Tuesday, March 31, 2015

वो दिल जो मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था...

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हे ग़म की कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो 

ये माना मैं किसी काबिल नहीं हूँ इन निगाहों में 
बुरा क्या हैं अगर ये दुःख ये हैरानी मुझे दे दो

मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिये अपनी निगेहबानी मुझे दे दो

वो दिल जो मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था 
बड़ी शय है अगर उसकी पशेमानी मुझे दे दो.… 

- साहिर

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अन्तर्राष्ट्रीय नूर्ख दिवस की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (01-04-2015) को “मूर्खदिवस पर..चोर पुराण” (चर्चा अंक-1935 ) पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

N A Vadhiya said...

Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us. Latest Government Jobs.