Wednesday, July 27, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला - 10 (अंतिम किश्त )


मरीना रिल्के के पत्र के इंतजार में अपनी सुबह-शाम बिताती थी. हर दिन बस इंतजार के हवाले रहता था और वो कयास लगाते हुए अपने दिल को बहलाती थी कि हो सकता है वो बीमार पड़ गया हो...हो सकता है वो व्यस्त हो...हो सकता है उसने आज खत लिखा हो और वो कल आ पहुंचे. डाक विभाग जाकर दरयाफ्त करती कि कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्र इधर-उधर गुम हो गया हो.
उसने 'अटैम्प्ट इन अ रूम' कविता लिखी जिसमें उसकी सपनों के एक कमरे में रिल्के से मुलाकात होती है.
दिन बीते...सप्ताह बीते...महीने बीते...लेकिन मरीना का इंतजार खत्म नहीं हुआ. 

वो साल की आखिरी शाम थी. उसके घर कुछ मेहमान आये थे. मरीना की उदासी रिल्के के पत्रों के इंतजार में स्थायी राग बनकर बजती रहती थी. उन मेहमानों ने उससे कहा कि चलो साल की आखिरी शाम के जश्न में चलते हैं. तुम्हारा मन बदलेगा. लेकिन मरीना अवसाद की चादर में ही सुकून पाती थी. उन्हीं मेहमानों में से किसी ने बेख्याली में ही बस यूं ही बातचीत के दौरान रिल्के की मृत्यु का जिक्र kiya . 'रिल्के की मृत्यु' ये तीन शब्द मरीना के कानों में फ्रीज हो गए. इसके बाद कौन क्या कह रहा था, क्या नहीं उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. दोस्तों की तमाम मान-मनुहार के बावजूद उस बीते साल की आखिरी रात मरीना ने रिल्के के शोक को पहनकर बिताई.  दोस्तों के जाने के बाद उसने महसूस किया कि उसकी देह जड़ हो गई है. उसकी समस्त चेतना ध्वस्त हो चुकी थी. वो खूब जोर से चीखना चाहती थी इतनी तेज कि धरती फट जाए और आसमान पिघल जाए...
आखिर उसने कलम उठाई और लिखना शुरू किया...

प्रिय बोरिस,
मेरी आंखों से लगातार आंसू बह रहे हैं...हालांकि इन आंसुओं से जरा भी दुख कम नहीं हो रहा है. बोरिस, मुझे अभी-अभी कुछ दोस्तों से रिल्के की मृत्यु का समाचार मिला है. मैं पिछले कितने महीनों से उसके पत्रों का इंतजार कर रही थी. तुम्हें पता है ना, जहां मैं रहती हूं वहां समाचारों के आने का कोई जरिया नहीं है. ओह रिल्के....बोरिस....इस पूरी दुनिया में सिर्फ तुम इस पीड़ा को हू-ब-हू महसूस कर सकते हो. बोरिस तुमने ही तो हमारे संवादों की बुनियाद रखी थी. तुम खुद भी तो उन्हें कितना प्यार करते थे ना. ऐसा कैसे हो सकता है....तुम्हें पता है बोरिस मैंने 29 दिसंबर को रिल्के के लिए एक कविता लिखी थी...सपने में मुलाकात...उसी रात रिल्के ने आखिरी सांस ली. ये सब क्यों हुआ बोरिस...मैं उससे मिलना चाहती थी. उसे छूकर महसूस करना चाहती थी. वो मुझसे क्यों नहीं मिला...और मिला भी तो ऐसे क्यों मिला? क्यों तुमने मुझे रिल्के से मिलवाया मेरे अच्छे बोरिस....काश कि तुम यहां होते...मेरे पास. इस पूरी दुनिया में मेरे दु:ख को सिर्फ और सिर्फ तुम ही समझ सकते हो...ओह....रिल्के...मेरे प्यारे रिल्के...
 
(हालांकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता फिर भी सुना जाता है कि रिल्के के अस्वस्थ होने के कारण मरीना के अंतिम दोनों पत्र रिल्के की सेक्रेटरी ने उन्हें दिए ही नहीं थे)

समाप्त

Saturday, July 23, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला - 9

वो हवा का कोई झोंका ही रहा होगा शायद जिसने एक मरती हुई आत्मा में प्राण फूंके होंगे. मरीना के पतझर से झरते उदास जीवन में रिल्के के खत, उनकी कविताएं और यह तोहफा जिसमें उन्होंने अपनी कविताओं की प्रेरणा मरीना को बताया था, मरी हुई देह को ऑक्सीजन की तरह मिले थे. मरीना हवाओं के सुरों पर नृत्य करती थी और खूब खुश रहने लगी थी. बच्चों पर अब वह ज्यादा ध्यान देने लगी थी. कविताओं में एक अलग किस्म की ताजगी का अनुभव कर रही थी. अरे हां, इस सबके बीच वो बोरिस को एक पल के लिए भी नहीं भूली थी. वो उसे अब भी लंबे-लंबे पत्र लिखती थी, जिसमें उसके जीवन से जुड़ी तमाम बातें होती थी. उन स्मृतियों का जिक्र होता था, जिनमें वे दोनों साथ थे. मास्को के लिए उसका प्यार और उससे बिछुडऩे की वेदना होती थी. रिल्के और मरीना के संवाद पत्रों के जरिये बढ़े जरूर लेकिन बोरिस से कम भी नहीं हुए. यह एक कला है शायद एक को खोये बिना दूसरे को साधे रहना...रिल्के और मरीना इस कला को कितना साध पाए और कितना नहीं यह तो आगे पता चलेगा फिलहाल जीवन लगभग खुशनुमा पटरियों पर दौड़ रहा था.
भावनाओं के ज्वार को थामने की कोशिश में मरीना ने एक रोज रिल्के को खत लिखा. वो दो अगस्त का दिन था. उसने लिखा,

प्रिय राइनेर,
तुमने अपनी कविताओं का जो तोहफा मुझे भेजा है वो मेरे लिए बेमिसाल है. कितनी बार उलट-पलट कर देख चुकी हूं. उसे छूती हूं और तुम्हारे स्नेह की छुअन को महसूस करती हूं. जाने क्यों मुझे लगता है कि यह पहली बार है जब तुमने इस तरह किसी को अपनी कविताओं की प्रेरणा बताया है. मैं बहुत बहुत बहुत खुश हूं.
राइनेर, खुशी के इस आलम में आज मैं तुमसे वो बात कहना चाहती हूं, जो अब तक नहीं कही. तुम्हें पता है, मैं सदियों से जाग रही हूं. मानो नींद का और मेरा कोई रिश्ता ही न हो. बंद आखों में भी जागती रहती हूं...जाने क्यों लगता है राइनेर कि तुमसे मिलूंगी तो सदियों की नींद को ठिकाना मिलेगा. तुम्हारे कंधों पर अपनी उम्र, अपना 
अकेलापन  सब टिका दूंगी. तुम संभाल लोगे न सब मेरे प्यारे राइनेर. बस मुझे वहीं सुला देना.
तुम्हारी 
मरीना


यह पत्र लिखने के बाद मरीना की आंखों की कड़वाहट जरा कम हुई. वो हल्का महसूस कर रही थी. हम सब अपने भीतर के अवसाद को टिकाने के ठीहे खोजते फिरते हैं...और जरा सी संभावना की झलक मिलते ही उस ओर लपक पड़ते हैं. अक्सर इसे प्रेम का नाम भी दे बैठते हैं. इस वक्त अवसाद के ऐसे ठीहों की खोज में भटकती न जाने कितनी स्त्रियां याद आ रही हैं. बहरहाल, मरीना के इस पत्र का कोई जवाब नहीं आया. चौदह अगस्त को मरीना ने फिर से राइनेर को एक पत्र लिखा.



प्रिय मित्र,
क्या तुम्हें मेरा पिछला पत्र मिला? जो मैंने दो अगस्त को पोस्ट किया था. मैं इसलिए पूछ रही हूं क्योंकि मैंने उसे जल्दबाजी में पोस्ट किया था. और ऐसा पहली बार है जब तुमने मेरे पत्र का जवाब नहीं दिया है.
रिल्के, मैं तुमसे मिलना चाहती हूं. मैंने पिछले पत्र में इसी बाबत दरयाफ्त की थी. आने वाली सर्दियों में हमें जरूर कहीं मिलना चाहिए. स्विट्जरलैंड या जहां तुम पहले कभी न गये हो. जहां बहारों का मौसम हो....
तुम इस खत का जवाब जल्दी से भेज दो रिल्के ताकि जवाब मिलते ही स्मृतियों में मैं अपनी होने वाली मुलाकात के सिरे जोडऩा शुरू कर दूं. ओह...इस ख्याल में ही कितना रोमांच है ना रिल्के...तुम जल्दी से जवाब भेजो. मैं इंतजार कर रही हूं.
तुम्हारी अपनी 

मरीना  


 (जारी...)







