Sunday, October 16, 2016

अक्टूबर की हथेली पर...


अक्टूबर की हथेली पर
शरद पूर्णिमा का चाँद रखा है
रखी है बदलते मौसम की आहट
और हवाओं में घुलती हुई ठण्ड के भीतर
मीठी सी धूप की गर्माहट रखी है

मीर की ग़ज़ल रखी है
अक्टूबर की हथेली पर
ताजा अन्खुआये कुछ ख्वाब रखे हैं

मूंगफली भुनने की खुशबू रखी है
आसमान से झरता गुलाबी मौसम रखा है
बेवजह आसपास मंडराती
मुस्कुराहटें रखी हैं
अक्टूबर की हथेली पर

परदेसियों के लौटने की मुरझा चुकी शाख पर
उग आई है फिर से
इंतजार की नन्ही कोंपलें

अक्टूबर महीने ने थाम ली है कलाई फिर से
कि जीने की चाहतें रखी हैं
उसकी हथेली पर
धरती को फूलों से भर देने की
तैयारी रखी है

बच्चों की शरारतों का ढेर रखा है
बड़ों की गुम गयी ताकीदें रखी हैं
उतरी चेन वाली साइकिल रखी है एक
और सामने से गुजरता
न खत्म होने वाला रास्ता रखा है
अपनी चाबियाँ गुमा चुके ताले रखे हैं
मुरझा चुके कुछ ‘गुमान’ भी रखे हैं

अक्टूबर की हथेली पर
पडोसी की अधेड़ हो चुकी बेटी की
शादी का न्योता रखा है
कुछ बिना पढ़े न्यूजपेपर रखे हैं
मोगरे की खुशबू की आहटें रखी हैं
और भी बहुत कुछ रखा है
अक्टूबर की हथेली में

बस कि तुम्हारे आने का कोई वादा नहीं रखा...

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18-10-2016) के चर्चा मंच "बदलता मौसम" {चर्चा अंक- 2499} पर भी होगी!
शरदपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HARSHVARDHAN said...

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति स्मिता पाटिल और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।