Monday, March 30, 2009

दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र - 3

लुई पाश्चर का पत्र मेरी लॉरेंट के नाम
(लुई पाश्चर: बीमारियां कीटाणुओं से फैलती हैं- जिसने सबसे पहले यह पता लगाया वह विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक)
डियर मादाम,
दो दिन में मेरी सारी जिंदगी ही बदल गई है। मेरा भविष्य, मेरी खुशी सब तुम्हारे हाथों में है। एक बात का मुझे दु:ख है और बहुत दु:ख है कि मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूं। तुम मुझे किस कारण पसंद करती हो यह तो नहीं पता लेकिन मैं नहीं चाहता कि तुम्हें आगे जाकर अपने फैसले पर पछतावा करना पड़े. वैसे मेरा दिल तुम्हारे प्यार से भरा हुआ है, इसके बावजूद मैं यह मानता हूं कि मैं तुम्हारे लायक नहीं. मैं तुम्हारे दु:ख का कारण नहीं बनना चाहता.वैसे, मैं जिंदगी भर के लिए तुमसे और विज्ञान से बंध चुका हूं. इस सच्चाई को अब कोई नहीं बदल सकता.
तुम्हारालुई
(पाश्चर जिन वैज्ञानिक के अधीन रिसर्च कर रहा था, मेरी उन्हीं की लड़की थी। काफी मुश्किलों के बाद मेरी और पाश्चर का विवाह हो गया।)

चेखव का पत्र लीडिया के नाम
(चेखव: दुनिया के दो सबसे बड़े कहानीकारों में से एक...रूस का वह महानतम लेखक, जिसने शोषित जनता के हक में अपनी कलम को तलवार बना लिया)२७ मार्च १८९४याल्ता
मधुर लीका,
पत्र के लिए धन्यवाद! यद्यपि तुम यह कहकर मुझे डराना चाहती हो कि तुम जल्दी ही मर जाओगी और मुझे ताना मारती हो कि मैं तुम्हें छोड़ दूंगा, फिर भी तुम्हें धन्यवाद! मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम मरोगी नहीं और कोई तुम्हें छोड़ेगा नहीं। मैं याल्टा में हूं और खूब मजे कर रहा हूं। नाटकों की रिहर्सल देखने और खूबसूरत फूलों से भरे बागीचों में अपना ज्यादातर वक्त बिताता हूं। भरपेट, मनपसंद खाना खाता हूं और संगीत सुनता हूं। प्यारी लीका याल्टा में बसंत देखना अलग ही अनुभव है. लेकिन एक ख्याल मेरा साथ कभी नहीं छोड़ता कि मुझे लिखना चाहिए...मुझे लिखना चाहिए....मुझे लिखना चाहिए...तुम्हारी याद मुझे आती है लेकिन मैं उदास नहीं हूं.तुम अगर पत्र डालकर मेरी आदत बिगाडऩा चाहो तो पत्र मिलिखोव भेजो. मैं यहां के बाद वहीं पहुंचूंगा और वादा करता हूं कि तुम्हारे पत्रों का जवाब दूंगा. मैं तुम्हारे दोनों हाथों को चूमता हूं।
तुम्हारा अंतेन चैखव

प्रेम पत्रों की श्रृंखला जारी.....

Sunday, March 29, 2009

दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र- 2

रानी विक्टोरिया का पत्र राजकुमार एल्बर्ट के नाम
( रानी विक्टोरिया: इंग्लैंड की वह महान सम्राज्ञी, जिसके राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता था।)
१० फरवरी १८४०
प्रियतम,
आज तुम कैसे हो? क्या तुम जी भरकर सोए? मैंने अच्छी तरह आराम किया है, और आज बड़ा हल्का महसूस कर रही हूं। मौसम भी कैसा है आज! मैं समझती हूं, वर्षा रुक जायेगी।एक लाइन लिख भेजना, ओ मेरे प्रियतम दूल्हे, जब तुम तैयार हो जाओ...हमेशा के लिए तुम्हारी सेविका
विक्टोरिया
(यह पत्र रानी वक्टोरिया ने अपने विवाह के ही दिन सुबह लिखा था। )

