Wednesday, December 31, 2014

आ रे …



फिर एक कैलेण्डर उतर गया. हर बरस की तरह इस बार फिर उम्मीदों के बीज टटोलती हूँ. नए बरस की जमीन पर उन बीजों को बोने की तैयारी  फिर से. कभी-कभी सोचती हूँ कि उम्मीद भी अफीम की तरह है. हम उसे ढूंढने के बहाने और ठिकाने ढूंढते रहते हैं. गहन से गहन दुःख में भी तलाशते रहते हैं उम्मीद की कोई वजह कई बार बेवजह ही. ऐसी ही वजहें तलाशते वक़्त हम हर आने वाले लम्हे के कोमल कन्धों पर बीते लम्हों का भार रख देते हैं. कि जो हो न सका अब तक वो अब आने वाले लम्हों में होगा. मैं नए कैलेण्डर को किसी मासूम शिशु की तरह देखती हूँ. उस पर कोई बोझ नहीं डालना चाहती। उसे दुलरा लेना चाहती हूँ. कि वो बेख़ौफ़ आये, मुस्कुराये और गुनगुनाये।

आ  रे …

Wednesday, December 17, 2014

उदास इरेज़र


अपने बच्चो को कलेजे से ज़ोर से चिपकाते वक़्त उन माओं का ख्याल आता है जिनकी आँखों के आंसू जर्द हो चुके हैं. वो माएं जिन्हें कई दिन से टल रही नन्ही फरमाइशें जिंदगी भर रुलायेंगी. याद आएगा उनके लिए आखिरी बार टिफिन बनाना, आखिरी बार लाड करना, कहना कि लौट के आने पर बना मिलेगा पसंद का खाना, दूध नहीं पियोगे तो बड़े कैसे होगे कहकर रोज दूध का गिलास मुंह से लगा देना और ख़त्म होने पर कहना शाबास!, ख्वाब में बच्चों का आना और पूछना कि, अम्मी मैं तो रोज दूध पीता था फिर भी बड़ा क्यों नहीं हुआ, पूछना उन मासूम रूहों का कि क्या दुनिया का कोई इरेज़र ये दिन मिटा नहीं सकता?
उनके बस्तों में रखे सारे इरेज़र उदास हैं.…

Monday, December 15, 2014

रू-ब-रू जिंदगी है...


दिन रात लम्हों की खपत के बाद एक पूरी उम्र गुजार देने के बाद जिंदगी को ढूंढना...उसे बीते हुए लम्हों में तलाशना। वो लम्हा जिसमें हमारे होने की खुशबू दर्ज है, जो अब तक जेहन के किसी कोने में वैसा ही ताजा है...उसी तरह मुस्कुरा रहा है जैसे उस वक्त मुस्कुराया था। जब वो आसमान से उतरकर हमारे शानों पर आ बैठा था...उतनी सी...बस उतनी सी ही थी जिंदगी....मीठी सी जिंदगी...उस एक मुक्कम्मल लम्हे में सांस लेती जिंदगी...

