Thursday, April 16, 2015

जिंदगी तुझको बड़ी देर से जाना मैंने...


सुफैद फूलों की कतारें थीं...दूर तक. बहुत दूर तक. रात की वीरानी...सफेद फूलों की कतारों के संग संगीत सा रच रही थी. मृत्यु का कोमल संगीत...जिसके गले में कोई हिचकी कोई सिसकी अटकी हुई हो...और मृत्यु का उत्सव मुस्कुराहट बन सजा हो होठोें पर। किसी नर्मदा, बेतवा, झेलम किसी चिनाब को आंखों से छलकने की आजादी नहीं...

सुुफैद फूलों की कतारों के बीच-बीच में स्मृतियों के दिये जल रहे थे, दिये की लौ में मुस्कुराता चेहरा...ओह....मृत्यु. शुक्रिया कि तुमने दर्द का एक सिलसिला खत्म किया। मर्सी किलिंग सिर्फ बहस का ही मुद्दा है न्यायालयों के लिए, और आत्महत्या गुनाह ही। मृत्यु इन सबसे आजाद है। वही जिंदगी की तमाम गिरहों को खोलने में समर्थ है।

लड़की स्मृतियों के दियों में लगातार तेल डालती जाती, बाती बढ़ाती जाती। हवाओं को उसने अपनी लटों में बांध रखा था। हवा का कोई टुकड़ा दियो को बुझा नहीं सकता था। सुफैद फूलों की उन कतारों में सुफैद दुपट्टा लहराती लड़की कोई उड़ता हुआ ख्वाब सा मालूम होती थी। 

मरना सिर्फ देह भर नहीं होता...लड़की जानती है। एक घायल जिस्म को ढोते-ढोते भी कभी कोई थक ही जाता है। जब जज्बातों का, अहसासों का ईंधन ही न बचा हो तो बचाने को रह भी क्या जाता है। मृत्यु की कामना अपराध मालूम होती है लेकिन नहीं भी। जिस्म हो या रिश्ते जब बोझ बनकर ढोये जाने लगें,उनसे सलीके से विलग होना जीवन का सौन्दर्य बनाये रखता है। 

दुःख होना अलग बात है और शोक होना अलग। लड़की उसके जीते जी शोक में थी अब दुःख में है। दुःख में एक राहत भी घुली है...अब उसे रोज जख्मों पर मरहम नहीं लगाना होगा, अब टूटी चटखी लगभग घिसटती उम्मीदों को सहेजने की कोशिश में खुद को खपा नहीं देना होगा, अब नहीं सुनने होंगे सांत्वना के वो खंजर से चुभते शब्द कि 'सब ठीक हो जायेगा एक दिन'...जबकि जानता हर कोई है कि कुछ चीजें कभी ठीक नहीं होतीें...अब उसे रोज खुद को जवाब नहीं देना होगा कि 'क्या अब उसे प्यार नहीं रहा। '

जिंदा रहना जरूरी है...लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि जीवन जीने लायक बचा भी है या नहीं। सड़ता, गिजगिजाता , पीड़ा व संत्रास से भरा जीवन....जीते जाना जैसे कोई सजा...

सुबह की अज़ान का वक्त हुआ, लड़की की थकी हुई आंखों में नींद का एक टुकड़ा जो आ टिका था वो खुद को झाड़कर खड़ा हो गया। लड़की ने चौंककर देखा. दिये अब पलकें झपकाने लगे थे। फूलों को भी नींद आने लगी थी। सूरज कहीं आसपास ही था शायद।

उसने किचन में जाकर चाय का पानी चढ़ा दिया...एक कप चाय...बिना इलायची की अदरक वाली चाय, कम चीनी कम दूध वाली जैसी उसे खुद को पसंद है...

सुबह की पहली किरन के साथ ही उसने रात भर जागे दियों को समेट दिया...सुफैद फूलों को कहा सो जाओ...वो देर तक नहाई...कमरे में मेंहदी हसन की आवाज को धूपबत्ती की तरह जलाया...मनपसंद सैंडविच बनाये...वार्डरोब खंगाली और पहनी अपनी पसंद की असमानी साड़ी....घर से निकली तो चेहरे पर सुकून था, खूब रोने के बाद की ताजगी चेहरे पर, जैसे लगातार टीसते जख्म से निजात का सुख...

'कैसी लड़की है...अभी इसके घर में मौत हुई है...और इसके लक्षण तो देखो...' लड़की कान में मोतियों वाले बुंदे पहनते हुए सुनती है...मुस्कुराती है...

जिंदगी तुझको बड़ी देर से जाना मैंने...वो बुदबुदाती है।

उसकी स्कूटी स्टार्ट होती है...और वो ज्यययूूूंयूं से निकल जाती है...'गली-गली तेरी याद बिछी है, प्यारे रस्ता देख के चल...' एफ एम के जरिये उसके कानों गूंजती है मंेंहदी हसन की आवाज, वो स्कूटी रोककर दूसरा एफ एम चैनल को लगाती है...रास्ता अब भी वही था...

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (18-04-2015) को "कुछ फर्ज निभाना बाकी है" (चर्चा - 1949) पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) said...

सुंदर अभिव्यक्ति

Digamber Naswa said...

बहुत खूब ... प्रवाहमयी ...