Saturday, April 16, 2016

मेरी शिकायत दर्ज की जाए मी लॉर्ड / देवयानी

- देवयानी भरद्वाज 

कितने साल लगते हैं
एक बलात्कार, एक हत्या, एक ज़ुर्म की सजा सुनाने में अदालत को
कितने साल के बाद तक है इजाज़त
कि एक पीड़ि‍त दर्ज़ कराने जाये
उसके विरुद्ध इतिहास में हुए किसी अन्याय की शिकायत

मी लॉर्ड
मेरे जन्म के बाद मेरी माँ को नहीं दिया गया पूरा आराम और भरपूर आहार
इसलिये नहीं मिला मुझे पूरा पोषण
मेरी शिकायत दर्ज की जाये मी लॉर्ड

भाई को जब दी जाती थी मलाई और मिश्री की डली
उस वक़्त मुझे चबानी होती थी
बाजरे की सूखी रोटी
और सुननी होती थी माँ को दादी की जली कटी
एक तो जनी लड़की
वह भी काली कलूटी
कौन इसे ब्याहेगा
कहाँ से दहेज जुटायेंगे
मैं गैर बराबरी और अपमान की शिकायत दर्ज कराना चाहती हूँ मी लॉर्ड
थाने मे जाती हूँ तो सब मेरी बात पर हंसते हैं
घर वाले भी मुझे ही बावली बताते हैं
अब आप ही बतायें मी लॉर्ड
क्या आज़ाद हिन्दुस्तान के संविधान में
मेरे लिये बराबरी की यही परिभाषा थी

मेरी शिकायत दर्ज की जाये मी लॉर्ड
जयपुर के रेलवे स्टेशन पर
पच्चीस साल पहले
जब मेरी उम्र मात्र चौदह साल थी
एक शोहदे ने टॉयलेट के गलियारे में
मेरे नन्हे उभारों पर चिकोटी भर ली थी
और इस कदर सहम गयी थी मैं
कि माँ तक को बता न सकी थी
वह अश्लील स्पर्श मुझे अब भी नींदों में जगा देता है
और मैं बेटी को ट्रेन में अकेले टॉयलेट जाने नहीं देती
पहुँच ही जाती हूँ किसी भी बहाने उसके पीछे
मैं उस अश्लील स्पर्श से छुटकारा चाहती हूँ मी लॉर्ड
मैं इस असुरक्षा से बाहर आना चाहती हूँ
मुझे न अब ट्रेन का नाम याद है,
न घटना की तारीख याद है
मैंने तो उस लिजलिजे स्पर्श का चेहरा भी नहीं देखा
यदि देखा भी होता तो अब याद न रहता
लेकिन मेरे सपनो को उस अहसास से आज़ाद कीजिये मी लॉर्ड
मेरी शिकायत दर्ज की जाये मी लॉर्ड
मेरी न्याय की पुकार खाली न जाये हुज़ूर

मेरे बचपन के अल्हड दिनों को
अश्लील कल्पनाए सौंपने वाले मौसा के विरुद्ध मेरा वाद दर्ज किया जाये मी लॉर्ड
क्या फर्क़ पडता है कि अब उसे लक़वा मार गया है
कि वह अब बिस्तर में पड़ा अपनी आखिरी साँसे गिन रहा है
छह वर्ष से चौदह वर्ष की उम्र तक साल में कम से कम दो बार आते जाते
मासूम देह के साथ किये उसके खिलवाड़ों ने
छीन ली जो बचपन की मासूम कल्पनाएँ वे मुझे लौटाई जायें मी लॉर्ड
मुझे ही क्यों सोचना पड़े कि क्या सोचेंगे उसके नाती और पोतियाँ उसके बारे में
कि बुढापे में ऐसी थू थू लेकर कहाँ मुँह छिपायेगा

क्यों सोचूँ मैं उन चाचाओं, भाइयों और मकान मालिक के बेटों के बारे में
उन सबको जेल में भर दिया जाये मी लॉर्ड
कि अपनी मासूम यादों में आखिर कितने जख्‍मों को लिये जीती रहूँ मैं
मैं उस सहकर्मी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना चाहती हूँ
जो रोज़ाना सामने की सीट पर बैठ कर घूरा करता था
और रातों को किया करता था गुमनाम फोन कॉल
उसे गिफ्तार किया जाये और
मेरे साथ इंसाफ किया जाये मी लॉर्ड

उस लड़के के विरुद्ध भी मेरी शिकायत दर्ज की जाये
जिसने प्यार को औजार की तरह इस्तेमाल किया
और जिसने मेरी देह से सोख लिया सारा नमक

मेरे बच्चों को मेरे ही नाम से जाना जाये मी लॉर्ड
कि बच्चे मेरे रक्तबीज से बने हैं
मैं ही अपने बच्चो की माँ हूँ और पिता भी
बच्चों के नाम के साथ पिता के नाम की अनिवार्यता को समाप्त किया जाये मी लॉर्ड
कि सिर्फ वीर्य की कुछ बूँदें उसे पिता बना देती है और
मेरी मांस मज्जा, मेरे नौ महीने
मेरा दूध
मेरी रातो की नींद,

सिर्फ एक कर्म जिसके पीछे भी छुपा था प्यार
या निरी वासना और गुलाम बनाने की मानसिकता
कैसे उसे दे सकता है मेरे बराबरी का अधिकार
इस व्यवस्था को बदलिये मी लॉर्ड
कुछ कीजिये हुज़ूर कि इसमें छुपा अन्याय का दंश अब और सहा नहीं जाता है

अगर आपका कानून लगा सकता है
तमाम उम्र सुनाने में अपने फैसले
तो मेरी तमाम उम्र की शिकायत क्यूँ आज दर्ज नहीं की जा सकती मी लॉर्ड.

4 comments:

batkahi said...

अद्भुत संवेदना और मर्मान्तक पीड़ा की कविता
सिवा खामोश रह कर कविता के एक एक शब्द को महसूस करने के कोई और प्रतिक्रिया नहीं...

यादवेन्द्र

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-04-2016) को "वामअंग फरकन लगे " (चर्चा अंक-2316) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Joglekar said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी।

Jagdhar Singh said...

गहरी बात...