Sunday, February 9, 2014

ढूंढते फिरे तुम मुझे...



तुमने मुझे भाषा के घर में ढूंढा
पुकारा नदियों के किनारों पर
तलाशा जंगलों में
सहराओं में भी खोजा
समंदर की लहरों से
पूछा मेरा पता

खेतों में, पगडंडियों में,
सड़कों पर दी आवाज
तलाशा विश्व के महानतम साहित्य में
और लोक कथाओं में भी

ढूंढते फिरे तुम मुझे
चूल्हे की कच्ची आंच में
बच्चों की रूठी आवाज में भी
शोर में ढूंढा कभी
तो खामोशियों में भी

प्रिय मैं इन ठिकानों से गुजरी जरूर
लेकिन ठहरी तुम्हारे ही भीतर
सदियों से...
मैं तुम ही तो हूं...


6 comments:

siddheshwar singh said...

'तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!'
_______महादेवी वर्मा

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अलविदा मारुति - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

बाहर तो प्रतीकों में दिखता है जीवन, भीतर तो स्वयं विद्यमान है।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

कस्तूरी कुण्डलि बसै, मृग ढूँढे बन माहिं!! या फिर जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली! मो को कहाँ ढूँढे रे बन्दे...! पूरी कविता ने ऐसे न जाने कितने एहसास ज़िन्दा कर दिए!
बहुत अच्छे!!

dr.mahendrag said...

सुन्दर भाव सुन्दर प्रस्तुति.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (11-02-2014) को "साथी व्यस्त हैं तो क्या हुआ?" (चर्चा मंच-1520) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बसंतपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'