कवि ब्राउनिंग का पत्र कवियत्री बैरट के नाम
(ब्राउनिंग: इंग्लैंड का विश्वप्रसिद्ध रोमैंटिक कवि, जिसने अनेक महाकाव्य बैलड्स लिखे)
प्रिये,
शब्दों को बार-बार उलट-पुलट रहा हूं लेकिन मेरी भावनाओं को ये शब्द बयान नहीं कर पा रहे। वे तुम्हें नहीं बता पा रहे कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं। वे यह कभी नहीं बता पायेंगे कि तुम मुझे कितनी प्रिय हो, किस तरह तुम मेरी आत्मा का हिस्सा बन चुकी हो। मैं अपने इस प्रेम को बनाये रखना चाहता हूं। भगवान मुझे यह शक्ति दें कि मैं अपने प्यार को हमेशा तुम तक पहुंचाता रहूं। तुम मुझे कितना प्रेम करती हो इसका प्रमाण तुम दे चुकी हो और तुम यह बात नहीं जानती कि यह मेरी लिए कितनी बड़ी बात है. मुझे अपने ऊपर कुछ घमंड भी होने लगा है प्रिये यह सोचकर कि तुम मुझे चाहती हो. तुमने मुझे चाहकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है. हमेशा तुम्हारा
ब्राउनिंग
( बैरट ने अपनी कविताएं ठीक करवाने के लिए कवि ब्राउंनिग के पास भेजी थीं। यहीं से उनका प्रेम भी शुरू हुआ. बाद में दोनों ने विवाह कर लिया था. )

प्रेम पत्रों का सिलसिला कल भी जारी.....

दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र

रानी विक्टोरिया का पत्र राजकुमार एल्बर्ट के नाम
( रानी विक्टोरिया: इंग्लैंड की वह महान सम्राज्ञी, जिसके राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता था।)

10 फरवरी १८४०

प्रियतम,

आज तुम कैसे हो? क्या तुम जी भरकर सोए? मैंने अच्छी तरह आराम किया है, और आज बड़ा हल्का महसूस कर रही हूं। मौसम भी कैसा है आज! मैं समझती हूं, वर्षा रुक जायेगी।एक लाइन लिख भेजना, ओ मेरे प्रियतम दूल्हे, जब तुम तैयार हो जाओ...हमेशा के लिए तुम्हारी सेविका

विक्टोरिया

(यह पत्र रानी वक्टोरिया ने अपने विवाह के ही दिन सुबह लिखा था। )


कवि ब्राउनिंग का पत्र कवियत्री बैरट के नाम

(ब्राउनिंग: इंग्लैंड का विश्वप्रसिद्ध रोमैंटिक कवि, जिसने अनेक महाकाव्य बैलड्स लिखे)१२।९।८६

प्रिये.

शब्दों को बार-बार उलट-पुलट रहा हूं लेकिन मेरी भावनाओं को ये शब्द बयान नहीं कर पा रहे। वे तुम्हें नहीं बता पा रहे कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं। वे यह कभी नहीं बता पायेंगे कि तुम मुझे कितनी प्रिय हो, किस तरह तुम मेरी आत्मा का हिस्सा बन चुकी हो। मैं अपने इस प्रेम को बनाये रखना चाहता हूं। भगवान मुझे यह शक्ति दें कि मैं अपने प्यार को हमेशा तुम तक पहुंचाता रहूं। तुम मुझे कितना प्रेम करती हो इसका प्रमाण तुम दे चुकी हो और तुम यह बात नहीं जानती कि यह मेरी लिए कितनी बड़ी बात है। मुझे अपने ऊपर कुछ घमंड भी होने लगा है प्रिये यह सोचकर कि तुम मुझे चाहती हो। तुमने मुझे चाहकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है।

हमेशा तुम्हारा

ब्राउनिंग

( बैरट ने अपनी कविताएं ठीक करवाने के लिए कवि ब्राउंनिग के पास भेजी थीं। यहीं से उनका प्रेम भी शुरू हुआ। बाद में दोनों ने विवाह कर लिया था। )

