मालूम होता है कि अब अकेलापन आ चुका है जीवन में. आया है या हमने खुद उसे बुलाया है. जो भी है, जैसे भी आया है लेकिन हम शायद उसे ठीक-ठीक समझ नहीं पाए. उसके आने पर किस तरह उसके साथ मेलजोल बढ़ाना है, कितना बढ़ाना है, कैसे उसे अपनी जिन्दगी में बिसूरने की नहीं खुश होने की वजह बनाना है, कैसे अब तक के छूटे-बिखरे तमाम लम्हों को एक लड़ी में पिरोना है और उन्हें जी लेना है यह सब जानना बाकी ही है अभी. इस न जानने का नतीजा यह हुआ कि नकारत्मक अवधारणाएँ इसके बारे में प्रचलित हो गयीं और ज्यादातर लोग इसके आने से घबरा जाने लगे, दुःख में डूब जाने लगे, भागने की कोशिश में डूबने लगे, निराशा में जाने लगे.

और शायद इसलिए हम जान ही नहीं सके कि अकेलापन एक नेमत है, एक असाधारण सुख. इसी अकेलेपन की तलाश में ही तो पीर फकीर, साधू-सन्यासी जंगलों की खाक़ छानते फिरे...और उन्हें लम्बी साधना के बाद जो मिला वो ज्ञान क्या था...उनका अपने आप को समझ पाना, दुनिया के नीति नियमों से दूर अपने केंद्र पर अपना अख्तियार कर पाना. बुद्ध को उस वृक्ष के नीचे सुजाता के हाथ से खीर खाकर और कौन सा ज्ञान प्राप्त हुआ होगा भला...

जिन्दगी बेहद साधारण चीज़ों में होती है, मामूली लम्हों में लेकिन हम उन मामूली लम्हों को इग्नोर करके जाने किस खोज में भटकते फिरते हैं. इस भटकाव से कैसे बचना है, यह सीखना ही जिन्दगी की ओर कदम बढ़ाना है.

अकेलापन भी उन्हीं में से एक है. अकेलापन सुख है...इसका हाथ थामकर जिन्दगी ज्यादा समझ आने लगती है, मौसम ज्यादा करीब आ जाते हैं, हम खुद को ज्यादा प्यार करने लगते हैं...सुबह की चाय का स्वाद अपनी ही सोहबत में और बढ़ जाता है...

यह अकेलापन ही है, जो हमें हमसे मिलाता है, जो हमारे वजूद को टटोलकर हमें बताता है कि ये तुम हो, अब खुद को और निखारो और जियो...ये अकेलापन ही है जिसने दुनिया भर की रचनात्मकता को जन्म दिया...प्रेम के असीम लम्हों में जब देह से इच्छा का साथ छूट जाता है तब अपने व्यक्तित्व की पूर्णता का एहसास होता है...असीम अकेलेपन के उन लम्हों में वो जो पलकों से छलकता है वो सुख, अपने स्व को पूर्णता में महसूस करने का.

कई बार यूँ भी होते पाया है कि याद में कोई जितना करीब होता है, उसकी उपस्थिति उस करीबी को खरोंच देती है...वापस अपने एकांत में जाकर अपने अकेलेपन में गढ़ना उसकी खुशबू और जीना इश्क...

वो जो तन्हा है, वो तन्हा क्यों है-
सुना है कि आजकल लोगों में अकेलापन बढ़ता जा रहा है. पर कैसे? आजकल तो हर वक़्त हर कोई किसी न किसी के साथ ही होता है. सोशल मीडिया के सहारे या किसी और माध्यम से, हमारे चारों ओर लोगों का हुजूम है. घर से लेकर बाहर लोग ही लोग हैं...बातें ही बातें...हंसी मजाक, घूमना फिरना, शादी ब्याह के जलसे, पार्टियाँ, थिरकते कदम, खिलखिलाते मुस्कुराते चेहरे और एक रोज़ सब ठप्प...अचानक. पता चलता है कि कोई तन्हाई थी जो भीतर-भीतर ही पल रही थी और एक रोज़ वो बीमारी बन गयी.

वो जो भीतर पल रहा था, वो क्या था? क्या हमने कभी उससे बात की थी? वो क्यों था? अगर वो था तो उससे उदासी ही क्यों रिस रही थी? अकेलापन मन की स्थिति है...यह तो समझना ही होगा लेकिन इसके लिए समझना होगा मन भी. मन क्या होता है, कहाँ रहता है आखिर?

आओ मिलकर इस अकेलेपन की कदर करना सीखते हैं, इससे प्यार करना सीखते हैं.

