Sunday, January 8, 2012

जाने क्या चाहे मन बावरा...


सुबहों का कोई ठिकाना नहीं कि वे कब आ धमकें. कभी तो आधी रात को दरवाजे पर दस्तक देती हैं और कभी दिन के दूसरे पहर भी ऊंघती सी आसमान के किसी कोने में दुबकी रहती हैं. मैंने भी अब सुबहों का इंतजार करना बंद कर दिया है. यूं मैंने किसी भी चीज का इंतजार करना बंद कर दिया है सिवाय उस पल के जिसमें सांस है, बीत जाने के. या कि इंतजार को इबादत का नाम देकर खुद को भरमाया हुआ है.

कमरा हमेशा फूलों से महकता रहता है. इतने फूल, इतने फूल कि कमरा ही गार्डन हो चला है. कल कुछ खुशनुमा से गमलों को कमरे में सजाया गया. दोस्तों की आमद का सिलसिला बारिश की किसी लड़ी की तरह कायम है. सबके हाथ में मेरे लिए कुछ फूल जरूर होते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि फूल ही हैं जो मुझे खुश करते हैं. कोई मेरे बारे में बात नहीं करता. सब किसी ख्याल की बात करते हैं. किसी किताब के किसी हर्फ की, किसी संगीत के टुकड़े की, मौसम की, राजनीति की. पर मैं समझती हूं कि ये मेरे बारे में बात न करना ही दरअसल मेरा ख्याल रखने की कोशिश की जा रही है. जानना कितना बुरा होता है कई बार कि हम हर बात की तह तक पहुंच जाते हैं और बातों का चार्म कम कर देते हैं. भले ही बातों का चार्म कम होता हो लेकिन इस बात की तसल्ली बढ़ती ही जाती है कि सबकी जड़ में मेरा ही ख्याल है.

मुरझाये फूलों को हटाते हुए एक दोस्त (मेरा स्टूडेंट मैं उन्हें दोस्त ही कहती हूं) पूछता है आपने क्या हाल कर लिया है अपना. ख्याल क्यों नहीं रखतीं. मैं हंस देती हूं. देर तक मेरी हंसी कमरे में रखे हर फूल से टकराती है फिर उसके कंधे पर जा बैठती है. वो नाराज होकर कहता है, वैसे मैम, इसमें हंसने वाली क्या बात थी? उसके पूछने में थोड़ी सी डांट का भी रंग है. मैं उसका चेहरा देखती हूं. अगर आपके छोटे कभी स्नेहवश आपको डांटें तो बड़ा अच्छा लगता है. मैं इस अच्छे लगने को अंजुरी में भरकर पीने लगती हूं. वो मेरे जवाब के इंतजार में है. बताइये, आप अपना ख्याल क्यों नहीं रखतीं? मैं शब्द तलाशती हूं जवाब की भरपाई करने के लिए.
'मैं खुद ही अपना ख्याल क्यों रखूं भई? सबका ख्याल मैं रखती हूं, कोई तो मेरा भी ख्याल रखे..'
'तो हम हैं ना रखने के लिए.'
तो रखो ना...मैं उसका चेहरा देखकर हंस देती हूं. बड़ी बेचारगी सी है उस पर.

कुछ लोग सिरहाने कुछ किताबें छोड़ जाते हैं. कल उन्हीं में से एक दक्षिण अफ्रीका की कहानियों का संग्रह उठाया. लेटे-लेटे एक कहानी 'भूत' पढ़ रही थी. जिसमें बच्चा जंगल में अपने दोस्तों के साथ जाता है और खो जाता है. घर वाले समझते हैं कि वो मर गया है. रोना धोना, अंतिम क्रियाएं सब हो जाती हैं. फिर एक दिन बच्चा लौट आता है और सब उसे जिंदा मानने से इनकार करते हैं. उसे भूत-भूत कहकर भगाने की कोशिश करते हैं. बच्चे को भूत समझने वालों में उसकी मां भी है...कहानी के अंत में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं वहां उलझ जाती हूं कि कैसे खुद को साबित करना कठिन होता है कि 'हां, ये मैं हूं.' और जब कोई नहीं मानता तो ख्याल आता है कि 'मैं क्यों हूं?'

माधुरी रोज सुबह मेरे कमरे को बुहारती है. मैं उन सारे ख्यालों को समेटने लगती हूं कि जो हर वक्त मेरे आसपास रहे. लेकिन माधुरी हुनरमंद है. मुझे बातों में उलझाकर वो मेरे सारे ख्याल भी बुहार ले जाती है. बस एक मृत्यु का ख्याल उसकी झाड़ू की जद में जाने क्यों नहीं आता. वो क्यों मेरे कंधों पर चढ़ा रहता है. मुझसे क्यों शास्त्रार्थ करना चाहता है जबकि मैंने कबसे लोगों से बहस करना बंद कर दिया है. अभी-अभी इनबॉक्स में कोई सुंदर सा गीत दाखिल हुआ. कितने सारे दोस्त हैं देश के कोने-कोने में. हर कोई मेरी मुस्कुराहट के लिए जतन कर रहा है. यही तो मेरी कमाई है, मन ही मन सोचती हूं...गाना बज रहा है जाने क्या चाहे मन बावरा....


(आज समाज और जनसत्ता (२४ जनवरी) में प्रकाशित. )

14 comments:

सागर said...

behtreen........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सटीक लिखा है आपने!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

अनुपमा पाठक said...

ढ़ेर सारे फूलों से सुन्दर भाव हम भी प्रेषित कर रहे हैं आपको... इस पोस्ट को पढ़कर कितने ही एकाकी हृदय सुकून पाएंगे...
बहुत सुन्दर लिखा है... दिल से निकलते शब्द सीधे दिल तक पहुँच रहे हैं!
wishing you all smiles:)

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने सपनों का विश्व, बिल्कुल अपना सा।

ajay garg said...

बहुत अच्छा लिखा है.... नर्म-सा है हर भाव!!

jyoti nishant said...

अपने हर शुभचिंतक को गलत साबित करने में मज़ा आता है.

RITU said...

अच्छी कथा ..
kalamdaan.blogspot.com

Anand Dwivedi said...

मैं वहां उलझ जाती हूं कि कैसे खुद को साबित करना कठिन होता है कि 'हां, ये मैं हूं.' और जब कोई नहीं मानता तो ख्याल आता है कि 'मैं क्यों हूं?'
.....
जाने क्या चाहे मन बावरा....

इन्हीं प्रश्नों से रूबरू होने के लिए तो आपकी दुनिया में आता हूँ ...और मुझे भी लगता है कि मैंने खुद को भरमाया हुआ है ...जाने किस किस बात को क्या क्या नाम देकर !

Pratibha Katiyar said...

@ Jyoti- तुम जो कहो सब सही...

dr.mahendrag said...

Sundar likha Pratibhaji Aapne.Apne ko sidh karna chahe kitna hi mushkil ho,par karna to padta hi hai.jo nahi kar pate,woh apna astitva kho baithte hai.par ye man hai ki bawra hai jo n jane kya kya sochta hai

रेखा said...

बहुत सही लिखतीं हैं आप ..बेहतरीन अभिव्यक्ति

बाबुषा said...

तुमको खैंच के दो लफाड़े देने का मन क्यों होता है कभी कभी ?? प्यार..खुश रहो..! आओ मैगी खाएं ..मस्ती करें..

Pratibha Katiyar said...

@ Baabu- sawal bhi tum, jawab bhi tum...mujhe bas maggi se matlab.

S.N SHUKLA said...

ख़ूबसूरत प्रस्तुति, आभार.
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