Tuesday, September 6, 2011

वो गुमख्याल सी हमख्याल...



शाम दरवाजे पर ऊंकड़ू बैठे-बैठे ऊंघने लगी थी. उसके हाथ में उम्मीद का कोई सिरा भी तो न था कि लड़की उसकी ओर एक निगाह देखेगी भी या नहीं. लड़की इन दिनों जाने कहां गुमख्याल रहने लगी थी. शाम कितने ही खूबसूरत रंगों में ढलकर आये, वो लड़की को लुभा नहीं पाती. शाम ही क्यों दिन के सारे पहर उन दिनों उस दरवाजे से उदास होकर जाते थे. चाहे आधा खिला चांद हो या जमुहाई लेता सूरज. लड़की किसी की तरफ देखती भी न थी.

वो कई दिनों से एक तस्वीर बना रही थी. उस तस्वीर में उसने वो सारे मौसम रचे, जो उस पर से होकर गुजरे. वो सारे दृश्य जो आंखों में भरे थे. वो सारा संगीत जो कानों से होकर गुजरा था. वो सारी आवाजें जिनसे उसे जीने की आस मिलती थी. उस तस्वीर में उसने चटख धूप और काली घिरी घटा को एक साथ रचा था. जबसे यह तस्वीर बनानी उसने शुरू की, तबसे दुनिया की हर शै से उसका वास्ता टूट गया है. खुद से वास्ता जुडऩे का बाद ऐसा ही तो होता है. लड़का उसे आवाजें देते-देते थक जाता लेकिन उसकी आवाज लड़की के कानों से टकराकर लौट आती. लड़का रोज उसके दरवाजे पर दस्तक देता. दरवाजे पर रखे मौसम देखकर वो समझ जाता कि आज भी यह दरवाजा नहीं खुलने वाला. लड़की अपने मन के दरवाजे खोले बैठी थी. वो अपनी आत्मा के रंगों को प्रकृति के कैनवास पर सजा रही थी. सदियों के दर्द को नीले रंग के आसमान में रचती, उसमें ढेर सारे कामनाओं के पंक्षियों को उड़ा देती. उसकी हंसी के बगूले बादल बनकर तस्वीर में उड़ते फिरते. उसकी ख्वाहिशें पीले फूल बनकर खिल उठतीं और उसके प्यार का लाल रंग उन फूलों पर अपनी ओढऩी डाल देता.

लड़का इन सबसे अनजान था. उसका धीरज अब चुकने लगा था. उस रोज भी ठिठकी हुई बारिश दरवाजे पर बैठी थी दीवार से सर टिकाये. उसने पूछा, क्या हुआ? बारिश ने इनकार में सर हिलाया कि आज भी लड़की ने दरवाजा नहीं खोला. लड़का गुस्से में लौट गया फिर कभी वापस न आने के लिए. ठीक उसी वक्त लड़की को वो रंग मिला जिसकी उसे तलाश थी. जिससे वो एक मुकम्मल तस्वीर बनाना चाह रही थी. स्त्री के मन की मुकम्मल तस्वीर. जिसे देखकर उसे समझना दुनिया भर के लोगों को आसान हो जाये और टूट जाए ये जुमला कि स्त्रियों को कोई नहीं समझ सकता. वो रंग था उसका खुद से प्यार करने का रंग. वो रंग जिसे पहनकर कोई भी स्त्री दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री बन जाती है.  लड़की ने उस रंग से प्रकृति को सजाया तो दरवाजे पर कबसे रखे उकताये हुए से मौसम अचानक झूम उठे.

लड़की ने तस्वीर को गौर से देखा...हां, यही तो है मुकम्मल तस्वीर. इसमें दुनिया की हर स्त्री का मन खुला पड़ा था. लड़की के चेहरे पर संतोष की झलक दिखी. वो भागकर लड़के के पास जाना चाहती थी. यह तस्वीर उसने लड़के के लिए ही तो बनाई थी. उसके हाथ रंगों से भरे थे, कुछ चेहरे पर भी लगे थे. वो नंगे पांव ही चल पड़ी. वो किसी परीकथा की नायिका लग रही थी जो अपने राजकुमार से मिलने को बेसब्र हो आधी रात को जंगल में भटकती फिरती है. उसके पास कोई जादुई शक्ति भी नहीं होती, जो उसे एक पल में राजकुमार से मिला दे. लड़की हड़बड़ी में दरवाजा खोलती है. सारे मौसम उसे देख मुस्कुराते हैं. वो भी मुस्कुराती है. वो लड़के को आवाज देती है. उसके पीछे जाती है दूर तक. अपने पावों के छालों की परवाह किये बगैर वो सुधबुध खोकर लड़के को तलाशती फिरती है. उसे बताना चाहती है कि वो उसके लिए सबसे कीमती तोहफा रच रही थी. लड़का नहीं मिला.वो थक-हार के घर लौट रही थी कि उसकी न$जर एक और घर पर पड़ती है. उस घर के बाहर भी मौसम जमा थे. लड़की ने खिड़की से झांककर देखा. अंदर एक लड़की संगीत के सुरों से झगड़ रही थी. वो अपने जीवन का सुंदरतम राग रच रही थी. आत्मा के सुरों से सिंचित राग. वो भी अपने प्रेमी के लिए कोई तोहफा गुन रही थी. उसे उस लड़की का चेहरा खुद से मिलता-जुलता लगा. 

घर लौटी तो सारे मौसम जा चुके थे. बस बारिश रुकी हुई थी. उसके पहुंचते ही वो उसकी आंखों से बरस उठी.
उस बरसात में उसकी तस्वीर के सारे रंग धुल गये. नया राग रचती उस लड़की के सारे सुर घुल गये. दुनिया की हर लड़की के ख्वाब उस बारिश की ताल से ताल मिलाने लगे. तबसे धरती के हर भीगे कोने में एक ख्वाब अंखुआता है...

लड़का दस्तक देने के लिए नये दरवाजों की तलाश में गुम हो गया और लड़की उसके इंतजार में...


9 comments:

नीरज गोस्वामी said...

बेजोड़ लेखन..वाह..आपतो शब्दों से मायावी संसार रच देती हैं...गध्य में शायरी का मज़ा आ जाता है...कमाल है...बधाई स्वीकारें

नीरज

बाबुषा said...

लड़की को इंतज़ार नहीं करना चाहिए..
मौसम उसका है.. सूरज....चाँद उसके हैं...
रंग उसके हैं ..
लड़की धनवान है..
फिर किसी दरिद्र का इंतज़ार क्यों ?
ये पूरी कायनात लड़की की मुट्ठी में है..

Pratibha Katiyar said...

intzar ladki ki fitrat hai...kaise badlegi baabusha...

Pratibha Katiyar said...
This comment has been removed by the author.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत उम्दा आलेख!

प्रवीण पाण्डेय said...

गज़ब का लेखन, प्रतीक्षा में बहुत टीस है।

kase kahun?by kavita verma said...

bahut sunder....ladaki ka intajar sarthak ho..

पारुल "पुखराज" said...

वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझ से :)

Dr.Nidhi Tandon said...

लड़का दस्तक देने के लिए नये दरवाजों की तलाश में गुम हो गया और लड़की उसके इंतजार में...
लड़के हमेशा नए की तलाश में निकल जाते हैं और लडकियां वही खडी रह जाती हैं..उनकी बाट जोहते .