Friday, September 18, 2009

चुनौती

तुम मुझे
चारों तरफ से बांध दो
छीन लो
मेरी पुस्तकें और चुरुट
मेरा मुंह धूल से भर दो
कविता मेरे धड़कते ह्रदय का रक्त है
मेरी रोटी का स्वाद है
और आंसुओं का खारापन है
यह लिखी जायेगी नाखूनों से
आंखों के कोटरों से
छुरों से
मैं इसे गाऊंगा
अपनी कैद-कोठरी में
स्नानघर में
अस्तबल में
चाबुक के नीचे
हथकडिय़ों के बीच
जंजीरों में फंसा हुआ
लाखों बुलबुले मेरे भीतर हैं
मैं गाऊंगा
मैं गाऊंगा
अपने संघर्ष के गीत।
- महमूद दरवेश

5 comments:

raj said...

apki kuchh ek kavitaye padhi kuchh to baat hai enme....achhi lagi..na haar man lene ki zidd achhi lagi....

सुशीला पुरी said...

mahmud davesh ki kavita likhne ke liye bahut dhanyabad........

Kishore Choudhary said...

फिलिस्तीन के आशिक की कविता...
प्रतिभा जी बहुत आभार !

पारूल said...

मैं गाऊंगा
मैं गाऊंगा अपने संघर्ष के गीत। yahi svar hona chaahiye...thx padhvane ka pratibha

rohit said...

prem ke sath sath sangharsh se bhi nikharti hai kavita. sangharsh se upja geet hi to jeevan ka geet hai.
achhi lagi darvesh ki kavita.apko badhayi

Rohit Kaushik