ऐसे ही लम्हों को समेटकर, बटोरकर इन दिनों एक जगह पर इक्ट्ठा कर दिया गया है और नाम रखा गया है जिंदगी। हां, ये जिंदगी चैनल की ही बात है। बाद मुद्दत शामों को कोई ठौर मिला। बाद मुद्दत लोगों को लगा कि कम से कम किसी ने तो उनकी समझ पर यकीन किया और उन्हें कुछ बेहतर दिया। बाद मुद्दत एक सीन पर कलर से ग्रे होते पांच से दस लोगों के स्टिल पोज दिखाकर कुछ आश्चर्यजनक, सनसनीखेज होने का संकेत नहीं है। सालहा बिना वजह बस चलते चले जा रहे सिलसिले को विराम मिला। जिंदगी चैनल ने इसे महिलाओं का चैनल होने से बचाया है। इसके दर्शकों में महिलाएं व पुरुष दोनों हैं।
'जिंदगी गुलज़ार है' से हिंदुस्तान के दर्शकों को अपनी ओर खींचने वाले इस शो का रिपीट टेलीकास्ट भी काफी पसंद किया गया। इसके बाद तो काफी धारावाहिकों ने दर्शकों को अपना बनाया। एपिसोड डाउनलोड हो रहे हैं। हर एपिसोड के बाद लोग ट्वीट कर रहे हैं...फेसबुक स्टेटस अपडेट कर रहे हैं। अपने सीरियल के खत्म हो जाने पर उसे, उनके किरदारों को मिस कर रहे हैं। यह सब देखते हुए मुझे मेरे बचपन के वो दिन याद आते हैं, जब एक ही चैनल आता था वो भी चंद घंटों के लिए। हम लोग, बुनियाद, ये जो है जिंदगी, कच्ची धूप, आशा पूर्णा देवी और शरतचंद्र की कहानियांे का दौर था। चित्रहार, रंगोली का समय, दादा दादी की कहानियां, किस्सा-ए-विक्रम वेताल, रामायण, महाभारत का समय। जब सब एक साथ होते थे। फिर जी टीवी सारेगामा, सेलर, अस्तित्व एक प्रेम कहानी, रिश्ते ने भी लोगों का प्यार हासिल किया। इन सबमें कहीं कोई मेलोड्रामा नहीं था। सास-बहू का झंझट नहीं था। यहां स्त्रियां षडयंत्र करती और पुरुष डमी किरदार की तरह खड़े नहीं होते थे। न ही स्त्रियां 
आदर्शवादिता की वेदी पर अपनी बलि देते हुए आदर्श बहू का तमगा पाने को बेकरार होती थीं। 