Saturday, March 28, 2009

दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र

दरवाजे पर दस्तक होती है खट... खट... खट....अंदर से आवाज आती है कौन? पुरुष कहता है मैं। दरवाजा नहीं खुलता। वह लौट जाता है। दूसरे दिन फिर वह आता है. दरवाजे पर फिर से दस्तक होती है खट... खट... खट....अंदर से आवाज आती है कौन? पुरुष कहता है तुम. दरवाजा खुल जाता है. तो ऐसा होता है प्रेम. मैं और तुम जहां पिघलकर एक हो जाते हैं. पहचानना मुश्किल हो जाता है कि यह किसका चेहरा है, किसका हाथ और कौन किसकी पहचान है. खुद को खोना ही पड़ता है प्यार को पाने के लिए. प्रेम के सिलसिले में खतों की बड़ी अहमियत रही है, हमेशा से. प्रेम करना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है और उस प्रेम को सही-सही रूप में अभिव्यक्त कर पाना उससे भी मुश्किल. यही वजह है कि प्रेमपत्र सिर्फ भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन भर नहीं रहे, एक दस्तावेज भी बन गये. संसार का सबसे पुराना प्रेम पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला है. बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी रातों की बेचैनियां, धड़कनों का कारवां, आंसू और भय समेटकर उससे अपने दिल की बात कहने जब बेबीलोन पहुंचा तो वह युवती वहां से कहीं जा चुकी थी. अपनी सारी बेचैनी लेकर वह युवक वापस नहीं जा सका. उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा, 'मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली, यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी, इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिखा गया. भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र ईसा से बहुत पहले का है. प्रेम जैसी गाढ़ी, गहरी भावना को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द सचमुच नाकाफी होते हैं. तभी तो विश्व के बड़े-बड़े राजा, महाराजा, महारानियां, सेनाध्यक्ष, वैज्ञानिक, लेखक, राजनेता प्रेम की अभिव्यक्ति करते समय खासे नर्वस और नौसिखिये ही नजर आये. उनकी याद आयी है, सांसों जरा धीरे चलो,/धड़कनों से भी इबादत में खलल पड़ता है....तो अपनी धड़कनों पर काबू रखते हुए आइये सुनते हैं इन महान लोगों के प्यार की दास्तान उनके प्रेमपत्रों के जरिये-

अब्राहम लिंकन का पत्र मेरी ओवंस के नाम (स्प्रिंग फील्ड7 मई, १८३७)
(अब्राहम लिंकन: साधारण परिवार का बदसूरत लड़का था जो बाद में अमेरिका का राष्ट्रपति बना...जिसने दासों के व्यापार के बदसूरत धब्बे को अमेरिका के चेहरे से मिटा दिया।)
प्यारी मेरी,
इस पत्र को लिखने से पहले मैं दो बार और लिखने की कोशिश कर चुका हूं। दोनों ही बार मैं संतुष्ट नहीं हुआ और उन्हें तुम तक भेजने से पहले ही फाड़कर फेंक चुका हूं। ऐसा लग रहा है कि कोई भी शब्द मेरी भावनाओं को ठीक-ठीक अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम नहीं है। अब यह चिट्ठी जैसी भी बनेगी मैं इसे जरूर भेज दूंगा।जहां मैं रहता हूं स्प्रिंग फील्ड में यहां का जीवन बहुत कठिन है मेरी प्यारी। मैं नहीं चाहता कि तुम यहां आओ और तुम्हारा सामना मुश्किलों से हो। यहां कोई शानो-शौकत नहीं है, गरीबी का आलम है। वैसे मैं तुम्हें आने वाले जीवन में सारे सुख देने की पूरी कोशिश करूंगा लेकिन अभी के जो हालात हैं, उन्हें मैं तुमसे छुपा नहीं सकता। तुम सोच-समझकर फैसला करना। मेरे पत्र के जवाब में तुम खूब लंबा पत्र लिखना। मेरे लिए इस व्यस्त और उजाड़ जीवन में एक बड़ा सहारा बनेगा।
तुम्हारा लिंकन
(यह पत्र लिंकन ने राष्ट्रपति बनने से बहुत पहले अपनी युवावस्था में लिखा था. मेरी ने लिंकन के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. )

अगला ख़त कल....

Thursday, March 26, 2009

रिल्के से एक सवाल

वैसे तो इन दिनों ऐसे लोग ही कम मिलते हैं जो यह पूछें की अच्छा कैसे लिखा जाए क्योंकि इन दिनों हर किसी को यही लगता है की वो सर्वश्रेष्ठ लिखता है। फ़िर भी कभी किसी चेहरे पर कप्पुस के सवाल नज़र आते हैं तो अच्छा लगता है। जब सवाल कप्पुस के से हों तो जवाब भी रिल्के का ही होना चहिये।
'एक ही काम है जो तुम्हें करना चाहिए - अपने में लौट जाओ। उस केन्द्र को ढूंढो जो तुम्हें लिखने का आदेश देता है। जानने की कोशिश करो कि क्या इस बाध्यता ने तुम्हारे भीतर अपनी जड़ें फैला ली हैं ? अपने से पूछो कि यदि तुम्हें लिखने की मनाही हो जाए तो क्या तुम जीवित रहना चाहोगे ?...अपने को टटोलो...इस गंभीरतम ऊहापोह के अंत में साफ-सुथरी समर्थ 'हाँ'' सुनने को मिले, तभी तुम्हें अपने जीवन का निर्माण इस अनिवार्यता के मुताबिक करना चाहिए।'

Tuesday, March 24, 2009

बर्तोल्त ब्रेख्त की कवितायें



कमजोरियां

कमजोरियां
तुम्हारी कोई नहीं थीं
मेरी थी एक
मैं करता था प्यार...