Thursday, July 7, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला - 8


रिल्के उन दिनों एकान्तवास में थे. म्यूजॉट की पहाडिय़ों पर वे अपने स्वास्थ्य और एकान्त दोनों को साध रहे थे. मरीना के पत्र उन्हें वहीं मिले. पहले पत्र का उत्तर उन्होंने हमेशा की तरह तुरंत यानी 8 जून को दिया. 

प्रिय मरीना
मैं खूबसूरत घाटियों में एकान्त जी रहा हूं. एक हरारत मेरे मन पर और शरीर पर तारी है. आज मैंने तुम्हारे लिए एक कविता लिखी है. 
ओह मरीना! कितना नुकसान होता है 
आसमान का टूटकर गिरे तारों से 
हम भरपाई नहीं कर सकते उसकी
चाहे जहां दौड़ें उनमें बढ़ोत्तरी के लिए 
जोड़ के किस तारे की तरफ जाएं 
सभी की तो गिनती हो चुकी है पहले से ही 
वह भी नहीं कर सकता भरपाई 
जो गिराता है उस पवित्र तारे को...
(कविता की इन पंक्तियों का अनुवाद- मनोज पटेल) 


रिल्के की यह कविता उनके कंप्लीट वर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी.

जिस तरह शब्दों के भीतर डुबकियां लेकर रिल्के पवित्र और गहन भाव ढूंढ लाने में माहिर थे ठीक उसी तरह संभवत: उन्हें आगत का भान भी हो जाता था. उन्होंने उसे लिखा-

....तुम्हें पता है मरीना, ऐसा कितना कम होता है कि हम अपनी नियति को पहचान सकें. कितना कम होता है ऐसा कि हम हमारे लिये जारी किये जा चुके नियति के अदालती फरमानों को जो पहले ही लिये जा चुके हैं समझ सकें.
जो लोग प्रेम में हैं उन्हें तो यह बात जरूर समझनी चाहिए...कि प्रेम असल में अवसाद और निराशा की ओर प्रस्थान है. वही निराशा और अवसाद जो जीवन का हासिल बन सकता है. शान्ति क्या है सिवाय मृत्यु के...सारा जीवन शांति की तलाश ही तो है. 
उम्मीद है तुम जीवन को समझ रही हो. प्रेम को भी...
रिल्के

इन पत्रों ने ऐसे धरातल की रचना की थी जिस पर गहन अनुभूति, विचार और लगभग एक जैसे हालात से गुजर रहे दो जन स्वस्थ, सुंदर और परिपक्व संवाद में थे. दोनों,  अकेले, दुखी और निर्वासित थे. एक निष्कासित ऑस्ट्रियन था तो दूसरी को मास्को ने उठाकर बाहर फेंक दिया था. मुश्किलों की घनघोर बारिशों ने दोनों को बस मजबूत होना सिखाया था. हालांकि ऊपर से मजबूत मरीना अंदर से रिल्के जैसी मजबूत नहीं हो पा रही थी. 

इस बीच रिल्के ने कुछ छोटे संवाद (पत्रों के जरिये) परस्तेनाक से भी किये. अनुभूति की कई पर्तें होती हैं. संभवत: यही कई पर्तें प्रेम की कई लेयर्स पर ले जाती हैं. जिन्हें नासमझने के चलते अक्सर ईष्र्या, द्वेष और पीड़ा का अनुभव होता है. रिल्के परस्तेनाक की पीड़ा को अनुभव कर रहे थे और उसे उससे मुक्त करने की कोशिश भी. 

इधर मरीना रिल्के से अपने संवादों को लेकर इस कदर आश्वस्त और प्रसन्न थी कि उसके दिनों में खुशियों का बागीचा लहलहाता था. उसका काम तेजी से आगे बढ़ रहा था और वो जीवन के दुखों का मुकाबला पहले की अपेक्षा ज्यादा ताकत से कर पा रही थी. मानो उसे कोई जादुई ताकत हासिल हो गई हो. 2 जुलाई को उसे रिल्के की ओर से एक तोहफा मिला. जिसे पाकर वह झूम उठी. यह तोहफा था रिल्के की फ्रेंच में लिखी कविताएं. इन कविताओं के लिए मरीना त्स्वेतायवा को प्रेरणा बताया गया था और उसका आभार किया गया था. 
यकीनन, मरीना के लिए यह जश्न का दिन था.

(जारी...)

