Monday, February 24, 2014

सर, मुझे कविता लिखनी नहीं आती है...


21 फरवरी शाम पांच बजे, बाल भवन के आडिटोरियम में शब्द अपना चोला उतारने को व्याकुल नज़र आये। मौका था मानव कौल के नाटक ' लाल पेंसिल' को देखने का। लाल पेंसिल देखते हुए महसूस हुआ कि जिन शब्दों को तराशने, सहेजने, उन्हें अपने सर पर ताज की तरह पहनने की जिजीविषाएं चारों ओर बिखरी पड़ी हों ठीक उसी वक्त कहीं कोई अव्यक्त शब्दों की दहलीज को पार करने को किस कदर व्याकुल है।

दिन भर किताबों के मेले में घूमने के बाद मेरे हाथ में थे ढेर सारे कविता संग्रह और सामने एक बच्ची का चीत्कार था...सर...मुझे कविता लिखनी नहीं आती है...बहुत मुश्किल काम है...कितना मुश्किल...क्या इतना मुश्किल कि जिंदगी एक अज़ाब हो जाये...कि सांस सांस वेदना...लगातार घनी होती वेदना...इतनी घनी की शब्दों का जंगल छोड़कर भाग जाने को जी चाहे...लेकिन भागना किससे, खुद से...खुद को व्यक्त न कर पाने की पीड़ा से मुक्ति भी नहीं है...प्रश्न यह है कि यह वेदना किसके हिस्से आई है...

नाटक 'लाल पेंसिल' जिंदगी की कई पर्तों को खोलता है, हमारे खामोशी के मानी तलाशता है, हमारी बोलियों में पैबस्त चुप को टटोलता है, भेड़चाल में फंसकर एक जैसा समझने, एक जैसा रचने, एक जैसी अभिव्यक्तियों और उनसे मिलने वाले देय को अभिलाषा से देखने की हसरतों को बेनकाब करता है। हमें जीवन भर लगता रहता है कि हमने सब कुछ ठीक-ठीक समझ लिया है...मैं समझा...मैं समझा...मैं  समझा...बड़...बड़...बड...यानी हम अपनी नासमझ समझ के मुगालते में जाने क्या-क्या बोलते जाते हैं बड़...बड़...बड़...यह बोलना सब कुछ है, लिखना, जीवन को जीना, अभिव्यक्त करना...और असल में सब निरर्थक...

यह नाटक बच्चों की दुनिया से खुलता है। एक जैसे होने की होड़...एक जैसे बच्चे...एक जैसे चेहरे...एक जैसी भाव भंगिमाएं...एक जैसी समझ और एक जैसी ही नासमझी भी। किस तरह हम सबका जीवन एक जैसे ढर्रे पर दौड़ता जाता है...यह इस कदर तेज दौड़ है कि हम अपने ही व्यक्तित्व की तमाम दूसरी खूबसूरत संभावनाओं को, इच्छाओं को समझ ही नहीं पाते। भेड़चाल, सफलता के कुछ तय मानक और बड़...बड़...बड़...बड़.…पिंकी इस भेड़चाल से अलग है। शायद इसीलिए वो कक्षा में उपेक्षित है। उसका कोई दोस्त नहीं है। बापू उसके दोस्त हैं, उनसे ही वो अपने मन की बात करती है। कक्षा में बच्चों से शिक्षक कविता लिखने को कहते हैं. सब बच्चे खुश होकर कविता लिखने लगते हैं...ऐसी कविता...वैसी कविता...शब्दों की उथल-पुथल और कविता...लेकिन पिंकी परेशान है...जहां एक ओर बच्चे किसी मशीन की तरह कविता लिखते हैं पिंकी इस वेदना से गुजरती है कि उसे तो कविता लिखनी आती ही नहीं है।

इसी दौरान उसे लाल पेंसिल मिल जाती है। लाल पेंसिल पकड़ते ही वो लिखने के प्रति दबाव महसूस करती है। इतना घना दबाव, ऐसी वेदना कि वो परेशान हो जाती है। वो अपने हाथ को रोकती है...पूरी कोशिश करती है कि न लिखे लेकिन नहीं...अब यह उसके बस का नहीं....और वो उस यातना से गुजरते हुए कविता लिखती है...कविता लिखने के बाद वो सेलिब्रिटी बन जाती है...क्लास के बाकी बच्चे उससे दोस्ती करना चाहते हैं...शिक्षक उसे सम्मानित करते हैं लेकिन पिंकी इन सबसे बेजार है...वो गले में पड़े मेडल को फेंक देती है और बार-बार कहती है मैंने कविता नहीं लिखी, मुझे कविता लिखना नहीं आता... वो लाल पेंसिल को फेंक आती है लेकिन वो पेंसिल उसका पीछा नहीं छोड़ती।

लाल पेंसिल का आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता है...यह लाल पेंसिल दरअसल पिंकी की इच्छा का प्रतीक है... इसे समझ पाना आसान नहीं लेकिन एक बार आप खुद को समझने की राह पे निकल पड़े तो इससे मुक्ति भी सम्भव नहीं।

लाल पेंसिल हमारे भीतर की दुनिया में चल रहे द्वंद्व को बेहतर ढंग से उकेरने में भी कामयाब होता है। हम सब कई लेयर्स पर जी रहे हैं। वो लेयर्स नाटक में खुलती हैं. नाटक का हर संवाद गहरा असर छोड़ता है। हर किरदार के लिए भरपूर स्पेस है। मंच का पूरा इस्तेमाल होता है। लाइट्स का इस्तेमाल कंटेंट को बखूबी सर्पोट करता है। सभी कलाकार अभिनय की शिद्दत को उकेरते हैं। यह नाटक एक खूबसूरत टीमवर्क के तौर पर उभरता है जिसमें एक नहीं बल्कि इससे जुड़ा हर व्यक्ति लीड रोल में नज़र आता है। इसे देखते हुए अपने भीतर की तमाम पर्तों को खुलता हुआ और शब्दों के मकड़जाल से मुक्त होता हुए महसूस करते हैं....

मानव एक निर्देशक के तौर पर चुपचाप दूर कहीं मुस्कुराते नज़़र आते हैं... 


2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बाल मन सदा ही सबसे भिन्न होने को मचलता है, हमारी शिक्षा पद्धति उसे एक सा बनाने को उद्धत है।

Shuboo said...

नाटक हमने भी देखा, पर इतना न देखा जितना आपकी 'पेन्सिल' ने लिखा है. शुक्रिया आपकी 'पेन्सिल' का.