जैसे-जैसे चैनल्स बढ़ते गये, न जाने कहां गुमने लगे मुंगेरी लाल के हसीन सपने, मालगुडी डेज, मैला आंचल...एक बहू अपने महंगे जेवरात और साडि़यों में, आदर्श बनने की होड़ में लगातार सहते जाने की सीमाओं कों लांघते हुए या फिर षडयंत्र रचते हुए, लंबे नाखून, गहरी लिपिस्टिक, किलो भर मेकअप, कुंटल भर की साड़ी अथाह साजिशों के साथ लोगों को लुभाने लगी। मानो स्त्रियां या तो षडयंत्रकारी होती हैं या बलिदानी। ओपेन सोसायटी के नाम विवाहेतर संबंधों की बाढ़ आ गई। जैसे रिश्तों से बाहर निकलना ही आजादी हो...। यह सब जिस तरह परोसा जाने लगा कि एक छोटा ही सही पर टीवी को शौक से देखने वाला वर्ग टीवी से दूर होने लगा। सेंसबिलिटी लगातार नदारद रहे तो कोई कब तक साडि़यां, गहने और साजिशें देखते रह सकता है। प्रोडक्शन हाउसेज ने पब्लिक डिमांड के नाम पर सास बहू और साजिश की अफीम परोसनी शुरू कर दी। जाहिर है नशा तो होना ही था। लेकिन इस नशे को अपनी जीत समझने वालों के लिए कोई जवाब नहीं था किसी के पास। अगर सब टीवी को छोड़ दें तो अमूमन सभी चैनल लगभग एक ही सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं। जिन्होंने कुछ अलग करने की शुरुआत भी की उन्हें भी या तो बीच में ही अपना शटर डाउन करना पड़ा या फिर उसी सुर में सुर मिलाना पड़ा।
टीआरपी की दौड़ में भागते इन तमाम चैनलों में से किसी ने उस छोटे से वर्ग की नाराजगी की परवाह नहीं की जिसने खुद को चैनल्स की दुनिया से दूर कर लिया था। 22 वर्षों से जीटीवी इंटरटेनमेंट की दुनिया में है। उसने उन दर्शकों का ख्याल किया और जिंदगी चैनल शुरू किया। रूमानियत, सहजता, सरलता से भरा चैनल जिसकी कहानियां दो से तीन महीनों में खत्म हो जाती हैं। जिंदगी की आॅडियंस के बारे में चैनल के चीफ कंटेंट एंड क्रिएटिव आॅफिसर भरत रंगा के अनुसार इस चैनल को देखने वाले नौकरीपेशा लोग, वकील, डाॅक्टर, बिजनेसमैन, प्रोफेसर, हाउस वाइफ वगैरह हैं। ये चैनल टीआरपी की रेस से शुरू से ही दूर है। इसका लक्ष्य स्पष्ट था। इसका दर्शक वर्ग सीमित होगा यह भी पहले से पता था लेकिन यह इतनी तेजी से इतनी लोकप्रियता हासिल करेगा यह शायद उम्मीद किसी को नहीं थी।
पाकिस्तान में लोकप्रियता हासिल कर चुका धारावाहिक जिंदगी गुलजार है...के कशफ और जारून की प्रेम कहानी को लोग बार-बार देखना चाहते थे। इसके एपिसोड डाउनलोड होने लगे, टाइटल सांग डाउनलोड होने लगे। आम जिंदगी की सादा सी कहानियों को लेकर कितनी गिरहें बाकी हैं भी लोगों को पसंद आया।
इसके बाद एक के बाद 'मेरे कातिल मेरे दिलदार', 'थकन', 'मस्ताना माही', 'काश मैं तेरी बेटी न होती' ने भी दर्शकों को अपने पास रोकना शुरू किया। लेकिन 'जिंदगी गुलजार है' में जारून बने फवाद खान इस चैनल के चहेते कलाकार बन गए। वो जब हमसफर में फिर से नज़र आये तो लोगों ने अपनी धड़कनों को थामकर इस धारावाहिक को देखा। रिपीट टेलीकास्ट भी इसका सुपरहिट रहा। इन धारावाहिकों की कौन सी बात है जो दर्शकों को पसंद आ रही है यह जानना भी जरूरी है। लोगों का कहना है कि इसके नाटकों में नाटक कम होता है यानी नो ड्रामेबाजी। फिजूल का ग्लैमर नहीं। जिंदगी जैसी सादा सी होती है, जैसी उलझनें उसमें होती है, जैसे धूप होती है जिंदगी में है जैसी छांव या फिर जैसी बारिश वो सब वैसा का वैसा ही यहां नज़र आता है।