सुख

सुबह खिड़की से बाहर का नजारा
फिर से मिली हुई
पुरानी किताब
उल्लसित चेहरे
बर्फ, मौसमों की आवाजाही
अखबार, कुत्ता,
डायलेक्टिक्स,
नहाना, तैरना, पुराना संगीत
आरामदेह जूते
जज्ब करना नया संगीत
लेखन, बागवानी मुसाफिरी
गाना मिलजुल कर रहना...

Monday, March 23, 2009


तुम्हें भी याद नहीं, और मैं भी भूल गया
वो लम्हा कितना हसीं था, मगर फिजूल गया....

Sunday, March 22, 2009

आज फिर जीने की तमन्ना है...

'कांटों से खींच के ये आंचल....तोड़ के बंधन बांधी पायल....कोई न रोको दिल की उड़ान को...दिल वो चला.... ये गाना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा. बहुत से गाने अच्छे नहीं लगते हैं हमें, लेकिन यह गाना बहुत अच्छा होते हुए भी अच्छा नहीं लगा. कारण...शैलेंद्र जैसे गीतकार के लिखे गाने में मुझे बंधनों को तोड़कर पायल बांधने वाली बात $जरा कम जंचती है. पायल भी बंधन ही तो है. खैर, फिल्म 'गाइड जिसका यह गाना है में पायल बंधन नहीं मुक्ति का मार्ग है, यह बात काफी बाद में समझ में आई और इसके बाद गाने से थोड़ा अपनापा हो ही गया. इतना तो तय है लेकिन कि यह गाना सौंदर्यबोध का गान नहीं मुक्ति का गान है. और यही इसका सौंदर्य है.पिछले दिनों इस मामले में मेरी राय जब गीता श्री के ब्लॉग पर उनकी राय से मिलती न$जर आई तो रुकना लाजिमी था. आज के दौर में सौंदर्यबोध, सौंदर्य प्रतीकों और सौंदर्य को रीडिफाइन करने का वक्त है. कब तक नायिकाओं को चूड़ी, बिंदी, झुमके, पायल जैसे सौंदर्य के उपमानों में उलझना पड़ेगा. आज के दौर में दिन-रात काम में उलझी स्त्रियां, दौड़ती-भागती स्त्रियां यह सुनने को बेकरार नहीं हैं कि आपकी साड़ी बहुत सुंदर है, आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं. वे यह सब सुनकर ठिठक सकती हैं, मुस्कुरा सकती हैं कभी-कभी झल्ला भी सकती हैं लेकिन इससे उनके काम पर कोई असर नहीं पड़ता. अगर कोई उनसे यह कहता है कि आपका काम शानदार है तो उनके चेहरे पर गहरे संतोष की लकीर दिखती है. उनके काम को ताकत मिलती है. गीता श्री की चिंता एकदम जायज है कि जिस वक्त में लड़कियां जींस-टॉप पहनकर दौड़ती हुई स्पीड में काम कर रही हों ऐसे में चूड़ी की खनखनाहट और पायल की रुनझुन जैसे प्रतीक बेमानी ही लगते हैं. आसमान बड़ा हो रहा है. बंधन पिघल रहे हैं. अब तो 'आती हुई लहरों पर जाती हुई लड़की... में सौंदर्य देखना होगा. उसका सौंदर्य उसके सपनों का है, उसकी ताकत उसकी महत्वकांक्षाओं की उड़ान है. गीता श्री का यह ब्लॉग कई मायनों में महत्वपूर्ण है. इसमें कॉन्ट्रीब्यूट करने वालों के पास भी नये जमाने की नई सोच है. अगर महिलाओं को, उनके काम को उनके भीतर के संसार को समझना हो, उनके अंदर की आग को जानना हो तो गीता के नुक्कड़ पर रुककर एक कप चाय पीना अच्छा अनुभव हो सकता है. तो आइये क्लिक करते हैं http://hamaranukkad.blogspot.com- प्रतिभा कटियार

आई नेक्स्ट के एडिट पेज पर प्रकाशित

Saturday, March 21, 2009

काश !