उदासी से क्या रिश्ता है अकेलेपन का-
जाने कब कैसे अकेलेपन को निराशा और उदासी से जोड़ दिया गया होगा. या शायद हो भी कोई रिश्ता. कि अकेलेपन के चलते लोगों को डॉक्टरों के चक्कर क्यों काटने पड़ते भला. कल तक जो साथ था, अब वो दूर-दूर तक नहीं है, सबके साथ कोई न कोई है हमारे ही साथ कोई नहीं है, या वो नहीं जिसका तस्सवुर किया रात दिन...और अब ये रात दिन का अकेलापन...काटता है...ऐसे न जाने कितने लोग आसपास हैं, कितने किस्से. हम सब कभी न कभी अकेलेपन से जूझे ज़रूर हैं, उससे भागते फिरे हैं...न जाने कितने उपाय करते फिरे..लेकिन हाथ क्या आया?

किसी का साथ होना भर अगर अकेलापन दूर करने की वजह होता तो आज क्यों बढ़ रहा होता इतना अकेलापन? हर किसी के पास कोई न कोई तो है ही...किसी न किसी रूप में. अगर यह अकेलापन व्यक्ति से जनित है तो क्यों उसी व्यक्ति के होते, हुए उसी के साथ रहते हुए जिसके साथ की तमन्ना हमेशा की थी अकेलापन आ जाता है जीवन में. अगर यह जीवन में आये दुखों से, असफलताओं से जनित है तो क्यों सुख के, ख़ुशी के पलों में भी अचानक एक हूक सी उठती है कलेजे में और दुनिया के तमाम शोर से उठकर दूर कहीं भाग जाने को जी चाहता है.

कनेर की डाल पर मुस्कुराते पीले फूल-
जीवन कनेर की डाल सा मालूम होता है. जिस पर लहलहाते पीले फूल लुभाते हैं, लेकिन उन्हें तोड़ने को हाथ नहीं बढ़ते कि बचपन में किसी ने बता दिया था ये फूल भगवान को नहीं चढ़ाये जाते. इतने प्यारे फूल....भगवान को क्यों नहीं चढाए जाते, सफ़ेद चांदनी, मदार और न जाने कितने जंगली फूल जिन्हें न कभी जुड़े में किसी ने सजाया न मंदिर में चढ़े, न ड्राइंगरूम की शोभा बने...क्यों इसका जवाब किसी के पास नहीं...क्योंकि पूछना मना है...बस सदियों से जो कहा जा रहा है उसे फॉलो करना है...एक रोज़ उसने अपने जूड़े में कनेर का फूल लगाया और इतराकर आईना देखा, आईना मुस्कुरा उठा. उसे लगा ये सारे फूल उसी के लिए छोड़ दिए गए हैं...ये सारे फूल सिर्फ उसके हैं...कोई भगवान नहीं, कोई शादी ब्याह नहीं, कोई बाज़ार नहीं...उसके जीवन में अब रंग-बिरंगे फूलों की भरमार है...सब उसके हैं...वो उन सबकी है...

अकेलापन भी ऐसा ही कनेर का फूल सा हो चला है...किसी को नहीं चाहिए...पूजा में वर्जित फूल...क्यों, यह पूछना मना है...लेकिन जिसने जमाने से बेपरवाह होकर इससे दोस्ती कर ली, उसे सुख हुआ...कि जिंदगी ज्यादा करीब महसूस होने लगी और अपने आपसे प्यार हो चला. अपने सुख की वजह जिसे बाहर ढूंढते फिरते रहे...वो अपने ही भीतर मिली...बस हथेलियाँ फैलायीं और टप्प से एक बड़ी सी बूँद गिरी हथेली पर...भीतर का सारा सूखा हरे में तब्दील होने लगा...

चाँद तनहा है, आसमां तन्हा-
ज़िन्दगी की राहों पर चलते-चलते एक रोज़ मुसाफिर थक के बैठा तो उसे अपनी छाया दिखाई दी...उसने रास्तों की ओर देखा, रास्ते की कोई छाया नहीं थी, ज़मीं अकेली थी, आसमान अकेला था...नदी चुपचाप बहती जा रही थी, किसी धुन सी गुनगुनाती, बलखाती अकेली, मगन अपने आप में...चाँद तनहा, तारों से भरे आसमान में हर तारा तनहा, तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लिए मेरा मन तनहा...तुम्हारे साथ तुम्हारी कामना और तुम्हारे बिना तुम्हारे होने का सुख खुद से मिलकर ही तो जाना है. अपना हाथ थामे बिना किसी और का हाथ कोई कैसे थाम सकता है भला, और अपना हाथ थामने के लिए ज़रूरी है थोडा सा अकेलापन, थोड़ी सी गुफ्तगू खुद से, थोडा सा रूमान जिन्दगी के साथ...तभी तो चाँद तारों से दोस्ती होगी जिसकी छाँव तले तुम्हारा होना महसूस हो सकेगा...वरना तो दुनियादारी ही निभती रहेगी रिश्तों में भी...