Sunday, July 3, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 7


इधर मरीना बिगड़ते हुए हालात को संभालने के लिए खुद को गहन दुख में डुबोने तक को तत्पर थी, उधर उसके भीतर का प्रेम हर लम्हा उसका जीना मुहाल किए था. वो यूं तो रिल्के को कोई पत्र नहीं लिख रही थी लेकिन असल में हर वक्त वो रिल्के से अनकहे संवाद में थी. आखिर तमाम वादों, चीजों को संभालने की उसकी जिद, किसी को दु:ख न देने की प्रबल इच्छाशक्ति पर प्रेम ही भारी पड़ा और उसने 3 जून को रिल्के को एक पत्र लिख ही दिया.

माई डियर राइनेर,
तुमने एक बार अपने किसी पत्र में लिखा था कि अगर मैं कभी गहन खामोशी में चला जाऊं और तुम्हारे पत्रों का जवाब न दूं, तब भी तुम मुझे लिखती रहना. मैंने इस बात का अर्थ यूं लिया मेरे प्रिय कि तुम्हें एक खामोश राहत की दरकार होती है जिसमें तुम आराम कर सको. मैंने खामोशी की वही राहत तुम्हें पिछले दिनों अता की. उम्मीद है अब तुम अपनी शान्ति को जी चुके होगे और मेरे पत्रों का बेसब्री से इंतजाऱ कर रहे होगे.
मेरे प्रिय, तुम्हारा साथ मुझे आकाश की ऊंचाइयों तक ले जाता है और मेरे भीतर की समंदर की गहराइयों तक भी. तुमसे मिलना है खुद से मिलना और मिलना समूची कायनात से. जब मैं तुमसे बात नहीं कर रही होती हूं, असल में मैं तब भी तुमसे ही बात कर रही होती हूं. मैं तुमसे मिलना चाहती हूं रिल्के. मिलकर तुम्हें बताना चाहती हूं कि एक व्यक्ति किस तरह दूसरे व्यक्तिव का हिस्सा हो जाता है. जैसे कि तुम हो चुके हो. रात की गहन नीरवता में तुम्हें हर पल अपने करीब पाती हूं रिल्के और खामोशी के बियाबान में खुद को गुमा देती हूं.
उम्मीद है तुम अच्छे होगे.
प्यार
मरीना

यह पत्र मरीना ने रिल्के को लंबे अरसे बाद लिखा था और इसमें उसका रिल्के के प्रति प्रेम एक आवेग के रूप में बह निकला था. इस पत्र में उसने बोरिस के साथ घटनाक्रम का कोई जिक्र नहीं किया. हां, यह जरूर है कि इस पत्र को लिखने के बाद उसने एक लंबी पीड़ा से मुक्ति पाई.
एक तरफ मरीना रिल्के को पत्र लिखकर राहत महसूस कर रही थी और दूसरी ओर उसके भीतर यह उधेड़बुन जारी थी कि उसे बोरिस के साथ घटे घटनाक्रम के बारे में रिल्के को बताना चाहिए. आखिर 14 जून को उसने रिल्के को फिर से पत्र लिखा.

सुनो रिल्के,
न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि मैं बहुत बुरी हूं. बहुत ही बुरी. पिछले दिनों की मेरी लंबी खामोशी इसी अहसास के चलते थी रिल्के. बोरिस को लगता है कि तुम्हें पत्र लिखकर और तुम्हारे करीब आकर मैंने उसे कोई धोखा दिया है. राइनेर...मैं सचमुच बुरी हूं मैंने उसका दिल दुखाया और पिछले पत्र में तुमसे इस बात का जिक्र भी नहीं किया. असल में मैं जब तुमसे बात करती हूं तो तुम्हें और खुद को खास और एकान्तिक माहौल में रखना चाहती हूं जहां हमें किसी और का ख्याल, कोई और बात छू भी न सके. लेकिन यह तो ठीक नहीं है ना राइनेर, तुम्हारे और मेरे बीच सब पानी की तरह साफ होना ही चाहिए इसीलिए आज तुम्हें यह पत्र लिख रही हूं. मैं अपनी जिंदगी में झूठ के लिए कोई जगह नहीं रखना चाहती हालांकि मेरे हिस्से में बहुतों के झूठ आये हैं, फिर भी. राइनेर, रिश्तों की ईमानदारी और सच्चाई पर विश्वास करती हूं. उम्मीद है तुम अपनी मरीना को समझ सकोगे.
प्यार
मरीना
(जारी...)

