Tuesday, March 4, 2014

लम्हा-लम्हा झरती तुम्हारी याद .…


सुनो, वो जो धनिया के बीज बोये थे न, जिनके उगने का कबसे इंतज़ार था, वो उग आये हैं. इस बार घर लौटा हूँ तो वो मुस्कुराते हुए मिले, जाने क्यों उन्हें मुस्कुराते हुए देख तुम्हारी मुस्कुराहट याद आयी.

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बिल्ली का बच्चा जिसे गली के कुत्तों से बचाया था उस ठण्ड की रात में, और जिसे घर लाने पर शालू नाराज हो गयी थी, वो लौटा नहीं कई दिनों से.…अनहोनी कि आशंका से मन घबराता है यार. अब तुम मोह और दर्द के रिश्ते को मत समझाना। समझता हूँ मैं, पर मुझे उसकी मासूम आँखें याद आती हैं.… वो ठीक होगा न? हमेशा की तरह कह दो न कि सब ठीक है.… तुम्हें पता है तुम्हारे कहते ही सचमुच ठीक सा महसूस होने लगता है धीरे-धीरे....
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सुनो, तुम उदास हो न? बादलों का कोई टुकड़ा अभी गुजरा है करीब से, वो तुम्हारी उदासी का गीत गुनगुना रहा था. मुझे पता है इस वक़्त तुम अपनी चुप्पियाँ उतार फेंकने को व्याकुल होगी। दिन भर की थकन को चाय में घोलकर पी जाने की तुम्हारी इच्छा। जिंदगी को बूँद-बूँद जीने की तुम्हारी इच्छा, समूची धरती पर प्रेम बनकर बिखर जाने की तुम्हारी इच्छा, हर आँचल में बिना बताये मुस्कुराहटें बाँध देने की तुम्हारी इच्छा, बिना कुछ भी कहे तुम्हें समझ लिए जाने की तुम्हारी इच्छा, मेरी तुम्हारे साथ होने की इच्छा से कितनी ज्यादा बड़ी और पाक़ है.…
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यह इस दिन का आखिरी ख़त है. असल में आखिरी शब्द मुझे बहुत चुभता है. आखिरी शब्द का इस्तेमाल सिर्फ दुःख के दिनों, दर्द के, संघर्षों के ख़त्म होने के सन्दर्भ ही होना चाहिए। आखिरी बार। कि एक बार इसका इस्तेमाल होने के बाद इस शब्द की ज़रुरत ही न बचे. जब भी मैं आखिरी लिखता हूँ मैं अपने भीतर व्याकुलता महसूस करता हूँ. जैसे जिद सी जागती है आखिरी न होने देने की.

सुनो, तुम नाराज मत होना लेकिन मैंने उस रोज तुम्हारी बात नहीं मानी और मैं भीगता रहा. देर रात सड़क पर भीगते हुए पैदल चलते हुए मैं तुम्हारा अपने पास होना महसूस करता हूँ.

इस वक़्त मैं बुखार में हूँ.… मुस्कुरा रही हो न तुम?

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मेरे ऑफिस के सामने एक सड़क है जिसका जिक्र मैं तुमसे अक्सर करता हूँ, उस सड़क के पार कोई बिल्डिंग बन रही है. वहाँ काम करने वाले मजदूरों के बच्चों से दोस्ती हो चली है मेरी। हम दूर से एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं. आज सुबह मैं जब चाय पीते हुए उनसे आँख का खेल खेल रहा था न जो मैंने तुमसे सीखा है तो वो पास में पड़े डंडे को गाड़ी बनाकर खेलने लगा. वो इतना खुश था, क्या कहूँ, उसका वो बार-बार मुड़कर मेरी ओर देखना। मुझे जब भी कोई सुख का लम्हा छूता है तो महसूस होता है कि तुमने मेरी बांह थाम ली है, या कंधे पर सर रखकर मुस्कुरा रही हो. बहुत दूर, बहुत पास.

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अब बस भी करो बरसना, बहुत हुआ. मुझे नींद आ रही है और जब तक तुम यूँ बरसती रहोगी मैं सो न सकूंगा। ये वक़्त आसमान से बरसने का नहीं ख्वाब बनकर आँखों में झरने का है..... सुना तुमने

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4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

इधर उधर बिखरे अवलोकन, ठहरे वहीं मन।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (05-03-2014) को माते मत वाले मगर, नेता नातेदार-चर्चा मंच 1542 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Prabhat said...

तुम यूँ ही बरसते रहना ………!

aditi said...

so beautiful words...
rendered me speechless.