अकेलेपन की हाथ बढ़ाना, पाना खुद को-
कभी यूँ भी महसूस हुआ है कि बिना जाने ही चीज़ों को अपना लेने या ठुकरा देने का जो चलन है, उसने शायद हमारे साथ काफी ज्यादती की है. खामोशी की लम्बी लकीर के उस पार चाँद कितनी मोहब्बत से हथेलियों पर उतर आता है कभी जाना ही नहीं...भीड़ भरे जीवन में कभी फुरसत ही नहीं थी चाँद से घंटों बतिया पाने की, आसमान से उसके हाल पूछने की या अपना मन उनके आगे उड़ेल देने की...जब जरा अकेलेपन की ओर हाथ बढाया तो मालूम हुआ कि असल में अपनी ओर हाथ बढाया है. जिन सुखों की वजह कस्तूरी बनकर बाहर, दूसरों में ढूंढते फिर रहे थे वो अपने ही भीतर थी...बेवजह अपने सुखों की चाबी किसी और को देकर असल में अपने लिए दुःख जमा कर रहे थे...वो जो किसी के साथ होने का एहसास है वो हमारा उससे जुड़ने से जन्मा है और उसे ख़त्म कर पाना या कम कर पाना किसी और के हाथ में कैसे हो सकता है भला.

एहसास कभी जुदा नहीं होते, लोग जुदा होते हैं... अकेलापन उस एहसास में शिद्द्द्त से पैबस्त होना सिखाता है. मोहब्बत असल में अपने करीब आना ही है, बस कि शुक्रगुज़ार उस साथी का होना होता है जो हमारा हाथ पकड़कर हमें हमारे करीब ले आता है...फिर वो रहे न रहे...जिन्दगी तो महकती ही रहती है...खिलती ही रहती है...

तेरे न होने में होना तेरा-
वो जिसे इबादत कहती है दुनिया, पूजा कहती है, ईश्वर के सजदे में होना कहती है वो अकेलेपन की वही यात्रा तो है...ऐसी स्थिति में होना जहाँ आसपास की तमाम चीज़ों से डिस्कनेक्ट होकर अपने केंद्र पर पहुंचना, केंद्र जो हमारे ही भीतर है...बाहर की आपाधापी में जिससे लगातार हाथ छूटता गया....वापस वहीँ पहुँचने की कोशिश...यही तो है अध्यात्म...यही तो है पूजा.

अध्यात्म की वो स्थिति जहाँ पवित्र रूदन भी है और सघन मुस्कुराहटें भी. बाहर कोई नहीं, सब अंदर है. अकेलापन मन की सुन्दरतम स्थिति है बस कि हमें मालूम नहीं कि इसके साथ पेश किस तरह आयें, हम इससे भागते रहते हैं या इसे खरोंचते रहते हैं. इस कोशिश में लगातार खुद से दूर जाते रहते हैं. बिना खुद के पास आये, बिना खुद को मोहब्बत किये हम किसी को भी क्या प्यार कर पायेंगे, किसी के क्या करीब जा पायेंगे. इसीलिए देह के तूफ़ान उठते हैं, गुज़र जाते हैं...ठहरता कुछ भी नहीं...व्यक्ति जो देह के, आवेग के उस पार है, वहां पहुँचने की योग्यता हासिल करनी होती है...न न कोई साधू सन्यासी होने की बात नहीं है यह, बस अपनी प्याली की चाय के हर घूँट को ठीक से महसूस करने जैसा सरल और आसान है...चलो फिर उठाओ अपनी चाय का प्याला...अभी..

एक प्यारे से एहसास अकेलेपन को यानि अपने खुद के करीब होने को दुनियादारी के तमाम आवरणों से ढांककर मैला कर दिया गया..इसे उदासी का, निराशा का कारण बना लिया है...बीमारी की वजह बना लिया है...बीमारी की वजह अकेलेपन का होना नहीं है, अकेलेपन को ठीक से समझ न पाना है, उसकी मुठ्ठी में हमारे लिए बहुत कुछ है, लेकिन हम उससे डरकर छुप जाते हैं, घबराकर कहीं दूर भाग जाना चाहते हैं, रुदन में सिमट जाते हैं, बीमार होने लगते हैं...भीतर ही भीतर टूटने बिखरने लगते हैं...लेकिन अकेलेपन की मुठ्ठी को खोलते नहीं. नहीं देखते कि उसमें हमारे लिए कुछ चमकते हुए लम्हे हैं, खुद पर विश्वास करना है, जिन्दगी को ठीक से महसूस करने का सुख है, बारिशें हैं, चाँद राते हैं...हम इन सबसे मुंह मोड़कर बैठे रहते हैं अकेलेपन से घबराकर भागते फिरते हैं....

