Saturday, December 13, 2014

कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू है....


याद है तुमको
कैसे हम दोनों मिलकर
सारा कोहरा जी लेते थे
कॉफी के कप में
सारे लम्हे घोल-घोल के पी लेते थे

याद है तुमको
कोहरे की खुशबू कितना ललचाती थी
देर रात भीगी सड़कों पर
मैं कोहरे की सुरंग में
भागी जाती थी

याद है तुमको
कोहरे की चादर कितना कुछ ढँक लेती थी
दिल के कितने जख्मों पर फाहे रखती थी
दिन के टूटे बिखरे लम्हों को
अंजुरी में भर लेती थी

याद है तुमको
एक टूटे लम्हे को तुमने थाम लिया था
भीगी सी पलकों को रिश्ते का अंजाम दिया था
वो रिश्ता अब भी कोहरे की चादर में महफूज रखा है
कोहरे की खुशबू में अब उसकी भी खुशबू है....

9 comments:

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति

Ankur Jain said...

गहरे अहसासों से भरी सुंदर रचना।

Dayanand Arya said...

लम्हा कैसा भी हो याद तो बस वो आते ही हैँ ।>> http://zindagikenasheme.blogspot.in/2013/05/whirling-memories.html

संध्या शर्मा said...

और आज तक जी रहे हैं उस कोहरे की खुशबू को … अद्भुत भाव

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (15-12-2014) को "कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू" (चर्चा-1828) पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

धीरेन्द्र अस्थाना said...

बहुत खूबसूरत यादें।

Pratibha Katiyar said...

शुक्रिया धीरेन्द्र!

मन के - मनके said...


बहुत सुंदर!!!

मन के - मनके said...


बहुत सुंदर!!!