क्यों मुझे बुरी लगती हैं
बुरी लगने वाली बात्तें
क्यों मेरा दिल टूट जाता है
दूसरों पर जब आती हैं विपत्तियाँ
क्यों मुझे रोना आता है....
काश ! मैं काठ का होता
काश ! मैं होता धोबी का पाट
काश ! मैं कंकर, पत्थर, पहाड़ होता...
- डॉ बद्री नारायण

Friday, March 20, 2009



लो देख लो ये वस्ल है, ये हिज्र है, ये इश्क
अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है....

ताकि उम्र भर जिया जा सके


अपनी आंखों से कहो
की हट जायें मेरी आंखों के सामने से
यूँ ही सुबह से शाम तक
रत भर, आँख आँख फिरना
मुझे जरा नहीं suhaata
कह दो की हट जायें
वे मेरे सामने से,
वे इस कदर रौशन हैं
की मेरी आँखें चुन्धियाने लगती हैं
कह दो उनसे
वे इतना शोर न मचाया करें
क्योंकि उनकी पुरजोर आवाजों के बीच
मेरी बेचैन से जिंदगी में
खलल padata है।
कह दो की वे समन्दर बन
लहराया न करें, जहाँ-तहां
उसकी saree लहरें
मेरी पलकों को नम कर जाती हैं।
वे इतनी गहरी हैं
की दिल doobta hi jata है
नहीं-नहीं, कह दो उनसे की
वे इतनी खामोश न रहा करें
उनकी चुप्पी मुझे तरसती है,
बेपनाह उदासी दे जाती है।
कहो अपनी आंखों से
की जुबान बनें
udel den अपनी भाषा के
तमाम अर्थ
मेरी आंखों में।
मैं हलके से
अपनी पलकें झांप लूँगा
उन आँखों समेत
कह दो एक बार
मनुहार करके
की मेरी आंखों के सामने से न haten
क्योंकि ख्यालों में ही सही
मुझें उन आँखों से ही
दुनिया रौशन लगती है।
मेरी आंखों में
सपने जागते हैं कह दो उनसे
की वे डटी रहें, ta-उम्र
मेरी आंखों के सामने
ताकि उम्र भर जिया जा सके।

Monday, March 16, 2009

हर प्रेम


हर प्रेम सबसे पहले यही पूछता है, तुम्हारी चौखट तक आकर....क्या तुम मेरे लिए कूद सकते हो खिड़की से नीचे? कर सकते हो छलनी अपना सीना? हर प्रेम पूछता है यही...उड़ सकते हो क्या मेरे साथ ?
प्रेम जब आता है तुम्हारी चौखट तक, तो जल्दी चले जाने के लिए नहीं....उसे जाना होता है किसी पर्वत या घाटी की तरफ़। समुद्र या नदी की तरफ़। वह बिना किसी पूर्वा योजना के आ निकलता है तुम्हारे घर की तरफ़ और जानना चाहता है, तुम उसके साथ डूबने चल रहे हो या नहीं...

प्रेम तुम्हें भली-भांति मरने की पूरी मोहलत देता है....