विषय नये हैं और पूरे जेहनी मरम्मत की कश्मकश के साथ आते हैं। बिना किसी झंडाबरदारी के यहां कहानियों में तमाम रूढि़यों के टूटने की आहटें सुनाई देती हैं। कोई बड़े-बड़े दावे किये बगैर इसकी कहानियां दिमाग में लग चुके जालों को साफ करती हैं। बावजूद तमाम तालीम के जो तरबियत हासिल नहीं हो पाई जो जेहन का अंधेरा दूर होने से रह गया उसे जिंदगी की कहानियां हटाने की कोशिश करती हैं।
पिछले दिनों मस्ताना माही की छोटी बहू अपनी सौतन से जो अपना शौहर बांटना नहीं चाहती और इस बात को लेकर काफी परेशान है से कहती है, कि हम कितनी छोटी चीजों में उलझे रहते हैं, शौहर शेयर नहीं करने को लेकर परेशान हैं जबकि हजारों लाखों लोगों के दिलों का दर्द शेयर किया जाना बाकी है जो बहुत जरूरी है उस पर ध्यान नही नहीं देते। जिस वक्त हम यह सोचते हैं कि आज खाने में इटैलियन खाएं या चाइनीज उसी वक्त कितने सारे लोगों कि चिंता होती है कि उनके बच्चों को खाना मिलेगा भी या नहीं। इसी धारावाहिक में धारावाहिक के नायक जो कि एक पाॅलिटिकल लीडर है के किडनैप होने पर किडनैपर जो मांग करता है वो पूरी दुनिया के सामंतवादी रवैये की कलई उतारता है। घर की औरतों को फोन करके किडनैपर कहता है कि हम उसे तब छोड़ेंगे जब तुम लोग स्कूल बंद करोगे, लोगांें को पढ़ाना लिखाना, उन्हें समझदार बनाना बंद करोगे। जाहिर है पूरी दुनिया की सत्ताएं लोगों की जाहिलियत, उनकी मजबूरियों, उनकी नासमझियों पर ही तो चल रही हैं। आपसी मतभेदों को भुलाकर घर की तीनों औरतें मां और दो पत्नियां एक सुर में कहती हैं, मार दो उसे...क्योंकि अगर उसके सपने मर गये तो वो वैसे भी मर ही जायेगा।
व्यक्ति का मरना मंजूर करके उसके सपने बचाने का माद्दा रखना सिखा गया एक छोटा सा एपिसोड। अपनों की फिक्र करना लेकिन बेजा बातों की मुखालफत करना भी जरूरी है। माॅडर्न होने का अर्थ सिर्फ खुले या ग्लैमरस कपडे़, मेकअप या अंगे्रजी नहीं है। सर पर दुपट्टा रखकर घर परिवार की सेवा करती औरतें वक्त आने पर जिस मजबूती से अपनी बात रखती हैं, अपने आत्मसम्मान को हर हाल में बचाये रखने की कोशिश करती हैं वो तारीफ के काबिल है।
एंटरटेनमेंट मीडिया पर भी जिम्मेदारी होती है, अपने दर्शकों के बौद्धिक विकास की वो जहां हैं, वहां से थोड़ा आगे बढ़कर सोचना शुरू करें...लंबी-चैड़ी टीआरपी के लिए मारामारी करने से बेहतर है कि कुछ बेहतर कर पाने की जद्दोजेहद। फिलहाल जिंदगी चैनल ने एक छोटी ही सही शुरुआत तो की है। पुराने दिनों की यादें भी ताजा की हैं। लेकिन दर्शकों के मन में कुछ शंकाएं भी हैं कि दो से तीन महीने में खत्म होने वाले इस चैनल पर कब तक बेहतर कहानियों का यह सिलसिला चल पायेगा। चैनल की कंटेट डिजाइनिंग टीम ने इस बाबत चैकन्नी लगती है। कंटेंट डिजाइनर्स की एक बेहतर टीम बनाने की उनकी योजना है। साथ ही एक क्रिएटिव पूल बनाने की भी जिसमें दुनिया भर के बेहतर साहित्य का शुमार होगा। भारत, पाकिस्तान, पश्चिम एशिया, यूके, टर्की वगैरह के परफाॅर्मिग टैलेंट पर भी इनकी नजर है। कहानियों के चुनाव का आधार सिर्फ एक होगा कि वो लोगों के दिलों को बांध सकें...उनके जेहन में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कर सकें। इस सिलसिले में कुछ डेढ या दो घंटे की टेलीफिल्में भी शामिल होने की बात है।
बहरहाल, क्या दिखायेंगे, कहां से लायेंगे ये तो चैनल वाले ही जानें दर्शक फिलहाल इसी राहत में हैं कि उनके पास एक बेहतर आॅप्शन है जिंदगी। दिन भर की थकन उतारकर हाथ में एक प्याली चाय लेकर कुछ बेहतर कहानी, कुछ गज़ल और कुछ बेहतर संवाद सुनने के सुकून की उम्मीद में आ बैठना जिंदगी के रू-ब-रू।

