Wednesday, December 17, 2014

उदास इरेज़र


अपने बच्चो को कलेजे से ज़ोर से चिपकाते वक़्त उन माओं का ख्याल आता है जिनकी आँखों के आंसू जर्द हो चुके हैं. वो माएं जिन्हें कई दिन से टल रही नन्ही फरमाइशें जिंदगी भर रुलायेंगी. याद आएगा उनके लिए आखिरी बार टिफिन बनाना, आखिरी बार लाड करना, कहना कि लौट के आने पर बना मिलेगा पसंद का खाना, दूध नहीं पियोगे तो बड़े कैसे होगे कहकर रोज दूध का गिलास मुंह से लगा देना और ख़त्म होने पर कहना शाबास!, ख्वाब में बच्चों का आना और पूछना कि, अम्मी मैं तो रोज दूध पीता था फिर भी बड़ा क्यों नहीं हुआ, पूछना उन मासूम रूहों का कि क्या दुनिया का कोई इरेज़र ये दिन मिटा नहीं सकता?
उनके बस्तों में रखे सारे इरेज़र उदास हैं.…

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (19-12-2014) को "नई तामीर है मेरी ग़ज़ल" (चर्चा-1832) पर भी होगी।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pratibha Verma said...

संवेदनशील। ।

प्रतिभा सक्सेना said...

स्तब्ध हूँ -कहने को कुछ नहीं !

Onkar said...

सार्थक रचना