- गगन गिल

Saturday, March 14, 2009

अंजुरी भर मरीना

किसी के विचार तो पसंद हो सकते हैं पर उसके नाखूनों का आकर सहन नहीं भी हो सकता है। उसके स्पर्श का प्रतुत्तर तो दिया जा सकता है पर उसके मूल्यवान भावों का नहीं। ये अलग-अलग छेत्र हैं। आत्मा आत्मा से प्रेम करती है, होंठ होंठ से लेकिन अगर आप इन्हें मिलाने लगेंगे, मिलाने का प्रयास करेंगे तो आप सुखी नहीं रहेंगे....मरीना
एक बार डॉक्टर नामवर सिंह ने बेहद भावुक होते हुए कहा था जिसने पिछले जन्मों में खूब सारे पुण्य किए होते हैं वही कविता लिख सकता है। मरीना को पढ़ते हुए हर बार यही लगता है की उसका जन्म सिर्फ़ कवितायें लिखने के लिए ही हुआ था। उनके हिस्से में जितनी यातनाएं आयीं दरअसल वे यात्रायें थीं उनकी कविताओं तक पहुँचने की। एक दिन नंदिनी के ब्लॉग पर पढ़ा था की उसे लगता है की पिछले जनम में वो ही मरीना थी। ऐसा ही कुछ मुझे भी लगता है हमेशा से, बस मैं कह नहीं पायी। उसके हर शब्द को धड़कते हुए महसूस किया है मैंने अपने भीतर। लेकिन हमारे पुण्य जरा कम थे सो हम मरीना नहीं हो पाये, प्रतिभा होकर रह गए। भटक गए इस दुनिया के रेले में/ मेले में। लेकिन कहीं कुछ था जो हमरे गुनाहों से बड़ा था। मरीना न हो पाने के गुनाहों से बड़ा तभी तो मरीना अपनी रचनाओं समेत हमारे भीतर प्रवेश कर गयीं। अनजाने देश की, अनजानी सी वो औरत हमरे भीतर धड़कने लगी, साँस लेने लगी। उनका जीवन अपना जीवन लगने लगा। एक-एक शब्द जैसे मैं ही तो हूँ। कभी-कभी किसी से मिलना, बात करना ख़ुद से मिलना होता है। अपनी ही आवाज में ख़ुद को पुकारना, अपने आपको सुनना। मरीना से मिलना हमेशा ऐसा ही होता है। हाँ, एक जगह हारती हूँ। कभी-कभी जब जरा सी तकलीफ से आँख भर आती है, जब दुनिया जीने नहीं देती अपनी तरह से। फ़िर लौटती हूँ मरीना के पास। सीखती हूँ दुखों को सहेजना, उन्हें अपनी शक्ति बनाना। उनसे वाबस्ता होते हुए अपनी तलाश करना। जिंदगी ऐसे ही तो जी जाती है। दुःख दरअसल सबसे बड़ी पूँजी है। ये वो समन्दर है जो अपने भीतर ढेर सारे हीरे, मोटी , शंख, सीप समेटकर लाता है। इस समन्दर में गहरे उतरने का हुनर, अपने दुःख की हिफाजत करने का हुनर, आंसू नही, शब्दों में ढलने का हुनर मरीना से बेहतर कौन जानता है भला। दर्द का मीठा सा अहसास मरीना के शब्द संसार में बिखरा पड़ा है। बुखार में तपती नन्ही आल्या (उनकी बिटिया ) के सिरहाने बैठकर निराशा, गरीबी, असुरक्षा से घिरी मरीना ही कवितायें लिख सकती थी... ऐसा लगता है मरीना के दर्द को बूँद-बूँद पिया है मैंने...जिया है मैंने...
आज एक मित्र ने फ़ोन पर मरीना का जिक्र करके उन्हें मेरे भीतर फ़िर से जगा दिया। भावुक, शोख, चंचल, जिद्दी, समझदार, नादाँ प्यारी सी मरीना। मरीना एक अहसास है जो न जाने कितने ही दिलों में धड़क रहा है...

Friday, March 13, 2009

वो लम्हे...

आसमान इतना साफ़ कभी नहीं लगा। जैसे अभी-अभी धोकर सुखाया गया हो जैसे-जैसे हम शहरों से दूर जाते हैं आसमान, हवा, नहरें, सब ज्यादा साफ़ होते जाते हैं। मन भी। उस रोज का आसमान अगर ज्यादा साफ़ लग रहा था तो इसके कई पर्यावरण के कारण तो थे ही साथ ही मन का साफ़ होना भी एक कारन था। दूर-दूर तक फैले गेहूं के खेतों के बीचोबीच खड़े होकर आसमान देखने का मौका ही कितना मिलता है। अब इस आसमान में एक और द्रश्य था जो इसे कमाल का बना रहा था। इस छोर से उस छोर तक फैले आसमान पे चाँद और सूरज को आमने सामने आते देखना खूबसूरत था। मानो सूरज जाने को तैयार न हो और चाँद पहले से आ धमका हो। उनकी इस लडाई का गवाह बन रहा था ख़ुद आसमान और वो नहर जिसमे चाँद और सूरज का अक्स झांक रहा था। पूरनमाशी का ये चाँद होली का चाँद था। खूब ujla ....खूब साफ ....

Sunday, March 8, 2009

हम हैं तो जग है....

किस तरह भरूं मैं अपनी उड़ान
ये आसमान तो बहुत कम है....

Saturday, March 7, 2009

मेरे हुए सारे पलाश!