Saturday, December 13, 2014

कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू है....


याद है तुमको
कैसे हम दोनों मिलकर
सारा कोहरा जी लेते थे
कॉफी के कप में
सारे लम्हे घोल-घोल के पी लेते थे

याद है तुमको
कोहरे की खुशबू कितना ललचाती थी
देर रात भीगी सड़कों पर
मैं कोहरे की सुरंग में
भागी जाती थी

याद है तुमको
कोहरे की चादर कितना कुछ ढँक लेती थी
दिल के कितने जख्मों पर फाहे रखती थी
दिन के टूटे बिखरे लम्हों को
अंजुरी में भर लेती थी

याद है तुमको
एक टूटे लम्हे को तुमने थाम लिया था
भीगी सी पलकों को रिश्ते का अंजाम दिया था
वो रिश्ता अब भी कोहरे की चादर में महफूज रखा है
कोहरे की खुशबू में अब उसकी भी खुशबू है....

Thursday, December 11, 2014

तुम्हारा होना...


तुम्हारा होना
जैसे चाय पीने की शदीद इच्छा होना
और घर में चायपत्ती का न होना

जैसे रास्तों पर दौड़ते जाने के इरादे से निकलना
और रास्तों के सीने पर टंगा होना बोर्ड
डेड इंड

जैसे बारिश में बेहिसाब भीगने की इच्छा
पर घोषित होना सूखा

जैसे एकांत की तलाश का जा मिलना
एक अनवरत् कोलाहल से

जैसे मृत्यु की कामना के बीच
बार-बार उगना जीवन की मजबूरियों का

तुम्हारा होना अक्सर 'हो' के बिना ही आता है
सिर्फ 'ना' बनकर रह जाता है...


Tuesday, December 9, 2014

दरारें दरारें हैं माथे पे मौला...


यह दुःख का समाज है, यहां सुख एक उत्सव की तरह सबसे उपरी पर्त पर अपनी भव्यता के साथ उपस्थित होकर भरमाता है। इसके सीने में अवसाद है जो आंसू बनकर टपप-टपप टपकता रहता है...जो आस्था बनकर किसी नाउम्मीद सी उम्मीद के पीछे दौड़ पड़ता है।

सामने अखबार की कुछ खबरें बिखरी हुई...टीवी चैनल्स पर दौड़ती तस्वीरें...आस्थाओं का समंदर फिर एक बार लहराता हुआ। फिर किसी बाबा का पाखंड उधड़ रहा है...फिर आस्थाओं में भूचाल आया हुआ है। फिर किसी तिलिस्मी दुनिया का दरवाजा सा खुलता है और न जाने कैसी-कैसी खबरें सामने आती हैं। मानो कोई किस्सागोई सी चल रही हो...कोई फैंटेसी। मानो पूस की रात में अलाव के गिर्द घेरा बनाकर बैठे लोग हों...और किस्सागो की भूमिका में उतरे चैनल्स।

लेकिन ये कोई किस्सागो का किस्सा नहीं...कोई फैंटेसी नहीं...यह किसी भी समाज की दुःखद तस्वीर है। तमाम आरोपों के बावजूद धर्म के इन तथाकथित फरमाबरदारों के भक्तों की आस्था में कोई कमी नहीं। वो अब भी उन्हें भगवान, कोई दूत, पैगम्बर, अवतार मानते हैं। वो नहीं मानते उन पर लगे किसी आरोप को। उनकी आस्थाएं अडिग हैं। अनगिनत आस्थाएं कब किसके पीछे चल पड़ें कहना मुश्किल है।

दुःख, पीड़ा, संघर्ष, शोषण और जाहिलियत की जड़ों से उपजी मासूम आस्थाएं। इन आस्थाओं में एक बड़ा वर्ग शोषित वर्ग का है। दुःख से डूबे लोगों का है। वो लोग जो अपनी परेशानियां अपने कंधों पर ढोते-ढोते बूढ़े होने लगते हैं। उनके कंधे पर हाथ रखकर जब कोई आत्मविश्वास से कहता है कि मैं हूं ना...मैं सब ठीक कर दूंगा...उसी वक्त आस्था का जन्म होता है। उस मैं हूं ना के प्रति आस्था....यह बात किसी एक धर्म या किसी एक घटना के बरअक्स पूरी नहीं होती। इसका कैनवास काफी बड़ा है और जिसकी जड़ों में अशिक्षा, सामाजिक जड़ता, वर्गभेद, लिंगभेद, असमानता, असंवेदनशाीलता से जाकर जुड़ती हैं।