कभी जब इस नए दोस्त से दोस्ती हो जाएगी तो सिनेमाहॉल में एक टिकट लेकर एक कप कॉफ़ी ऑर्डर करके सिनेमा देखने का सुख महसूस होगा. अपनी सोहबत में अपने साथ मीलों पैदल का सफ़र तय करने का लुत्फ़ होगा. अपनी ही मुस्कुराहटों पर खुद निसार होकर तमाम बारिशों को, पंछियों के कोलाहल के बीच खुद को छोड़ देने का आनंद होगा. तब अकेलापन बीमारी नहीं जिन्दगी का उत्सव सा नजर आएगा...सच्ची.

अगर आप धार्मिक हैं तो अध्यात्म की उच्चतम स्थिति है अकेलापन और अगर आप यायावर हैं तो आप जानते ही हैं कि यायावरी अकेलेपन की वह उच्चतम स्थिति है जहाँ महसूसने की तमाम हदें टूट जाती हैं...किसी समन्दर के सामने धूनी लगाकर घटों एकटक ताकते हुए कोई मिले अगर आपको तो आप उसे अकेला या उदास समझकर तरस मत खाइएगा, उसके सुख़ में होने से ईर्ष्या ज़रूर कर सकते हैं.

अकेले रहना अकेलेपन की ज़रूरत नहीं-
अकेलेपन को अकसर लोगों के अकेले रहने से जोड़कर देखने का रिवाज़ सा है. अजीब बात है न? अकेलापन तो परिवार के साथ होते हुए, दोस्तों के साथ होते, भीड़ भड़क्के में, दुनियादारी के शोर के बीच भी खूब मिलता है...वो निदा फ़ाज़ली साहब की लाइन है न ‘ हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी...’ यानि अकेलापन और अकेले रहना दो अलग-अलग बातें हैं. हाँ, यह ज़रूर है कि कुछ लोगों ने अपने अकेलेपन को बचाए रखने के लिए खुद को दुनियादरी से दूर कर लिया धीरे धीरे और अकेले रहना भी चुन ही लिया. लेकिन वो दूसरी बात है, यह कोई ज़रूरी शर्त नहीं. बस एक ही दिक्कत है कि समाज, परिवेश, हम सब अभी इसे संभालना इसके साथ किस तरह पेश आना है ये समझ नहीं पाए हैं.

‘वो बहुत अजीब इन्सान है, न किसी से बोलता है, न चालता है, न कहीं आना न जाना...जाने क्या करता है अकेले. सामान्य नहीं है वो...’ अपने अकेलेपन में अपने काम को जीते, अपने जीवन को महसूस करते हुए इस तरह के लोग जब हमारे आसपास होते हैं तो उनको हम नॉर्मल नहीं होने की कैटेगरी में डाल देते हैं. दरअसल, ये हमारा उन्हें न समझ पाना है. ये न समझ पाना कि वो शायद खुद को समझ चुके हैं...और उन्होने अपनी जिन्दगी से बेवजह के सामान को कम कर दिया है. कुछ लोग भीड़ में रहते हुए भी अपने इस अकेलपन को बचा लेते हैं और अपनी सुबहों, अपनी शामों को अपनी मुताबिक जीने की कोशिश करते रहते हैं...कुछ लोग अपने अकेलेपन को एकांत में उठाकर ले जाते हैं...लेकिन यह तो तय है कि अकेलापन अकेले रहने की दरकार नहीं करता. जो अकेले रहते हैं वो अकेलापन नहीं भी जी रहे होते हैं और जो भीड़ में रह रहे हैं वो अकेलेपन को जी रहे भी हो सकते हैं.

ओ डॉक्टर बाबू, सुनो तो-
अगर किसी के जीवन में कोई है तो उसका होना उसके भीतर का भराव कितना है यह समझना होगा. ज्यादातर जो बीमारियाँ हैं, डिप्रेशन हैं जिनकी वजह अकेलापन माना जाता है वो बाहरी अकेलेपन की बात है. किसी का साथी बिछड़ गया, कोई लगातार असफल होता रहा, किसी को लगता है कि उसकी किसी को फ़िक्र नहीं...ये बाहरी स्थितियां हैं जो अंदर तक नकारात्मकता भर रही होती हैं और व्यक्ति डॉक्टर के चक्कर काटने लगता है, या कभी चुपचाप उदासी में सिमट जाता है. जबकि बाहर की हर स्थिति से आसानी से या मुश्किल से लड़ा जा सकता है. कभी कभी लगता है, न लड़ पाना, लड़ने की हिम्मत छोड़ देना भी अकेलापन का कारण बनता है, उदासी का, निराशा का कारण. अकेलापन नहीं, कुछ और हैं कारण उदासी के, समझना होगा, अकेलेपन के कंधे पर अपनी नाकामियों का बोझ डालना ठीक नहीं. जीवन में सब कुछ व्यवस्थित करने के लिए कमर कसिये, बाहर की दुनिया को दुरुस्त करिए और तब अपने साथ अकेले में बैठकर बात करिए...सुख मिलेगा...

