Friday, February 13, 2015

आखिर ये किसका प्यार हैं...


ये किसके विरह में
जल उठे हैं पलाश के जंगल

ये किसकी उदासियों पर डाल देते हैं
शोख रंगों की चूनर

किसके इंतजार की खुशबू में
महकते रहते हैं दिन-रात

किसकी तलाश में
गुम रहते हैं बरसों बरस

आखिर किसकी मुस्कुराहटों का
इन्हें इंतजार है...

आखिर ये किसका प्यार हैं...


3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-02-2015) को "आ गया ऋतुराज" (चर्चा अंक-1889) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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पाश्चात्य प्रेमदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Naveen Mani Tripathi said...

Waaah Prtibha ji bahut sundar likha hai apne ......badhai

dr.mahendrag said...

सार्थक प्रस्तुति