जाहिर है इन आस्थाओं में, अंधविश्वास में स्त्रियों की संख्या ज्यादा है। किसी भी धर्म की बात हो, महिलाएं आमतौर पर ज्यादा संख्या में श्रद्धा में डूबी हुई पाई जाती हैं। क्यों न हो आखिर कि शोषित वर्ग में भी जो शोषित है वो स्त्री ही तो है। संवेदनाओं का, भावनाओं का बोझ जिसके कंधों पर है वो स्त्री है। जिसके हिस्से में अब तक शिक्षा की एक पूरी इबारत आना तो दूर कुछ अक्षर भी नहीं आये वो स्त्री है। वो भागती है ऐसे किसी तिलिस्म की ओर जहां से उसे सब ठीक होने के संकेत मिलते हैं....एक वहम उन्हें फुसलाता है...उनके कदम चल पड़ते हैं...वो सब करने को वो राजी होती जाती हैं जिसमें सब ठीक होने का आश्वासन होता है। पुरुष भी होते हैं, और पढ़े-लिखे लोग भी होते ही हैं इसमें शामिल लेकिन वो दूसरी बहस का मुद्दा है कि क्यों हमारी जो शिक्षा है वो वर्गभेद, संकीर्ण मानसिकता की जंजीरें नहीं तोड़ पाती, क्यों शिक्षित होने के बावजूद समता और समानता की जरूरत संविधान में तो शामिल हो गयी लेकिन जीवन में अब तक अपनी जगह नहीं बना पाया। लेकिन यहां बात स्त्रियों की भक्ति और आस्था की है।

मार्क्स कहते हैं कि जिसने भी जरा सा भी इतिहास पढ़ा है वो जानता है कि सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के उत्थान के बिना संभव ही नहीं है। तो हमारे समाज की मौजूदा तस्वीर साफ बयान कर रही है, कि हमारा समाज कैसा है और यहां स्त्रियों की स्थिति कैसी है।

मुझे एक तीन बरस पुरानी एक घटना याद आ रही है। एटा जिले के आसपास की एक जगह थी। जून की भरी दोपहरी। वहां के स्थानीय बाबा का आवास। भक्तजनों की भीड़। और तकरीबन एक किलोमीटर पहले से पैदल चलकर आते भक्तजन। तपती हुई सख्त जमीन पर ये लंबा सफर उन्हें जला नहीं रहा था। मुझे वहां सारे चेहरे गमज़दा नज़र आये। सबके लब पर कोई दुआ थी। कोई ऐसा नहीं मिला जो कुछ मांगने न आया हो, जो खुश दिख रहा हो। झुके हुए जिस्मों पर जिंदगी का बोझ तारी थी। भक्तों में ज्यादा संख्या महिलाओं की थी। एक सत्रह बरस की लड़की बार-बार जमीन पर सर पटक रही थी। एक स्त्री बार-बार पानी भरकर आने जाने वालों के रास्ते में गिरा रही थी। एक स्त्री चीख-चीखकर रो रही थी। उसके आसपास कुछ स्त्रियां थीं लेकिन वो उसे चुप नहीं करा रही थीं। तभी एक स्त्री पर नज़र गई, करीब 50 या 55 बरस की एक महिला लगातार एक पेड़ के चक्कर लगा रही थी। तेज दोपहर...बिना खाये पिये...नंगे पैर बस रोती जाती और घूमती जाती। पता चला कि वो करीब डेढ़ महीने से यही कर रही है। उसका 21 बरस का बेटा मर गया है। और उसे ऐसा करने से आराम आता है। वो चक्कर लगाती है...बेहोश हो जाती है...उठती है फिर चक्कर लगाने लगती है। वो सर पटकने वाली सत्रह बरस की लड़की शादी वाले दिन ही विधवा हो गई थी। ऐसी न जाने कितनी दारुण कहानियां खेतों के बीचोबीच उगे उस आस्था के पेड़ पर टंगी हुई थीं।