मेरे घर से ऑफिस के बीच कई सारे पलाश के पेड़ पड़ते है। इन दिनों पलाश के पेड़ फूलों से जिस कदर लदे नजर आते हैं, मन वहीँ कहीं अटक सा जाता है। ऐसा लगता है हम तो वहां से चले आते हैं पर हमारा एक हिस्सा वहीँ कहीं ठहर जाता है। दिल में रोज ये ख्याल आता की कभी तो कोई पलाश टूटकर मेरे ऊपर गिरे। मन तो ये भी करता की गाड़ी किनारे खड़ी करुँ और ढेर सारे पलाश अपने आँचल में भर लूँ। लेकिन एक झूठमूठ का वहम घेर लेता की लोग क्या कहेंगे। लेकिन मेरी उन फूलों से रोज बात होती थी। मैं उनसे मन ही मन शिकायत करती की तुम्हें मेरे पास आने से किसने रोका है, तुम्हें कोई कुछ भी नहीं कहेगा.... मन में कितनी ही बेचैनिया हों इन रास्तों से गुजरते हुए इन दिनों मन अपने आप महक उठता है । कितनी छोटी-छोटी सी होती हैं ख्वाहिशें और उससे भी छोटी होती हैं उन तक पहुँचने के दरमियाँ की वजहें। हम उन्हें पार ही नहीं कर पाते। इसीलिए जिंदगी इतने करीब होते हुए भी हमसे दूर चली जाती है। खैर, अब तक जो मेरी बात होती थी उन पलाश के फूलों से, वो जाया नहीं गई। कल जैसे ही मैं उन फूलों के करीब से गुजर रही थी एक प्यारा सा फूल, पलाश का फूल मेरे सर पर गिरते हुए आँचल में ठहर गया। यकीन नहीं आता न, लेकिन सचमुच कभी-कभी ऐसा हो जाता है। बात बहुत जरा सी है लेकिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जैसे कोई सपना पूरा हो जाना, जैसे कोई खजाना मिल जाना, जैसे जिंदगी से मुलाकात हो जाना, जैसे किसी ने मौसम भेज दिया हो तोहफे में। ऐसा लगा की अब से दुनिया के सारे पलाश के फूल मेरे हुए। मानने में क्या हर्ज है, खुश होने में क्या हर्ज है? जाने क्यों पलाश के फूल मुझे बचपन से ही बड़े अच्छे लगते हैं। बचपन में कोई कहानी सुनी थी की एक लड़की का प्रेमी उसे वादा करके गया था की जब पलाश का पेड़ फूलों से भर जाएगा तब वो जरूर लौटेगा। वो लड़की पूरे साल, एक-एक दिन पलाश के पेड़ को बड़ी उम्मीद से ताकती है, उसके लिए वो फूल नहीं, जिंदगी थी.....फूल खिले....खूब खिले.....प्रेमी लौटा की नहीं....ये तो अब याद नहीं लेकिन उस लड़की का इंतजार, और पलाश के फूलों की अहमियत मेरे साथ हो ली। जब भी इन फूलों को देखती हूँ लगता है कहीं किसी का इंतजार फल रहा है....पलाश के फूल बहुत कम समय के लिए ही खिलते हैं। अब तक जल्वेरा या रेड रोजेस की तरह इन्हें फूलों की दुकानों पर बिकते भी नहीं देखा। भला इतनी अनमोल नियामत कोई कैसे खरीद पायेगा। इसकी कीमत तो सदियों के इंतजार में, जन्मों की मोहब्बत पिरोकर ही अदा की जा सकती है। वो लड़की अपने इंतजार में गाया करती थी की जब जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के लिए ले आना तुम.....
बहरहाल, कल की एक छोटी सी बात ने बड़ी सी खुशी दी....ऐसी ही तो है जिंदगी.....छोटी-छोटी बातों में बड़ी-बड़ी-बड़ी खुशियाँ.....