वो जो दिखती है तन्हाई सी...
वो जो दूसरों को नज़र आती तन्हाई आपकी, वो पूरा सच है क्या? नज़र आने वाली तन्हाई में आसपास लोगों की भीड़ का कम होना होता है, जीवनसाथी या प्रेमी का न होना, परिवार या दोस्तों का न होना. जिन्हें ये नज़र आती है वो शुभचिंतक इस तन्हाई को लेकर एक अवसाद का तानाबाना बुनने लगते हैं...वो अपने साथ या साथी के होने के सुख से भरपूर होने के वहम का सुख अकेले व्यक्ति के कन्धों पर इस तरह उड़ेलते हैं कि उसे अपनी तन्हाई को छोड़कर उसके जैसा होने का जी चाहता है. वो भी किसी ‘और’ के ‘साथ’ की कल्पना में उदास होने लगता है, और धीरे-धीरे अकेलापन अवसाद में तब्दील होने लगता है...लेकिन हम ये कभी नहीं जान पाते कि जिनके जैसे न होने के दुःख में अकेलापन चुभ रहा है वो खुद भी बहुत अकेले हैं. वो जो अपने दोस्तों को तन्हाई से आज़ाद कराने के तमाम उपक्रम कर रहे हैं, वो खुद अपने भीड़ भरे घेरे में तन्हा ही हैं...बस न वो खुद को देख पा रहे हैं, न कोई और उन्हें देख पा रहा है.

जीवन को देखना नई नजर से-
जीवन हमें वैसा दिखता है, जैसा हम उसे देखते हैं. हम जीवन को वैसे ही देखते हैं जैसे उसे देखने के हम अभ्यस्त होते हैं या कराये जाते हैं. संभवतः समाज ने शुरू से ही अकेलेपन को नकारत्म्कता के साथ देखा और सारे नियम अकेलेपन को तोड़ने के बनाये. इसीलिए जीवन में अकेले हो गए या कर दिए गए लोगों के प्रति तरस का, सहानुभूति का या उपहास का भाव रखा. उन लोगों को तो खैर समाज कभी समझ ही नहीं पाया जिन्होंने खुद स्वेच्छा से अकेलापन चुना. समूची दुनिया ने उन्हें पागलों की श्रेणी में ही डाल दिया.
‘अजीब पागल जैसा शख्स था, घंटो अकेले बैठा दूर आसमान को ताकता रहता था...’
‘उम्र हो गयी, ब्याह कर दो ताकि इसका अकेलापन दूर हो जाये’...
’बेचारे का जीवनसाथी बीच सफ़र में बिछड़ गया, इससे बड़ा कहर कोई हो ही नहीं सकता’
‘ हाय बेचारा जीवन के सफ़र में अकेला रह गया’ इस तरह के जुमले अकेलेपन को हिकारत से, घबराहट से देखने के आदी बनाती है. अगर इस पहले से तयशुदा फ्रेम से अलग अकेलेपन को देखना, समझना आ जाए तो संभवतः इसका रचनात्मक उपयोग हो सके. और तब इसे लेकर बिसूरना बंद हो, सुकून संग हो...

मुग्धा होना जीना, मुस्कुराना-
उसे यह बात काफी पहले ही समझ में आ गयी थी कि ज़माने से बेपरवाह होकर ही जिया जा सकता है. वरना तो जिंदगी ज़माने के नीति नियमों पर चलते ही बीत जायेगी. मुग्धा मुस्कुराकर बताती है कि दरअसल बाहर का कोई व्यक्ति कभी जान ही नहीं सकता कि आपका अकेलापन कब है आपके साथ, और वो आपके साथ किस तरह से पेश आ रहा है. लेकिन बाहरी दबावों के चलते हम खुद को ही समझ नहीं पाते. सोचो तो, हमारा महसूस करना भी हमारा नहीं है, अजीब बात है न? जिन दिनों मैं दुनिया की नज़रों में खुश, कामयाब और ‘साथ’ से भरपूर थी असल में उसी वक़्त मैं सबसे ज्यादा तन्हा थी...लेकिन तब वो तन्हाई मुझे उदास करती थी. जीवनसाथी के साथ होते हुए, प्रेम से भरपूर होते हुए, दोस्तों के बीच हंसते हुए मैं अपने भीतर कोई खालीपन रेंगता महसूस करती थी...मुझे मालूम नहीं था कि मेरे भीतर क्या चल रहा था...बस कि सब छोडकर कहीं दूर भाग जाने को जी चाहता था. धीरे-धीरे मैंने भीड़ में होते हुए भी, लोगों के बीच होते हुए भी खुद को अलग करना सीख लिया...यह मेरे सुख की शुरुआत थी...अब लोगों के बीच होकर भी मैं अपने अकेलेपन को जीने लगी थी. संवाद मेरे इर्द-गिर्द से गुज़र जाते थे, लोग मेरे आसपास से गुजरते रहते थे...लेकिन मैं अपने अकेलेपन में सुरक्षित थी, खुश थी. धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि इस झूठ-मूठ के घेरों की ज़रूरत क्या है...क्यों न मैं अपने साथ रहूँ...और मैंने खुद का साथ चुन लिया...बस उसी दिन से मैं लोगों की आँखों की किरकिरी बन गयी. लेकिन मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं देती क्योंकि जिन्होंने गुड का स्वाद चखा ही नहीं, वो कैसे जानेंगे उसे...मेरे लिए तो मेरा अकेलापन एक नेमत है.