Friday, July 1, 2011

रिल्के, मरीना और एक सिलसिला... 6


बोरिस के पत्र मरीना के जीवन में चल रहे बसंत पर अवसाद का पतझड़ लेकर आये. मरीना बोरिस के पत्र पढ़कर गहन पीड़ा में डूब गई. उसे बोरिस की भावनाओं का जरा भी अंदाजा नहीं था लेकिन उसके पत्रों के बाद उसके दु:ख का उसे अहसास हो चुका था. उसे महसूस हुआ कि अनजाने ही वो अपने अच्छे दोस्त के दु:ख का कारण बन चुकी है. यह दु:ख उसके हिस्से के उजाले की सारी किरणें बीनने लगा. आखिर उसने बोरिस को 23 मई को एक पत्र लिखा.
बोरिस,
मेरे कारण तुम्हारी भावनाओं को ठेस लगी इसका मुझे दु:ख है. मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था. अब मैं रिल्के को कोई पत्र नहीं लिखने वाली हूं. मैं किसी के भी हिस्से के दु:ख को नहीं बढ़ाना चाहती. हालांकि मैं जानती हूं इससे सबसे ज्यादा मुझे ही दु:ख होगा. रिल्के इतने महान हैं कि वो दु:ख, प्रेम, अवसाद सब साध चुके हैं. उन्हें मेरे पत्र लिखने, न लिखने से बहुत फर्क नहीं पडऩे वाला.
रिल्के के लिए मेरी मन में बहुत गहरी भावनाएं हैं. उनका मेरी जिंदगी में होने का अहसास मुझे रचनात्मक और भावनात्मक सुरक्षा के केंद्र में ले जाता है. उनसे संवाद करके मेरे लंबे अकेलेपन को विराम मिलता है. मानो रिल्के के शब्द किसी ब्लॉटिंग पेपर की तरह मेरा दु:ख सोख लेते हों. बोरिस, रिल्के मुझसे बड़े हैं. उम्र में भी रचनात्मकता में भी और समझ में तो इतने विशाल हैं कि मैं सालों नहीं युगों छोटी हूं उनसे लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं है. मैं उनकी छाया में खुद को खोती नहीं, बल्कि उनके साथ खुद को मजबूत पाती हूं. हमारा छोटा सा अल्पकालिक संवाद मुझे बहुत कुछ प्रदान कर चुका है. लेकिन प्रिय बोरिस, अब मैं उन्हें पत्र नहीं लिखूंगी क्योंकि तुम्हारे दु:ख का मुझे अहसास है. हालांकि यह फैसला खुद को विषाद के कुंएं में धकेलने जैसा है फिर भी.
इस पत्र के साथ रिल्के के वे दोनों पत्र भी भेज रही हूं, जो उन्होंने मुझे लिखे थे.
अपना ख्याल रखना
मरीना

रिल्के के प्रेम में डूबी मरीना ने अपने पत्र में यह तो कह दिया कि बोरिस की भावनाओं को उसके कारण ठेस पहुंची इसके लिए उसे दु:ख है और वो अब रिल्के को पत्र नहीं लिखेगी. लेकिन रिल्के के प्रति अपनी आत्मीयता को उसने अनजाने ही इस कदर अभिव्यक्त किया कि बोरिस मरीना के पत्र को पढ़कर पहले से ज्यादा दु:खी हो गया. उसे लगा रिल्के के पत्र उसे भेजकर मरीना एक किस्म की नाटकीयता कर रही है. यह उसने मरीना को अपने पत्र में लिख भेजा.

बोरिस के नाराजगी भरे पत्र के जवाब में मरीना ने बोरिस को 25 मई को फिर से पत्र लिखा,

बोरिस,
मैंने तुम्हें रिल्के के पत्र इसलिए नहीं भेजे कि मैं तुम्हें कोई सफाई देना चाहती थी. मैंने रिल्के को पत्र न लिखने का निर्णय भी इसीलिए लिया कि रिल्के से संवाद खत्म करने के लिए उसके मोह से खुद को मुक्त करना जरूरी है. सब कुछ खो देने के बाद उपजे गहन अवसाद में डूबी शांति को अनुभव कर रही हूं. इस शांति ने मुझे खुद चुना है.
(यकीनन ये पंक्तियां लिखते समय मरीना की आंखें छलक रही थीं जिसका जिक्र दस्तावेजों में कहीं नहीं है.)
वो आगे लिखती है-

मैंने रिल्के के प्रति अपनी भावनाओं को तुमसे नहीं छुपाया जबकि तुम्हारी भावनाओं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता था. बोरिस, मैंने अपनी सहज विनम्रता के चलते तुम्हें रिल्के के पत्र भेजे और अपनी सहज ईमानदारी के चलते रिल्के के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया इस उम्मीद से कि जिसे प्यार करने की बात कर रहे हो उसे समझ भी सकोगे.
मरीना

(जारी...)