Tuesday, March 3, 2009

चारों ओर है तालिबान

उड़ने की, आसमान की ऊंचाइयों, आसमान के विस्तार को पार करने की स्ट्रांग फीलिंग किसमें होती है? उस पक्षी में जो पिंजड़े में होता है। रात-दिन, सोते-जागते उसे बस आसमान दिखता है। भूख, प्यास तक उसके लिए इंपॉर्टेट नहीं रहती. ऐसी ही कामना, उड़ने की ऐसी ही विलपावर पिछले दिनों दिखी पाकिस्तान (स्वात घाटी) की लड़कियों में. वे देश की तकदीर बदल देना चाहती हैं. पॉलिटिक्स, मेडिकल, इंजीनियरिंग, सेना हर जगह की कमान अपने हाथ में लेना चाहती हैं. आंखों में चमक है और दिल में ह़जारों ख्वाहिशें. जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान का कब्जा हो चुका है. सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में खलबली है, अब क्या होगा? हवा में हथियार लहराते हुए अपनी विजय का पर्व मनाते उन खूंखार लोगों को देखकर न जाने क्यों लगा कि इनके इस जश्न पर उस मासूम लड़की की एक मुस्कान भारी है. दुनिया का कोई भी खौ़फ अगर सपनों को आखों में आने से रोक नहीं पाता है तो य़कीन मानिए उसकी उम्र ज्यादा नहीं है. बहरहाल, आज सवाल यह भी है कि क्या तालिबान का कब्जा सिर्फ स्वात में हुआ है, वह भी अभी? क्या होता है तालिबान? कैसे होते हैं तालिबान के नाम पर दहशत पैदा करने वाले लोग? जितना मेरी समझ में आता है उसके हिसाब से तो मुझे यह तालिबान हर जगह ऩजर आता है. हिंदुस्तान में, अमेरिका में, बांग्लादेश में, पाकिस्तान में हर जगह. हमारे घर में, घर से बाहर निकलते ही, सड़कों पर, चौराहों पर, दफ्तरों में. कहां नहीं है तालिबान? हर वक्त, हर मोड़ पर किसी न किसी रूप में शिकंजा कसने की कवायद लगातार चल रही है. मंगलौर में जो हुआ उसे भला और क्या नाम दिया जा सकता है? वैलेंटाइंस डे पर पार्को में, सड़कों पर जो होता है, वो क्या है? सौम्या विश्वनाथन के साथ जो हुआ, वो क्या था? वह तो काम के बाद घर लौट रही थी. मुझे याद है उसकी हत्या के बाद किस तरह की बातें हुई थीं. उन बातों में मुख्य बात यह थी कि एक लड़की होने के नाते उसे देर रात निकलना ही नहीं चाहिए था. एक न्यूजपेपर ने तो सौम्या के कैरेक्टर का पोस्टमार्टम करने से भी गुरेज नहीं किया था. यानी उसके साथ जो हुआ, वह ठीक ही हुआ. गोया कि कोई लड़की सिर्फ इसलिए मार दी जा सकती है क्योंकि उसका कैरेक्टर गड़बड़ है. किसी लड़की के बारे में कुछ भी अनाप-शनाप बकवास करना, क्या पत्थर मारकर घायल करने या मार डालने की सजा से कम बड़ी सजा है? हर मोड़ पर कोई न कोई कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने को तैयार खड़ा है. क्या तालिबानी सोच का ही दूसरा संस्करण नहीं हैं ये लोग? हद तो यह है कि जहां इन लोगों को घर से बाहर निकलने वाली सारी औरतों को कैरेक्टरलेस कहने में कोई संकोच नहीं है, वहीं दूसरी ओर घर में रहने वाली औरतों के बारे में भी कोई खास अच्छी राय नहीं है इनकी. पढ़े-लिखे समाज में ये चेहरे इस कदर डिजॉल्व हो चुके हैं कि इन्हें पहचानना भी मुश्किल है. एक सूडोइज़्म हर जगह है. वो कहते हैं, हम तुम्हारे साथ हैं, तुम चलो॥पर ऐसे नहीं, वैसे॥इतनी तेज नहीं ़जरा धीरे, इधर नहीं उधर..यह कैसी डेमोक्रेसी है, जहां आजादी के बाद बंदिशें और बढ़ रही हैं? मुझे लगता है कि वह दुश्मन फिर भी ठीक है, जिसका चेहरा आप पहचान सकते हैं. ऐसे दुश्मन तो और भी खतरनाक हैं, जो दोस्त बनकर गला काट रहे हैं. हर वक्त एक घुटन, उदासी, उपेक्षा और नकारेपन का अहसास करा रहे हैं. पाकिस्तान में तालिबान के घुसने के बाद हम सब कम से कम वहां के लोगों की स्थिति को समझने की कोशिश तो कर रहे हैं, कुछ हद तक ही सही लेकिन अपने आसपास के तालिबानी चेहरों को पहचान पा रहे हैं क्या? तालिबान और कुछ नहीं एक क्रूर सोच है जो हर सूरत में अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहती है. अपने नियम, ़कायदे, कानूनों में लोगों को जकड़ देती है. जिसका शिकार सबसे ज्यादा औरतें होती हैं. वक्त आ गया है खुद को समझने का, अपने भीतर जन्म लेती तालिबानी सोच को झटककर फेंक देने का. साथ ही आसपास उग आये तालिबानी चेहरों के इरादों को नाकाम करते हुए इस आसमान की ऊंचाइयों से भी पार....
- प्रतिभा कटियार

आई नेक्स्ट के एडिट पेज पर प्रकाशित लेख...

Monday, March 2, 2009

एक दिन

प्यार
पीड़ा ही छोड़ जाता है एक दिन
इस पीड़ा को अर्थ देने में
फ़िर बीतती है जिंदगी
धूप की, फूल की
हलकी उड़ती हवा की
भाषा समझ में आने लगती है
प्यार तरह-तरह से
उद्भाषित होता है
डूब जाता है शब्द
अर्थ में.....