शादी का अकेलेपन से क्या रिश्ता है-
आकाश में टंगा ध्रुवतारा गवाही देता है कि इस धरती पर दो लोग अब एक हो जायेंगे और उन दोनों के जीवन में एक दूजे का साथ गुंथ जायेगा. लेकिन शादी का अकेलेपन से क्या रिश्ता है आखिर? क्या दो लोगों का एक साथ रहना, देह के रिश्ते से जुड़ना, जिम्मेदारियों के रिश्ते से जुड़ना अकेलपन से मुक्ति का रास्ता है...अगर ऐसा है तो कोई भी शादीशुदा व्यक्ति तन्हा होता ही नहीं. जाने क्यों अकेलेपन को दूर करने के उपाय के तौर पर शादी को देखा जाता है और दो अकेले लोगों को एक-दूसरे की उपस्थिति में अकेले रहने की ओर धकेला जाता है. अकेलापन भीतर की स्थिति है, जिसे किसी बाहरी की उपस्थिति से कम या ज्यादा तो किया जा सकता है, दूर नहीं किया जा सकता.

एक तो औरत, वो भी अकेली, फिर भी खुश ?

एक रोज़ जिंदगी के करीब बैठकर जब वो चाय का आखिरी घूँट गटक रही थी, उसे महसूस हुआ कि जिंदगी भी उसके करीब आने को उतनी ही उत्सुक थी जितनी वो उसके करीब जाने को. लेकिन वक़्त जिस तरह ज़र्ररररर से निकला जा रहा था, उसे यही लगता रहा कि जिंदगी उससे भागती फिर रही है...कभी गुस्से में उसने भी कहा ‘ओये जिन्दगी, जा मैं तुझे छोड़ दूँगी...’ लेकिन ठीक उसी वक़्त जिन्दगी ने उसके सर पर हाथ रख दिया था. दोनों फफक के रो पड़ीं...जिन्दगी ने कहा, ‘मैं तो तुझे छोड़कर कभी नहीं गयी...बस तेरे मेरे बीच लोगों का, काम-काज का, रस्मो-रिवाज का सैलाब आ गया था. और हम दोनों एक दूसरे से दूर होते गए...’

बस उस रोज़ दोनों में दोस्ती हो गयी...उसने दोनों के बीच आये सैलाब को कम करना शुरू किया, रस्मो-रिवाज के तौर पर किये जाने वाले तमाम काम बंद किये, वो करना शुरू किया जो उसका दिल चाहता था...उसने लोगों की भीड़ से खुद को अलग किया और उनका साथ चुना जिनका होना या न होना उसके भीतर की दुनिया में भी दखल रखता था. नाममात्र के जो रिश्ते नाते थे साथ होकर भी जिनके साथ को कभी महसूस नही किया था, उसने उन सबसे किनारा कर लिया और इस तरह उसकी जिंदगी से दोस्ती मजबूत होती गयी लेकिन एक और ही लेबल चस्पा हुआ फिर उसके माथे पर...अकेली औरत.

वो मुस्कुराई, अकेली होना अकेलेपन में होना नहीं है. अकेलेपन में होना उदासी में होना नहीं है...अकेली जब थी तब किसी को लगी ही नहीं, उदास जब थी, तबकी तमाम तस्वीरों में मुस्कुराहटें तारी हैं ही लेकिन अब जबकि जिंदगी जीने का मज़ा आने लगा है, अपने अकेलेपन का स्वाद महसूस होना शुरू हुआ है तब सारे ज़माने को तन्हाई नज़र आती है...तन्हाई में भी एक बेचारगी...लेकिन भला ये कैसी बात हुई कि ज़माना आंसू पोछने को रूमाल लिए खड़ा था, कन्धा बनकर सांत्वना देने को आतुर था और वो मुस्कुराकर अपने जूते के फीते कस रही थी...कि जिन्दगी के सफ़र पे उसे बहुत दूर जाना था जहाँ उसे उसका वजूद पुकार रहा था...उसका अपना होना, अपनी ख़ुशी, अपने दुःख...जंगल की खुशबू बाहें पसारे उसके इंतजार में थी और समन्दर की लहरें टुकुर-टुकुर उसकी बाट जोह रही थीं...वो हंस रही थी, मुस्कुरा रही थी, खिलखिला रही थी, गुनगुना रही थी...