उस वक्त वो सारी खबरें जेहन में दोबारा जाग उठीं जिनमें कोई महिला बेटा होने की आस में किसी तांत्रिक के कहने पर अपनी दुधमुंही बच्ची को छोड़कर चली आती है...कहीं कोई जमीन को गिरवी पर से छुड़ाने के लिए अपने बच्चे को जिंदा गाड़ देती है, कहीं कोई अपनी जीभ काटकर चढ़ा आती है।

यह हमारे समूचे समाज का करुण सच है। फौरी तौर पर किसी वर्ग विशेष के गले में जाहिलियत की पहचान टांग देने भर से बात नहीं बनने वाली। उसकी जड़ों की पड़ताल जरूरी है। यह जानना जरूरी है कि आखिर क्यों अचानक से आस्थाओं का भूचाल आ जाता है...क्यों इस तरह की बात करने वाले उन्हीें के हक में काम करने वालों को भी उन्हीें से माफी मांगनी पड़ती है। क्योंकि उनके दुःख ने एक खंभा पकड़ रखा है। उसे जोर से पकड़ने पर उन्हें राहत मिलती है। वहम ही सही पर इससे कुछ देर को उन्हें सुकून आता है...

कुछ लोगों ने इस दुःख से, भय से उपजी आस्थाओं को काबू करना शुरू किया। आस्था किसी उद्योग में तब्दील होने लगी। यूं ही मजाक ही मजाक में लोग कहने लगे कि बाबा होने में भी बढ़िया करियर हो सकता है...कोई कहता है जब नौकरी करने से उब जायेंगे तो बाबा बन जायेंगे...ये खाली वक्त के मजाक हो सकते हैं लेकिन इनमें हमारे समाज का विद्रूप चेहरा छुपा है। और कई सवाल भी छुपे हैं कि अगर ये मामला सिर्फ शोषित वर्ग से जुड़ा है, स्त्री वर्ग से जुड़ा है तो क्यों भला पढ़े-लिखे लोग भी, तमाम सेलिब्रिटी भी शामिल हैं इस सबमें।

कई परतें हैं...काफी जाले हैं...कई स्तर पर हैं...पढ़ भर लेना जो सब कुछ होता तो कबीर जैसा फकीर बिना कागज कलम हाथ से छुए कैसे वो तमाम पर्तें तोड़कर कह पाता कि कांकर पाथर जोड़ के मसजिद लिये बनाय...तां चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहिरा हुआ खुदाय...उसी कबीर का नाम लेकर कोई लाखों के तिलिस्मी सिंहासन पर बैठकर खुद को कबीरपंथी कहता है और भोली-भाली जनता उसे सच मानने लगती है...यह विरोधाभास वो देख पाये इसके बीच उनके जीवन की दारुण कथायें आ जाती हैं।

यह दुःख का समाज है, यहां सुख एक उत्सव की तरह सबसे उपरी पर्त पर अपनी भव्यता के साथ उपस्थित होकर भरमाता है। इसके सीने में अवसाद है जो आंसू बनकर टपप-टपप टपकता रहता है...जो आस्था बनकर किसी नाउम्मीद सी उम्मीद के पीछे दौड़ पड़ता है। इस समाज के माथे पर ऐसी ही किसी दरार को देखकर शायद प्रसून जोशी ने लिखा था दरारें-दरारें हैं माथे पे मौला....
http://dailynewsnetwork.epapr.in/348410/khushboo/01-10-2014#page/1/1

(published)