और फिर ज़माने की त्योरियां चढ़ीं...ऐसी कोई लड़की होती है क्या...पति से अलग होकर अकेली रहती है और फिर भी खुश रहती है...शादी न करके भी खुश रहती है, ज़रूर कुछ गड़बड़ है...लो जी, तैयार हो गया उसका नया कैरेक्टर सर्टिफिकेट...लेकिन जिसने जीना सीख लिया हो उसने लड़ना भी सीख ही लिया होगा. जिसने लड़ना सीख लिया होगा उसने जमाने के दिए तमाम अच्छे बुरे सर्टिफिकेट भी उठाकर फेंक ही दिए होंगे...और जिसने ये सब कर लिया होगा वो अकेले रहती हो या भीड़ में अपना हाथ मजबूती से थाम ही चुकी होगी...ज़ाहिर है ज़माने की आँख की वो किरिकिरी मुस्कुराकर देखती है ज़माने को, उसकी नादान सोच को, पीठ दिखाकर चल देती है आगे और पलटकर कहती है जिसे तुम अकेलापन समझते थे वो दरअसल अपना होना था, जिससे अब तक भागते फिरती थी वहीँ पनाह थी...समझे तुम...?

ज़माना सुन तो रहा है उसकी बात लेकिन समझ नहीं पा रहा कि जिसके कंधे पर अकेले छूट जाने का, अकेलेपन का इतना बड़ा बोझ हो वो इस कदर खुश कैसे हो सकती है...एक तो औरत, वो भी अकेली, फिर भी खुश...? वो आँखे मिचमिचाते समाज के इस असमंजस पे हंसती है...

तुम गए तो गये कहाँ –
कोई रोके उसे और ये कह दे कोई अपनी निशानी देता जा
गर ये भी तुझे मंजूर नहीं तू याद भी अपनी लेता जा...

अमीरनबाई की आवाज़ घर में गूँज रही थी और जाने वाले की याद जीवन में. वो जिसके जाते ही घुप्प अँधेरा घिर आया था जीवन में, रौशनी से रिश्ता टूट गया था, जिन्दगी से मोह ख़त्म हो गया था...दिन रात अतीत के पन्ने सेल्युलाइड के परदे की तरह जेहन में घूमते रहते...सवाल घुमते रहते, वो कहाँ होगा, किसके साथ होगा, वो खुश होगा शायद...ये सोचकर उसकी शामें, उसकी सुबहें उसके दिन और रात सब उदास हो चले थे...

जीवन में विकट अकेलापन घिर आया था, कितने उपाय किये, कितनी तरकीबे लगायीं लेकिन कोई काम न आई...अकेलापन अवसाद बनने लगा, दुःख जीवन. उसे अपने अकेलपन में ही सुख मिलने लगा. धीरे-धीरे दोनों को एक दूसरे की आदत हो गयी...बहुत वक़्त लगा लेकिन एक दिन दोनों में दोस्ती हो ही गयी.

जिन्दगी ने पूछा, ‘उदास क्यों हो, जिसके लिए उदास हो वो कौन था...उसके प्रति प्रेम तुम्हारे भीतर था या बाहर था. अगर वो भीतर था, तो वो बाहर से कैसे जा सकता है...’ वो ध्यान से सुनती रही...एक रोज उसी अकेलेपन का हाथ पकड़कर वो बाहर आ गयी...अब आंसुओं की जगह मुस्कान थी...जेहन में उसकी याद थी, लेकिन दुःख नहीं.

उसने महसूस किया इस दौरान उसने खुद के स्त्री होने को कितना कोसा था. ‘क्यों कोसा होगा अपने स्त्री होने को मैंने,’ उसने खुद से पूछा क्योंकि हर दुःख स्त्री के जीवन से जुड़ते ही दोगुना बना देता है समाज और सुख आधा. दुःख में लिपटी स्त्री को तो देखने की आदत है सबको लेकिन दुःख से, अवसाद से, अकेलेपन से लड़कर जीतकर बाहर निकलकर हंसती, मुस्कुराती स्त्री को देखने की आदत नहीं है. इसीलिए उसे स्त्री होने के नाते अपने दुःख से लड़ने की बजाय उसे नियति मान लेना सिखाया गया. जहाँ पुरुषों को उनके अकेलेपन से लड़ने के लिए तुरंत समाज उसके लिए जल्दी से नया जीवनसाथी, काम, बदला हुआ माहौल जमा करने लगता है, दूसरी और स्त्री को धीरज रखने, सहने की ताक़त जमा करने, बच्चों का मुह देखकर उनके लिए जीने के नाम के हौसले दिए जाने लगते हैं. अकेलापन वो महसूस न करें, इसके लिए उनकी दुनिया को घर परिवार पति की जिम्मेदारियों को ठीक से निभाने की तरफ ही मोड़ा जाता है. लेकिन बहुत कम स्त्रियाँ जान पाती हैं इस सबके बीच ही वो कितना अकेलापन जी रही हैं. वो अकेलापन, जिसे ठीक ठीक पहचानना ही नहीं आया उनको, उसे सकारत्मक दिशा देने की तो बात ही अलग है.

कोई स्त्री या कोई पुरुष या समाज यह कभी नहीं जान पाता की लिपस्टिक की आड़ से मुस्कराती, घर परिवार और अब नौकरी संभालती हुई स्त्री लगातार कब और कैसे एक चिडचिडी स्त्री में तब्दील होती जा रही है. क्यों और कब वो पुरुषों के दुनिया में फूहड़ चुटकुलों का मसाला हो चुकी है जिस पर वो खुद भी हँसना सीख चुकी है...ये भीड में रहते हुए भी हमारे साथ जो अकेलापन चलता रहता है, जिसकी ओर हम आँख भर देख भी नहीं पाते, उसे महसूस भी नहीं कर पाते वो किस तरह अन्दर ही अन्दर खोखला और निरर्थक कर देता है. खासकर तब जब आप स्त्री हों.

तुम्हारा तो घर है फिर भी-
भला बताओ जिसका अच्छा भला पैसे वाला, रुतबे वाला प्यार करने वाला पति हो, प्यारा सा बेटा हो, दोस्तों में अच्छी साख हो, सोसायटी में कभी कभार चीफ गेस्ट बनने के मौके मिलते हों, फेसबुक पर लाइक्स और कमेंट्स की भरमार हो, ट्विटर पर फौलोअर्स की बाढ़ हो फिर भी वो एक रोज बिना किसी को वजह बताये घर से अलग रहने का फैसला कर ले अजीब बात है न? वो घर छोड़ना नहीं था, अपने आपसे खुद को जोड़ना था...अब एक कमरे के छोटे से फ़्लैट में रहती है, छोटी सी नौकरी करती है, घुमक्कड़ी करती है और खुश रहती है, अब वो अकेली रहती है और अकेले रहने को और अकेलापन दोनों को भरपूर जीती है...पहले वो सबके बीच अकेली रहती थी लेकिन अकेलेपन की उदासियों से भीतर ही भीतर गलती जा रही थी...

फिल्म ‘पिंक’ में जब वकील लड़की से पूछता है कि ‘तुम्हारा तो घर है इसी शहर में फिर तुम अकेले क्यों रहती हो’ तो कितने गिजगिज़ाते हुए सवाल शामिल थे इसके भीतर जिसका सिर्फ एक ही जवाब है हर लड़की के पास, ‘क्योंकि वो अपना होना जीना चाहती थी.’ तो क्या जो लोग परिवार में रह रहे हैं, समाज के नियमों पे चल रहे हैं वो अपना होना नहीं जी रहे हैं? या उन सबको घर छोड़ देने चाहिए? यही है न अगला सवाल?

अकेलापन तो भीड़ में भी है ही सबके भीतर, लेकिन कुछ को इसके होने के खबर है, कुछ को पता ही नहीं चलता और वो दूसरी ही बाहरी वजहों पर चीखकर, चिल्लाकर खुद को खत्म करते रहते हैं...हाँ लेकिन अकेलेपन को जीना कम ही लोगों को आता है...ज्यादातर उसमें मर ही रहे होते हैं...दुःख और अवसाद उगा लेते हैं इससे. स्त्रियों के मामले में यह और ज्यादा होता है...सुखी औरत से हाय बेचारी अकेली औरत के बीच वो कब कहाँ कितनी तनहा है ये न वो खुद समझ पाती है और न ही कोई और...लेकिन जिस दिन समझ जाती है न उस दिन दुनिया उसे नहीं समझ पाती, दुनिया उसे हैरत से देखती है और वो मुस्कुराकर कहती है ‘अपने पास हूँ मैं, किसी और की ज़रूरत नहीं, समूचा आसमान है मेरे पास समूची धरती....और समूचा जीवन, तुम जिसे कहते थे अकेलापन...वो असल में मेरा होना था...’

('अहा जिन्दगी' के दिसम्बर अंक में प्रकाशित )